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बुधवार, 24 अगस्त 2016

यहां हुई थी कृष्ण की राधा से शादी, भगवान को दहेज में मिले थे हाथी-घोड़े

जयपुर।सभी जानते हैं कि राधा और भगवान श्रीकृष्ण के बीच स्नेहपूर्ण संबंध थे, लेकिन उनकी कभी शादी नहीं हुई। श्रीकृष्ण का विवाह रुक्मणी के साथ हुआ था। क्या आप जानते हैं कि जयपुर में श्रीकृष्ण और राधा की शादी हुई थी। इस शादी को ज्यादा समय नहीं हुआ। अठारहवीं शताब्दी यानी 1778 से 1803 के बीच के समय की बात है।किसने करवाई थी ये अनोखी शादी..
- जयपुर राजपरिवार के महाराजा प्रतापसिंह के समय श्रीकृष्ण और राधा के बीच बाकायदा विवाह संपन्न हुआ, सभी तरह की रस्में अदा की गईं, दहेज लिया गया।
- यह एक ऐसा विवाह था, विवाह के साथ राधाजी को भरपूर दहेज तक दिया गया था।
- द्वापर में यह रिवाज रहा हो या नहीं, लेकिन कलयुग में जरूर श्रीकृष्ण ने राधा जी से दहेज में थोड़ा बहुत नहीं लिया, बल्कि हाथी-घोड़े, हीरे-जवाहरात सभी कुछ था इस दहेज में।
- यह सुनकर किसी को भी आश्चर्य हो सकता है, लेकिन कहते हैं न कि कलयुग में कुछ भी संभव है। वैसा ही कुछ श्रीकृष्ण के साथ हुआ।
 
कृष्ण के पिता थे खुद राजा और राधा के पिता प्रधानमंत्री
 
- असल में तब जयपुर के महाराजा थे प्रताप सिंह। वे कृष्ण के अनन्य भक्त थे। इतिहासकार और जयपुर के जानकार डॉ. आनंद शर्मा कहते हैं कि उन्होंने श्रीकृष्ण का मंदिर स्थापित कराया।
- यहीं वे रात-दिन भक्ति में लीन रहते। किसी से कोई वास्ता नहीं रखते थे। दिन-रात मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा के समक्ष खुद को रखते और भक्ति में लीन रहते।
- राजा के प्रधानमंत्री दौलतराम हल्दिया बड़े विद्वान थे।
- उन्होंने राजा को कहा, महाराज भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति बिना राधा के अधूरी है। बिना राधा के श्रीकृष्ण का मंदिर भी अधूरा है।
- इसके बाद राजा ने यह जिम्मेदारी दौलतराम हल्दिया को ही सौंपी कि वे राधा जी की प्रतिमा यहां स्थापित कराएं।
- स्थापित कराने के बजाय फिर यहां राधा को विवाह करा ही लाने का फैसला किया गया। राधा के पिता बने थे दौलतराम और कृष्ण के राजा प्रतापसिंह।
 
यूं हुई अनूठी और शाही शादी
 
- दौलतराम यहां जयपुर में हल्दियों के रास्ते में रहते थे। यहीं से कुछ माह पूर्व ही विवाह की तैयारियां शुरू करा दी गई।
- कुछ समय पूर्व ही बेटी का विवाह किया था। कमोबेश वैसी ही तैयारी शुरू करा दी गई। इस बीच दौलतराम ने एक भारी पीतल की राधा जी की विशेष प्रतिमा बनवाई।
- इसी प्रतिमा को दुल्हन मानकर कई दिन तक विवाह की रस्में पूरी कराई गईं।
- इस दौरान राज्य में मौजूद उनके सभी नाते-रिश्ते वाले, जयपुर के लोग शरीक हुए। घर और बाजारों को सजाया गया।
- हल्दी, चेल, चाक-भात जैसी रस्मों को भी निभाया गया। दूसरी ओर राजपरिवार में भी श्रीकृष्ण को बेटा मानकर दूल्हे वालों की ओर से तैयारी तेजी से चल रही थीं। फिर गाजे-बाजे के साथ विवाह संपन्न हो गया।
 
यूं आई राधा जी जयपुर राजपरिवार में
 
- दौलतराम हल्दिया के यहां से भगवान श्रीकृष्ण राधा जी को विदा करा, श्रीकृष्ण यहां मंदिर में ले आए। इसके बाद मंदिर के गर्भगृह में जहां भगवान की प्रतिमा थी, वहीं उन्हें स्थापित करा दिया गया।

ये आया था दहेज में सामान

- दहेज के रूप में दौलतराम ने पुत्री बनाकर राधाजी की प्रतिमा के साथ हाथी, घोड़े, वस्त्र और आभूषण, हीरे-जवाहरात भरपूर संख्या में दिए।

- यूं समझिए कि दहेज की भी पूरी एक बारात थी अलग से। अंतत: विवाह संपन्न हुआ।
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