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बुधवार, 31 जनवरी 2018

चंद्रग्रहण 2018 किन 9 राशि के जातक पर भारी पड़ेगा



Chandra Grahan 2018: आज साल 2018 का पहला चंद्रग्रहण हो रहा है। आज के इस चंद्रग्रहण पर एक विशेष संयोग बन रहा है। इस दिन 176 साल बाद पुष्य नक्षत्र का योग बन रहा है। साथ ही इस दिन चांद सामान्य से 14 प्रतिशत बड़े आकार में और 30 प्रतिशत ज्यादा चमकदार दिखाई देगा। इस ग्रहण से 12 राशियों पर अलग-अलग असर पड़ेगा। लेकिन 9 राशियों पर इसका असर ज्यादा रहेगा। आइए जानते हैं किन 9 राशि के जातक पर भारी पड़ेगा यह चंद्रग्रहण-

1. मिथुन- मिथुन राशि के जातक को आज के दिन थोड़ी सावधानी बरतने की जरूरत है। आज आपको पैसों की तंगी से परेशान होना पड़ सकता है। आर्थिक निवेश करने के लिए आज का समय अनुकूल नहीं है। किसी जरुरी काम से बाहर जा सकते हैं लेकिन वह काम पूरा नहीं हो पाएगा।

2. कर्क – कर्क राशि के जातक को आज सावधान रहना होगा। आज वाहन चलाते समय सावधानी अधिक बरतें। आज के दिन आपको चोट लग सकती है या किसी अन्य बीमारी की चपेट में आ सकते हैं इसलिए आज इन बातों का ध्यान रखें। जल्दबाजी से बचें।


3. सिंह – चंद्र ग्रहण से सिंह राशि के जातक को आर्थिक परेशानी हो सकती है। मानसिक परेशानी हो सकती है। परिवार में अशांति का माहौल रहेगा। किसी के साथ झगड़ा हो सकता है। आर्थिक नुकसान हो सकता है।

4. तुला – तुला राशि के लिए ग्रहण ठीक नहीं होगा। किसी काम को पूरा करने के लिए आज आपको अधिक मेहनत करनी पड़ेगी। पारिवारिक समस्याएं हो सकती है। स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो सकती है। मानसिक तनाव से ग्रस्त रहेंगे।

5. वृश्चिक – ग्रहण के प्रभाव से आपको परेशानी हो सकती है। आपके कार्य में बाधा आ सकती है। गलतफहमी का शिकार हो सकते हैं। भाग्य के भरोसे रहने से काम में देरी या असफल हो सकते हैं।


6. धनु – ग्रहण से धनु राशि के जातक को काम में अनेक चुनौतियां का सामना करना पड़ सकता है। आज आकस्मिक धन हानि हो सकती है। कानूनी मामलों में परेशानी हो सकती है या मुश्किलें में घिर सकते हैं।

7. मकर – मकर राशि के जातक पर ग्रहण का असर उनके दांपत्य जीवन पर पड़ेगा। नौकरी में समस्याएं आ सकती है। कारोबार में नुकसान हो सकता है। आर्थिक परेशानी आ सकती है। जीवनसाथी के साथ मनमुटाव हो सकता है। स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो सकती है।

8. कुंभ – कुंभ राशि के जातक की आज सेहत खराब हो सकती है। आर्थिक तंगी से परेशान होना पड़ सकता है। कार्य में अधिक परिश्रम करना पड़ेगा।

9. मीन – आज आपके खर्चे बढ़ सकते हैं। नौकरी में कार्यभार बढ़ सकता है। आर्थिक नुकसान हो सकता है। किसी से वाद-विवाद होने की संभावना है। किसी से विश्वासघात मिल सकता है।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

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मंगलवार, 30 जनवरी 2018

अष्टभुजा धाम इस मंदिर में बिना सिर वाली मूर्तियों की होती है पूजा



उत्तरप्रदेश के एक ऐसे मंदिर के बारे में, जहां देवी-देवताओं की ज्यादातर मूर्तियों पर सिर ही नहीं है। वैसे तो लोग खंडित मूर्तियों की पूजा नहीं करते हैं, लेकिन यहां इन मूर्तियों को 900 सालों से संरक्षित किया जा रहा है और इनकी पूजा भी की जाती है।

यह मंदिर उत्तरप्रदेश की राजधानी से 170 किमी दूर प्रतापगढ़ के गोंडे गांव में स्तिथ है। यह मंदिर लगभग 900 साल पुराना हैं। अष्टभुजा धाम मंदिर की मूर्तियों के सिर औरंगजेब ने कटवा दिए थे। शीर्ष खंडित ये मूर्तियां आज भी उसी स्थिति में इस मंदिर में संरक्षित की गई हैं।

ASI के रिकॉर्ड्स के मुताबिक, मुगल शासक औरंगजेब ने 1699 ई. में हिन्दू मंदिरों को तोड़ने का आदेश दिया था। उस समय इसे बचाने के लिए यहां के पुजारी ने मंदिर का मुख्य द्वार मस्जिद के आकार में बनवा दिया था, जिससे भ्रम पैदा हो और यह मंदिर टूटने से बच जाए।

मुगल सेना इसके सामने से लगभग पूरी निकल गई थी, लेकिन एक सेनापति की नजर मंदिर में टंगे घंटे पर पड़ गई। फिर सेनापति ने अपने सैनिकों को मंदिर के अंदर जाने के लिए कहा और यहां स्थापित सभी मूर्तियों के सिर काट दिए गए। आज भी इस मंदिर की मूर्तियां वैसी ही हाल में देखने को मिलती हैं।

मंदिर की दीवारों, नक्काशियां और विभिन्न प्रकार की आकृतियों को देखने के बाद इतिहासकार और पुरातत्वविद इसे 11वीं शताब्दी का बना हुआ मानते हैं। गजेटियर के मुताबिक, इस मंदिर का निर्माण सोमवंशी क्षत्रिय घराने के राजा ने करवाया था। मंदिर के गेट पर बनीं आकृतियां मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध खजुराहो मंदिर से काफी मिलती-जुलती हैं।

इस मंदिर में आठ हाथों वाली अष्टभुजा देवी की मूर्ति है। गांव वाले बताते हैं कि पहले इस मंदिर में अष्टभुजा देवी की अष्टधातु की प्राचीन मूर्ति थी। 15 साल पहले वह चोरी हो गई। इसके बाद सामूहिक सहयोग से ग्रामीणों ने यहां अष्टभुजा देवी की पत्थर की मूर्ति स्थापित करवाई।

इस मंदिर के मेन गेट पर एक विशेष भाषा में कुछ लिखा है। यह कौन-सी भाषा है, यह समझने में कई पुरातत्वविद और इतिहासकार फेल हो चुके हैं। कुछ इतिहासकार इसे ब्राह्मी लिपि बताते हैं तो कुछ उससे भी पुरानी भाषा का, लेकिन यहां क्या लिखा है, यह अब तक कोई नहीं समझ सका।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

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शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

समस्याओं को दूर करने के ज्योतिषीय उपाय

समस्याओं को दूर करने के ज्योतिषीय उपाय 


व्यक्ति के जीवन में कुछ न कुछ समस्याएं जरूर रहती हैं। कभी कोई समस्या जल्दी खत्म हो जाती है तो कोई समस्या लंबे समय तक बनी रहती है। कुछ लोग इसे अपना दुर्भाग्य समझने लगते हैं। इन समस्याओं का निदान छोटे-छोटे ज्योतिषीय उपाय करने से हो सकता है। जरूरत है तो बस उन पर पूरी तरह विश्वास करने की। आज हम आपको ऐसे ही छोटे-छोटे उपायों के बारे में बता रहे हैं जो आपके दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदल सकते हैं।

1. लगातार धन हानि हो रही हो और असफलता पीछा नहीं छोड़ रही हो तो परेशान व्यक्ति के सिर से पैर तक एक लाेटा पानी 7 बार उतारें। कर पानी सहीत वो लोटा श्मशान में गाड़ दें।
2. किसी काम के लिए घर से निकलते वक्त पहले विपरीत यानी उल्टी दिशा में 4 कदम चलें।
3. सोमवार या शुक्रवार को मछलियों के लिए आटे की गोलियां बना कर नदी या तालाब में डालें
4. रोज हनुमान जी की मूर्ति के बाएं पैर का सिंदूर सिर पर लगाएं। रोज न हो पाए तो मंगलवार और शनिवार को करें।
5. सरसों के तेल में मीठे भजिए तलें और गरीबों को बांट दें।
6. अपने खाने की थाली में से एक रोटी गाय और एक कुत्ते के लिए निकालें।
7. आधे सुखे नारियल में चीनी भरकर कच्ची जमीन में दबा दें। सारी परेशानियां खत्म हो जाएंगी।जिस बर्तन से घर के लोग पानी पीते हैं उसमें से थोड़ा-सा पानी लेकर उसमें गंगा जल मिलाकर घर के चारों कोनों में छींट दें। बचा हुआ पानी घर के बीच वाले स्थान पर डाल दें। ये उपाय सूर्योदय के समय करें।


शनिवार, 13 जनवरी 2018

लोहडी क्यों और कब मनाई जाती है इसकी कुछ रोचक बाते

लोहडी क्यों और कब मनाई जाती है इसकी कुछ रोचक बाते


 लोहडी को पंजाबी और हरियाणवी लोग बहुत उल्लास से मनाते हैं। पारंपरिक तौर पर लोहडी फसल की बुआई और उसकी कटाई से जुडा एक विशेष त्यौहार है। यह मकर संक्रान्ति के एक दिन पहले मनाया जाता है। मकर संक्रान्ति की पूर्वसंध्या पर इस त्यौहार का उल्लास रहता है। इन दिनों देशभर में पतंगों का ताता लगा रहता हैं। देश में भिन्न-भिन्न मान्यताओं के साथ इन दिनों त्योहार का आनंद लिया जाता है। इस दिन सभी अपने घरों और चौराहों के बाहर लोहड़ी जलाते हैं। आग का घेरा बनाकर दुल्ला भट्टी की कहानी सुनाते हुए रेवड़ी, मूंगफली और लावा खाते हैं। इस दिन सब एक-दूसरे से मिलकर इस खुशी को बाटते है।

कब मनाया जाता हैं लोहडी का त्योहार
लोहडी पौष माह की अंतिम रात को एवम मकर संक्राति की सुबह तक मनाया जाता हैं यह 12 अथवा 13 जनवरी को प्रति वर्ष मनाया जाता हैं। इस साल 2018 में यह त्यौहार 13 जनवरी, दिन शनिवार को मानाया जायेगा।

कैसे मनाते हैं लोहड़ी--
पारंपरिक तौर पर लोहड़ी फसल की बुआई और उसकी कटाई से जुडा एक विशेष त्यौहार है। इस दिन अलाव जलाकर उसके इर्दगिर्द डांस किया जाता है। लउके भांगडा करते है और लडकियां और महिलाएं गिद्धा करती है। इस दिन विवाहिता पुत्रियों को मां के घर से त्योहार (वस्त्र, मिठाई, रेवड़ी, फलादि) भेजा जाता है। वहीं, जिन परिवारों में लडक़े का विवाह होता है या जिन्हें पुत्र प्राप्ति होती है, उनसे पैसे लेकर मुहल्ले या गांव भर में बच्चे ही रेवड़ी बांटते हैं।

क्यों मनाया जाता लोहडी है-
यह त्योहार सर्दियों के जाने और बंसत के आने का संकेत है। इसलिए लोहड़ी की रात सबसे ठंडी मानी जाती है। इस दिन पंजाब में अलग ही रौनक देखने को मिलती है। लोहड़ी को फसलों का त्योहार भी कहते हैं क्योंकि इस दिन पहली फसल कटकर तैयार होती है। पवित्र अग्नि में कुछ लोग अपनी रवि फसलों को अर्पित करते हैं। ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से फसल देवताओं तक पहुंचती है।

कहां से आया लोहड़ी शब्द--
अनेक लोग मानते हैं कि लोहड़ी शब्द लोई (संत कबीर की पत्नी) से उत्पन्न हुआ था, लेकिन कई लोग इसे तिलोडी से उत्पन्न हुआ मानते हैं, जो बाद में लोहडी हो गया। वहीं, कुछ लोग यह मानते है कि यह शब्द लोह’ से उत्पन्न हुआ था, जो चपाती बनाने के लिए प्रयुक्त एक उपकरण है।

पौराणिक एवम एतिहासिक कथा--
पुराणों के आधार पर इसे सती के त्याग के रूप में प्रतिवर्ष याद करके मनाया जाता हैं। कथानुसार जब प्रजापति दक्ष ने अपनी पुत्री सती के पति महादेव शिव का तिरस्कार किया था और अपने जामाता को यज्ञ में शामिल ना करने से उनकी पुत्री ने अपनी आपको को अग्नि में समर्पित कर दिया था। उसी दिन को एक पश्चाताप के रूप में प्रति वर्ष लोहडी पर मनाया जाता हैं और इसी कारण घर की विवाहित बेटी को इस दिन तोहफे दिये जाते हैं और भोजन पर आमंत्रित कर उसका मान सम्मान किया जाता हैं। इसी खुशी में श्रृंगार का सामान सभी विवाहित महिलाओ को बांटा जाता हैं।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

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शनिवार, 6 जनवरी 2018

भगवान शिव को क्यों कहते है नीलकंठ

भगवान शिव को क्यों कहते है नीलकंठ

भगवान शिव का ध्यान करने से ही एक ऐसी छवि उभरती है जिसमें वैराग है। इस छवि के हाथ में त्रिशूल, वहीं दूसरे हाथ में डमरु, गले में सांप और सिर पर त्रिपुंड चंदन लगा हुआ है। किसी भी शिव मंदिर या मूर्ति में भगवान शिव के पास ये चार चीजें हमेशा मिलती हैं। कई सवाल इसके साथ जुड़े हैं कि भगवान शिव के साथ ही ये सब चीजें प्रकट हुई थी। इन सवालों का ये भी उत्तर हो सकता है कि समय के साथ और अलग-अलग घटनाओं के साथ भगवान शिव के साथ ये सब जुड़ता गया हो। भगवान शिव की जटाओं में अर्ध चंद्रमा, सिर से निकलती गंगा आदि ऐसी कितनी बातें हैं जो भगवान शिव को रहस्यमयी बनाती हैं। इसी के साथ भगवान शिव का कंठ नीला पाया जाता है और उन्हें नीलकंठ नाम से भी जाना जाता है। भगवान शिव के नीले कंठ वाले बनने के पीछे एक कथा प्रचलित है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार माना जाता है कि क्षीरसागर के मंथन के समय कई महत्वपूर्ण वस्तुएं प्रकट हुई थी जैसे कल्पवृक्ष, कामधेनु गाय आदि प्रकट हुए और उन्हें देवों और राक्षसों के बीच बांटा गया। क्षीरसागर से अमृत प्राप्त होने पर देवताओं ने चलाकी से उसे ले लिया था। मंथन के दौरान सागर में से भयंकर विष निकला, ये इतना शक्तिशाली था कि उसकी एक बूंद से पूरा संसार नष्ट हो सकता था। इससे सभी देवता और राक्षस डर गए और उनमें प्राण बचाने के लिए खलबली मच गई थी। इसका हल पाने के लिए सभी ने भगवान शिव से प्रार्थना करी।

संसार की समस्या से निपटने के लिए भगवान शिव ने विष का पान कर लिया। इस विष को गले से नीचे ना जाने देने के लिए माता पार्वती भगवान शिव के गले में विराजमान हो गई। जिसके कारण भगवान शिव का गला नीला हो गया और उसके बाद से उन्हें नीलकंठ के नाम से जाना जाने लगा। संपूर्ण मानव जाति की रक्षा के लिए भगवान शिव ने विष को ग्रहण कर लिया था।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

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धन की कमी दूर करने के उपाय



शास्त्रानुसार प्रत्येक पूर्णिमा पर प्रात: दस बजे पीपल वृक्ष पर मां लक्ष्मी का फेरा लगता है। इसलिए जो व्यक्ति आर्थिक रूप से परेशान हो, वो इस समय पीपल के वृक्ष के पास जाये, उसका पूजन करें, जल चढ़ाये और लक्ष्मी जी की उपासना करे और कम-से-कम कोई भी एक लक्ष्मी मंत्र की एक माला करके आएं।
किसी भी शुभ मुहूर्त या अक्षय तृतीया या पूर्णिमा या दीपावली या किसी अन्य मुहूर्त में सुबह जल्दी उठें। सभी आवश्यक कार्यों से निवृत्त होकर लाल रेशमी कपड़ा लें। अब उस लाल कपड़े में चावल के 21 दानें रखें। ध्यान रहें चावल के सभी 21 दानें पूरी तरह से अखंडित होना चाहिए यानि कोई टूटा हुआ दान न रखें। उन दानों को कपड़े में बांध लें। इसके बाद धन की देवी माता लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजन करें। पूजा में यह लाल कपड़े में बंधे चावल भी रखें। पूजन के बाद यह लाल कपड़े में बंधे चावल अपने पर्स में छुपाकर रख लें। ऐसा करने पर कुछ ही समय में धन संबंधी परेशानियां दूर होने लगेंगी।

ध्यान रखें कि पर्स में किसी भी प्रकार की अधार्मिक वस्तु कतई न रखें। इसके अलावा पर्स में चाबियां नहीं रखनी चाहिए।
सिक्के और नोट अलग-अलग व्यस्थित ढंग से रखे होने चाहिए। किसी भी प्रकार की अनावश्यक वस्तु पर्स में न रखें। इन बातों के साथ ही व्यक्ति को स्वयं के स्तर भी धन प्राप्ति के लिए पूरे प्रयास करने चाहिए।

पैसों का कोई जुगाड़ न बन रहा हो तथा घर में दरिद्रता का वास हो तो एक पानी भरे घड़े में राई के पत्ते डालकर इस जल को अभिमंत्रित करके जिस भी किसी व्यक्ति को स्नान कराया जाएगा उसकी दरिद्रता रोग नष्ट हो जाते हैं।

किसी भी सप्ताह के रविवार को एक गिलास दूध का तांत्रिक उपाय करेंगे तो आप पैसों का सुख प्राप्त करने लगेंगे। यह तांत्रिक उपाय करने के लिए आपको रविवार की रात को सोते समय 1 गिलास में दूध भरकर अपने सिर के पास रखकर सोना है। इसके लिए ध्यान रखें कि नींद में दूध ढुलना नहीं चाहिए। सुबह उठने के बाद नित्य कर्मों से निवृत्त हो जाएं। इसके बाद इस दूध को किसी बबूल के पेड़ की जड़ में डाल दें। ऐसा हर रविवार की रात की करें। यह एक तांत्रिक उपाय है और इससे आपके ऊपर लगी बुरी नजर दूर होगी। नकारात्मक शक्तियों का असर खत्म होगा और कार्यों में सफलता मिलने लगेगी। पैसों की कमी दूर हो जाएगी।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

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