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मंगलवार, 14 जून 2016

किसी की प्रशंसा करते समय ध्यान रखें ये बातें

भाषा का अपना द्वंद्व होता है। इसका सीधा संबंध शब्दों से होता है। मनुष्य जीवन में शब्दों का बड़ा प्यारा प्रयोग है - प्रशंसा और आलोचना। कोई कितना ही मौन साधे इन दो स्थितियों से बच नहीं सकता। हमारी भाषा कैसी हो यह एक कला है। सार्वजनिक जीवन में तो ठीक है, लेकिन परिवार में भाषा और शब्द, कलह और प्रेम का कारण बन जाते हैं। जब किसी की प्रशंसा करनी हो तो सबके सामने करिए और आलोचना करनी हो तो एकांत में करिए। आइए, पहले प्रशंसा को समझ लें। प्रशंसा में दो गड़बड़ हो सकती है। सामने वाला भ्रम में डूब सकता है, अहंकार में गिर सकता है या फिर हमें चापलूस मान सकता है, इसलिए प्रशंसा में उसके कार्य को अधिक फोकस करें। हम व्यक्ति की प्रशंसा करने लगते हैं। उसके काम को भी तीन भागों में बांटकर प्रशंसा करें।
एक, यह काम उन्होंने किया कैसे? हमें भी इसकी समझ होनी चाहिए, इसलिए बिना जाने किसी की प्रशंसा न करें। दो, अब ऐसे प्रशंसनीय कार्य कौन-कौन कर गए, इस तरह के कार्य की प्रशंसा करें। इसमें व्यक्ति की बात भी आ जाएगी और व्यक्तित्व की तुलना भी हो जाएगी। तीन, इस कार्य से अन्य लोगों को क्या फायदा होगा। ऐसा दर्शाने से उनका कार्य सेवा में बदल जाएगा। सामने वाले को महसूस होगा कि प्रशंसा उसके व्यक्तित्व की नहीं, उसके सेवा-कार्य की हो रही है। इससे वह अहंकार से बच जाएगा और वह जान जाएगा कि हर प्रशंसा करने वाला चापलूस नहीं होता। अब बात करते हैं आलोचना की। जब आलोचना करनी ही पड़ जाए तो सार्वजनिक रूप से बचें। व्यक्ति कितना ही बड़ा या छोटा क्यों न हो उससे अकेले में ही बात करें। सार्वजनिक रूप से की गई आलोचना अपमान में बदल जाती है और एकांत में की गई आलोचना अच्छी सलाह बन जाती है।
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