Adsense responsive

गुरुवार, 30 जून 2016

महिलाओं के ये 6 राज जान चौंक जाएंगे आप

आमतौर पर पुरुष महिलाओं के बारे में उतना ही जानते है, जितना वो देखते या सुनते हैं। उन्हें औरतों के रहस्यों के बारे में कुछ भी नहीं पता होता है। महिलाओं के दिल में कई ऐसे राज छिपे होते हैं जिन्हें वो किसी से शेयर नहीं करती हैं। अगर किसी मर्द को ऐसा लगता है कि उसे किसी महिला के बारे में सबकुछ पता है तो ये उसकी गलतफहमी हो सकती है क्योंकि ऐसी बहुत सी बातें होती हैं जो महिलाएं किसी को नहीं बतातीं। हम आज औरतों के कुछ ऐसे ही सीक्रेट बताएंगे जिनसे आप अनजान हैं।

1. अक्सर हर लडक़ी को सरप्राइज अच्छा लगता है, फिर चाहे वो चाय से लेकर शादी की सालगिरह ही क्यों न हो। लड़कियां किसी महंगी चीज की बजाए एक छोटे से गुलाब से खुश हो जाती हैं। 
2. महिलाएं अपने पार्टनर की डरेसिंग सैंस से भी इंमप्रेस होती हैं इसलिए लडक़ो को चाहिए कि वें अपने पहनावे से अपने पार्टनर को प्रभावित करें।
3. जब औरत लव रिलेशन में होती है तो इसे अपने पार्टनर के परफ्यूम की स्मैल से लेकर हर बात उसको अच्छी लगती हैं
4. महिलाएं उन लडक़ो को पसंद करती हैं जो उनकी तारीफ ही नहीं बल्कि खामियों के बारें में बताए। अगर आप लंबे समय तक काम करके थकावट या कमजोरी फिल कर रही है तो उस टाइम सहायता करने वाले पार्टनर उनको पसंद आते हैं 
5. लड़कियां अक्सर यह जानने की कोशिश करती हैं कि उनका पार्टनर उनकी बात पर कितना ध्यान देते है, कहीं वे सिर हिलाकर उनकी बातों को अनसुना तो नहीं कर रहें। 
6. औरतें बहुत ही इमोशनल होती हैं इसलिए उनको वहीे लडक़े अच्छे लगते है। जो उनकी समस्या को समझकर उसका हल निकालें।
सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



शुक्रवार, 24 जून 2016

जानिए जगन्नाथ पुरी मंदिर से जुड़े 13 रोचक तथ्य


जानिए जगन्नाथ पुरी मंदिर से जुड़े 13 रोचक तथ्य


13 Facts about Jagannath Puri Temple in Hindi : हिन्दुओं की आस्था का एक केन्द्र भगवान जगन्नाथ की जगन्नाथ पुरी है। 10वीं शताब्दी में निर्मित यह प्राचीन मन्दिर सप्त पुरियों में से एक है। आज इस लेख में हम आपको जगन्नाथ पुरी मंदिर से जुड़े रोचक और अद्भुत तथ्यों के बारे में बता रहे है।
1. पुरी की सबसे खास बात तो स्वयं भगवान जगन्नाथ हैं ज‌िनका अनोखा रूप कहीं अन्य स्‍थान पर देखने को नहीं म‌िलता है। नीम की लकड़ी से बना इनका व‌िग्रह अपने आप में अद्भुत है ज‌िसके बारे में कहा जाता है क‌ि यह एक खोल मात्र है। इसके अंदर स्वयं भगवान श्री कृष्‍ण मौजूद होते हैं।
 Jagannath Puri Temple, Mandir, Hindi, Facts, Story, History, Kahani, Itihas, Rochak Baatein,
2. जगन्‍नाथ मंदिर के शिखर पर लहराता झंडा हमेशा हवा के विपरीत दिशा में रहता है।
 Jagannath Puri Temple, Mandir, Hindi, Facts, Story, History, Kahani, Itihas, Rochak Baatein,
3. तीर्थ में आप कहीं भी हों, मंदिर के ऊपर लगे सुदर्शन चक्र हमेशा सामने ही दिखाई देगा।
 Jagannath Puri Temple, Mandir, Hindi, Facts, Story, History, Kahani, Itihas, Rochak Baatein,
4. यह है जगन्‍नाथ जी का महाप्रसाद। मंदिर में प्रसाद बनाने के लिए सात बर्तन एक दूसरे पर रखा जाते हैं। और प्रसाद लकड़ी जलाकर पकाया जाता है। इस प्रक्रिया में लेकिन सबसे ऊपर के बर्तन का प्रसाद पहले पकता है।
24
5. समुद्र तट पर दिन में हवा जमीन की तरफ आती है, और शाम के समय इसके विपरीत, लेकिन पुरी में हवा दिन में समुद्र की ओर और रात को मंदिर की ओर बहती है।
25
6. मुख्य गुंबद की छाया किसी भी समय जमीन पर नहीं पड़ती।
26
7. मंदिर में कुछ हजार लोगों से लेकर 20 लाख लोग भोजन करते हैं। फिर भी अन्न की कमी नहीं पड़ती है। हर समय पूरे वर्ष के लिए भंडार भरपूर रहता है।
27
8. हमने ज्यादातर मंदिरों के शिखर पर पक्षी बैठे और उड़ते देखे हैं. जगन्नाथ मंदिर की यह बात आपको चौंका देगी कि इसके ऊपर से कोई पक्षी नहीं गुजरता ।
28
9. सिंहद्वार में प्रवेश करने पर आप सागर की लहरों की आवाज को नहीं सुन सकते। लेकिन कदम भर बाहर आते ही लहरों का संगीत कानों में पड़ने लगता है।
 Jagannath Puri Temple, Mandir, Hindi, Facts, Story, History, Kahani, Itihas, Rochak Baatein,
10. एक पुजारी मंदिर के 45 मंजिला शिखर पर स्थित झंडे को रोज बदलता है। ऐसी मान्यता है कि अगर एक दिन भी झंडा नहीं बदला गया तो मंदिर 18 वर्षों के लिए बंद हो जाएगा।
11. मन्दिर का रसोई घर दुनिया का सबसे बड़ा रसोइ घर है।  विशाल रसोई घर में भगवान जगन्नाथ को चढ़ाने वाले महाप्रसाद को बनाने 500 रसोईये एवं 300 उनके सहयोगी काम करते है।
12. कुछ इतिहासकार यह सोचते हैं, कि इस मंदिर के स्थान पर पूर्व में एक बौद्ध स्तूप होता था। उस स्तूप में गौतम बुद्ध का एक दांत रखा था। बाद में इसे इसकी वर्तमान स्थिति, कैंडी, श्रीलंका पहुंचा दिया गया।इस काल में बौद्ध धर्म को वैष्णव सम्प्रदाय ने आत्मसात कर लिया था, जब जगन्नाथ अर्चना ने लोकप्रियता हासिल की। यह दसवीं शताब्दी के लगभग हुआ, जब उड़ीसा में सोमवंशी राज्य चल रहा था।
13. महाराजा रणजीत सिंह, महान सिख सम्राट ने इस मंदिर को प्रचुर मात्रा में स्वर्ण दान किया था, जो कि उनके द्वारा स्वर्ण मंदिर, अमृतसर को दिये गये स्वर्ण से कहीं अधिक था। उन्होंने अपने अंतिम दिनों में यह वसीयत भी की थी, कि विश्व प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा, जो कि विश्व में अबतक भी सबसे मूल्यवान और सर्वाधिक बड़ा हीरा है, को इस मंदिर को दान कर दिया जाये। लेकिन यह सम्भव ना हो सका, क्योकि उस समय तक, ब्रिटिश ने पंजाब पर अपना अधिकार करके , उनकी सभी शाही सम्पत्ति जब्त कर ली थी। वर्ना कोहिनूर हीरा, भगवान जगन्नाथ के मुकुट की शान होता।
सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



गुरुवार, 23 जून 2016

भारत के 10 सबसे अमीर मंदिर

आइए जानते हैंं कौन से है भारत के दस सबसे अमीर हिन्दू मंदिर….

1. पद्मनाभ स्वामी मंदिर, त्रिवेंद्रम (Padmanabhaswamy Temple Trivandrum) : –



पद्मनाभ स्वामी मंदिर भारत का सबसे अमीर मंदिर है। यह तिरुवनंतपुरम् (त्रिवेंद्रम) शहर के बीच स्थित है। इस मंदिर की देखभाल त्रावणकोर के पूर्व शाही परिवार द्वारा की जाती है। यह मंदिर बहुत प्राचीन है और द्रविड़ शैली में बनाया गया है। मंदिर की कुल एक लाख करोड़ की संपत्ति है। मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की विशाल मूर्ति विराजमान है जिसे देखने के लिए हजारों भक्त दूर दूर से यहां आते हैं।

इस प्रतिमा में भगवान विष्णु शेषनाग पर शयन मुद्रा में विराजमान हैं। मान्यता है कि तिरुअनंतपुरम नाम भगवान के अनंत नामक नाग के नाम पर ही रखा गया है। यहां पर भगवान विष्णु की विश्राम अवस्था को पद्मनाभ कहा जाता है और इस रूप में विराजित भगवान पद्मनाभ स्वामी के नाम से विख्यात हैं।
2. तिरूपति बालाजी का मंदिर, आंध्रप्रदेश (Tirupati Balaji Temple, Andhra Pradesh) :-


तिरूपति बालाजी का मंदिर आंध्रप्रदेश के चित्तूर जिले में स्थित है। यह मंदिर वास्तुकला का अद्भुत नमूना है। मंदिर सात पहाड़ों से मिलकर बने तिरूमाला के पहाड़ों पर स्थित है, कहते हैं कि तिरूमाला की पहाड़ियां विश्व की दूसरी सबसे प्राचीन पहाड़ियां है। इस तिरूपति मंदिर में भगवान वेंकटश्वर निवास करते है। भगवान वेंकटश्वर को विष्णुजी का अवतार माना जाता है।

यह मंदिर समुद्र तल से 2800 फिट की ऊंचाई पर स्थित है। इस मंदिर को तमिल राजा थोडईमाननें ने बनवाया था। इस मंदिर में लगभग 50,000 श्रृद्धालु रोज दर्शन करने आते हैं। मंदिर की कुलसंपत्ति लगभग 50,000 करोड़ है।
3. श्री जगन्नाथ मंदिर, पुरी (Jagnnath Temple, Puri) : –


पुरी का श्री जगन्नाथ मंदिर एक हिन्दू मंदिर है, जो भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण) को समर्पित है। यह भारत के उड़ीसा राज्य के तटवर्ती शहर पुरी में स्थित है। जगन्नाथ शब्द का अर्थ जगत के स्वामी होता है। इनकी नगरी ही जगन्नाथपुरी या पुरी कहलाती है।

इस मंदिर को हिन्दुओं के चार धाम में से एक गिना जाता है। यह वैष्णव सम्प्रदाय का मंदिर है। पुरी जगन्नाथ मंदिर भारत के दस अमीर मंदिरों में से एक है। इस मंदिर के लिए जो भी दान आता है। वह मंदिर की व्यवस्था और सामाजिक कामों में खर्च किया जाता है।
4. सांई बाबा मंदिर, शिरडी (Shai Baba Temple, Shirdi) :-


सांई बाबा एक भारतीय गुरु, योगी और फकीर थे, उन्हें उनके भक्तों द्वारा संत कहा जाता है। उनके असली नाम, जन्म, पता और माता पिता के सन्दर्भ में कोई सूचना उपलब्ध नहीं है। सांई शब्द उन्हें भारत के पश्चिमी भाग में स्थित प्रांत महाराष्ट्र के शिर्डी नामक कस्बे में पहुंचने के बाद मिला।

शिर्डी सांई बाबा मंदिर भी यहीं बना हुआ है। सांई बाबा मंदिर भारत के अमीर मंदिरों में से एक माना जाता है। इस मंदिर की संपत्ति और आय दोनों ही करोड़ों में है। मंदिर के पास लगभग 32 करोड़ की चांदी के जेवर हैं। 6 लाख कीमत के चांदी के सिक्के हैं। साथ ही, हर साल लगभग 350 करोड़ का दान आता है।
5. सिद्घिविनायक मंदिर, मुंबई (Siddhivinayak Temple, Mumbai) :-


सिद्घिविनायक गणेश जी का सबसे लोकप्रिय रूप है। गणेश जी की जिन प्रतिमाओं की सूड़ दाईं तरह मुड़ी होती है, वे सिद्घपीठ से जुड़ी होती हैं और उनके मंदिर सिद्घिविनायक मंदिर कहलाते हैं। सिद्धि विनायक की महिमा अपरंपार है, वे भक्तों की मनोकामना को तुरंत पूरा करते हैं।

मान्यता है कि ऐसे गणपति बहुत ही जल्दी प्रसन्न होते हैं और उतनी ही जल्दी कुपित भी होते हैं। सिद्धी विनायक मंदिर भारत के रईस मंदिरों में से एक माना जाता है। इस मंदिर को 3.7 किलोग्राम सोने से कोट किया गया है, जो कि कोलकत्ता के एक व्यापारी ने दान किया था।
6. वैष्णो देवी मंदिर, जम्मू (Vaishno Devi Templ, Jammu) :-


भारत में हिन्दूओं का पवित्र तीर्थस्थल वैष्णो देवी मंदिर है जो त्रिकुटा हिल्स में कटरा नामक जगह पर 1700 मी. की ऊंचाई पर स्थित है। मंदिर के पिंड एक गुफा में स्थापित है, गुफा की लंबाई 30 मी. और ऊंचाई 1.5 मी. है।

लोकप्रिय कथाओं के अनुसार, देवी वैष्णों इस गुफा में छिपी और एक राक्षस का वध कर दिया। मंदिर का मुख्य आकर्षण गुफा में रखे तीन पिंड है। इस मंदिर की देखरेख की जिम्मेदारी वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की है। आंध्र प्रदेश के तिरुमला वेंकटेश्वर मंदिर के बाद इसी मंदिर में भक्तों द्वारा सबसे ज्यादा दर्शन किए जाते है। यहां हर साल लगभग 500 करोड़ का दान आता है।

7. सोमनाथ मंदिर, गुजरात (Somnath Temple, Gujarat) :-


सोमनाथ एक महत्वपूर्ण हिन्दू मंदिर है जिसकी गिनती 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में होती है। गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बंदरगाह पर स्थित इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण स्वयं चन्द्रदेव ने किया था।

इसका उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है। इसे अब तक 17 बार नष्ट किया गया है और हर बार इसका पुनर्निर्माण किया गया। सोमनाथ में हर साल करोड़ों को चढ़ावा आता है। इसलिए ये भारत के अमीर मंदिरों में से एक है।
8. गुरुवयुर मंंदिर, केरल (Guruvayur Temple, Kerala) :-



गुरुवयुर श्री कृष्ण मंदिर गुरुवयुर केरला में स्थित है। यह मंदिर विष्णु भगवान का सबसे पवित्र मंदिर माना जाता है। कहा जाता है कि यह मंदिर लगभग 5000 साल पुराना है। गुरुवयुर मंंदिर वैष्णवों की आस्था का केंद्र है। अपने खजाने के कारण यह मंदिर भी भारत के 10 सबसे अमीर मंदिरों में से एक है।
9. काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी (Kashi Vishwanath Temple, Varanasi) :-



काशी विश्वनाथ मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मंदिर वाराणसी में स्थित है। काशी विश्वनाथ मंदिर का हिंदू धर्म में एक विशिष्ट स्थान है। ऐसा माना जाता है कि एक बार इस मंदिर के दर्शन करने और पवित्र गंगा में स्नान कर लेने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

वर्तमान मंदिर का निर्माण महारानी अहिल्या बाई होल्कर द्वारा सन 1780 में करवाया गया था। बाद में महाराजा रंजीत सिंह द्वारा 1853 में 1000 कि.ग्रा शुद्ध सोने द्वारा मढ़वाया गया था। काशी विश्वनाथ भी भारत के अमीर मंदिरों में से एक है। यहां हर साल करोड़ों का चढ़ावा आता है।
10. मीनाक्षी अम्मन मंदिर, मदुरै (Meenakshi Temple, Madurai) :


तमिलनाडु में मदुरै शहर में स्थित मीनाक्षी अम्मन मंदिर प्राचीन भारत के सबसे महत्वपूर्ण मंदिरों में से एक है। मीनाक्षी अम्मन मंदिर विश्व के नए सात अजूबों के लिए नामित किया गया है।

यह मंदिर भगवान शिव व मीनाक्षी देवी पार्वती के रूप के लिए समर्पित है। मीनाक्षी मंदिर पार्वती के सबसे पवित्र स्थानों में से एक है। मंदिर का मुख्य गर्भगृह 3500 वर्ष से अधिक पुराना माना जा रहा है। यह मंदिर भी अमीर मंदिरों में से एक माना जाता है।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



आरंग- यहाँ कृष्ण ने ली थी राज मोरध्वज की परीक्षा, मांगा था उसके बेटे का मांस



छत्तीसगढ़ की राजधानी से करीब 30 किलोमीटर दूर रायपुर-कोलकाता हाईवे पर एक कस्बा है- आरंग। कहा जाता है कि यह कभी राजा मोरध्वज की राजधानी थी और इसकी पहचान एक समृद्ध नगर के रूप में थी। मोरध्वज की कहानी पुराणों में मिलती है जिसे कृष्ण ने आदेश दिया था कि वह अपने बेटे ताम्रध्वज को आरी से चीरकर उसका मांस शेर के सामने पेश करे। आरे से चीरने की कहानी के कारण ही इस नगर का नाम ‘आरंग’ पड़ा।


आरंग का प्रसिद्ध भांड देवल मंदिर, जिसे 11वीं-12वीं सदी का बताया जाता है। (फोटो: साभार ललित शर्मा)

आरंग में में मौजूद आर्कियोलोजिकल एविडेंस इस बात की गवाही देते हैं कि यह कभी व्यवस्थित नगर रहा होगा। हालांकि, महाभारत काल (कृष्ण काल) का कोई सबूत नहीं मिलता। शायद इसलिए कि अब तक उसके पांच हजार साल से ज्यादा बीत चुके हैं।


जैन मंदिर में इरॉटिक मूर्तियां


भांड देवल मंदिर के बाहर बनी मूर्तियां, जिनमें कुछ खजुराहो की तर्ज पर इरॉटिक हैं।

आरंग मंदिरों की नगरी है। इनमें 11वीं-12वीं सदी में बना भांडदेवल मंदिर प्रमुख है। यह एक जैन मंदिर है जिसके बाहरी हिस्सों में बनी इरॉटिक मूर्तियां खजुराहो की याद दिलाती हैं। इसके गर्भगृह में काले ग्रेनाइट से बनी जैन तीर्थंकरों की तीन मूर्तियां हैं। महामाया मंदिर में 24 तीर्थकरों की मूर्तियां देखने लायक हैं। यहां के बाग देवल, पंचमुखी हनुमान तथा दंतेश्वरी मंदिर भी प्रसिद्ध हैं। महानदी के किनारे स्थित इस ऐतिहासिक शहर में जल के कटाव से आर्कियोलोजिकल मटेरियल मिलते रहते हैं।


बाग देवल मंदिर को अब बागेश्वर नाथ मंदिर कहा जाने लगा है।

सुवर्ण नदी से मिले ताम्रपत्र से पता चलता है कि छठी-सातवीं सदी में यहां राजर्षि तुल्यकुल वंश का शासन था। वंश के अंतिम शासन भीमसेन ने यह ताम्रपत्र जारी किया था। इतिहासकारों का मत है कि इस वंश के राजा गुप्त ताम्रपत्र में गुप्त सम्राट के अधीन रहे होंगे।



भांड देवल मंदिर में स्थापित जैन मूर्तियां।


राजा मोरध्वज की एेतिहासिक नगरी आरंग में स्थित स्वायंभू पंचमुखी महादेव, मान्यता है की पीपल वृक्ष को चीर कर प्रकट हुए हैं स्वायंभू पंचमुखी महादेव.

कृष्ण ने ली थी परीक्षा (Mordhwaj ki kahani)

पौराणिक कथा के अनुसार, महाभारत का युद्ध खत्म होने के बाद कृष्ण अपने भक्त मोरध्वज की परीक्षा लेना चाहते थे। उन्होंने अर्जुन से शर्त लगाई थी कि उनका उससे भी बड़ा कोई भक्त है। कृष्ण ऋषि का वेश बना अर्जुन को साथ लेकर मोरध्वज के पास पहुंचे और कहा, ‘मेरा शेर भूखा है और वह मनुष्य का ही मांस खाता है।’ राजा अपना मांस देने को तैयार हो गए तो कृष्ण ने दूसरी शर्त रखी कि किसी बच्चे का मांस चाहिए। राजा ने तुरंत अपने बेटे का मांस देने की पेशकश की। कृष्ण ने कहा, ‘आप दोनों पति-पत्नी अपने पुत्र का सिर काटकर मांस खिलाओ, मगर इस बीच आपकी आंखों में आंसू नहीं दिखना चाहिए।’ राजा और रानी ने अपने बेटे का सिर काटकर शेर के आगे डाल दिया। तब कृष्ण ने राजा मोरध्वज को आशीर्वाद दिया जिससे उसका बेटा फिर से जिंदा हो गया।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



बुधवार, 22 जून 2016

दाईं और घुमी सूंड के गणेशजी ही क्यों होते हैं शुभ

श्रीगणेशजी भारत के अति प्राचीन देवता हैं। ऋग्वेद में गणपति शब्द आया है। यजुर्वेद में भी ये उल्लेख है। अनेक पुराणों में गणेश की विरुदावली वर्णित है। पौराणिक हिन्दू धर्म में शिव परिवार के देवता के रूप में गणेश का महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्रत्येक शुभ कार्य से पहले गणेश की पूजा होती है। धर्म शास्त्रों में भगवान श्रीगणेश के अनेक नाम बताए गए हैं। उन्हीं में से एक नाम है वक्रतुंड, जिसका अर्थ है भगवान गणेश का वह स्वरूप जिसमें उनकी सूंड मुड़ी हुई होती है। श्रीगणेश के इस स्वरूप के भी कई भेद हैं।

कुछ मुर्तियों में गणेशजी की सूंड को बाईं को घुमा हुआ दर्शाया जाता है तो कुछ में दाईं ओर। कुछ विद्वानों का मानना है कि दाईं ओर घुमी सूंड के गणेशजी शुभ होते हैं तो कुछ का मानना है कि बाईं ओर घुमी हुई सूंड वाले गणेशजी शुभ फल प्रदान करते हैं। हालांकि कुछ विद्वान दोनों ही प्रकार की सूंड वाले गणेशजी का अलग-अलग महत्व बताते हैं। उसके अनुसार-
यदि गणेशजी की स्थापना घर में करनी हो तो दाईं ओर घुमी हुई सूंड वाले गणेशजी शुभ होते हैं। दाईं ओर घुमी हुई सूंड वाले गणेशजी सिद्धिविनायक कहलाते हैं।

ऐसी मान्यता है कि इनके दर्शन से हर कार्य सिद्ध हो जाता है। किसी भी विशेष कार्य के लिए कहीं जाते समय यदि इनके दर्शन करें तो वह कार्य सफल होता है व शुभ फल प्रदान करता है। इससे घर में पॉजीटिव एनर्जी रहती है व वास्तु दोषों का नाश होता है।

धर्म शास्त्रों के अनुसार घर के मुख्य द्वार पर भी गणेशजी की मूर्ति या तस्वीर लगाना शुभ होता है। यहां बाईं ओर घुमी हुई सूंड वाले गणेशजी की स्थापना करना चाहिए। बाईं ओर घुमी हुई सूंड वाले गणेशजी विघ्नविनाशक कहलाते हैं। इन्हें घर में मुख्य द्वार पर लगाने के पीछे तर्क है कि जब हम कहीं बाहर जाते हैं तो कई प्रकार की बलाएं, विपदाएं या नेगेटिव एनर्जी हमारे साथ आ जाती है। घर में प्रवेश करने से पहले जब हम विघ्वविनाशक गणेशजी के दर्शन करते हैं तो इसके प्रभाव से यह सभी नेगेटिव एनर्जी वहीं रुक जाती है व हमारे साथ घर में प्रवेश नहीं कर पाती।

हमारे धर्म ग्रंथों में भगवान श्रीगणेश को प्रथम पूज्य कहा गया है यानी किसी भी शुभ कार्य करने से पहले भगवान गणेश की पूजा सबसे पहले करना चाहिए। हिंदू धर्म में गणेशजी के अनेक स्वरूपों की पूजा की जाती है। हर आकार, स्वरूप व रंग के गणेशजी अलग-अलग फल प्रदान करते हैं।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



आखिर किस पर लागू होते हैं वास्तुशास्त्र की नियम

कई अनेक स”ानों के पत्र आते हैं कि वास्तुशास्त्र का अधिकतम उपयोग उद्योगपति, फैक्टरी, दुकानदार अथवा उच्चा भवनों व महलों वाले ही करते हैं। गरीब लोगों के लिए इसका प्रयाग कम होता है। वास्तुविज्ञान पर यह आरोप निराधार है। जैसे सूर्य की किरणें अमीर-गरीब के भेद किए बिना सभी को समान रूप से रोशनी देती है। हवा की किरणें अमीर-गरीब के भेद किए बिना सभी को प्रभावित कर देती है। ठीक उसकी प्रकार से पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि एवं वायु इन पांच तत्वों के संतुलन पर आधारित वास्तुशास्त्र का ज्ञान अमीर-गरीब सभी को समान रूप से बिना भेदभाव के प्रभावित करता है। यह व्यक्ति के स्वयं की योग्यता है कि ज्ञान के इस अनमोल खजाने से वह कितना ग्रहण कर पाता है। झोंपडी निर्माण में वास्तु विज्ञान की उपयोगिता के संदर्भ में एक बहुत ही रोचक किन्तु सर्वाधिक प्रमाणित दृष्टान्त प्रमुख पाठकों के सामने प्रस्तुत है।
भगवान श्रीराम ने वनवास काल में पंचवटी में घास फूंस से अपनी झोंपडी बनाई। वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुसार वायु-प्रकाश की समुचित व्यवस्था को देखकर भगवान श्रीराम प्रसन्न हो उठे और लक्ष्मण से कहा-हे लक्ष्मण! हम इस पर्णशाला के अधिष्ठाता वास्तु देवता का पूजन यजन करेंगे। क्योंकि दीर्घ जीवन की इच्छा करने वाले पुरूषों को वास्तुशांति अवश्य करनी चाहिए। वास्तु शास्त्र की महत्ता प्रमाणिकता एवं उपयोगिता का इससे उत्कृष्ट उदाहरण और क्या हो सकता है।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



क्यों लगाते हैं ललाट पर तिलक



अपने-अपने संप्रदायों के अनुसार ललाट पर विविध प्रकार के तिलक लगाए जाते हैं। किसी भी धार्मिक कार्यक्रमों में या पूजा करते समय ललाट पर तिलक लगाया जाता है। ललाट पर तिलक लगाने के पीछे भी कारण है।

कठोपनिषद् में तिलक धारण करने के पीछे नाडी का वर्णन किया गया है। सुषुमा नाम की नाडी हमारे मस्तक के सामने वाले हिस्से यानी ललाट पर से निकलती है।
यह नाडी ह्रदय से निकलने वाली नाडियों में से एक है। कहते हैं इस नाडी से मोक्ष मार्ग निकलता है। सुषुमा नाडी मार्ग ऊध्र्व दिशा की ओर ही रहता है। सुषुमा नाडी को केंद्र मानकर तिलक लगाया जाता है।
धन विद्युत बहते समय उत्पन्न हुई उष्णता को रोकने के लिए भी तिलक लगाना उपयोगी बताया गया है। साथ ही अलग-अलग प्रकार के तिलकों का महत्तव भी अलग-अलग बताया गया है। चंदन का तिलक लगाना अध्यात्म के लिए अनुकूल माना गया है।

सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



सोमवार, 20 जून 2016

गणपति पूजन में तुलसी निषिद्ध क्यों

मनोहारिणी तुलसी समस्त पौधों में श्रेष्ठ मानी जाती हैं। इन्हें समस्त पूजन कर्मो में प्रमुखता दी जाती है साथ ही मंदिरों में चरणामृत में भी तुलसी का प्रयोग होता है तथा ऎसी कामना होती है कि यह अकाल मृत्यु को हरने वाली तथा सर्व व्याधियों का नाश करने वाली हैं परन्तु यही पूज्य तुलसी देवों को भगवान श्री गणेश की पूजा में निषिद्ध मानी गई हैं। इनसे सम्बद्ध ब्रrाकल्प में एक कथा मिलती है जो कि इसके कारण को व्यक्त करती है।
कथा — एक समय नवयौवना, सम्पन्ना तुलसी देवी नारायण परायण होकर तपस्या के निमित्त से तीर्थो में भ्रमण करती हुई गंगा तट पर पहुँचीं। वहाँ पर उन्होंने गणेश को देखा, जो कि तरूण युवा लग रहे थे। अत्यन्त सुन्दर, शुद्ध और पीताम्बर धारण किए हुए थे, आभूषणों से विभूषित थे, सुन्दरता जिनके मन का अपहरण नहीं कर सकती, जो कामनारहित, जितेन्द्रियों में सर्वश्रेष्ठ, योगियों के योगी तथा जो श्रीकृष्ण की आराधना में घ्यानरत थे। उन्हें देखते ही तुलसी का मन उनकी ओर आकर्षित हो गया। तब तुलसी उनका उपहास उडाने लगीं। घ्यानभंग होने पर गणेश जी ने उनसे उनका परिचय पूछा और उनके वहां आगमन का कारण जानना चाहा। गणेश जी ने कहा—माता! तपस्वियों का घ्यान भंग करना सदा पापजनक और अमंगलकारी होता है।
"" शुभे! भगवान श्रीकृष्ण आपका कल्याण करें, मेरे घ्यान भंग से उत्पन्न दोष आपके लिए अमंगलकारक न हो। ""
इस पर तुलसी ने कहा—प्रभो! मैं धर्मात्मज की कन्या हूं और तपस्या में संलग्न हूं। मेरी यह तपस्या पति प्राप्ति के लिए है। अत: आप मुझसे विवाह कर लीजिए। तुलसी की यह बात सुनकर बुद्धि श्रेष्ठ गणेश जी ने उत्तर दिया— " हे माता! विवाह करना बडा भयंकर होता है, मैं ब्रम्हचारी हूं। विवाह तपस्या के लिए नाशक, मोक्षद्वार के रास्ता बंद करने वाला, भव बंधन की रस्सी, संशयों का उद्गम स्थान है। अत: आप मेरी ओर से अपना घ्यान हटा लें और किसी अन्य को पति के रूप में तलाश करें। तब कुपित होकर तुलसी ने भगवान गणेश को शाप देते हुए कहा—"कि आपका विवाह अवश्य होगा।" यह सुनकर शिव पुत्र गणेश ने भी तुलसी को शाप दिया—" देवी, तुम भी निश्चित रूप से असुरों द्वारा ग्रस्त होकर वृक्ष बन जाओगी। "
इस शाप को सुनकर तुलसी ने व्यथित होकर भगवान श्री गणेश की वंदना की। तब प्रसन्न होकर गणेश जी ने तुलसी से कहा—हे मनोरमे! तुम पौधों की सारभूता बनोगी और समयांतर से भगवान नारायण की प्रिया बनोगी। सभी देवता आपसे स्नेह रखेंगे परन्तु श्रीकृष्ण के लिए आप विशेष प्रिय रहेंगी। आपकी पूजा मनुष्यों के लिए मुक्तिदायिनी होगी तथा मेरे पूजन में आप सदैव त्याज्य रहेंगी। ऎसा कहकर गणेश जी पुन: तप करने चले गए। इधर तुलसी देवी दु:खित ह्वदय से पुष्कर में जा पहुंची और निराहार रहकर तपस्या में संलग्न हो गई। तत्पश्चात गणेश के शाप से वह चिरकाल तक शंखचूड की प्रिय पत्नी बनी रहीं। जब शंखचूड शंकर जी के त्रिशूल से मृत्यु को प्राप्त हुआ तो नारायण प्रिया तुलसी का वृक्ष रूप में प्रादुर्भाव हुआ।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



सरल उपायों से बच्चों को बनाएं कुशाग्र विद्यार्थी

यदि आपके बच्चो का पढाई में मन नहीं लगता या फिर पढने के बावजूद वह अपने पाठ को याद नहीं रख पता तो अब घबराने की जरूरत नहीं। हम आपको कुछ ऎसे उपाय बताने जा रहे हैं जिससे आपके बच्चो का पढाई में मन भी लगेगा और साथ ही उसे सब कुछ याद भी रहेगा।

ये सरल उपाय अपनाकर आप अपने बच्चो को पढाई में कुशाग्र बना सकते हैं।
1. बच्चों की अच्छी पढाई के लिए स्टडी टेबल हमेशा ही कमरे के पूर्व कोने में इस तरह से रखें कि पढाई करते समय आपके बच्चे का मुंह पूर्व दिशा की ओर रहे।
2. बच्चों को पढाई मे कुशाग्र बनाने के लिए उन्हें पढाई से पहले गायत्री मंत्र का पाठ करने के लिए कहें व पढते समय बच्चो के सिर पर पिरामिडिकल कैप लगाएं। ऎसा करने से उसके द्वारा याद किया हुआ सबक या पाठ उसे हमेशा के लिए याद रहेगा और बुद्धि कुशाग्र होगी।
3. बच्चों के उत्तर-पूर्व दीवार में लाल पट्टी के चायनीज बच्चों की युगल फोटों लगाएं। ऎसा करने से घर में खुशियां आएंगी और आपके बच्चो का करियर अच्छा बनेगा। इन उपायों को अपनाकर आप अपने बच्चे को एक अच्छा करियर दे सकते हैं और जीवन में सफल बना सकते हैं।
सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



शनिवार, 18 जून 2016

अनोखी प्रथा! परिवार वाले ही मृतक के

बीजिंग। हमारे देश में कई प्रथा का प्रचलन है। जन्म से लेकर मृत्यु तक हर क्षेत्र में अलग अलग प्रथा निभाई जाती है। इसी प्रकार तिब्बत के लारूंग वैली में रहने वाले एक अजीबोगरीब प्रथा निभाते हैं। इस अनोखी प्रथा के अंतर्गत बौद्ध भिक्षु और नन किसी के मरने के बाद उसके शव को खुद काटकर गिद्धों को खिलाते हैं। खुले आसमान के नीचे निभाई जाने वाली यह प्रथा तिब्बत, किंगघई और मंगोलिया में बहुत सालों से चली आ रही है।

एक अंग्रेजी वेबसाइट में छपी खबर के अनुसार, शव को गिद्धों को खिलाने के लिए काटते वक्त उनके रिश्तेदार भी मौजूद रहते हैं। शव को इस तरह काटकर गिद्धों को खिलाने के पीछे भिक्षुओं का मानना है कि इससे मृतक को जन्नत मिलती है।

इस मान्यता को मानने वाले कहते हैं कि गिद्ध शरीर की आत्मा को जन्नत तक लेकर जाते हैं। और फिर वहां से उन्हें अगला जन्म मिलता है। तिब्बतियों की मान्यता है कि अगर कोई भी इस प्रथा को नहीं निभाता है, तो मृत शरीर की आत्मा को शांति नहीं मिलती है। इसके साथ ही उसकी आत्मा को जन्नत भी नसीब नहीं होती है
इस प्रथा को अंजाम देते समय कोई भी पर्यटक या अंजान व्यक्ति तिब्बितयों के पास नहीं जा सकता है। यही वजह है कि इसके बारे में लोगों के पास कुछ तस्वीरों और थोड़ी बहुत जानकारी के अलावा ज्यादा कुछ मौजूद नहीं है। 

बताते चलें कि इस प्रथा को कई दशक बीत जाने के बाद अब चीनी सरकार लारूंग वैली में बने हजारों घरों को गिरवाने जा रही है। एक ऑर्डर के मुताबित चीनी सरकार यहां रहने वाले चालीस हजार से भी ज्यादा बौद्ध भिक्षुओं और ननों को पांच हजार तक सीमित करना चाह रही है। 

सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



शुक्रवार, 17 जून 2016

हमेशा 2 रंग के कपडे क्यों पहनते है मार्क जुकरबर्ग

आज चाहे इंडिया ले लो या किसी भी कंट्री के बारे में बात करी जाए लोगों की सबसे ज्यादा उत्सुकता फैशन के लिए है कि, वे कैसे लग रहे है, दुसरे लोग उनके बारे मे क्या सोचते है। अमेरिका तो ऐसा देश है जहां फैशन की कोई कमी नहीं है, लेकिन फिर भी कभी किसी ने सोचा है कि फेसबुक के निर्माता मार्क जुकरबर्ग हमेशा एक ही कपड़ो में ही क्यों नजर आते है, क्यों वे भारत हो या अमेरिका हमेशा एक रंग के टी शर्ट में भाषण देते नजर आते है, नहीं न। इसलिए आज हम आपको मार्क जुकरबर्ग के इस यह ही रंग के कपडे का राज खोलने जा रहे है। 

मार्क जुकरबर्ग दुनिया की सबसे महंगी यूनिवर्सिटी हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पास आउट है, और एक चर्चित सोशलाइट भी, जानकारी के लिए बता दें कि जब मार्क जुकरबर्ग ऑफिस में काम करते थे तो उनके पास बस दो रंग के टी शर्ट ही थे, इसलिए आज इतने बड़े बिज़नेस मैन बनने के बाद भी वह ग्रे और ब्लैक कलर को ही पहनना पसंद करते है, जिससे उन्हें अपना पुराना समय याद रहे और वे और आगे बढ़ेंआपको पता है, जब मार्क जुकरबर्ग से पुछा गया कि वे हमेशा ये दो रंग के कपडे ही क्यों पहनते है, तो उनका जवाब था कि मुझे नहीं लगता है कि मेरी जिंदगी में इन छोटी-छोटी बातों के लिए समय है।
सिर्फ इतना ही नहीं मार्क जुकरबर्ग का मानना कि वे इन छोटी छोटी चीज़ों में अपना समय नहीं गवाना चाहते बल्कि उस समय में वे लोगों के लिए कुछ अच्छा करना चाहते है और कुछ नया भी करना चाहते है 

सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



खिडकी-दरवाजे बनवाएं वास्तु के अनुसार

जीवन में हर व्यक्ति की चाहते होती है कि उसके परिवार में सभी लोगों खुशहाल जीवन बिताएं इसलिए अगर आप ने घर बनवाने की सोच रहे हैं तो जरूरी है कि कुछ बातों का ख्याल रखा जाये। अगर आप के घर में एक से अधिक दरवाजे हैं तो मुख्य प्रवेश द्वार उत्तर या फिर पूर्व में होना चाहिए। दक्षिण मुखी में मुख्यद्वार का होना शुभ नहीं माना जाता है। 
इसके अलावा भवन के चारों ओर सडक हो तो चारों दिशाओं में मुख्यद्वार रखने से घर में सुख शांति और धन का योग बना रहता है। द्वार के ऊपर जाली नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा घर के द्वार के सामने पेड, खंूटा, कुआं तथा पानी निकास की नाली नहीं होेने चाहिए। वरना इससे घर के लोगों पर बुरा प्रभाव पडता है। यह होने से स्वामी का नाश होता है। वृक्ष होने से बालकों को कष्ट होात है। द्वार के सामने की चड होने से शोक होता है। 
नाली होने से धन खर्च होता है। घर में दरवाजे, खिडकी की संख्या सम जैसे 2, 4, 6 आदि होनीचाहिए। इसके साथ सभी खिडकी और दरवाजे एक ही प्रकार की लकडी के बने होने चाहिए इस बात का ध्यान रखिए। मुख्य द्वार पर देहरी जरूर होनी चाहिए। 
द्वार, खिडकी और अलमारियां कभी भी आमने-सामने नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा घर के अग्र भाग में खिडकी रखना श्रेष्ठ होता है इससे काम में सफलता मिलती है। घर के पीछे और बाएं भाग में खिडकी अशुभ होती है

सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



जानते है, हर सेकंड में 4.5 हजार लोग खरीदते है पार्ले जी

पार्ले- जी के बिस्कुट के ऊपर छपी बच्ची से कौन वाकिफ नहीं है, क्या आप जानते पूरे दुनिया में हर सेकंड  4.5 हजार लोग पार्ले जी बिस्कुट खरीद कर खाते है, चाहे रेलवे स्टेशन ले लो, या घर में सुबह का नाश्ता या शाम की चाय, हर जगह आपको पार्ले जी बिस्कुट ही दिखेंगे। यहाँ तक की लोग रोड में पड़े जानवरों को पार्ले जी बिस्कुट ही खिलाते है। 

ऑल इंडिया नील्‍सन सर्वे रिपोर्ट की माने तो पारले प्रोडक्‍ट्स बिस्किट कंपनी शेयर के मामले में ब्रिटानिया से 0.5 फीसदी पीछे थी, लेकिन इसके बाद भी यह कंपनी नंबर एक पर बनी हुई है और इसके बिस्कुट बहते पानी की तरह खरीदे जा रहे है।

भारत में सबसे ज्यादा डिमांड पार्ले जी की आती है,आज 70 % प्रतिशत बाजार में पार्ले जी बिकता हैु, जिसके बाद ब्रिटानिया के टाइगर (17-18%) और आईटीसी के सनफीस्ट (8-9%) का है । 
सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



गुरुवार, 16 जून 2016

बच्चों के अच्छे संस्कार और जीवन के लिए ध्यान रखें ये बातें

परिवार का सबसे महत्वपूर्ण भाग हैं बच्चे। जो बच्चे परिवारों में ठीक से पलेंगे, संस्कारी होकर समाज में जाएंगे, वे समाज और राष्ट्र के लिए गौरव बनेंगे। किसी ने ठीक कहा है और हमारे ऋषिमुनि भी यही कहते थे कि बच्चों के साथ कभी-कभी बच्चा होना पड़ता है। अध्यात्म की दृष्टि से बच्चों के लालन-पालन में दो चीजें ध्यान रखनी चाहिए। ये दो चीजें हैं खान-पान। बच्चे क्या खा रहे हैं और क्या पी रहे हैं, इससे उनका व्यक्तित्व बनता है।
कबीर लिख गए हैं कि
जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होय।
जैसा पानी पीजिये, तैसी बानी होय।।
इसका अर्थ यही है कि जैसा भोजन करोगे, वैसे ही मन का निर्माण होगा और जैसा जल पियोगे, वैसी वाणी होगी।
शुद्ध-सात्विक आहार तथा पवित्र जल से मन और वाणी पवित्र होते हैं। इसी प्रकार जो जैसी संगति करता है, उसका जीवन वैसा ही बन जाता है।
जल शरीर में ऑक्सीजन लेकर जाता है। पानी पीते समय अपने आप यह प्राणायाम की क्रिया बन जाती है। बच्चों को सिखाया जाना चाहिए कि जल हमेशा बैठकर और शांति से पीना चाहिए।
दूरदर्शिता, याददाश्त और चरित्र, खानपान पर निर्भर है। इसलिए बच्चों के साथ उनके स्वाद पर नजर रखनी चाहिए।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



इन 4 को तुरंत छोड़ देना चाहिए, नहीं तो पड़ सकते हैं मुसीबत में


हिंदू धर्म ग्रंथों में नैतिक शिक्षा के साथ-साथ लाइफ मैनेजमेंट के अनेक सूत्र भी छिपे हैं। ये ग्रंथ सालों पहले हमारे पूर्वजों ने लिखे थे, लेकिन इसमें बताए गए लाइफ मैनेजमेंट के सूत्र आज भी प्रासंगिक हैं। गीताप्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित संक्षिप्त गरुड़ पुराण अंक में भी जीवन प्रबंधन से जुड़े अनेक सूत्र बताए गए हैं।
इस ग्रंथ में ये भी बताया गया है कि किन स्थानों व लोगों को तुरंत छोड़ देना चाहिए, नहीं तो आगे जाकर आप किसी मुसीबत में फंस सकते हैं। आज हम आपको इसी के बारे में बता रहे हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार दुष्टजनों से व्याप्त देश, उपद्रवग्रस्त निवास भूमि, कृपण राजा व मायावी मित्र का परित्याग तुरंत कर देना चाहिए। जानिए ये किस प्रकार हमारे लिए मुसीबत बन सकते हैं-


दुष्टजनों से व्याप्त देश

गरुड़ पुराण के अनुसार, जिस देश में दुष्ट लोग निवास करते हैं, वो देश तुरंत छोड़ देना चाहिए क्योंकि दुष्ट लोग स्वभाव से लोभी व निष्ठुर होते हैं। ऐसे लोग अपने थोड़े से फायदे के लिए आपका बड़ा नुकसान कर सकते हैं। ऐसे देश में रहने पर आपको जान और माल दोनों का ही नुकसान हो सकता है।

उपद्रवग्रस्त निवास भूमि

उपद्रवग्रस्त निवास भूमि से अर्थ है वह स्थान जहां आए दिन कोई घटना-दुर्घटना होती रहती है। यदि आप ऐसे स्थान पर रहते हैं तो तुरंत ऐसे स्थान को छोड़कर किसी दूसरे स्थान पर चले जाने चाहिए क्योंकि ऐसे स्थान पर रहना भी खतरे से खाली नहीं है। ऐसे स्थान पर आपके साथ कभी भी कुछ बुरा हो सकता है। अत: उपद्रवग्रस्त निवास भूमि को तुरंत ही छोड़ देने में ही भलाई समझना चाहिए।

कृपण राजा

कृपण यानी कुटिल व दुष्ट। जिस देश का राजा कुटिल हो, वह देश भी तुरंत छोड़ देना चाहिए क्योंकि ऐसा राजा हमेशा अपनी प्रजा के हित से पहले स्वयं का हित साधता है। ऐसी स्थिति में वह कई बार प्रजा विरोधी निर्णय भी ले लेता है, जिसके कारण प्रजा को किसी न किसी रूप में नुकसान उठाना पड़ सकता है। ऐसे राजा के देश में अराजकता भी फैल सकती है, जिसके कारण सज्जन लोगों को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए जिस देश में कुटिल राजा का राज हो, उसे तुरंत ही छोड़ देना चाहिए।

मायावी मित्र

मायावी यानी चालाक। इस प्रकार के मित्र सबसे पहले स्वयं के बारे में ही सोचते हैं। ऐसे मित्र अपने निजी स्वार्थ के लिए किसी का नुकसान करने से भी नहीं चूकते। ऐसे लोगों से मित्रता रखने का सबसे बड़ा नुकसान ये हो सकता है कि ज़रुरत पडऩे पर ये आपसे हरसंभव मदद ले सकते हैं, लेकिन जब आपको इनकी मदद की आवश्यकता होती है, उस समय ये आपकी मदद नहीं करते। इसलिए इस प्रकार के मित्रों का त्याग तुरंत कर देने में ही भलाई है।
सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



बुधवार, 15 जून 2016

समुद्र शास्त्रः ठोड़ी देखकर जानिए कैसा है किस का NATURE

मनुष्य के चेहरे का हर हिस्सा उसे सुंदर बनाने के लिए जरूरी होता है। यदि चेहरे के किसी भी एक हिस्से को हटा दिया तो सुंदर चेहरा भी बदसूरत हो जाएगा। आज हम बात कर रहे हैं चेहरे के सबसे निचले भाग में स्थित ठोड़ी की। ठोड़ी होंठों के ठीक नीचे होती है। चेहरे को सुंदर बनाने में ठोड़ी का भी अहम योगदान रहता है। समुद्र शास्त्र के अनुसार ठोड़ी भी कई प्रकार की होती है।
ठोड़ी के प्रकारों के आधार पर ही मनुष्य के गुण-अवगुण तथा स्वभाव के बारे में आसानी से जाना जा सकता है। समुद्र शास्त्र के अनुसार जो ठोड़ी चिकनी और मांसल हो वह शुभ होती है, वहीं नीचे की ओर झुकी हुई और सूखी हुई ठोड़ी अशुभ होती है। जानिए ठोड़ी के अनुसार किस व्यक्ति का स्वभाव कैसा होता है-

सामान्य ठोड़ी
ये ठोड़ी शुभ फलदायक होती है। इस प्रकार की ठोड़ी होंठों के ठीक नीचे समानांतर रूप से होती है। ऐसे ठोड़ी वाले लोग हमेशा सच बोलने वाले और अपने नियमों का पालन करने वाले होते हैं। ये लोग गंभीर और कम बोलने वाले होते हैं। ये कम जरूर बोलते हैं, लेकिन जब भी बोलते हैं काम की बात ही बोलते हैं।
इनकी बात को सिरे से नकारा नहीं जा सकता। ये जो भी काम करते हैं, नि:स्वार्थ भाव से करते हैं। इसलिए ये परिवार और समाज में बहुत लोकप्रिय होते हैं। ये जहां भी जाते हैं, लोग इनका मान-सम्मान करते हैं। आर्थिक रूप से भी ये काफी संपन्न होते हैं।

लंबी ठोड़ी
जिन लोगों की ठोड़ी सामान्य से थोड़ी लंबी होती है, ऐसे लोगों में अनेक गुण होते हैं। ऐसे ठोड़ी वाले लोगों का मन स्थिर रहता है। ये एक ही लक्ष्य बनाकर लगातार उसे पाने के लिए संघर्ष करते हैं। जब तक ये अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच जाते, चैन से नहीं बैठते। इनका निश्चय बहुत पक्का होता है। मगर कई बार ये लोग बहुत जिद्दी और क्रोधी भी हो जाते हैं। इसी कारण ये समाज में वो मुकाम नहीं हासिल कर पाते, जिसके ये हकदार होते हैं।


छोटी ठोड़ी


ऐसी ठोड़ी सामान्य से थोड़ी छोटी होती है। ऐसी ठोड़ी वाले लोग आलसी, असंतोषी, विवेकहीन और काम से भागने वाले होते हैं। इनके मन में कोई महत्वाकांक्षा नहीं रहती। इसलिए ये कामचोर प्रवृत्ति के होते हैं।

गोल ठोड़ी
जिन लोगों की ठोड़ी गोलाकार होती है, ऐसे लोग छोटी-छोटी बातों पर भड़क जाते हैं। ये हर काम बहुत जल्दबाजी में करते हैं, इसलिए कभी-कभी इनके काम बिगड़ भी जाते हैं। ये लोग स्वयं को क्रोधी दिखाने का प्रयास तो करते हैं, लेकिन ये अंदर से बहुत डरपोक होते हैं। ये उत्तेजित और असभ्य भी होते हैं। इतने अवगुणों के बावजूद भी इनमें कई गुण भी होते हैं। ये अपने काम के प्रति ईमानदार होते हैं और साफ, स्पष्ट बोलने में विश्वास रखते हैं।

आगे निकली हुई ठोड़ी
ऐसे ठोड़ी चेहरे से थोड़ी आगे की ओर निकली हुई होती है। ऐसे लोग अपने काम के लिए कर्मठ और गतिशील तो होते हैं, लेकिन फिर भी इनमें बहुत से अवगुण भी होते हैं। ऐसी ठोड़ी वाले लोग स्वार्थी, पैसों के लिए कुछ भी करने वाले, धूर्त और कपटी होते हैं। इन पर आसानी से भरोसा नहीं किया जा सकता। ये लोग बिना बात पर किसी से भी लड़ने को तैयार रहते हैं। ऐसी ठोड़ी वाले कुछ लोग बड़े अपराधी भी होते हैं। अपराध करना जैसे इनका शौक होता है और ये किसी के समझाने पर समझते भी नहीं है। इनका परिवार भी इनकी इन हरकतों से परेशान रहता है।

अण्डाकार ठोड़ी
इस प्रकार की ठोड़ी शुभ होती है। इस प्रकार की ठोड़ी वाले लोग भावुक, नटखट, कलाप्रेमी, व्यवहारिक और ऊंचे विचारों वाले होते हैं। ऐसे लोग कला के क्षेत्र में नाम कमाते हैं। इनका जीवन एक खुली किताब की तरह होता है। इन्हें इनके जीवन में कई सफलताएं देखने को मिलती हैं, लेकिन ये प्रयास करते रहते हैं और सफलता को प्राप्त कर ही दम लेते हैं।

मुख के अंदर दबी हुई ठोड़ी
ऐसी ठोड़ी चेहरे से थोड़ी अंदर की ओर दबी हुई रहती है। ऐसी ठोड़ी वाले लोग काफी चंचल होते हैं। साथ ही ये आलसी, निराशावादी व मायूस भी होते हैं। ये मानसिक रूप से पूर्ण स्वस्थ नहीं होते। इसलिए इनमें सोचने-समझने की क्षमता भी आमतौर पर थोड़ी कम होती है। ये बहुत अधिक बोलते हैं, लेकिन ये क्या बोल रहे हैं और क्यों बोल रहे हैं, इस बात का अंदाजा इन्हें भी नहीं होता। अधिक बोलने के कारण ही लोग इनसे थोड़ा दूर भागते हैं। ये लोग किसी भी कार्यक्रम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं, लेकिन अति उत्साह में कभी-कभी ये हंसी व गुस्से के पात्र बन जाते हैं। परिवार में इनका कोई खास मान-सम्मान नहीं होता।

वर्गाकार ठोड़ी
ये ठोड़ी समकोण की स्थिति में होती है। ऐसी ठोड़ी वाले लोग आमतौर पर आर्थिक रूप से संपन्न होते हैं। इनके पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं होती। इसी पैसे के कारण इनमें कई अवगुण आ जाते हैं। ऐसे लोग वासना से युक्त और अपनी ताकत का दुरूपयोग करने वाले होते हैं। इन्हें आराम पसंद होता है। इसलिए ये थोड़े आलसी भी होते हैं। इनके पास अपने आराम का हर सामान उपलब्ध होता है। ये कोई भी काम दिल से नहीं करते। इसलिए लोग इन्हें कम पसंद करते हैं। मगर इनसे डर के कारण इनकी हां में हां मिलाते हैं। अगर ऐसे लोग काले हो तो इनमें उत्तेजना और असभ्यता का अवगुण भी आ जाता है।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



मंगलवार, 14 जून 2016

किसी की प्रशंसा करते समय ध्यान रखें ये बातें

भाषा का अपना द्वंद्व होता है। इसका सीधा संबंध शब्दों से होता है। मनुष्य जीवन में शब्दों का बड़ा प्यारा प्रयोग है - प्रशंसा और आलोचना। कोई कितना ही मौन साधे इन दो स्थितियों से बच नहीं सकता। हमारी भाषा कैसी हो यह एक कला है। सार्वजनिक जीवन में तो ठीक है, लेकिन परिवार में भाषा और शब्द, कलह और प्रेम का कारण बन जाते हैं। जब किसी की प्रशंसा करनी हो तो सबके सामने करिए और आलोचना करनी हो तो एकांत में करिए। आइए, पहले प्रशंसा को समझ लें। प्रशंसा में दो गड़बड़ हो सकती है। सामने वाला भ्रम में डूब सकता है, अहंकार में गिर सकता है या फिर हमें चापलूस मान सकता है, इसलिए प्रशंसा में उसके कार्य को अधिक फोकस करें। हम व्यक्ति की प्रशंसा करने लगते हैं। उसके काम को भी तीन भागों में बांटकर प्रशंसा करें।
एक, यह काम उन्होंने किया कैसे? हमें भी इसकी समझ होनी चाहिए, इसलिए बिना जाने किसी की प्रशंसा न करें। दो, अब ऐसे प्रशंसनीय कार्य कौन-कौन कर गए, इस तरह के कार्य की प्रशंसा करें। इसमें व्यक्ति की बात भी आ जाएगी और व्यक्तित्व की तुलना भी हो जाएगी। तीन, इस कार्य से अन्य लोगों को क्या फायदा होगा। ऐसा दर्शाने से उनका कार्य सेवा में बदल जाएगा। सामने वाले को महसूस होगा कि प्रशंसा उसके व्यक्तित्व की नहीं, उसके सेवा-कार्य की हो रही है। इससे वह अहंकार से बच जाएगा और वह जान जाएगा कि हर प्रशंसा करने वाला चापलूस नहीं होता। अब बात करते हैं आलोचना की। जब आलोचना करनी ही पड़ जाए तो सार्वजनिक रूप से बचें। व्यक्ति कितना ही बड़ा या छोटा क्यों न हो उससे अकेले में ही बात करें। सार्वजनिक रूप से की गई आलोचना अपमान में बदल जाती है और एकांत में की गई आलोचना अच्छी सलाह बन जाती है।
सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



किसी की प्रशंसा करते समय ध्यान रखें ये बातें

भाषा का अपना द्वंद्व होता है। इसका सीधा संबंध शब्दों से होता है। मनुष्य जीवन में शब्दों का बड़ा प्यारा प्रयोग है - प्रशंसा और आलोचना। कोई कितना ही मौन साधे इन दो स्थितियों से बच नहीं सकता। हमारी भाषा कैसी हो यह एक कला है। सार्वजनिक जीवन में तो ठीक है, लेकिन परिवार में भाषा और शब्द, कलह और प्रेम का कारण बन जाते हैं। जब किसी की प्रशंसा करनी हो तो सबके सामने करिए और आलोचना करनी हो तो एकांत में करिए। आइए, पहले प्रशंसा को समझ लें। प्रशंसा में दो गड़बड़ हो सकती है। सामने वाला भ्रम में डूब सकता है, अहंकार में गिर सकता है या फिर हमें चापलूस मान सकता है, इसलिए प्रशंसा में उसके कार्य को अधिक फोकस करें। हम व्यक्ति की प्रशंसा करने लगते हैं। उसके काम को भी तीन भागों में बांटकर प्रशंसा करें।
एक, यह काम उन्होंने किया कैसे? हमें भी इसकी समझ होनी चाहिए, इसलिए बिना जाने किसी की प्रशंसा न करें। दो, अब ऐसे प्रशंसनीय कार्य कौन-कौन कर गए, इस तरह के कार्य की प्रशंसा करें। इसमें व्यक्ति की बात भी आ जाएगी और व्यक्तित्व की तुलना भी हो जाएगी। तीन, इस कार्य से अन्य लोगों को क्या फायदा होगा। ऐसा दर्शाने से उनका कार्य सेवा में बदल जाएगा। सामने वाले को महसूस होगा कि प्रशंसा उसके व्यक्तित्व की नहीं, उसके सेवा-कार्य की हो रही है। इससे वह अहंकार से बच जाएगा और वह जान जाएगा कि हर प्रशंसा करने वाला चापलूस नहीं होता। अब बात करते हैं आलोचना की। जब आलोचना करनी ही पड़ जाए तो सार्वजनिक रूप से बचें। व्यक्ति कितना ही बड़ा या छोटा क्यों न हो उससे अकेले में ही बात करें। सार्वजनिक रूप से की गई आलोचना अपमान में बदल जाती है और एकांत में की गई आलोचना अच्छी सलाह बन जाती है।
सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



जीवन में मिलती रहेंगी खुशियां, ध्यान रखें ये बातें

आजकल खुश रहने की खूब बातेें की जाती हैं। यह बात सबको समझ में आ चुकी है कि 15-20 साल बाद खुशी जिंदगी के बाजार का सबसे महंगा प्रोडक्ट होगी। जिन्हें खुशी को स्थायी बनाना है, उन्हें शांति का मतलब समझना होगा वरना अस्थायी खुशी तो आसानी से मिलती रहेगी। हमारे ऋषि-मुनियों ने बड़ी सुंदर बात कही है कि खुश रहना है तो बहुत अधिक उठापटक न करते हुए बस, दो काम करो। पहला जब-जो करो, जमकर करो। खुद को शत-प्रतिशत उसमें झोंक दो। यदि नौकरी कर रहे हों तो जमकर सेवक बन जाओ। घर में माता-पिता हों तो शत-प्रतिशत माता-पिता बने रहो। दूसरी बात उन्होंने कही कि जीवन में खुशी साधन-सुविधा, धन-दौलत से ही नहीं मिलती। यह मन में उतार लें कि यदि जीवन में चुनौतियां आएं तो भी खुशी मिल सकती है। चुनौतियां कभी किसी की खत्म नहीं होंगी।
जिस युग में भगवान ने अवतार लिया उन्हें भी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। बुरा आदमी जब चुनौतियां देता है तो परेशानियां और बढ़ जाती हैं। आपका संबंध किसी से भी हो, भगवान और शैतान सभी में मिल जाएंगे। शैतान का मतलब ही चुनौती है, भगवान का मतलब ही समाधान है। धार्मिक लोग यह गलतफहमी दूर कर लें कि भक्त होने से, भगवान को मानने से चुनौतियां, समस्याएं नहीं आएंगी। आप तब भी दुखी रह सकते हैं और आपको खुश रहने के मंत्र खुद ढूंढ़ने पड़ेंगे। इसलिए यदि खुश रहना है तो जो तैयारियां हमारे ऋषि-मुनियों ने कीं, पीर-पैगंबर और अवतारों ने जो आचरण किया उन्हें हम भी अपना लें। जो भीतर से तैयार है वह स्थायी खुशी पाएगा। जिसकी तैयारी केवल बाहरी है उसके जीवन में खुशी आएगी और जाएगी। खुश रहने के मौके खुद ढूंढ़िए। दूसरों पर आधारित रहकर खुश रहने की तैयारी किसी नए दुख को आमंत्रण होगा।
सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



सोमवार, 13 जून 2016

क्यों पहनते हैं जनेऊ और क्या है इसके लाभ, जानिए

।।ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम।। अर्थात ब्राह्मण ब्रह्म (ईश्वर) तेज से युक्‍त हो। 
ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं, प्रजापतेयर्त्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं, यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥ -पार. गृ.सू. 2.2.11।
 
को उपवीत, यज्ञसूत्र, व्रतबन्ध, बलबन्ध, मोनीबन्ध और ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं। इसे संस्कार भी कहते हैं। 'उपनयन' का अर्थ है, 'पास या सन्निकट ले जाना।' किसके पास? ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के पास ले जाना। हिन्दू समाज का हर वर्ग जनेऊ धारण कर सकता है। जनेऊ धारण करने के बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। द्विज का अर्थ होता है दूसरा जन्म। कालांतर में इस संस्कार को दूसरे धर्मों में धर्मांतरित करने के लिए उपयोग किया जाने लगा। हिन्दू धर्म में प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है जनेऊ पहनना और उसके नियमों का पालन करना। हर हिन्दू जनेऊ पहन सकता है बशर्ते कि वह उसके नियमों का पालन करे।
क्यों पहनते हैं जनेऊ : हिन्दू धर्म के 24 संस्कारों में से एक 'उपनयन संस्कार' के अंतर्गत ही जनेऊ पहनी जाती है जिसे 'यज्ञोपवीत संस्कार' भी कहा जाता है। मुंडन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार के अंग होते हैं। प्राचीनकाल में पहले शिष्य, संत और ब्राह्मण बनाने के लिए दीक्षा दी जाती थी। इस दीक्षा देने के तरीके में से एक जनेऊ धारण करना भी होता था। प्राचीनकाल में गुरुकुल में दीक्षा लेने या संन्यस्त होने के पूर्व यह संकार होता था।
 
यज्ञोपवीत को व्रतबन्ध भी कहते हैं। व्रतों से बंधे बिना मनुष्य का उत्थान सम्भव नहीं। यज्ञोपवीत को व्रतशीलता का प्रतीक मानते हैं। इसीलिए इसे सूत्र (फार्मूला, सहारा) भी कहते हैं। धर्म शास्त्रों में यम-नियम को व्रत माना गया है। बालक की आयुवृद्धि हेतु गायत्री तथा वेदपाठ का अधिकारी बनने के लिए उपनयन (जनेऊ) संस्कार अत्यन्त आवश्यक है।
 
दीक्षा देना : दीक्षा देने का प्रचलन वैदिक ऋषियों ने प्रारंभ किया था। प्राचीनकाल में पहले शिष्य और ब्राह्मण बनाने के लिए दीक्षा दी जाती थी। माता-पिता अपने बच्चों को जब शिक्षा के लिए भेजते थे तब भी दीक्षा दी जाती थी। हिन्दू धर्मानुसार दिशाहीन जीवन को दिशा देना ही दीक्षा है। दीक्षा एक शपथ, एक अनुबंध और एक संकल्प है। दीक्षा के बाद व्यक्ति द्विज बन जाता है। द्विज का अर्थ दूसरा जन्म। दूसरा व्यक्तित्व। 
 
अन्य धर्मों में यह संस्कार : हिन्दू धर्म से प्रेरित यह उपनयन संस्कार सभी धर्मों में मिल जाएगा। यह दीक्षा देने की परंपरा प्राचीनकाल से रही है, हालांकि कालांतर में दूसरे धर्मों में दीक्षा को अपने धर्म में धर्मांतरित करने के लिए प्रयुक्त किया जाने लगा। इस आर्य संस्कार को सभी धर्मों में किसी न किसी कारणवश भिन्न-भिन्न रूप में अपनाया जाता रहा है। मक्का में काबा की परिक्रमा से पूर्व यह संस्कार किया जाता है।
 
सारनाथ की अति प्राचीन बुद्ध की प्रतिमा का सूक्ष्म निरीक्षण करने से उसकी छाती पर यज्ञोपवीत की सूक्ष्म रेखा दिखाई देती है। जैन धर्म में भी इस संस्कार को किया जाता है। वित्र मेखला अधोवसन (लुंगी) का सम्बन्ध पारसियों से भी है। सिख धर्म में इसे अमृत संचार कहते हैं। बौद्ध धर्म से इस परंपरा को ईसाई धर्म ने अपनाया जिसे वे बपस्तिमा कहते हैं। यहूदी और इस्लाम धर्म में खतना करके दीक्षा दी जाती है। 
 यहां जनेऊ पहनने के आपको लाभ बता रहे हैं। जनेऊ के नियमों का पालन करके आप निरोगी जीवन जी सकते हैं।
 
1.जीवाणुओं-कीटाणुओं से बचाव : जो लोग जनेऊ पहनते हैं और इससे जुड़े नियमों का पालन करते हैं, वे मल-मूत्र त्याग करते वक्त अपना मुंह बंद रखते हैं। इसकी आदत पड़ जाने के बाद लोग बड़ी आसानी से गंदे स्थानों पर पाए जाने वाले जीवाणुओं और कीटाणुओं के प्रकोप से बच जाते हैं।
 
2.गुर्दे की सुरक्षा : यह नियम है कि बैठकर ही जलपान करना चाहिए अर्थात खड़े रहकर पानी नहीं पीना चाहिए। इसी नियम के तहत बैठकर ही मूत्र त्याग करना चाहिए। उक्त दोनों नियमों का पालन करने से किडनी पर प्रेशर नहीं पड़ता। जनेऊ धारण करने से यह दोनों ही नियम अनिवार्य हो जाते हैं।
 
3.हृदय रोग व ब्लडप्रेशर से बचाव : शोधानुसार मेडिकल साइंस ने भी यह पाया है कि जनेऊ पहनने वालों को हृदय रोग और ब्लडप्रेशर की आशंका अन्य लोगों के मुकाबले कम होती है। जनेऊ शरीर में खून के प्रवाह को भी कंट्रोल करने में मददगार होता है। ‍चिकित्सकों अनुसार यह जनेऊ के हृदय के पास से गुजरने से यह हृदय रोग की संभावना को कम करता है, क्योंकि इससे रक्त संचार सुचारू रूप से संचालित होने लगता है।
 
4.लकवे से बचाव : जनेऊ धारण करने वाला आदमी को लकवे मारने की संभावना कम हो जाती है क्योंकि आदमी को बताया गया है कि जनेऊ धारण करने वाले को लघुशंका करते समय दांत पर दांत बैठा कर रहना चाहिए। मल मूत्र त्याग करते समय दांत पर दांत बैठाकर रहने से आदमी को लकवा नहीं मारता।
 
5.कब्ज से बचाव : जनेऊ को कान के ऊपर कसकर लपेटने का नियम है। ऐसा करने से कान के पास से गुजरने वाली उन नसों पर भी दबाव पड़ता है, जिनका संबंध सीधे आंतों से है। इन नसों पर दबाव पड़ने से कब्ज की श‍िकायत नहीं होती है। पेट साफ होने पर शरीर और मन, दोनों ही सेहतमंद रहते हैं।
 
6.शुक्राणुओं की रक्षा : दाएं कान के पास से वे नसें भी गुजरती हैं, जिसका संबंध अंडकोष और गुप्तेंद्रियों से होता है। मूत्र त्याग के वक्त दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से वे नसें दब जाती हैं, जिनसे वीर्य निकलता है। ऐसे में जाने-अनजाने शुक्राणुओं की रक्षा होती है। इससे इंसान के बल और तेज में वृद्ध‍ि होती है।
 
7.स्मरण शक्ति‍ की रक्षा : कान पर हर रोज जनेऊ रखने और कसने से स्मरण शक्त‍ि का क्षय नहीं होता है। इससे स्मृति कोष बढ़ता रहता है। कान पर दबाव पड़ने से दिमाग की वे नसें एक्ट‍िव हो जाती हैं, जिनका संबंध स्मरण शक्त‍ि से होता है। दरअसल, गलतियां करने पर बच्चों के कान पकड़ने या ऐंठने के पीछे भी मूल कारण यही होता था।
 
8.आचरण की शुद्धता से बढ़ता मानसिक बल : कंधे पर जनेऊ है, इसका मात्र अहसास होने से ही मनुष्य बुरे कार्यों से दूर रहने लगता है। पवित्रता का अहसास होने से आचरण शुद्ध होने लगते हैं। आचरण की शुद्धत से मानसिक बल बढ़ता है।
 
9.बुरी आत्माओं से रक्षा : ऐसी मान्यता है कि जनेऊ पहनने वालों के पास बुरी आत्माएं नहीं फटकती हैं। इसका कारण यह है कि जनेऊ धारण करने वाला खुद पवित्र आत्मरूप बन जाता है और उसमें स्वत: ही आध्यात्म‍िक ऊर्जा का विकास होता है।
 क्यों कान पर लपेटते हैं जनेऊं : मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व को कानों पर कस कर दो बार लपेटना पड़ता है। इससे कान के पीछे की दो नसें, जिनका संबंध पेट की आंतों से होता है, आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल देती है, जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता है तथा कान के पास ही एक नस से मल-मूत्र विसर्जन के समय कुछ द्रव्य विसर्जित होता है। जनेऊ उसके वेग को रोक देती है, जिससे कब्ज, एसीडीटी, पेट रोग, मूत्रन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय के रोगों सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते।
 
कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जाग्रण होता है। कान पर जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है। जनेऊ पहनने वाला व्यक्ति नियमों में बंधा होता है। वह मल विसर्जन के पश्चात अपनी जनेऊ उतार नहीं सकता। जब तक वह हाथ पैर धोकर कुल्ला न कर ले। अत: वह अच्छी तरह से अपनी सफाई करके ही जनेऊ कान से उतारता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जीवाणुओं के रोगों से बचाती है। इसी कारण जनेऊ का सबसे ज्यादा लाभ हृदय रोगियों को होता है।
 
* चिकित्सा विज्ञान के अनुसार दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है। वैज्ञानिकों अनुसार बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से इस समस्या से मुक्ति मिल जाती है।
 
* माना जाता है कि शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह काम करती है। यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कमर तक स्थित है। जनेऊ धारण करने से विद्युत प्रवाह नियंत्रित रहता है जिससे काम-क्रोध पर नियंत्रण रखने में आसानी होती है।
 
* विद्यालयों में बच्चों के कान खींचने के मूल में एक यह भी तथ्य छिपा हुआ है कि उससे कान की वह नस दबती है, जिससे मस्तिष्क की कोई सोई हुई तंद्रा कार्य करती है। इसलिए भी यज्ञोपवीत को दायें कान पर धारण करने का उद्देश्य बताया गया है।
सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें ।