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मंगलवार, 17 जनवरी 2017

Body signs (symptoms Maritime) more than women characterized



 Body signs (symptoms Maritime) more than women characterized

ऋषि पाराशर ने सामुद्रिक लक्षणों के आधार पर स्त्रयों के शरीर पर मंगल और अशुभ चिन्ह बताए हैं। उनमें से कुछ शुभ चिन्हों के बारे में हम यहां चर्चा करेंगे।

तिल: 
आमतौर से पुरूष के शरीर के दाएं अंगों पर तिल शुभ माना जाता है। स्त्रयों के बाएं अंग पर तिल शुभ माना जाता है। हर अंग पर तिलों के अलग-अलग प्रभाव माने गए हैं। ऎसा माना जाता है कि भगवान शंकर ने माता पार्वती को यह रहस्य बताए थे। भौहों के मध्य में तिल या ललाट के मध्य में रक्तवर्ण तिल राज्यप्रद माना गया है तथा गाल पर तिल हो तो नित्य मिष्ठान और भोजन प्राप्त होते हैं। नाक पर तिल या लाल चिन्ह हो तो वह राजपत्नी होती है। यदि नाक पर काले रंग का दाग हो तो विधवा हो जाती है या निन्दित होती है। नाभि के नीचे स्त्री और पुरूष के सब चिन्ह शुभ माने गए हैं। कान, गाल या कंठ पर तिल हो तो प्रथम संतान पुत्र होती है। जिसके जांघ में तिल होता है उसको दु:ख मिलता है।

तलुआ: 
स्त्री के तलुए चिकने, मुलायम, पुष्ट तथा सम हों अर्थात् न छोटे हों न ब़डे हों, पसीने रहित हों और गरम हों तो सुख भोगने वाली होती है। कटे-फटे, रूखे, मांसहीन तलुए दु:ख देने वाले होते हैं। तलुए में शंख, स्वस्तिक, चक्र, कमल, ध्वज, मत्स्य या छाते के चिन्ह हों तो वह रानी और सुख भोगने वाली होती है परन्तु तलुए में सांप, चूहा, कौआ या विचित्र चिन्ह हो तो दु:ख भोगने वाली और धनहीन होती है।

नाखून:
 लाल, चिकने, ऊंचे और गोल नाखून से सुख मिलता है तथा फटे और काले नाखून से दु:ख मिलता है

अंगूठा: 
पैर का अंगूठा उन्नत, पुष्ट और गोल हो तो सुखदायक, टेढ़ा, छोटा और चिपटा हो तो दु:ख देने वाला होता है

पैर की अंगुली: 
कोमल, घनी, गोल और पुष्ट अंगुली सुख देने वाली तथा लम्बी तथा पतली अंगुली अशुभ मानी गई है।

स्त्री या पुरूष की छोटी अंगुली अल्पायु, छोटी-ब़डी अंगुलियां हों तो स्वभाव दोष और कपट आता है, चिपटी अंगुली दासकर्म कराती है और छिद्र वाली अंगुली धनहीन बनाती है। अंगुली एक-दूसरे पर चढ़ी हो तो विधवा होकर दूसरे के आश्रित हो जाती है।

चाल: 
जिस स्त्री के चलने से पीछे से मार्ग में धूल उ़डे वह अपने सभी कुलों को कलंकित करने वाली होती है। यदि किसी स्त्री की कनिष्ठा अंगुली भूमि का स्पर्श ना करे तो वह एक पति का नाश कर दूसरा पति करती है। इसी भांति पैर का पृष्ठ भाग ऊंचा, पसीना रहित, पुष्ट, चिकना और कोमल हो तो वह रानी होती है अगर विपरीत हो तो दरिद्रता आती है। रोम सहित पैर का ऊपर का भाग या मांसहीन हो तो उसे अशुभ माना गया है। पैर का पिछला भाग यानि ऎ़डी समान हो तो शुभ माना गया है अगर यह भाग मोटा हो तो अशुभ, ऊंचा हो तो निन्दित और लम्बा हो तो दु:ख लाने वाला होता है।

कटि (कमर):-
चौबीस अंगुल कटि और ऊंचा नितम्ब सौभाग्यदायक माना गया है। अगर कटि प्रदेश टेढ़ा, चपटा, लम्बा मांसरहित हो, छोटा हो और रोमयुक्त हो तो अशुभ माना गया है और वैधव्य देने वाला होता है।

नाभि प्रदेश: 
स्त्री की नाभि गहरी, दाहिनी तरफ घूमी हुई तो सब सुख देने वाली मानी गई है। ऊपर को उठी हुई ग्रंथि तथा वामावर्त वाली नाभि अशुभ फल देने वाली होती है।

कुक्षि: 
ऊंची कुक्षि संतानोत्पत्ति में बाधक है। कुक्षि में बल या आवर्त (भंवर) उसे नौकरी करा सकता है। हथेली: मध्य में ऊंची, अंगुली मिलाने से छिद्रहीन, कोमल और थो़डी रेखाओं वाली हो तो बहुत सुख भोगने वाली होती है।

कुछ अन्य स्त्री लक्षण: 
स्त्री के जन्म के समय लग्न और चंद्रमा दोनों समराशि में हों तो उसे अत्यन्त शुभ और स्त्रयोचित लक्षण देने वाला माना जाता है। ऎसी स्त्री सुशीला, रूपवती और देहसुख वाली होती है। यदि लग्न और चंद्रमा दोनों विषम राशि में हों तो वह कन्या पुरूष के सदृश्य स्वभाव और पुरूषोचित कार्य करने वाली होती है। यदि इन पर पाप ग्रहों की दृष्टि या योग हो तो वह दुर्गुणों में बदल जाती है। अगर चंद्रमा बलवान हों तो उसके गुण अधिक होने चाहिएं और लग्न बलवान हों तो उसके गुण अधिक होने चाहिएं।

2, 4, 6, 8, 10 और 12 को सम राशियां माना जाता है तथा 1, 3, 5, 7, 9 और 11 को विषम राशियां माना जाता है। सप्तम भाव मे कोई भी ग्रह नहीं हो और उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि नहीं हो तो पति की सफलता सीमित हो जाती है। सप्तम भाव में यदि चर राशि हो तो उस स्त्री का पति देशाटन करता रहता है। सप्तम भाव में सूर्य हो तो उसे त्याग दिया जाता है, 

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