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मंगलवार, 10 मई 2016

गर्भवती महिलाओं को किन जगहों पर नहीं जाना चाहिए?


गर्भवती महिलाओं को किन जगहों पर नहीं जाना चाहिए?


गर्भवती महिला को बच्चे के जन्म से पहले अनेक सावधानियां रखनी होती हैं। जिससे बच्चे के जन्म के बाद जच्चा और बच्चा दोनों स्वस्थ्य रहें। इसलिए हमारे यहां बच्चे के जन्म के पूर्व की भी अनेक परंपराएं हैं जिनका गर्भवती महिला को पालन करना होता है। ऐसी ही एक परंपरा है कि गर्भवती स्त्री को सातवें महीने के बाद नदी व नाले पार नहीं करना चाहिए या उनके पास नहीं जाना चाहिए ताकि माता और उसके गर्भ में पल रहा शिशु दोनों की सुरक्षा और सेहत अच्छी बनी रहे।


आजकल के अधिकांश लोग इस परंपरा का पालन नहीं करते हैं, क्योंकि वे इसे सिर्फ अंधविश्वास मानते हैं। मगर ये मान्यता अंधविश्वास नहीं है। दरअसल, इसके पीछे कुछ कारण छुपे हैं। ऐसा माना जाता है कि नदी और नाले जैसे जो क्षेत्र रहते हैं वहां नकारात्मक ऊर्जा का निवास होता है। इसलिए श्मशान भी नदी के किनारे बनाए जाते हैं और ऐसे स्थानों पर ही तंत्र साधना की जाती है।जब कोई स्त्री गर्भवती होती है तो उसके शरीर में बहुत सारे परिवर्तन होते हैं। उनका शरीर सामान्य से अधिक संवेदनशील होता है।

ऐसे में नदी या नाले को पार करने से या उनके पास जाने से होने वाले बच्चे पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा इसका एक अन्य कारण यह भी है कि एक बार जब गोद भराई करके होने वाले शिशु की मां को मायके भेज दिया जाता है तो वो वहां अच्छे से आराम करे और यात्राएं ना करे ताकि होने वाली संतान स्वस्थ्य हो क्योंकि सातवे महीने के बाद गर्भवती महिलाओं को यात्रा करने पर कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।


एक ही गौत्र में क्यों नहीं करते हैं शादी?


हिंदू धर्म में शादी से पहले गौत्र मिलान और कुंडली मिलान की भी परंपरा है कुछ लोग इस प्रथा को अंधविश्वास मानकर टाल देते हैं तो कुछ लोग इसे सही मानते हैं। दरअसल, यह कोई अंधविश्वास नहीं है। इसके पीछे धार्मिक कारण ये है कि एक ही गौत्र या कुल में विवाह होने पर दंपत्ति की संतान अनुवांशिक दोष के साथ पैदाहोती है।

ऐसे दंपत्तियों की संतान में एक सी विचारधारा, पसंद, व्यवहार आदि में कोई नयापन नहीं होता। ऐसे बच्चों में रचनात्मकता का अभाव होता है। विज्ञान द्वारा भी इस संबंध में यही बात कही गई है कि सगौत्र शादी करने पर अधिकांश ऐसे दंपत्ति की संतानों में अनुवांशिक दोष यानी मानसिक विकलांगता, अपंगता, गंभीर रोग आदि जन्मजात ही पाए जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार इन्हीं कारणों से सगौत्र विवाह पर प्रतिबंध लगाया था।



दुल्हन के लिए लाल रंग ही खास क्यों?

हिंदू शादियों में दूल्हा-दुल्हन को काले कपड़े नहीं पहनने दिए जाते हैं, क्योंकि ये मान्यता है कि काला रंग अशुभ होता है। दुल्हन की हर चीज में लाल रंग को अधिक महत्व दिया जाता है। अधिकतर लोग इसे अंधविश्वास मानकर इस बात को नहीं मानते हैं, क्योंकि आजकल अनेक रंगो के वेडिंग ड्रेस फैशन में है इसलिए शादी में दूल्हा- दुल्हन और उनके रिश्तेदार भी इस बात को अंधविश्वास मानकर टाल देते हैं।

लेकिन ज्योतिष के अनुसार भी शुभ काम व शादी में लाल, पीले और गुलाबी रंगों को अधिक मान्यता दी जाती है, क्योंकि लाल रंग सौभाग्य का प्रतीक है। इसके पीछे वैज्ञानिक तथ्य यह है कि लाल रंग ऊर्जा का स्त्रोत है। साथ ही, ये सकारात्मक ऊर्जा का भी प्रतीक है। इसके विपरीत जब नीले, भूरे और काले रंगों की मनाही करते हैं क्योंकि ये रंग नैराश्य का प्रतीक है और ऐसी भावनाओं को शुभ कामों में नहीं आने देना चाहिए। जब पहले ही कोई नकारात्मक विचार मन में जन्म ले लेंगे तो रिश्ते का आधार मजबूत नहीं हो सकता। इसलिए शादी में दुल्हन के लिए लाल रंग खास माना गया है।



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