Adsense responsive

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

Rochak news



1 अगर आपको नींद नही आ रही है, तो 99 से उलटी गिनती शुरु कीजिए। अधिकतर आप 50 तक की गिनती पूरी होने के पहले ही सो जाएंगे।

.
2. नाश्ते के समय चॉकलेट का एक छोटा टुकड़ा खाने से दिनभर आपका मूड अच्छा बना रहता है।
.
3. आप बैटरी को 6 इंच की हाईट से गिरा कर देखिए। बैटरी अगर एक बार उछलती है तब यह ठीक हालत में है। अगर ज्यादा बार उछलती है तो यह खराब हो चुकी है या खराब होने वाली है।
.
4. आप वजन कम करने की कोशिश कर रहे हैं? सोने जाने के 4 घंटे पहले कुछ मत खाइए। यह काफी कारगर है।
.
5. पीले दांत ज्यादा मजबूत होते हैं। दांतो का प्राकृतिक रंग हल्का पीला है। दांतो को सफेद करने की कोशिश उनको नुकसान पहुंचा सकती है।
.
6. सोने में परेशानी महसूस हो रही है, अपनी पलकों को तेजी से खोलिए, बंद कीजिए। थकी हुई आंखें सोने में आपकी मदद करेंगी।
.
7. किसी रेस्टोरेंट में ऑर्डर देने के बाद अपने हाथ धोएं। मेन्यू कार्ड वहां आपके द्वारा छुई गई सभी चीजों में से सबसे ज्यादा गंदा होता है।
.
8. अगर आप 5 मिनिट्स से भी कम समय में सो जाते हैं तो इससे साबित होता है कि आपकी नींद की जबरदस्त कमी है।
.
9. आपने नोट्स को बनाने के एक दिन के अंदर पढ़ लेने से, आप उन्हें 60 प्रतिशत से ज्यादा याद कर लेते हैं।.सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

अपने हाथ के आकार से जानें कैसा है आपका व्‍यक्तित्‍व

अपने हाथ के आकार से जानें कैसा है आपका व्‍यक्तित्‍व


आपने लोगों की हाइट से उनकी पर्सनैलिटी का राज जाना होगा। इसके अलावा बातचीत से भी लोगों की पर्सनैलिटी का खुलासा करते सुना होगा। लेकिन क्या आपने कभी हाथों से पर्सनैलिटी का खुलासा होते सुना है? जी, हां! चलिए हम आपको बताते हैं कि आपकी हथेली किस तरह आपके पर्सनैलिटी का तिनका तिनका बयां करती है।

1
रेक्टुंगलर हथेली



यदि आपके रेक्टुंगलर आकार के हाथ हैं तो समझना चाहिए कि आप समस्या से निपटने में माहिर हैं। असल में आप समस्या को पहले से ही भापकर उसका निदान करने में महारत रखते हैं। साथ ही दूसरों की समस्या का निपटारा करने में भी आप एक्सपर्ट है। विशेषज्ञ यह भी कहतेहै। कि समकोणीय हाथ वाले व्यक्ति खासकर आफिस सम्बंधी समस्याओं में ज्यादा सहायक होते हैं। इतने में ही आपकी खासियत खत्म नहीं हो जाती। आपकी हथेली इस ओर भी इशारा कर रही है कि आप खासा एड्वेंचरस यानी खतरों के खिलाड़ी भी है। बिना कुछ सोचे समझे कोई भी खतरा मोल ले लेते हैं।





2
स्क्वायर हथेली



स्क्वायर हथेली वाले लोग बहुत ज्यादा व्यवहारिक होते हैं। ये बिना व्यवहारिक हुए कोई काम करना पसंद ही नहीं करते। यही कारण है कि आप इनसे रचनात्मक कार्य की उम्मीद न करें। विशेषज्ञों की राय में स्क्वायर हथेली वाले लोग रचनात्मक कार्यों में जरा भी रुचि नहीं दिखाते। इतना ही नहीं उन्हें रचनात्मक कार्य से दूरी पसंद आती है। असल में इनके जीवन में सिर्फ और सिर्फ व्यवहारिक होने का बोलबाला होता है। ये बिना तर्क के कोई काम करना तक पसंद नहीं करते। अपने तर्कशास्त्र व्यवहार के कारण ये लोग अत्यधिक सोचते हैं। इनके लिए आप कह सकते हैं कि जितना सोचते हुए ये लोग दिखते हैं, ये उतना ही सोचते हैं। बिना सोचे समझे कोई काम अंजाम देने में ये लोग विश्वास नहीं रखते।




3
छोटे हाथ



छोटी हथेली वाले काफी रिस्की लोग होते हैं। आप कह सकते हैं कि जितने छोटे हाथ, उतना बडा रिस्क। जिस भी जगह हो, जैसा भी माहौल हो। कोई भी रिस्क हो। हर काम करने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। ये लोग अंजाम की तो खैर परवाह करते ही नहीं; लेकिन इन्हें काम के दौरान आने वाली समस्याओं से भी परेशानी महसूस नहीं होती। यही कारण है कि ये लोग अन्य लोगों से अलग हैं। ये अपने रिश्ते में भी अपने पार्टनर को हर समय खास महसूस कराने की कोशिश करते हैं। असल में ये रोमांटिक भी हैं और इनका प्यार ड्रामाटिक लगता है।



4
लम्बी अंगुलियां



यदि आपका कोई दोस्त काफी ज्यादा जिज्ञासु है तो जरा उसकी अंगुलियों की ओर गौर करें। कहीं उसकी अंगुलियां लम्बी तो नहीं? असल में लम्बी अंगुली वाले लोग बेहद जिज्ञासु और हर चीज जानने को उत्साही होते हैं। आप कह सकते हैं कि ये लोग छोटी अंगुली वाले लोगों के बिल्कुल उलट होते हैं। ये लोग स्वभाव से ही लीडर होते हैं। हर समय दूसरों को अपने काम से प्रभावित करने की हर संभव कोशिश करते हैं। यही नहीं ये लोग अकसर खुद को दूसरों से बेहतर साबित करने की कोशिश करते हैं ताकि दूसरों के लिए अच्छे लीडर साबित हो सकें।




5
बड़ी हथेली





बड़ी हथेली वाले लोग काफी भावुक होते हैं। इन लोगों की एक समस्या यह है कि इन्हें हर चीज पर्फेक्ट चाहिए। असल में यह समस्या इस लिहाज है कि यदि कोई काम पर्फेक्ट न हो या फिर इनके ओर्डर के मुताबिक न हो तो ये बहुत जल्द भड़क जाते हैं। इनके साथ बनाए रखने के लिए जरूरी है कि इनकी हर बात मानी जाए। असल में ये हमेशा दूसरों पर प्रभावी बने रहना चाहते हैं। हालांकि भावुकता इनकी तमाम अन्य नकारात्मकता को दरकिनार कर देता है।
सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



Kapalik Sadu History & Facts in Hindi



Kapalik Sadu History & Facts in Hindi




अगर कोई आपको इंसान की खोपड़ी में भोजन परोसे या पानी पिलाए तो क्या आप इसे ग्रहण कर सकेंगे। आपके लिए ये सोचना भी कितना दुष्कर हो सकता है, लेकिन कापालिक संप्रदाय के लोग इंसान की खोपड़ी में ही भोजन करते और पानी पीते हैं।


तंत्र शास्त्र के अनुसार कापालिक संप्रदाय के लोग शैव संप्रदाय के अनुयायी होते हैं। क्योंकि ये लोग मानव खोपडिय़ों (कपाल) के माध्यम से खाते-पीते हैं, इसीलिए इन्हें ‘कापालिक’ कहा जाता है।

इतिहास

प्राचीन समय में कापालिक साधना को विलास तथा वैभव का रूप मानकर कई साधक इसमें शामिल हुए। इस तरह इस मार्ग को भोग मार्ग का ही एक विकृत रूप बना दिया गया। मूल अर्थों में कापालिकों की चक्र साधना को भोग विलास तथा काम पिपासा शांत करने का साधन बना दिया गया। इस प्रकार इस मार्ग को घृणा भाव से देखा जाने लगा।

जो सही अर्थों मे कापालिक थे, उन्होंने अलग-अलग हो कर व्यक्तिगत साधनाएं शुरू कर दीं। आदि शंकराचार्य ने कापालिक संप्रदाय में अनैतिक आचरण का विरोध किया, जिससे इस संप्रदाय का एक बहुत बड़ा हिस्सा नेपाल के सीमावर्ती इलाके में तथा तिब्बत मे चला गया। यह संप्रदाय तिब्बत में लगातार गतिशील रहा, जिससे की बौद्ध कापालिक साधना के रूप मे यह संप्रदाय जीवित रह सका।

साधना

इतिहासकार यह मानते हैं कि कापालिक पंथ से शैव शाक्त कौल मार्ग का प्रचलन हुआ। इस संप्रदाय से संबंधित साधनाएं अत्यधिक महत्वपूर्ण रही हैं। कापालिक चक्र में मुख्य साधक ‘भैरव’ तथा साधिका को ‘त्रिपुर सुंदरी’ कहा जाता है तथा काम शक्ति के विभिन्न साधन से इनमें असीम शक्तियां आ जाती हैं। फल की इच्छा मात्र से अपने शारीरिक अवयवों पर नियंत्रण रखना या किसी भी प्रकार के निर्माण तथा विनाश करने की बेजोड़ शक्ति इस मार्ग से प्राप्त की जा सकती है।

इस मार्ग में कापालिक अपनी भैरवी साधिका को पत्नी के रूप में भी स्वीकार कर सकता था। इनके मठ जीर्णशीर्ण अवस्था मे उत्तरी पूर्व राज्यों में आज भी देखे जाते हैं। यामुन मुनि के आगम प्रामाण्य, शिवपुराण तथा आगम पुराण में विभिन्न तांत्रिक संप्रदायों के भेद दिखाए गए हैं। वाचस्पति मिश्र ने चार माहेश्वर संप्रदायों के नाम लिये हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि श्रीहर्ष ने नैषध में समसिद्धान्त नाम से जिसका उल्लेख किया है, वह कापालिक संप्रदाय ही है।

इष्टदेव

कापालिक साधनाओं में महाकाली, भैरव, चांडाली, चामुंडा, शिव तथा त्रिपुरासुंदरी जैसे देवी-देवताओं की साधना होती है। पहले के समय में मंत्र मात्र से मुख्य कापालिक साथी कापालिकों की काम शक्ति को न्यूनता तथा उद्वेग देते थे, जिससे योग्य मापदंड में यह साधना पूरी होती थी। इस प्रकार यह अद्भुत मार्ग लुप्त होते हुए भी गुप्त रूप से सुरक्षित है। विभिन्न तांत्रिक मठों मे आज भी गुप्त रूप से कापालिक अपनी तंत्र साधनाएं करते हैं।
सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



Amazing facts of Nalanda University in Hindi



Amazing facts of Nalanda University in Hindi




दुनिया की सबसे पुरानी यूनिवर्सिटियों में से एक है नालंदा यूनिवर्सिटी।इसकी स्थापना 450 ई. में हुई थी। नालंदा यूनिवर्सिटी प्राचीन भारत में उच्च शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विख्यात केंद्र थी। पटना से 90 किलोमीटर दूर और बिहार शरीफ से करीब 12 किलोमीटर दक्षिण में, विश्व प्रसिद्ध प्राचीन बौद्ध विश्वविद्यालय, नालंदा के खंडहर स्थित है। आइये जानते है दुनिया की सबसे पुरानी यूनिवर्सिटियों में से एक नालंदा यूनिवर्सिटी के बारे में रोचक फैक्ट्स-


1. यहां की लाइब्रेरी में हजारों किताबों के साथ 90 लाख पांडुलिपियां रखी हुई है। यहां पर बख्तियार खिलजी ने आक्रमण कर आग लगा दी थी जिसे बुझाने में 6 महीने से ज्यादा का वक़्त लगा था।


2. तक्षशिला के बाद नालंदा को दुनिया की दूसरी सबसे प्राचीन यूनिवर्सिटी माना जाता है। ये 800 साल तक अस्तित्व में रही।

3. यहां पर विद्यार्थियों का चयन मेरिट के आधार पर होता था और निःशुल्क शिक्षा दी जाती थी। इसके साथ उनका रहना और खाना भी पूरी तरह निःशुल्क था।

4. इस यूनिवर्सिटी में 10 हजार से ज्यादा विद्यार्थी और 2700 से ज्यादा अध्यापक थे।

5. यूनिवर्सिटी में सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, ईरान, ग्रीस, मंगोलिया समेत कई दूसरे देशो के स्टूडेंट्स भी पढ़ाई के लिए आते थे।


6. नालंदा यूनिवर्सिटी की स्थापना 5वीं शताब्दी में गुप्त वंश के शासक सम्राट कुमारगुप्त ने की थी। नालंदा में ऐसी कई मुद्राएं भी मिली है जिससे इस बात की पुष्टि भी होती है।

7. नालंदा की स्थापना का उद्देश्य ध्यान और आध्यात्म के लिए स्थान बनाने से था। ऐसा भी कहा जाता है कि गौतम बुद्ध ने कई बार यहां की यात्रा की और रुके भी।

8. यूनिवर्सिटी में ‘धर्म गूंज’ नाम की लाइब्रेरी थी। इसका मतलब ‘सत्य का पर्वत’ से था। लाइब्रेरी के 9 मंजिलों में तीन भाग थे जिनके नाम ‘रत्नरंजक’, ‘रत्नोदधि’, और ‘रत्नसागर’ थे।

9. उस दौर में यहां लिटरेचर, एस्ट्रोलॉजी, साइकोलॉजी, लॉ, एस्ट्रोनॉमी, साइंस, वारफेयर, इतिहास, मैथ्स, आर्किटेक्टर, भाषा विज्ञानं, इकोनॉमिक, मेडिसिन समेत कई विषय पढ़ाएं जाते थे।

10. नालंदा यूनिवर्सिटी में हषवर्धन, धर्मपाल, वसुबन्धु, धर्मकीर्ति, आर्यवेद, नागार्जुन के साथ कई अन्य विद्वानों ने पढ़ाई की थी।

11. नालंदा यूनिवर्सिटी का इतिहास चीन के हेनसांग और इत्सिंग ने खोजा था। ये दोनों 7वीं शताब्दी में भारत आए थे। इन दोनों ने इसे दुनिया की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी भी बताया था।

12. यूनिवर्सिटी में लोकतान्त्रिक प्रणाली थी। कोई भी फैसला सभी की सहमति से लिया जाता था। यानि सन्यासियों के साथ टीचर्स और स्टूडेंट्स भी राय देते थे।

13. 1.5 लाख वर्ग फीट में नालंदा यूनिवर्सिटी के अवशेष मिले है। ऐसा माना जाता है कि ये सिर्फ यूनिवर्सिटी का 10 प्रतिशत हिस्सा ही है।

14. नालंदा शब्द संस्कृत के तीन शब्द ‘ना +आलम +दा’ के संधि-विच्छेद से बना है। इसका अर्थ ‘ज्ञान रूपी उपहार पर कोई प्रतिबंध न रखना’ से है।

15. नालंदा की तर्ज पर नई नालंदा यूनिवर्सिटी बिहार के राजगिर में बनाई गई है। इसे 25 नवंबर, 2010 को स्थापित किया गया।
सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



सोमवार, 25 अप्रैल 2016

Rochak gyan

अगर कोई इन्सानबहुत हंसता है , तो अंदर से वो बहुत अकेला हैअगर कोई इन्सान बहुत सोता है , तो अंदर सेवो बहुत उदास हैअगर कोई इन्सान खुद को बहुत मजबूत दिखाता है और रोता नही , तो वोअंदर से बहुत कमजोर हैअगर कोई जरा जरा सीबात पर रो देता है तो वो बहुत मासूम और नाजुक दिल का हैअगर कोई हर बात परनाराज़ हो जाता है तो वो अंदर से बहुत अकेलाऔर जिन्दगी में प्यार की कमी महसूस करता हैलोगों को समझने की कोशिश कीजिये,जिन्दगी किसी का इंतज़ार नही करती , लोगों को एहसास कराइए की वो आप के लिए कितने खास है!!!1. अगर जींदगी मे कुछ पाना हो तो,,, तरीके बदलो....., ईरादे नही..2. जब सड़क पर बारात नाच रही हो तो हॉर्न मार-मार के परेशान ना हो...... गाडी से उतरकर थोड़ा नाच लें..., मन शान्त होगा।टाइम तो उतना लगना ही है..!3. इस कलयुग में रूपया चाहे कितना भी गिर जाए, इतना कभी नहीं गिर पायेगा, जितना रूपये के लिए इंसान गिर चूका है...सत्य वचन....4. रास्ते में अगर मंदिर देखो तो,,, प्रार्थना नहीं करो तो चलेगा . . पर रास्ते में एम्बुलेंस मिले तब प्रार्थना जरूर करना,,, शायद कोईजिन्दगी बच जाये5. जिसके पास उम्मीद हैं, वो लाख बार हार के भी, नही हार सकता..!6. बादाम खाने से उतनी अक्ल नहीं आती...जितनी धोखा खाने से आती है.....!7. एक बहुत अच्छी बात जो जिन्दगी भर याद रखिये,,, आप का खुश रहना ही आप का बुरा चाहने वालों के लिए सबसे बड़ी सजा है....!8. खुबसूरत लोग हमेशा अच्छे नहीं होते,अच्छे लोग हमेशा खूबसूरत नहीं होते...!9. रिश्ते और रास्ते एक ही सिक्के के दो पहलु हैं... कभी रिश्ते निभाते निभाते रास्ते खो जाते हैं,,, और कभी रास्तो पर चलते चलते रिश्ते बन जाते हैं...!10. बेहतरीन इंसान अपनी मीठी जुबान से ही जाना जाता है,,,, वरना अच्छी बातें तो दीवारों पर भी लिखी होती है...!11. दुनिया में कोई काम "impossible" नहीं,,, बस होसला और मेहनत की जरूरत है...सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



चीन में मशहूर है हवा में खड़ा मंदिर !

चीन भर में मशहूर है हवा में खड़ा मंदिर !

आपने इस विशाल दुनिया में कई प्रकार के मंदिर देखें होंगे। परंतु यह मंदिर ऐसा है, जो दूर से देखने में मानो वो हवा में खडा हो। यह मंदिर चीन के शानसी प्रांत में पहाड़ की चट्टान में ओर जमीन से ५० मीटर की ऊंचाई पर बनाया गया है। यह मंदिर बौद्ध, ताओ, ओर कन्फ्यूशियस यह त्रिधर्मो की मिश्रित शैली से बना, एवम् चीन के सुरक्षित प्राचीन वास्तु निर्माणों में से एकमात्र अत्यंत अद्दभुत मंदिर है। मंदिर के उपर पहाड़ का विशाल टुकड़ा बाहर की ओर आगे बढा हुआ है, जिसे देखकर लगता है की वो अभी मंदिर पर गिर जाएगा।
इस मंदिर को दिसम्बर २०१० में टाइम पत्रिका ने दुनिया की १० अजीब ओर खतरनाक इमारतों में सामिल किया गया था। यह मंदिर का निर्माण कोंगसु नामक प्राचीन सुप्रसिद्ध चीनी शिल्पी द्वारा किया गया है। अनुमान लगाया जाता है की यह मंदिर १४०० साल से भी पुराना है।

सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

सिंहस्थ महाकुंभ



सिंहस्थ महाकुंभ




22 अप्रैल से मध्य प्रदेश के उज्जैन नगर में दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक मेला सिंहस्थ महाकुंभ आयोजित होने वाला है। इस मेले की खासियत यहां आने वाले विभिन्न अखाड़ों के साधु-संत होंगे। मुख्य तौर पर 13 अखाड़े मान्यता प्राप्त हैं। इनमें से 7 शैव, 3 वैष्णव व 3 उदासीन अखाड़े हैं। ऊपर से देखने पर ये अखाड़े एक जैसे लगते हैं, लेकिन इनकी परंपरा, पूजा पद्धति आदि में कुछ न कुछ भिन्न जरूर है। आज हम आपको बता रहे हैं इन अखाड़ों से जुड़ी कुछ ऐसी रोचक बातें जो बहुत कम लोग जानते हैं-



जूना अखाड़ा –
मान्यता के अनुसार, यह सबसे पुराना अखाड़ा है। इसीलिए इसे जूना (पुराना) नाम दिया गया है। वर्तमान में सबसे ज्यादा महामंडलेश्वर (275) इसी अखाड़े के है। इनमें विदेशी व महिला महामंडलेश्वर भी शामिल है।


अटल अखाड़ा –
इस अखाडे में सिर्फ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को दीक्षा दी जाती है। अन्य वर्गों को इस अखाड़े में शामिल नहीं किया जाता।

आवहन अखाड़ा –
अन्य अखाड़ों में महिला साध्वियों को भी दीक्षा दी जाती है, लेकिन आवाहन में महिला साध्वियों की कोई परम्परा नहीं है।

निरंजनी अखाड़ा –
इस अखाड़े में लगभग 50 महामंडलेश्वर है। सबसे ज्यादा उच्च शिक्षित महामंडलेश्वर इसी अखाड़े में है।

अग्नि अखाड़ा –
इस अखाड़े में सिर्फ ब्राह्मणों को ही दीक्षा दी जाती है। ब्राह्मण के साथ उनका ब्रह्मचारी होना भी आवश्यक है।


महानिर्वाणी अखाड़ा –
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की पूजा का जिम्मा इसी अखाड़े के पास है। यह परम्परा अनेक वर्षों से चली आ रही है।

आनंद अखाडा –
इस शैव अखाड़े में आज तक एक भी महामंडलेश्वर नहीं बनाया गया है। इस अखाड़े में आचार्य का पद प्रमुख होता है।

दिगंबर अणि अखाड़ा –
इस अखाड़े में सबसे ज्यादा खालसा (431) हैं। वैष्णव संप्रदाय के अखाड़ों में इसे राजा कहा जाता है।

निर्मोही अणि अखाड़ा –
वैष्णव सम्प्रदाय के तीनों अणि अखाड़ों में से इसी में सबसे ज्यादा अखाड़े शामिल हैं। इनकी संख्या 9 है।

निर्वाणी अणि अखाड़ा –
इस अखाड़े के कई संत प्रोफेशनल पहलवान रह चुके हैं। कुश्ती इस अखाड़े के जीवन का एक हिस्सा है।

बड़ा उदासीन अखाड़ा –
इस अखाड़े का उद्देश्य सेवा करना है। इस अखाड़े में 4 महंत होते हैं, जो कभी रिटायर नहीं होते है।

नया उदासीन अखाड़ा –
इस अखाड़े में उन्हीं को नागा बनाया जाता है, जिनकी दाड़ी-मूंछ न निकली हो यानी 8 से 12 साल तक के।

निर्मल अखाड़ा –
इस अखाड़ें में धूम्रपान पर पूरी तरह पाबंदी है। इस अखाड़े के सभी केंद्रों के गेट पर इसकी सूचना लिखी रहती है।

सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



बुधवार, 20 अप्रैल 2016

हनुमान जयंती पर पढ़ें मनोकामना पूर्ति के 6 सरल मंत्र

हनुमान जयंती पर पढ़ें मनोकामना पूर्ति के 6 सरल मंत्र


हनुमान जयंती शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016 को वैशाख पूर्णिमा पर है।श्री हनुमानजी का जन्म इसी दिन हुआ, ऐसा माना जाता है। वैसे तो हनुमान मंत्रों का प्रयोग किसी भी शुभ मुहूर्त मंगलवार या शनिवार से किया जा सकता है, लेकिन इस मुहूर्त में किए जाने वाले पूजन-अर्चन कई गुना लाभ पहुंचाते हैं।


 
यथाशक्ति पूजन चंदन, रक्तपुष्प, सिन्दूर, बेसन के लड्डू का नैवेद्य, लाल वस्त्र, पान, यज्ञोपवीत इत्यादि चढ़ाकर किया जाता है। रक्त कंबल के आसन या कुशासन का प्रयोग यथेष्ट है। रक्त प्रवाल की माला के अभाव में रुद्राक्ष की माला उपयोग में लाई जा सकती है।

1) रोजगार-ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए हनुमत् गायत्री मंत्र की यथाशक्ति 11-21-51 माला करें। देशकाल के अनुसार हवन करें। मंत्र सिद्ध हो जाएगा। पश्चात नित्य 1 माला जपें। 
 
'ॐ ह्रीं आंजेनाय विद्महे, पवनपुत्राय
धीमहि तन्नो: हनुमान प्रचोद्यात्।।' 

(2) मनोरथ पूर्ति हेतु मंत्र-
 
'ॐ नमो भगवते आंजनेयाय महाबलाय स्वाहा।' 

(3) सभी भय बंधन मुक्ति तथा शत्रु संहार हेतु- विधि उपरोक्त तथा निम्न मंत्र का जप करें।
 
'ॐ नमो भगवते हनुमते महारुद्राय हुं फट स्वाहा।' 

(4)  सिेद्धि प्राप्त करने हेतु : लगातार विधि-विधान से जप करने पर हनुमानजी स्वयं दर्शन या आभास देकर वर प्रदान करते हैं।
'ॐ हं पवन नंदनाय स्वाहा'

(5) राजकीय, कोर्ट-कचहरी, शत्रु अधिक परेशान करें तो यह अनुभूत प्रयोग है। चुनावी प्रत्याशी भी इसे कर या करवा सकते हैं। पूर्ण अनुष्ठान सवा लाख का है। किसी ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण से हनुमान मंदिर में किया जा सकता है। मंत्र निम्नलिखित है- 
 
'ॐ नमो हरिमर्कट मर्कटाय स्वाहा।' 

6) शत्रु व क्रोध नाश के लिए सरसों के तेल से हनुमानजी का अभिषेक किया जाता है। कई लोग हनुमत् साधना करते हैं तथा बीच में रोक देते हैं। पूछने पर बताते हैं कि उन्हें क्रोध ज्यादा आने लगा या व्यवधान होने लगे अत: वे निम्न मंत्र का जप कुछ दिन पहले करें या हमेशा भी कर सकते हैं। इस मंत्र का कुछ दिन जप करने से सुख-शांति मिलती है।
 
मंत्र- 'ॐ नम: शिवाय ॐ हं हनुमते श्री रामचन्द्राय नम:।' 


सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



20 Facts about Kinnar


20 Facts about Kinnar


किन्नर समुदाय समाज से अलग ही रहता है और इसी कारण आम लोगों में उनके जीवन और रहन-सहन को जानने की जिज्ञासा बनी रहती है। किन्नरों का वर्णन ग्रंथों में भी मिलता है। यहां जानिए किन्नर समुदाय से जुड़ी कुछ खास बातें…



1. ज्योतिष के अनुसार वीर्य की अधिकता से पुरुष (पुत्र) उतपन्न होता है। रक्त (रज) की अधिकता से स्त्री (कन्या) उतपन्न होती है। वीर्य और राज़ समान हो तो किन्नर संतान उतपन्न होती है।


2. महाभारत में जब पांडव एक वर्ष का अज्ञात वास काट रहे थे, तब अर्जुन एक वर्ष तक किन्नर वृहन्नला बनकर रहा था।

3. पुराने समय में भी किन्नर राजा-महाराजाओं के यहां नाचना-गाना करके अपनी जीविका चलाते थे। महाभारत में वृहन्नला (अर्जुन) ने उत्तरा को नृत्य और गायन की शिक्षा दी थी।

4. किन्नर की दुआएं किसी भी व्यक्ति के बुरे समय को दूर कर सकती हैं। धन लाभ चाहते है तो किसी किन्नर से एक सिक्का लेकर पर्स में रखे।

5. एक मान्यता है कि ब्रह्माजी की छाया से किन्नरों की उत्पत्ति हुई है। दूसरी मान्यता यह है कि अरिष्टा और कश्यप ऋषि से किन्नरों की उतपत्ति हुई है।


6. पुरानी मान्यताओं के अनुसार शिखंडी को किन्नर ही माना गया है। शिखंडी की वजह से ही अर्जुन ने भीष्म को युद्ध में हरा दिया था।

7. यदि कुंडली में बुध गृह कमजोर हो तो किसी किन्नर को हरे रंग की चूड़ियां व साडी दान करनी चाहिए। इससे लाभ होता है।

8. किसी नए वयक्ति को किन्नर समाज में शामिल करने के भी नियम है। इसके लिए कई रीती-रिवाज़ है, जिनका पालन किया जाता है। नए किन्नर को शामिल करने से पहले नाच-गाना और सामूहिक भोज होता है।

9. फिलहाल देश में किन्नरों की चार देवियां हैं।

10. कुंडली में बुध, शनि, शुक्र और केतु के अशुभ योगों से व्यक्ति किन्नर या नपुंसक हो सकता है।

11. किसी किन्नर की मृत्यु के बाद उसका अंतिम संस्कार बहुत ही गुप्त तरीके से किया जाता है।

12. किन्नरों की जब मौत होती है तो उसे किसी गैर किन्नर को नहीं दिखाया जाता। ऐसा माना जाता है कि ऐसा करने से मरने वाला अगले जन्म में भी किन्नर ही पैदा होगा। किन्नर मुर्दे को जलाते नहीं बल्कि दफनाते हैं.

13. हिंजड़ों की शव यात्राएं रात्रि को निकाली जाती है। शव यात्रा को उठाने से पूर्व जूतों-चप्पलों से पीटा जाता है।किन्नर के मरने उपरांत पूरा हिंजड़ा समुदाय एक सप्ताह तक भूखा रहता है।

14. किन्नर समुदाय में गुरू शिष्य जैसे प्राचीन परम्परा आज भी यथावत बनी हुई है। किन्नर समुदाय के सदस्य स्वयं को मंगल मुखी कहते है क्योंकि ये सिर्फ मांगलिक कार्यो में ही हिस्सा लेते हैं मातम में नहीं ।

15. किन्नर समाज कि सबसे बड़ी विशेषता है मरने के बाद यह मातम नहीं मनाते हैं। किन्नर समाज में मान्यता है कि मरने के बाद इस नर्क रूपी जीवन से छुटकारा मिल जाता है। इसीलिए मरने के बाद हम खुशी मानते हैं । ये लोग स्वंय के पैसो से कई दान कार्य भी करवाते है ताकि पुन: उन्हें इस रूप में पैदा ना होना पड़े।

16. देश में हर साल किन्नरों की संख्या में 40-50 हजार की वृद्धि होती है। देशभर के तमाम किन्नरों में से 90 फीसद ऐसे होते हैं जिन्हें बनाया जाता है। समय के साथ किन्नर बिरादरी में वो लोग भी शामिल होते चले गए जो जनाना भाव रखते हैं।

17. किन्नरों की दुनिया का एक खौफनाक सच यह भी है कि यह समाज ऐसे लड़कों की तलाश में रहता है जो खूबसूरत हो, जिसकी चाल-ढाल थोड़ी कोमल हो और जो ऊंचा उठने के ख्वाब देखता हो। यह समुदाय उससे नजदीकी बढ़ाता है और फिर समय आते ही उसे बधिया कर दिया जाता है। बधिया, यानी उसके शरीर के हिस्से के उस अंग को काट देना, जिसके बाद वह कभी लड़का नहीं रहता।

18. अब देश में मौजूद पचास लाख से भी ज्यादा किन्नरों को तीसरे दर्जे में शामिल कर लिया गया है। अपने इस हक के लिए किन्नर बिरादरी वर्षों से लड़ाई लड़ रही थी। 1871 से पहले तक भारत में किन्नरों को ट्रांसजेंडर का अधिकार मिला हुआ था। मगर 1871 में अंग्रेजों ने किन्नरों को क्रिमिनल ट्राइब्स यानी जरायमपेशा जनजाति की श्रेणी में डाल दिया था। बाद में आजाद हिंदुस्तान का जब नया संविधान बना तो 1951 में किन्नरों को क्रिमिनल ट्राइब्स से निकाल दिया गया। मगर उन्हें उनका हक तब भी नहीं मिला था।

19. आमतौर पर सिंहस्थ में 13 अखाड़े शामिल होते हैं, लेकिन इस बार एक नया अखाड़ा और बना है। ये अखाड़ा है किन्नर अखाड़ा। किन्नर अखाड़े को लेकर समय-समय पर विवाद होते रहे हैं। इस अखाड़े का मुख्य उद्देश्य किन्नरों को भी समाज में समानता का अधिकार दिलवाना है।

20. किन्नर अपने आराध्य देव अरावन से साल में एक बार विवाह करते है। हालांकि यह विवाह मात्र एक दिन के लिए होता है। अगले दिन अरावन देवता की मौत के साथ ही उनका वैवाहिक जीवन खत्म हो जाता है।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



सोमवार, 18 अप्रैल 2016

We should do these five work daily


मान्यता है कि ये 5 शुभ काम रोज सुबह करने से मिलती है सफलता




पुराने समय से ही कई ऐसी परंपराएं चली आ रही हैं जो हमें सुख और शांति के साथ ही देवी-देवताओं की कृपा भी दिलवाती है। यहां जानिए उन्हीं परंपराओं में से पांच ऐसे काम जो हर रोज सुबह घर से निकलने से पहले करना चाहिए। मान्यता है कि ये पांच काम करने पर हमें दिनभर के कार्यों में सफलता मिलती है और धन संबंधी कार्यों में लाभ मिलने के योग बनते हैं।

एक कहावत है कि यदि दिन की शुरुआत अच्छी हो तो पूरे दिन सब अच्छा ही अच्छा होता है। इसी बात को ध्यान रखते हुए ये पांच काम सुबह-सुबह करने की परंपरा बनाई गई है। जानिए ये काम कौन-कौन से हैं…

रोज सुबह दही खाकर घर से निकलें






किसी भी आवश्यक काम के लिए घर से बाहर जाते समय दही खाकर निकलना चाहिए। यह परंपरा काफी पुराने समय से चली आ रही है। दही को पवित्र माना जाता है। इसकी पवित्रता और स्वाद से मन प्रसन्न होता है। इसी वजह से इसे पूजन सामग्री में भी खास स्थान प्राप्त है। घर से निकलने से पहले दही खाने से नकारात्मक विचार नष्ट हो जाते हैं और कार्य के प्रति सकारात्मक सोच बनती है।
घर के मंदिर में विराजित भगवान का दर्शन करें



घर के मंदिर में विराजित देवी-देवताओं के दर्शन प्रतिदिन करना चाहिए। घर से निकलने से पहले एक बार इनके दर्शन करके सफलता की प्रार्थना करनी चाहिए। घर के देवी-देवता की कृपा से नि:संदेह व्यक्ति का दिन शुभ हो जाता है। भगवान की कृपा बनी रहती है और अशुभ समय दूर होता है।

ध्यान रखें हर रोज घर के मंदिर की साफ-सफाई की जानी चाहिए। साथ ही, सुबह और शाम को मंदिर में दीपक अवश्य लगाएं। घर के मंदिर के लिए इस बात का ध्यान रखेंगे तो सदैव आपके घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहेगी। वातावरण की नकारात्मक ऊर्जा सक्रिय नहीं हो पाएगी।
तुलसी के पत्तों का सेवन करें



सामान्यत: तुलसी का पौधा सभी के घरों में होता है, क्योंकि शास्त्रों के अनुसार तुलसी को पवित्र और पूजनीय माना जाता है। जिस घर में तुलसी का पूजन प्रतिदिन होता है, वहां महालक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। पैसों से संबंधी परेशानियां उस घर में नहीं रहती हैं।


तुलसी एक औषधीय पौधा भी है। प्रतिदिन तुलसी के पत्ते बिना दांतों से चबाए ही निगल लेना चाहिए। ऐसा करने पर कई प्रकार के रोगों से बचाव हो जाता है। साथ ही, तुलसी से प्राप्त होने वाले पुण्य लाभ भी प्राप्त होते हैं। तुलसी में कुछ ऐसे तत्व होते हैं जो हमारे दांतों के नुकसानदायक होते हैं, अत: तुलसी के पत्तों को बिना चबाए ही निगल लेना चाहिए।
पहले सीधा पैर घर से बाहर रखें



किसी भी कार्य का प्रारंभ सीधे हाथ और सीधे पैर को आगे बढ़ाकर किया जाए तो सफलता मिलने की संभावनाएं अधिक हो जाती हैं। शास्त्रों के अनुसार सभी धार्मिक पूजन कर्म सीधे हाथ से ही किए जाने पर अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। ठीक इसी प्रकार घर से निकलने से पहले सीधा पैर रखते हैं तो कार्य में सफलता मिलने की संभावनाएं भी बढ़ती हैं। यह उपाय सकारात्मक मानसिकता को प्रबल करता है।
सकारात्मक मानसिकता के साथ घर से निकलेंगे तो कार्यों के लिए फायदेमंद रहेगा। कार्य ठीक से कर पाएंगे। कार्यों में आ रही बाधाओं से निपटने का रास्ता खोज मिल सकता है।
माता-पिता एवं बुजुर्गों का आशीर्वाद लें



प्रतिदिन घर से निकलने से पहले माता-पिता का आशीर्वाद लेना चाहिए। जिन लोगों से उनके माता-पिता प्रसन्न रहते हैं, उनसे सभी देवी-देवता भी प्रसन्न रहते हैं। इसके विपरीत जो लोग माता-पिता का सम्मान नहीं करते हैं और उन्हें दुख देते हैं, वे कई परेशानियों में सदैव उलझे रहते हैं। अत: घर से निकलने से पूर्व माता-पिता और बुजुर्गों के पैर छूएं और आशीर्वाद लेना चाहिए।

शास्त्रों में बताया गया है कि माता-पिता ही साक्षात् देवी-देवता के समान होते हैं। अत: उनका आदर-सम्मान करने पर सभी देव शक्तियां भी प्रसन्न होती हैं। माता-पिता के आशीर्वाद के साथ किए कार्यों में बाधाएं नहीं आती हैं और सफलता मिलने की संभावनाएं काफी अधिक हो जाती हैं।

सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



शनिवार, 16 अप्रैल 2016

मकान की नींव में सर्प और कलश क्यों गाड़ा जाता है?


मकान की नींव में सर्प और कलश क्यों गाड़ा जाता है?




ऐसा माना जाता है कि जमीन के नीचे पाताल लोक है और इसके स्वामी शेषनाग हैं। पौराणिक ग्रंथों में शेषनाग के फण पर पृथ्वी टिकी होने का उल्लेख मिलता है।


शेषं चाकल्पयद्देवमनन्तं विश्वरूपिणम्।
यो धारयति भूतानि धरां चेमां सपर्वताम्।।

इन परमदेव ने विश्वरूप अनंत नामक देवस्वरूप शेषनाग को पैदा किया, जो पहाड़ों सहित सारी पृथ्वी को धारण किए है। उल्लेखनीय है कि हजार फणों वाले शेषनाग सभी नागों के राजा हैं। भगवान की शय्या बनकर सुख पहुंचाने वाले, उनके अनन्य भक्त हैं। बहुत बार भगवान के साथ-साथ अवतार लेकर उनकी लीला में भी साथ होते हैं। श्रीमद्भागवत के 10 वे अध्याय के 29 वें श्लोक में भगवान कृष्ण ने कहा है- अनन्तश्चास्मि नागानां यानी मैं नागों में शेषनाग हूं।

नींव पूजन का पूरा कर्मकांड इस मनोवैज्ञानिक विश्वास पर आधारित है कि जैसे शेषनाग अपने फण पर पूरी पृथ्वी को धारण किए हुए हैं, ठीक उसी तरह मेरे इस घर की नींव भी प्रतिष्ठित किए हुए चांदी के नाग के फण पर पूरी मजबूती के साथ स्थापित रहे। शेषनाग क्षीरसागर में रहते हैं। इसलिए पूजन के कलश में दूध, दही, घी डालकर मंत्रों से आह्वान पर शेषनाग को बुलाया जाता है, ताकि वे घर की रक्षा करें। विष्णुरूपी कलश में लक्ष्मी स्वरूप सिक्का डालकर फूल और दूध पूजा में चढ़ाया जाता है, जो नागों को सबसे ज्यादा प्रिय है। भगवान शिवजी के आभूषण तो नाग हैं ही। लक्ष्मण और बलराम भी शेषावतार माने जाते हैं। इसी विश्वास से यह प्रथा जारी है।

सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



Badrinath Dham History

कहानी बद्रीनाथ धाम की

बदरी नारायण मंदिर जिसे बद्रीनाथ भी कहते हैं अलकनंदा नदी के किनारे उत्तराखंड राज्य में स्थित है। नर नारायण की गोद में बसा बद्रीनाथ नीलकण्ड पर्वत का पार्श्व भाग है। भगवान विष्णु को समर्पित यह मंदिर आदिगुरू शंकराचार्य द्वारा चारों धाम में से एक के रूप में स्थापित किया गया था। यह मंदिर तीन भागों में विभाजित है, गर्भगृह, दर्शनमण्डप और सभामण्डप।



मंदिर परिसर में 15 मूर्तियां है, इनमें सब से प्रमुख है भगवान विष्णु की एक मीटर ऊंची काले पत्थर की प्रतिमा है। यहां भगवान विष्णु ध्यान मग्न मुद्रा में सुशोभित है। जिसके दाहिने ओर कुबेर लक्ष्मी और नारायण की मूर्तियां है। इसे धरती का वैकुंठ भी कहा जाता है।शंकराचार्य की व्यवस्था के अनुसार बद्रीनाथ मंदिर का मुख्य पुजारी दक्षिण भारत के केरल राज्य से होता है। मंदिर अप्रैल-मई से अक्टूबर-नवम्बर तक मंदिर दर्शनों के लिए खुला रहता है।
श्री विशाल बद्री

बद्रीनाथ धाम में श्री बदरीनारायण भगवान के पांच स्वरूपों की पूजा अर्चना होती है। विष्णु के इन पांच रूपों को ‘पंच बद्री’ के नाम से जाना जाता है। बद्रीनाथ के मुख्य मंदिर के अलावा अन्य चार बद्रियों के मंदिर भी यहां स्थापित है। श्री विशाल बद्री पंच बद्रियों में से मुख्य है। इसकी देव स्तुति का पुराणों में विशेष वर्णन किया जाता है। ब्रह्मा, धर्मराज व त्रिमूर्ति के दोनों पुत्र नर के साथ ही नारायण ने बद्री नामक वन में तपस्या की, जिससे इन्द्र का घमण्ड चकनाचूर हो गया। बाद में यही नर नारायण द्वापर युग में कृष्ण और अर्जुन के रूप में अवतरित हुए। जिन्हें हम विशाल बद्री के नाम से जानते हैं। इसके अलावा श्री योगध्यान बद्री, श्री भविष्य बद्री, श्री वृद्घ बद्री, श्री आदि बद्री इन सभी रूपों में भगवान बद्रीनाथ यहां निवास करते हैँ।


पौराणिक मान्यताएं

कहते हैं जब गंगा देवी पृथ्वी पर अवतरित हुई तो पृथ्वी उनका प्रबल वेग सहन न कर सकी। गंगा की धारा बारह जल मार्गो में विभक्त हुई। उसमें से एक है अलकनंदा का उद्गम। यही स्थल भगवान विष्णु का निवास स्थान बना और बद्रीनाथ कहलाया। एक अन्य मान्यता है कि प्राचीन काल में यह स्थल जंगली बेरों से भरा रहने के कारण बद्री वन भी कहा जाता था। कहते हैं यहीं किसी गुफा में वेदव्यास ने महाभारत लिखी थी और पांडवों के स्वर्ग जाने से पहले यही अंतिम पड़ाव था। जहां वे रूके थे।
लोक कथा

पौराणिक कथाओं और यहाँ की लोक कथाओं के अनुसार यहाँ नीलकंठ पर्वत के समीप भगवान विष्णु ने बाल रूप में अवतरण किया। यह स्थान पहले शिव भूमि (केदार भूमि) के रूप में व्यवस्थित था। भगवान विष्णुजी अपने ध्यानयोग हेतु स्थान खोज रहे थे और उन्हें अलकनंदा नदी के समीप यह स्थान बहुत भा गया। उन्होंने वर्तमान चरणपादुका स्थल पर (नीलकंठ पर्वत के समीप) ऋषि गंगा और अलकनंदा नदी के संगम के समीप बाल रूप में अवतरण किया और क्रंदन करने लगे। उनका रुदन सुन कर माता पार्वती का हृदय द्रवित हो उठा। फिर माता पार्वती और शिवजी स्वयं उस बालक के समीप उपस्थित हो गए। माता ने पूछा कि बालक तुम्हें क्या चहिये? तो बालक ने ध्यानयोग करने हेतु वह स्थान मांग लिया। इस तरह से रूप बदल कर भगवान विष्णु ने शिव-पार्वती से यह स्थान अपने ध्यानयोग हेतु प्राप्त कर लिया। यही पवित्र स्थान आज बदरीविशाल के नाम से सर्वविदित है।


बदरीनाथ नाम की कथा

जब भगवान विष्णु योगध्यान मुद्रा में तपस्या में लीन थे तो बहुत अधिक हिमपात होने लगा। भगवान विष्णु हिम में पूरी तरह डूब चुके थे। उनकी इस दशा को देख कर माता लक्ष्मी का हृदय द्रवित हो उठा और उन्होंने स्वयं भगवान विष्णु के समीप खड़े हो कर एक बेर (बदरी) के वृक्ष का रूप ले लिया और समस्त हिम को अपने ऊपर सहने लगीं। माता लक्ष्मीजी भगवान विष्णु को धूप, वर्षा और हिम से बचाने की कठोर तपस्या में जुट गयीं । कई वर्षों बाद जब भगवान विष्णु ने अपना तप पूर्ण किया तो देखा कि लक्ष्मीजी हिम से ढकी पड़ी हैं। तो उन्होंने माता लक्ष्मी के तप को देख कर कहा कि हे देवी! तुमने भी मेरे ही बराबर तप किया है सो आज से इस धाम पर मुझे तुम्हारे ही साथ पूजा जायेगा और क्योंकि तुमने मेरी रक्षा बदरी वृक्ष के रूप में की है सो आज से मुझे बदरी के नाथ-बदरीनाथ के नाम से जाना जायेगा। इस तरह से भगवान विष्णु का नाम बदरीनाथ पड़ा।

जहाँ भगवान बदरीनाथ ने तप किया था, वही पवित्र-स्थल आज तप्त-कुण्ड के नाम से विश्व-विख्यात है और उनके तप के रूप में आज भी उस कुण्ड में हर मौसम में गर्म पानी उपलब्ध रहता है।


सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



बुधवार, 13 अप्रैल 2016

भगवान गणेश

जानिए गणेश जी का असली मस्तक कटने के बाद कहां गया



भगवान गणेश गजमुख, गजानन के नाम से जाने जाते हैं, क्योंकि उनका मुख गज यानी हाथी का है। भगवान गणेश का यह स्वरूप विलक्षण और बड़ा ही मंगलकारी है।


आपने भी श्रीगणेश के गजानन बनने से जुड़े पौराणिक प्रसंग सुने-पढ़े होंगे। लेकिन क्या आप जानते हैं या विचार किया है कि गणेश का मस्तक कटने के बाद उसके स्थान पर गजमुख तो लगा, लेकिन उनका असली मस्तक कहां गया? जानिए, उन प्रसंगों में ही उजागर यह रोचक बात –

श्री गणेश के जन्म के सम्बन्ध में दो पौराणिक मान्यता है। प्रथम मान्यता के अनुसार जब माता पार्वती ने श्रीगणेश को जन्म दिया, तब इन्द्र, चन्द्र सहित सारे देवी-देवता उनके दर्शन की इच्छा से उपस्थित हुए। इसी दौरान शनिदेव भी वहां आए, जो श्रापित थे कि उनकी क्रूर दृष्टि जहां भी पड़ेगी, वहां हानि होगी। इसलिए जैसे ही शनि देव की दृष्टि गणेश पर पड़ी और दृष्टिपात होते ही श्रीगणेश का मस्तक अलग होकर चन्द्रमण्डल में चला गया।

इसी तरह दूसरे प्रसंग के मुताबिक माता पार्वती ने अपने तन के मैल से श्रीगणेश का स्वरूप तैयार किया और स्नान होने तक गणेश को द्वार पर पहरा देकर किसी को भी अंदर प्रवेश से रोकने का आदेश दिया। इसी दौरान वहां आए भगवान शंकर को जब श्रीगणेश ने अंदर जाने से रोका, तो अनजाने में भगवान शंकर ने श्रीगणेश का मस्तक काट दिया, जो चन्द्र लोक में चला गया। बाद में भगवान शंकर ने रुष्ट पार्वती को मनाने के लिए कटे मस्तक के स्थान पर गजमुख या हाथी का मस्तक जोड़ा।

ऐसी मान्यता है कि श्रीगणेश का असल मस्तक चन्द्रमण्डल में है, इसी आस्था से भी धर्म परंपराओं में संकट चतुर्थी तिथि पर चन्द्रदर्शन व अर्घ्य देकर श्रीगणेश की उपासना व भक्ति द्वारा संकटनाश व मंगल कामना की जाती है।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



ध्रुव तारा की कहानी

कहानी बालक ध्रुव के ध्रुव तारा बनने की

स्वयंभुव मनु और शतरुपा के दो पुत्र थे-प्रियवत और उत्तानपाद। उत्तानपाद की सुनीति और सुरुचि नामक दो पत्नियां थीं। राजा उत्तानपाद को सुनीति से ध्रुव और सुरुचि से उत्तम नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए। यद्पि सुनीति बड़ी रानी थी परन्तु उत्तानपाद का प्रेम सुरुचि के प्रति अधिक था। एक बार सुनीति का पुत्र ध्रुव अपने पिता की गोद में बैठा खेल रहा था। इतने में सुरुचि वहां आ पहुंची।
Dhruv star bhagat story in hindi
ध्रुव को उत्तानपाद की गोद में खेलते देख उसका पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा। सौतन के पुत्र को अपने पति की गोद में वह बर्दाश्त न कर सकी। उसका मन ईष्र्या से जल उठा। उसने झपट कर बालक ध्रुव को राजा की गोद से खींच लिया और अपने पुत्र उत्तम को उसकी गोद में बिठा दिया तथा बालक ध्रुव से बोली, अरे मूर्ख! राजा की गोद में वही बालक बैठ सकता है जो मेरी कोख से उत्पन्न हुआ हो।
तू मेरी कोख से उत्पन्न नहीं हुआ है। इसलिए तुझे इनकी गोद में या राजसिंहासन पर बैठने का कोई अधिकार नहीं है। पांच वर्ष के ध्रुव को अपनी सौतेली मां के व्यवहार पर क्रोध आया। वह भागते हुए अपनी मां सुनीति के पास आए तथा सारी बात बताई। सुनीति बोली, बेटा! तेरी सौतेली माता सुरुचि से अधिक प्रेम के कारण तुम्हारे पिता हम लोगों से दूर हो गए हैं।
तुम भगवान को अपना सहारा बनाओ। माता के वचन सुनकर ध्रुव को कुछ ज्ञान उत्पन्न हुआ और वह भगवान की भक्ति करने के लिए पिता के घर को छोड़ कर चल पड़े। मार्ग में उनकी भेंट देवार्षि नारद से हुई।  देवार्षि ने बालक ध्रुव को समझाया, किन्तु ध्रुव नहीं माना। नारद ने उसके दृढ़ संकल्प को देखते हुए ध्रुव को मंत्र की दीक्षा दी। इसके बाद  देवार्षि राजा उत्तानपाद के पास गए।
राजा उत्तानपाद को ध्रुव के चले जाने से बड़ा पछतावा हो रहा था। देवार्षि नारद को वहां पाकर उन्होंने उनका सत्कार किया। देवॢष ने राजा को ढांढस बंधाया कि भगवान उनके रक्षक हैं। भविष्य में वह अपने यश को सम्पूर्ण पृथ्वी पर फैलाएंगे। उनके प्रभाव से आपकी कीर्ति इस संसार में फैलेगी। नारद जी के इन शब्दों से राजा उत्तानपाद को कुछ तसल्ली हुई।
उधर बालक ध्रुव यमुना के तट पर जा पहुंचे तथा महॢष नारद से मिले मंत्र से भगवान नारायण की तपस्या आरम्भ कर दी। तपस्या करते हुए ध्रुव को अनेक प्रकार की समस्याएं आईं परन्तु वह अपने संकल्प पर अडिग रहे। उनका मनोबल विचलित नहीं हुआ। उनके तप का तेज तीनों लोकों में फैलने लगा। ओम नमो भगवते वासुदेवाय की ध्वनि वैकुंठ में भी गूंज उठी।
तब भगवान नारायण भी योग निद्रा से उठ बैठे। ध्रुव को इस अवस्था में तप करते देख नारायण प्रसन्न हो गए तथा उन्हें दर्शन देने के लिए प्रकट हुए। नारायण बोले, हे राजकुमार! तुम्हारी समस्त इच्छाएं पूर्ण होंगी। तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न होकर मैं तुम्हें वह लोक प्रदान कर रहा हूं, जिसके चारों ओर ज्योतिष चक्र घूमता है तथा जिसके आधार पर सब ग्रह नक्षत्र घूमते हैं।
प्रलयकाल में भी जिसका कभी नाश नहीं होता। सप्तऋषि भी नक्षत्रों के साथ जिस की प्रदक्षिणा करते हैं। तुम्हारे नाम पर वह लोक ध्रुव लोक कहलाएगा। इस लोक में छत्तीस सहस्र वर्ष तक तुम पृथ्वी पर शासन करोगे। समस्त प्रकार के सर्वोत्तम ऐश्वर्य भोग कर अंत समय में तुम मेरे लोक को प्राप्त करोगे। बालक ध्रुव को ऐसा वरदान देकर नारायण अपने लोक लौट गए। नारायण के वरदान स्वरूप ध्रुव समय पाकर ध्रुव तारा बन गए।


सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

भगवान परशुराम के जीवन से जुडी रोचक बातें


भगवान परशुराम के जीवन से जुडी रोचक बातें


हिंदू पंचांग के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को भगवान परशुराम की जयंती मनाई जाती है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु के आवेशावतार परशुराम का जन्म हुआ था। आज हम आपको भगवान परशुराम से संबंधित कुछ रोचक बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार है-


1.अपने शिष्य भीष्म को नहीं कर सके पराजित

महाभारत के अनुसार महाराज शांतनु के पुत्र भीष्म ने भगवान परशुराम से ही अस्त्र-शस्त्र की विद्या प्राप्त की थी। एक बार भीष्म काशी में हो रहे स्वयंवर से काशीराज की पुत्रियों अंबा, अंबिका और बालिका को अपने छोटे भाई विचित्रवीर्य के लिए उठा लाए थे। तब अंबा ने भीष्म को बताया कि वह मन ही मन किसी और का अपना पति मान चुकी है तब भीष्म ने उसे ससम्मान छोड़ दिया, लेकिन हरण कर लिए जाने पर उसने अंबा को अस्वीकार कर दिया।

तब अंबा भीष्म के गुरु परशुराम के पास पहुंची और उन्हें अपनी व्यथा सुनाई। अंबा की बात सुनकर भगवान परशुराम ने भीष्म को उससे विवाह करने के लिए कहा, लेकिन ब्रह्मचारी होने के कारण भीष्म ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। तब परशुराम और भीष्म में भीषण युद्ध हुआ और अंत में अपने पितरों की बात मानकर भगवान परशुराम ने अपने अस्त्र रख दिए। इस प्रकार इस युद्ध में न किसी की हार हुई न किसी की जीत।
2. ऐसे हुआ भगवान परशुराम का जन्म

महर्षि भृगु के पुत्र ऋचिक का विवाह राजा गाधि की पुत्री सत्यवती से हुआ था। विवाह के बाद सत्यवती ने अपने ससुर महर्षि भृगु से अपने व अपनी माता के लिए पुत्र की याचना की। तब महर्षि भृगु ने सत्यवती को दो फल दिए और कहा कि ऋतु स्नान के बाद तुम गूलर के वृक्ष का तथा तुम्हारी माता पीपल के वृक्ष का आलिंगन करने के बाद ये फल खा लेना।

किंतु सत्यवती व उनकी मां ने भूलवश इस काम में गलती कर दी। यह बात महर्षि भृगु को पता चल गई। तब उन्होंने सत्यवती से कहा कि तूने गलत वृक्ष का आलिंगन किया है। इसलिए तेरा पुत्र ब्राह्मण होने पर भी क्षत्रिय गुणों वाला रहेगा और तेरी माता का पुत्र क्षत्रिय होने पर भी ब्राह्मणों की तरह आचरण करेगा।

तब सत्यवती ने महर्षि भृगु से प्रार्थना की कि मेरा पुत्र क्षत्रिय गुणों वाला न हो भले ही मेरा पौत्र (पुत्र का पुत्र) ऐसा हो। महर्षि भृगु ने कहा कि ऐसा ही होगा। कुछ समय बाद जमदग्रि मुनि ने सत्यवती के गर्भ से जन्म लिया। इनका आचरण ऋषियों के समान ही था। इनका विवाह रेणुका से हुआ। मुनि जमदग्रि के चार पुत्र हुए। उनमें से परशुराम चौथे थे। इस प्रकार एक भूल के कारण भगवान परशुराम का स्वभाव क्षत्रियों के समान था।
3. किया श्रीकृष्ण के प्रस्ताव का समर्थन

महाभारत के युद्ध से पहले जब भगवान श्रीकृष्ण संधि का प्रस्ताव लेकर धृतराष्ट्र के पास गए थे, उस समय श्रीकृष्ण की बात सुनने के लिए भगवान परशुराम भी उस सभा में उपस्थित थे। परशुराम ने भी धृतराष्ट्र को श्रीकृष्ण की बात मान लेने के लिए कहा था।
4. नहीं हुआ था श्रीराम से कोई विवाद

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरित मानस में वर्णन है कि भगवान श्रीराम ने सीता स्वयंवर में शिव धनुष उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाते समय वह टूट गया। धनुष टूटने की आवाज सुनकर भगवान परशुराम भी वहां आ गए। अपने आराध्य शिव का धनुष टूटा हुआ देखकर वे बहुत क्रोधित हुए और वहां उनका श्रीराम व लक्ष्मण से विवाद भी हुआ।

जबकि वाल्मीकि रामायण के अनुसार सीता से विवाह के बाद जब श्रीराम पुन: अयोध्या लौट रहे थे। तब परशुराम वहां आए और उन्होंने श्रीराम से अपने धनुष पर बाण चढ़ाने के लिए कहा। श्रीराम ने बाण धनुष पर चढ़ा कर छोड़ दिया। यह देखकर परशुराम को भगवान श्रीराम के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो गया और वे वहां से चले गए।
5. क्यों किया माता का वध?

एक बार परशुराम की माता रेणुका स्नान करके आश्रम लौट रही थीं। तब संयोग से राजा चित्ररथ भी वहां जलविहार कर रहे थे। राजा को देखकर रेणुका के मन में विकार उत्पन्न हो गया। उसी अवस्था में वह आश्रम पहुंच गई। जमदग्रि ने रेणुका को देखकर उसके मन की बात जान ली और अपने पुत्रों से माता का वध करने को कहा। किंतु मोहवश किसी ने उनकी आज्ञा का पालन नहीं किया।

तब परशुराम ने बिना सोचे-समझे अपने फरसे से उनका सिर काट डाला। ये देखकर मुनि जमदग्रि प्रसन्न हुए और उन्होंने परशुराम से वरदान मांगने को कहा। तब परशुराम ने अपनी माता को पुनर्जीवित करने और उन्हें इस बात का ज्ञान न रहे ये वरदान मांगा। इस वरदान के फलस्वरूप उनकी माता पुनर्जीवित हो गईं।

सम्पूर्ण कहानी यहाँ पढ़े- http://goo.gl/Lem9eX
6. क्यों किया कार्तवीर्य अर्जुन का वध?

एक बार महिष्मती देश का राजा कार्तवीर्य अर्जुन युद्ध जीतकर जमदग्रि मुनि के आश्रम से निकला। तब वह थोड़ा आराम करने के लिए आश्रम में ही रुक गया। उसने देखा कामधेनु ने बड़ी ही सहजता से पूरी सेना के लिए भोजन की व्यवस्था कर दी है तो वह कामधेनु के बछड़े को अपने साथ बलपूर्वक ले गया। जब यह बात परशुराम को पता चली तो उन्होंने कार्तवीर्य अर्जुन की एक हजार भुजाएं काट दी और उसका वध कर दिया।
7. इसलिए किया क्षत्रियों का संहार?

कार्तवीर्य अर्जुन के वध का बदला उसके पुत्रों ने जमदग्रि मुनि का वध करके लिया। क्षत्रियों का ये नीच कर्म देखकर भगवान परशुराम बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने कार्तवीर्य अर्जुन के सभी पुत्रों का वध कर दिया। जिन-जिन क्षत्रिय राजाओं ने उनका साथ दिया, परशुराम ने उनका भी वध कर दिया। इस प्रकार भगवान परशुराम ने 21 बार धरती को क्षत्रियविहिन कर दिया।

सम्पूर्ण कहानी यहाँ पढ़े- http://goo.gl/FLhlKb
8. ब्राह्मणों को दान कर दी संपूर्ण पृथ्वी

महाभारत के अनुसार परशुराम का ये क्रोध देखकर महर्षि ऋचिक ने साक्षात प्रकट होकर उन्हें इस घोर कर्म से रोका। तब उन्होंने क्षत्रियों का संहार करना बंद कर दिया और सारी पृथ्वी ब्राह्मणों को दान कर दी और स्वयं महेंद्र पर्वत पर निवास करने लगे।
9. परशुराम का कर्ण को श्राप

महाभारत के अनुसार परशुराम भगवान विष्णु के ही अंशावतार थे। कर्ण भी उन्हीं का शिष्य था। कर्ण ने परशुराम को अपना परिचय एक सूतपुत्र के रूप में दिया था। एक बार जब परशुराम कर्ण की गोद में सिर रखकर सो रहे थे। उसी समय कर्ण को एक भयंकर कीड़े ने काट लिया। गुरु की नींद में विघ्न न आए ये सोचकर कर्ण दर्द सहते रहे, लेकिन उन्होंने परशुराम को नींद से नहीं उठाया।

नींद से उठने पर जब परशुराम ने ये देखा तो वे समझ गए कि कर्ण सूतपुत्र नहीं बल्कि क्षत्रिय है। तब क्रोधित होकर परशुराम ने कर्ण को श्राप दिया कि मेरी सिखाई हुई शस्त्र विद्या की जब तुम्हें सबसे अधिक आवश्यकता होगी, उस समय तुम वह विद्या भूल जाओगे। इस प्रकार परशुरामजी के श्राप के कारण ही कर्ण की मृत्यु हुई।
10. राम से कैसे बने परशुराम?

बाल्यावस्था में परशुराम के माता-पिता इन्हें राम कहकर पुकारते थे। जब राम कुछ बड़े हुए तो उन्होंने पिता से वेदों का ज्ञान प्राप्त किया और पिता के सामने धनुर्विद्या सीखने की इच्छा प्रकट की। महर्षि जमदग्रि ने उन्हें हिमालय पर जाकर भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कहा। पिता की आज्ञा मानकर राम ने ऐसा ही किया। उस बीच असुरों से त्रस्त देवता शिवजी के पास पहुंचे और असुरों से मुक्ति दिलाने का निवेदन किया। तब शिवजी ने तपस्या कर रहे राम को असुरों को नाश करने के लिए कहा।

राम ने बिना किसी अस्त्र की सहायता से ही असुरों का नाश कर दिया। राम के इस पराक्रम को देखकर भगवान शिव ने उन्हें अनेक अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। इन्हीं में से एक परशु (फरसा) भी था। यह अस्त्र राम को बहुत प्रिय था। इसे प्राप्त करते ही राम का नाम परशुराम हो गया।
11. फरसे से काट दिया था श्रीगणेश का एक दांत

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार एक बार परशुराम जब भगवान शिव के दर्शन करने कैलाश पहुंचे तो भगवान ध्यान में थे। तब श्रीगणेश ने परशुरामजी को भगवान शिव से मिलने नहीं दिया। इस बात से क्रोधित होकर परशुरामजी ने फरसे से श्रीगणेश पर वार कर दिया। वह फरसा स्वयं भगवान शिव ने परशुराम को दिया था। श्रीगणेश उस फरसे का वार खाली नहीं होने देना चाहते थे। इसलिए उन्होंने उस फरसे का वार अपने दांत पर झेल लिया, जिसके कारण उनका एक दांत टूट गया। तभी से उन्हें एकदंत भी कहा जाता है।
12. ये थे परशुराम के भाइयों के नाम

ऋषि जमदग्रि और रेणुका के चार पुत्र थे, जिनमें से परशुराम सबसे छोटे थे। भगवान परशुराम के तीन बड़े भाई थे, जिनके नाम क्रमश: रुक्मवान, सुषेणवसु और विश्वावसु था।
13. अमर हैं परशुराम

हिंदू धर्म ग्रंथों में कुछ महापुरुषों का वर्णन है जिन्हें आज भी अमर माना जाता है। इन्हें अष्टचिरंजीवी भी कहा जाता है। इनमें से एक भगवान विष्णु के आवेशावतार परशुराम भी हैं-

अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण।
कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविन।।
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।

इस श्लोक के अनुसार अश्वत्थामा, राजा बलि, महर्षि वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, भगवान परशुराम तथा ऋषि मार्कण्डेय अमर हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान परशुराम वर्तमान समय में भी कहीं तपस्या में लीन हैं।

सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



धुनी रमाना – बहुत कठिन होती है ये साधना



धुनी रमाना – बहुत कठिन होती है ये साधना, जानिए इसकी पूरी प्रक्रिया




सभी साधुओं की आराधना और तपस्या के तरीके अलग-अलग और कठोर होते हैं। भक्ति का ऐसा ही एक तरीका है धुनी रमाना। धुनी रमाने की क्रिया में साधु कठोर तप करता है और खुद के शरीर को तपाता है। ये क्रिया अलग-अलग तरह के हठयोगों में से एक है। धुनी रमाने की एक पूरी प्रक्रिया है और अलग-अलग चरणों में इसे किया जाता है। आमतौर पर एक साधु को धुनी रमाने के सभी चरण पूरे करने में 18 साल से भी अधिक समय लग जाता है। जब धुनी रमाने के सभी चरण पूरे होते हैं, तब ही साधु का तप पूरा होता है। यहां जानिए धुनी रमाने की प्रक्रिया और उसके चरण…



ये है धुनी रमाने की क्रिया
धुनी रमाने के लिए साधु एक स्थान पर बैठकर सबसे पहले अपने चारों ओर कंडे या उपलों का घेरा बनाता है। इसके बाद जलते हुए कंडों को घेरे में रखे हुए कंडों पर रखता है, जिससे घेरे के सभी कंडे जलने लगते हैं। जलते हुए कंडों के कारण भयंकर धुआं होता है और कंडों की गर्मी भी साधु को सहन करनी पड़ती है। इसी कंडों की धुनी में साधु अपने इष्ट देव के मंत्रों का जप करता है।


धुनी रमाने का पहला चरण
धुनी रमाने की प्रक्रिया का पहला चरण है पंच धुनी। इसके अंतर्गत साधु पांच जगह कंडे रखकर गोल घेरा बनाता है, उन्हें जलाता है। इस घेरे में बैठकर साधु तप करता है।

धुनी रमाने का दूसरा चरण
दूसरे चरण को सप्त धुनी कहा जाता है। इस चरण में साधु 7 जगह कंडे रखकर घेरा बनाता है। इन सात जलते कंडों के बीच बैठकर तप करता है।

धुनी रमाने का तीसरा चरण
इस चरण को कहते हैं द्वादश धुनी। इसमें साधु 12 जगह जलते हुए कंडे रखकर गोल घेरे के बीच में बैठकर तप करता है।

धुनी रमाने का चौथा चरण
इस चरण में साधु को 84 जगह कंडे रखकर घेरा बनाना पड़ता है। इसे चौरासी धुनी कहा जाता है। इस चरण में कंडों का घेरा बनाने के लिए साथी साधु की मदद लेनी होती है।


धुनी रमाने का पांचवां चरण
धुनी रमाने के इस चरण को कोट धुनी कहा जाता है। इसमें साधु कंडों का घेरा बनाते समय जलते कंडों के बीच दूरी नहीं रखी जाती है। कंडे एकदम पास-पास रहते हैं, जिससे घेरे में बैठे साधु को असहनीय तपन और धुएं का सामना करते हुए तप करना होता है।

धुनी रमाने का अंतिम चरण
छठें और अंतिर चरण को कोटखोपड़ धुनी कहा जाता है। ये धुनी रमाने की क्रिया का सबसे कठिन चरण है। इसमें साधु को अपने सिर पर मिट्टी के पात्र में जलते हुए कंडे रखकर तप करना होता है।
सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



सोमवार, 11 अप्रैल 2016

आंख फड़कने के ये कारण

क्या आंख फड़कने के ये कारण जानते हैं आप


आंख फड़कने के कारण

आंख फड़कने पर बहुत सी लोकोक्तिया प्रचलित हैं, और इसे भारत में अधिकांश जगहों पर शुभ-अशुभ से जोड़ कर भी देखा जाता है। लेकिन इससे परे, क्या आपने कभी आंख फड़कने के असली कारणों के बारे में सोचने की कोशिश की है? क्‍या आपने ये सोचा है कि यह कोई बीमारी हो सकती है फिर यह कोई संदेश भी हो सकता है जो शरीर देता है। इन्‍हीं पहलुओं पर विस्‍तार से चर्चा करते हैं।

कैसे फड़कती है आंख

पलक फड़कना एक आम लक्षण होता है। इसमें आंखों के आस-पास की मांसपेशियां खुद संकुचित होती हैं जिससे उलझन और परेशानी तो काफी होती है, लेकिन कोई नुकसान नहीं होता। थोड़ी बहुत देर के बाद ऐसा होना अपने आप बंद भी हो जाता है। इसके सही कारणों के बारे में मतों में विभेद हैं, लेकिन  नेत्र विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका संबंध थकान, नींद की कमी, कैफ़ीन के अधिक इस्तेमाल, कम रोशनी में काम करने या देर तक कम्प्यूटर पर काम करने आदि से हो सकता है।

तनाव और थकान के कारण

आज के वर्क कल्चर में थकान और तनाव होना मानों आम हो गया है। आंख फड़कना तनाव या थकान का संकेत हो सकता है। विशेष रूप से तब जबकि यह आंख में तनाव (आई स्ट्रेन) के जैसी दृष्टि समस्याओं से संबंधित हो। तनाव के कारण को कम कर आंख की फड़कन को बमद किया जा सकता है। नहीं की कमी से भी ये समस्या हो सकती है।

कैफीन और एल्कोहॉल

कई विशेषज्ञों का मानना है कि बहुत ज्यादा कैफीन और शराब भी आंख फड़कने का कारण हो सकते हैं। तो यदि आप कैफीन (कॉफी, चाय, सोडा पॉप, आदि) और / या शराब का सेवन अधिक कर रहे हैं तो आपको ये समस्या हो सकती है।

आंख फड़कना बंद कैसे करें

आंख फड़कना बंद करने के लिये हाइड्रेटेड बने रहें, ज्यादा नींद लें, जोर-जोर से पलकें झपकाने से शुरू करें, आंखों की बेहद कोमलता से मसाज करें, पलकों को 30 सेकेण्ड्स तक झपकायें, अपने आँखों को अर्ध-खुली अवस्था में लायें, आँखों का व्यायाम करें, अपने आपको ऐक्यूप्रेशर मसाज दें, आंखों के हाइड्रोथिरेपी टेक्नीक को आजमायें। यदि आंखों का फड़कना एक सप्ताह से अधिक तक रहे या यदि ऐंठन से चेहरे की अन्य मांस-पेशियों को भी असर हो रहा हो तो आंखों के डाक्टर से मिलें।
सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



Secrets of Man

यहां जानिए पुरुषों को समझने के लिए खास बातें…

1. यदि किसी पुरुष के पैर में तर्जनी उंगली (अंगूठे के पास वाली उंगली) अंगूठे से बड़ी दिखाई देती है तो ऐसे व्यक्ति स्त्री सुख प्राप्त करने वाले होते हैं।
2. यदि किसी पुरुष के पैर कोमल, मांसल यानी भरे हुए, रक्तवर्ण यानी लाल रंग के होते हैं और जिनके पैर पसीने से रहित होते हैं, वे सभी सुख-सुविधाएं प्राप्त करने वाले होते हैं। ऐसे लोग बहुत ही आराम का जीवन व्यतीत करते हैं।
3. यदि किसी पुरुष के पैरों के अंगूठे बहुत ज्यादा मोटे दिखाई देते हैं तो उन्हें भाग्य का साथ नहीं मिल पाता है।
4. यदि किसी पुरुष के पैर सफेद, रुखे, टेढ़े नाखून वाले हों और उंगलियों की बनावट भी असमान हो तो ऐसे लोग परेशानियों का सामना करते हैं। इनके जीवन में धन की कमी बनी रहती है।
5. यदि किसी पुरुष के पैरों में सबसे छोटी उंगली अंगूठे से बड़ी है तो ऐसे लोग बहुत धनी होते हैं।
6. यदि किसी पुरुष की जांघ पर रोम नहीं होते हैं तो वे भाग्य का साथ प्राप्त नहीं कर पाते हैं।
7. जिन पुरुषों की जांघ लंबी, मोटी और मांसल यानी भरी हुई होती है, वे भाग्य का साथ प्राप्त करते हैं। मजबूत जांघ वाले पुरुष धन और सभी सुख प्राप्त करने वाले होते हैं।
8. यदि किसी पुरुष के घुटने मांसरहित हैं तो उसे छोटी-छोटी सफलताओं के लिए भी बहुत मेहनत करनी पड़ती है।
9. यदि किसी पुरुष का पेट मांसल यानी मांस से भरा हुआ है, सीधा और गोल है तो वे लोग धनवान होते हैं। ऐसे लोग सभी सुख प्राप्त करने वाले होते हैं।
10. जिन लोगों का पेट लंबा और पतला दिखाई देता है, वे गरीबी का सामना करने वाले और अधिक भोजन करने वाले होते हैं।
11. किसी पुरुष की पीठ लंबी होती है तो वह बंधनों में फंसा रहता है।
12. जिस पुरुष की पीठ कछुए की पीठ के आकार की तरह दिखती है, वह धनवान और भाग्यशाली होता है।
13. पुरुषों के लिए चौड़े और मजबूत कंधे शुभ होते हैं।
14. यदि किसी पुरुष की नाभि गहरी और गोल है तो वह सभी सुख प्राप्त करता है।
15. छोटी नाभि वाले पुरुष जीवन में कई परेशानियों का सामना करते हैं।
16. छोटी और चपटी ठुड्डी वाले लोग धन का सुख प्राप्त नहीं कर पाते हैं। उभरी हुई ठुड्डी शुभ होती है।
17. यदि किसी पुरुष की गर्दन कुछ ज्यादा लंबी है तो ऐसे व्यक्ति के जीवन में समस्याएं अधिक होती हैं।
18. छोटी गर्दन और सामान्य गर्दन शुभ होती है। ऐसी गर्दन वाले लोग धनवान होते हैं और जीवन में कई उपलब्धियां हासिल करते हैं।
19. यदि किसी व्यक्ति की हथेली का तल गहरा है तो उसे पिता की ओर से धन का सुख नहीं मिल पाता है।
20. हथेली का तल यानी बीच का हिस्सा उभरा हुआ दिखाई देता है तो ऐसे लोग दानी होते हैं और सुखी रहते हैं।
सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



Famous Devi Temple On Hills


यह है पहाड़ों पर बसे देवी के 10 प्रसिद्ध मंदिर


1. कनक दुर्गा मंदिर, आंध्र प्रदेश (Kanaka durga temple, Vijayawada, Andhra pradesh)
यहां पहाड़ी को लेकर मान्यता है कि अर्जुन ने यहीं पर भगवान शिव की तपस्या की थी और उनसे पाशुपतास्त्र प्राप्त किया था।
कहते है इस मंदिर की देवी प्रतिमा स्वयं प्रकट हुई थी, इसलिए इसे बहुत ख़ास और शक्तिशाली माना जाता है।

2. तारा देवी मंदिर, हिमाचल प्रदेश (Tara devi temple, Shimla, Himachal pradesh)
कहा जाता है कि यह मंदिर लगभग 250 साल पहले बनाया गया था।
यहां स्थापित देवी की मूर्ति को लेकर मान्यता है की तारा देवी की मूर्ति प. बंगाल से लाई गई थी।

3. चामुंडेश्वरी मंदिर, कर्नाटक (Chamundeshwari temple, Karnataka)
मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर की स्थापना 12वीं सदी में की गई थी।
मंदिर परिसर में राक्षस महिषासुर की एक 16 फुट ऊंची प्रतिमा स्थापित है। जो यहां के मुख्य आकर्षणों में से एक है।

4. मनसा देवी मंदिर, उत्तराखंड (Mansa devi temple, Haridwar, Uttarakhand)
मान्यताओं के अनुसार मनसा देवी की उत्पत्ति ऋषि कश्यप के मन से हुई थी।
यहां स्थापित पेड़ पर धागा बांधने से मनोकामना जरूर पूरी होती है। जिसके बाद पेड़ से एक धागा खोलने की परम्परा है।

5. अधर देवी मंदिर, राजस्थान (Adhar devi temple, Mount abu, Rajasthan)
अधर देवी मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को लगभग 365 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है।
यहां मान्यता है कि अगर कोई भक्त पूरी श्रद्धा के साथ देवी की पूजा करता है तो यहां उसे बादलों में देवी की छवि दिखती है।

6. बम्लेश्वरी देवी मंदिर, छत्तीसगढ़ (Bamleshwari devi temple, Dongargarh, Chhattisgarh)
इस जगह का नाम डोंग और गढ़ शब्दों को मिलाकर बना है। डोंग का अर्थ होता है पर्वत और गढ़ का मतलब होता है क्षेत्र।
यह मंदिर छत्तीसगढ़ राज्य के डोंगरगढ़ में 1600 फ़ीट ऊंची पहाड़ी पर है। जहां पहुंचने के लिए लगभग 1100 सीढ़ियां है।

7. सप्तश्रृंगी देवी मंदिर, महाराष्ट्र (Saptashrungi devi temple, Nasik, Maharashtra)
यहां की देवी मूर्ती लगभग 10 फ़ीट ऊंची है। देवी मूर्ति के 18 हाथ है. जिनसे वे अलग-अलग अस्त्र-शस्त्र पकडे हुए है।
यह मंदिर छोटे-बड़े सात पर्वतों से घिरा हुआ है इसलिए यहां की देवी को सप्तश्रृंगी यानी सात पर्वतों की देवी कहा जाता है।

8. तारा तारिणी मंदिर, उड़ीसा (Tara Tarini temple, Odisha)
यह देवी मंदिर अपनेआप में बहुत ख़ास है क्योंकि यह मंदिर दो जुड़वां देवियों तारा और तारिणी को समर्पित है।
यह मंदिर देवी सटी के 4 शक्ति पीठों के मध्य में स्थापित है, यानि इस मंदिर की चारों दिशा में एक एक शक्ति पीठ है।

9. वैष्णो देवी मंदिर, जम्मू-कश्मीर (Vaishno devi temple, Katra, Jammu and Kashmir)
मंदिर के ग्राभ गृह तक जाने के लिए एक प्राचीन गुफा थी, जिसे अब बंद करके दूसरा रास्ता बना दिया गया है।
मान्यता है की माता ने इसी प्राचीन गुफा में भैरव को अपने त्रिशूल से मारा था।

10. शारदा माता मंदिर, मध्यप्रदेश (Maa Sharda devi temple, Maihar, MP)

इसे देवी के 51 शक्ति पीठों में से एक माना जाता है। कहते है की यहां पर देवी सती का हार गिरा था। मैहर वाली माता मंदिर मध्यप्रदेश राज्य की त्रिकुटा पहाड़ी पर बसा है। सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें ।