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सोमवार, 25 जुलाई 2016

इन बातों का सामना कर लेंगे तो आप भी हो जाएंगे कामयाब

सफलता का रास्ता कठिन नहीं तो सरल भी नहीं है। इस रास्ते पर अनेक मुसीबतें आती हैं। ये मुसीबतें हैं, अहंकार, सफलता-असफलता का डर, योजना की कमी, लक्ष्य का अभाव, जिंदगी का बदलाव, विश्वास की कमी, आर्थिक असुरक्षा, असह्य पारिवारिक दायित्व, दिशाहीनता, अकेलेपन का अहसास, सारा बोझ स्वयं उठाना, क्षमता से अधिक स्वयं को बांधना, प्रशिक्षण, दृढ़ता व प्राथमिकता की कमी। इन कठिनाइयों को पार करके ही सफलता का सेहरा सिर पर बंधता है।

सफलता यानी लगातार प्रयास
अर्ल नाइटिंगेल के अनुसार, “मूल्यवान लक्ष्य की लगातार प्राप्ति का नाम ही सफलता है।” सफलता सतत प्रयास का नाम है। सफलता एक सफर है, मंजिल नहीं। मंजिल या लक्ष्य प्राप्ति के पश्चात् ठहर जाना सफलता का अंत है। लक्ष्य मिलने पर एक सुखद अनुभव होता है।
ऐसे लोग कभी भी कुशल नहीं बन सकते
श्रेष्ठता का प्रयास ही सफलता है। संसार में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे सुधारा या सुगढ़ नहीं बनाया जा सकता। पूर्णता की प्राप्ति एक असंभव तो नहीं, हां, कठिन लक्ष्य हो सकता है, परंतु श्रेष्ठता पाई जा सकती है। श्रेष्ठता में सफलता शामिल रहती है। इस प्रयास के लिए संघर्ष की आवश्यकता पड़ती है। सफलता संघर्ष के बिना नहीं मिल सकती। बिना संघर्ष कठिनाइयों से जूझने की कला सिखाता है। आत्मविश्वास तभी जग सकता है, जब मुसीबतों व कठिनाइयों का सामना किया जाता है, उनको जीता जाता है। कष्ट-कठिनाइयां जीवन का अभिन्न अंग हैं। इनसे जूझना ही संघर्ष है। विजेता कभी मायूस एवं निराश नहीं होता। वह संघर्षरत रहता है। संघर्ष ही सफलता है। हर चीज आसान होने से पहले कठिन होती है। कठिनाइयों से नहीं भागना चाहिए। इसलिए कहा गया है, “शांत समुद्र में नाविक कभी कुशल नहीं बन पाता।”
बार-बार उठना ही सफलता का मूल मंत्र है
सच्ची सफलता का मापदंड है उचित कार्य को उचित ढंग से पूरा करना और अपने लक्ष्य को प्राप्त करना। जीवन में सफलता इस बात से नहीं मापी जाती कि दूसरों की तुलना में हम क्या कर रहे हैं। हमारी सफलता तो इस तथ्य पर आधारित है कि हम अपनी क्षमताओं की तुलना में क्या कर रहे हैं। सफल व्यक्ति स्वयं से लड़ा करते हैं। वे अपने ही कार्यों में सदैव सुधार लाते हैं और प्रगति करते हैं। सफलता का मानदंड प्राप्त ऊंचाई नहीं हो सकती, बल्कि यह इस बात से तय होता है कि हम गिरकर कितनी बार उठते हैं। गिरकर बार-बार उठने की शक्ति ही सफलता का पथ प्रशस्त करती है


सफलता के लिए जरूरी है दृढ़ इच्छा शक्ति
एक यहूदी अनपढ़ था और ग्रामीण भी। प्रायश्चित पर्व पर सबको प्रार्थना करते देखकर वह भी बैठ गया और वर्णमाला के अक्षरों का ही पाठ करता हुआ वह सोचने लगा, “हे प्रभु! मुझे तो कोई मंत्र याद नहीं, इन अक्षरों को जोड़कर तुम्हीं मंत्र बना लेना। मैं तो तुम्हारा दास हूं, पूजा के लिए नए भाव कहां से लाऊं?” जब तक दूसरे लोग प्रार्थना करते रहे, वह ऐसे ही भगवान् का ध्यान करता रहा।
सायंकाल जब सब सामूहिक प्रार्थना में सम्मिलित हुए, तो धर्मगुरु रबी ने उस ग्रामीण को भक्तों की अग्रपंक्ति में रखा। यह देखकर साथी ने आपत्ति की, “श्रीमान जी! इसे तो मंत्र भी अच्छी तरह याद नहीं।” “तो क्या हुआ” रबी ने आर्द्र कंठ से कहा, “इसके पास शब्द नहीं, भाव तो हैं।”
सफलता के लिए आवश्यक है दृढ़ इच्छा शक्ति की। किसी स्थिति में हम अपने आपको कैसे संभालते और ढालते हैं, उसी से हमारी सफलता तय होती है। असफल दो प्रकार के होते हैं, वे जो करते तो हैं, परंतु सोचते नहीं। दूसरे वे जो सोचते तो हैं, परंतु कुछ करते नहीं। सोचने-विचारने की क्षमता का प्रयोग किए बिना जीवन जीना ठीक उसी तरह है जैसे बिना निशाने के तीर चलाना।
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