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गुरुवार, 31 मार्च 2016

जरासंध से जुडी कुछ रोचक बातें

दो माँ से आधा-आधा पैदा हुआ था जरासंध, जानिए जरासंध से जुडी कुछ रोचक बातें



 महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत ग्रंथ में अनेक महारथी व बलशाली राजाओं का वर्णन है। ऐसा ही एक महारथी राजा था जरासंध। उसके जन्म व मृत्यु की कथा भी बहुत ही रोचक है। जरासंध मगध (वर्तमान बिहार) का राजा था। वह अन्य राजाओं को हराकर अपने पहाड़ी किले में बंदी बना लेता था। जरासंध बहुत ही क्रूर था, वह बंदी राजाओं का वध कर चक्रवर्ती राजा बनना चाहता था। भीम ने 13 दिन तक कुश्ती लड़ने के बाद जरासंध को पराजित कर उसका वध किया था।
Mahabharat Jarasandh Story in Hindi
कंस का ससुर था जरासंध
जरासंध मथुरा के राजा कंस का ससुर एवं परम मित्र था। उसकी दोनों पुत्रियों आसित व प्रापित का विवाह कंस से हुआ था। श्रीकृष्ण से कंस वध का प्रतिशोध लेने के लिए उसने 17 बार मथुरा पर चढ़ाई की, लेकिन हर बार उसे असफल होना पड़ा। जरासंध के भय से अनेक राजा अपने राज्य छोड़ कर भाग गए थे। शिशुपाल जरासंध का सेनापति था।
100 राजाओं का करना चाहता था वध
जरासंध भगवान शंकर का परम भक्त था। उसने अपने पराक्रम से 86 राजाओं को बंदी बना लिया था। बंदी राजाओं को उसने पहाड़ी किले में कैद कर लिया था। जरासंध 100 को बंदी बनाकर उनकी बलि देना चाहता था, जिससे कि वह चक्रवर्ती सम्राट बन सके।
ऐसे हुआ था जरासंध का जन्म
मगधदेश में बृहद्रथ नाम के राजा थे। उनकी दो पत्नियां थीं, लेकिन उन्हें कोई संतान नहीं थी। एक दिन संतान की चाह में राजा बृहद्रथ महात्मा चण्डकौशिक के पास गए और सेवा कर उन्हें संतुष्ट किया। प्रसन्न होकर महात्मा चण्डकौशिक ने उन्हें एक फल दिया और कहा कि ये फल अपनी पत्नी को खिला देना, इससे तुम्हें संतान की प्राप्ति होगी। राजा बृहद्रथ की दो पत्नियां थीं। राजा ने वह फल काटकर अपनी दोनों पत्नियों को खिला दिया। समय आने पर दोनों रानियों के गर्भ से शिशु के शरीर का एक-एक टुकड़ा पैदा हुआ। रानियों ने घबराकर शिशु के दोनों जीवित टुकड़ों को बाहर फेंक दिया। उसी समय वहां से एक राक्षसी गुजरी। उसका नाम जरा था। जब उसने जीवित शिशु के दो टुकड़ों को देखा तो अपनी माया से उन दोनों टुकड़ों को जोड़ दिया और वह शिशु एक हो गया। एक शरीर होते ही वह शिशु जोर-जोर से रोने लगा।
Jarasandh birth Story in Hindi
बालक की रोने की आवाज सुनकर दोनों रानियां बाहर निकली और उन्होंने उस बालक को गोद में ले लिया। राजा बृहद्रथ भी वहां आ गए और उन्होंने उस राक्षसी से उसका परिचय पूछा। राक्षसी ने राजा को सारी बात सच-सच बता दी। राजा बहुत खुश हुए और उन्होंने उस बालक का नाम जरासंध रख दिया क्योंकि उसे जरा नाम की राक्षसी ने संधित (जोड़ा) किया था।
भीम ने ऐसे किया था जरासंध का वध
जरासंध का वध करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने योजना बनाई। योजना के अनुसार श्रीकृष्ण, भीम व अर्जुन ब्राह्मण का वेष बनाकर जरासंध के पास गए और उसे कुश्ती के लिए ललकारा। जरासंध समझ गया कि ये ब्राह्मण नहीं है। जरासंध के कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना वास्तविक परिचय दिया।
जरासंध ने भीम से कुश्ती लड़ने का निश्चय किया। राजा जरासंध और भीम का युद्ध कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा से 13 दिन तक लगातार चलता रहा। चौदहवें दिन भीम ने श्रीकृष्ण का इशारा समझ कर जरासंध के शरीर के दो टुकड़े कर दिए।
Mahabharat Jarasandh death Story in Hindi
जरासंध का वध कर भगवान श्रीकृष्ण ने उसकी कैद में जितने भी राजा थे, सबको आजाद कर दिया और कहा कि धर्मराज युधिष्ठिर चक्रवर्ती पद प्राप्त करने के लिए राजसूय यज्ञ करना चाहते हैं। आप लोग उनकी सहायता कीजिए। राजाओं ने श्रीकृष्ण का यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और धर्मराज युधिष्ठिर को अपना राजा मान लिया। भगवान श्रीकृष्ण ने जरासंध के पुत्र सहदेव को अभयदान देकर मगध का राजा बना दिया।
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तिरुपति बालाजी से जुड़ी मान्यताएं


तिरुपति बालाजी से जुड़ी मान्यताएं


तिरूमाला वेंकटेश्वर यानी तिरुपति बालाजी मंदिर, आंध्र प्रदेश के तिरूमाला पहाड़ों में हैं। यह मंदिर भारत के सबसे प्राचीन और अमीर मंदिरों में से एक माना जाता है। इस मंदिर से जुड़ी कई मान्यताएं हैं, कुछ ऐसी ही प्रमुख मान्यताओं से हम आपको परिचित करवाने जा रहे हैं…


मान्यता नंबर 1

इस मंदिर में वेंकटेश्वर स्वामी की मूर्ति पर लगे हुए बाल उनके असली बाल हैं। ऐसा कहा जाता है कि ये बाल कभी उलझते नहीं है और हमेशा इतने ही मुलायम रहते हैं।

मान्यता नंबर 2

वेंकटेश्वर स्वामी यानी बालाजी की मूर्ति का पिछला हिस्सा हमेशा नम रहता है। यदि ध्यान से कान लगाकर सुनें तो सागर की आवाज सुनाई देती है।
मान्यता नंबर 3

मंदिर के दरवाजे कि दायीं ओर एक छड़ी रहती है। माना जाता है इस छड़ का उपयोग भगवान के बाल रूप को मारने के लिए किया गया था। तब उनकी ठोड़ी पर चोट लग गई थी। जिसके कारण बालाजी को चंदन का लेप ठोड़ी पर लगाए जाने की शुरुआत की गई।
मान्यता नंबर 4

सामान्य तौर पर देखने में लगता है कि भगवान की मूर्ति गर्भ गृह के बीच में है, लेकिन वास्तव में, जब आप इसे बाहर से खड़े होकर देखेंगे, तो पाएंगे कि यह मंदिर के दायीं ओर स्थित है।
मान्यता नंबर 5

मूर्ति पर चढ़ाए जाने वाले सभी फूलों और तुलसी के पत्तों को भक्तों में न बांटकर, परिसर के पीछे बने पुराने कुएं में फेंक दिया जाता है।

मान्यता नंबर 6

गुरूवार के दिन, स्वामी की मूर्ति को सफेद चंदन से रंग दिया जाता है। जब इस लेप को हटाया जाता है तो मूर्ति पर माता लक्ष्मी के चिन्ह बने रह जाते हैं।
मान्यता नंबर 7

मंदिर के पुजारी, पूरे दिन मूर्ति के पुष्पों को पीछे फेंकते रहते हैं और उन्हें नहीं देखते हैं, दरअसल इन फूलों को देखना अच्छा नहीं माना जाता है।
मान्यता नंबर 8

कहा जाता है 18 वी शताब्दी में, इस मंदिर को कुल 12 वर्षों के लिए बंद कर दिया गया था। उस दौरान, एक राजा ने 12 लोगों को मौत की सजा दी और मंदिर की दीवार पर लटका दिया। कहा जाता है कि उस समय वेंकटेश्वर स्वामी प्रकट हुए थे।
मान्यता नंबर 9

इस मंदिर में एक दीया कई सालों से जल रहा है किसी को नहीं ज्ञात है कि इसे कब जलाया गया था।
मान्यता नंबर 10

बालाजी की मूर्ति पर पचाई कर्पूरम चढ़ाया जाता है जो कर्पूर मिलाकर बनाया जाता है। यदि इसे किसी साधारण पत्थर पर चढाया जाए, तो वह कुछ ही समय में चटक जाता है, लेकिन मूर्ति पर इसका प्रभाव नहीं होता है।

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बुधवार, 30 मार्च 2016

मंगल से गुप्त नवरात्रि आरंभ

मंगल से गुप्त नवरात्रि आरंभ, सौभाग्य और मोक्ष की प्राप्ति के लिए ऐसे करें पूजा 


इस बार माघ मास की गुप्त नवरात्रि का आरंभ शुक्ल प्रतिपदा (मंगलवार, 9 फरवरी) से हो रहा है। ये नवरात्रि मंगलवार (16 फरवरी) तक चलेंगे। तिथि का क्षय होने के कारण इस बार छठी व सातवी नवरात्रि एक ही दिन रविवार (14 फरवरी) को पड़ेंगी, अतः इसी दिन मां कात्यायनी तथा कालरात्रि की एक साथ पूजा होगी। जानिए गुप्त नवरात्रों में मां के किस स्वरूप की किस दिन और किस मंत्र से पूजा-अर्चना करनी चाहिए।
पहले दिन होगी मां शैलपुत्री की पूजा
नवरात्रों में प्रथम दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। इन्हें अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान होने के बाद सती योगाग्नि में भस्म हो गई थी तत्पश्चात उन्होंने हिमालय पर्वत के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया। अतः पर्वत की पुत्री होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ गया। इनकी आराधना से जीवन में स्थिरता, सौम्यता तथा शांति का वरदान मिलता है। मां शैलपुत्री की पूजा के पश्चात निम्न मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए इससे बड़े से बड़े अनिष्ट का भी खात्मा होता है।
वन्दे वांछितलाभाय चन्दार्धकृतशेखराम्।वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌।।
पूणेंदुनिभांगौरी मूलाधार स्थितांप्रथम दुर्गा त्रिनेत्रा।
पटांबरपरिधानांरत्नकिरीटांनानालंकारभूषिता॥प्रफुल्ल वदनांपल्लवाधरांकांतकपोलांतुंग कुचाम्।
कमनीयांलावण्यांस्मेरमुखीक्षीणमध्यांनितंबनीम्॥
दूसरे दिन करें मां ब्रह्मचारिणी का आव्हान
मां पार्वती के ही स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा नवरात्रों के दूसरे दिन की जाती है। इन्होंने शिव को पति रूप में पाने के लिए उग्र तप किया था अतः ये ब्रह्म शक्ति अर्थात तप की शक्ति की प्रतीक है। इनकी आराधना से व्यक्ति अजेय बनता है और उसकी सर्वत्र विजय होती है। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा के बाद निम्न मंत्र का 108 बार जप करने से जन्मकुंडली के बुरे ग्रह भी अच्छा फल देने लगते हैं।
दधानां करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डल। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।
तीसरे दिन होती है मां चंद्रघंटा की पूजा
नवदुर्गाओं में तीसरे शक्ति के रूप में पूज्यनीय माँ चंद्रघंटा शत्रुहंता के रूप में विख्यात है। इन देवी के मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्र है इसीलिए इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। इनकी आराधना से समस्त शत्रुओं तथा भाग्य की बाधाओं का नाश होकर अपार सुख-सम्पत्ति मिलती है। इनकी पूजा के बाद निम्न मंत्र का 108 बार जप करने से बड़े से बड़ा शत्रु भी कुछ नहीं बिगाड़ पाता है।
या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
चौथे दिन होगी कुष्मांडा की उपासना
माघ मास की गुप्त नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्माण्डा की पूजा-आराधना की जाती है। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार जब चारों और अंधकार ही अंधकार था तब इन्होंने अपनी मंद हल्की हंसी द्वारा ब्रह्माण्ड को उत्पन्न किया था। इनकी आराधना करने से समस्त रोग व शोक का नाश होता है तथा व्यक्ति मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ता है। इनकी पूजा करने के बाद निम्न मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए।
ॐ कूष्माण्डायै नम:।।
पांचवें दिन होती है स्कंदमाता की पूजा
नवरात्र के पांचवें दिन स्कंदमाता की पूजा की जाती है। देवासुर संग्राम के सेनापति भगवान स्कंद की माता होने के कारण इन्हें स्कंदमाता कहा जाता है। इनकी पूजा से साधक का मन एकाग्र होकर समाधि में लीन होता है जिससे उसके मोक्ष का रास्ता खुलता है। साथ ही साधक के जीवन में आने वाली हर छोटी-बड़ी बाधा का तुरंत ही खात्मा होता है। इनकी पूजा के बाद निम्न मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए।
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।।
छठें दिन होगी मां कात्यायनी की पूजा
जगतमाता पार्वती ने महर्षि कात्यायनी की तपस्या से प्रसन्न होकर उनके यहां पुत्री रूप में जन्म लिया था अतः उन्हें कात्यायनी भी कहा जाता है। उनकी उपासना से साधक को अलौकिक तेज और तपशक्ति प्राप्त होती है जिसके बल पर उसके रोग, शोक, संताप, भय आदि सभी नष्ट हो जाते हैं। इनकी पूजा के बाद निम्न मंत्र का 108 बार जप करने से दिव्य शक्तियां प्राप्त होती हैं-
चन्द्रहासोज्जवलकरा शाईलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दग्घादेवी दानवघातिनी।।
या देवी सर्वभूतेषु मां कात्यायनी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
सातवें दिन होती है मां कालरात्रि की पूजा
नवरात्र के सातवें दिन पूजी जाने वाली अत्यन्त भयावह स्वरूप वाली मां कालरात्रि की पूजा की जाती है। ये अपने भक्तों के कष्टों को तुरंत हरती है और उन पर सुख की वर्षा करती है। ये महाकाली की भांति अत्यन्त क्रोधातुर दिखाई देती है और अपने भक्तों की ओर आंख उठाने वाले किसी भी संकट को तुरंत समाप्त करती है। इनकी पूजा के पश्चात निम्न मंत्र का 108 बार जप करना सौभाग्य लाता हैः
या देवी सर्वभूतेषु मां कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
आठवें दिन होगी मां महागौरी की पूजा
गुप्त नवरात्रि के आठवें दिन मां महागौरी की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि उग्र तप के कारण मां पार्वती का शरीर पूरी तरह काला पड़ गया था जिसके बाद भगवान शिव ने उन्हें स्नान कराया जिससे उनका शरीर सोने की भांति चमक उठा। अतः उन्हें महागौरी कहा जाता है। उनकी आराधना से व्यक्ति का आज्ञा चक्र जागृत होता है और उस पर साक्षात महादेव तथा पार्वतीजी की कृपा होती है। इनकी पूजा के बाद निम्न मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए।
ॐ ऎं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै ॐ महागौरी देव्यै नम:
नवें और अंतिम दिन होती है मां सिद्धिदात्री की आराधना
नवरात्रि के अंतिम दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। इनकी पूजा करने वाले साधकों के जीवन के समस्त कष्ट दूर होते हैं तथा उन्हें अष्ट सिद्धियां, नव निधियों का वरदान प्राप्त होता है। इनकी आराधना से साधक को मृत्युपरांत मोक्ष की प्राप्ति होती है। मां सिद्धिदात्री की पूजा के बाद निम्न मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए।
सिद्धगन्धर्वयक्षाघैरसुरैरमरैरपि। सेव्यमाना सदा भूयात् सिदि्धदा सिदि्धदायिनी।।

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इस बार आठ दिन के होंगे चैत्र नवरात्रि

इस बार आठ दिन के होंगे चैत्र नवरात्रि, ये हैं घट स्थापना का मुहूर्त 

चैत्र (वासंतिक) नवरात्र 8 अप्रेल को शुरू होंगे। इस बार नवरात्र में तृतीया तिथि क्षय (कमी) होने से 8 दिन ही देवी की आराधना की जाएगी। ज्योतिष मतानुसार नवरात्रों का घटना शुभ नहीं माना जाता। हालांकि इस बार चैत्र नवरात्र के सात दिन सुयोग रहेंगे। शुक्रवार को कुमार योग व सर्वार्थ सिद्धि योग से नवरात्र की शुरुआत श्रेष्ठ व समृद्धि कारक होगी।
सूर्य-चंद्रमा की गति के कारण नवरात्र इस बार खुशहाली लाएंगे। 15 अप्रेल को रामनवमी का पर्व मनाया जाएगा, इसी दिन नवरात्र उत्थापन भी होंगे। 14 अप्रेल को अष्टमी पर बन रहा गुरु पुष्य योग भी उन्नतिकारक रहेगा। ज्योतिषाचार्य पंडित चंद्रमोहन दाधीच के अनुसार नवरात्र में सात दिन रहने वाले सुयोग में शुभ कार्य का आरम्भ, वाहन व स्वर्णाभूषण की खरीद, प्रॉपर्टी का लेन-देन श्रेष्ठ रहेगा।
आठ को सिंजारा, नौ को गणगौर
9 अप्रेल को द्वितीया तिथि सुबह 9.23 बजे तक ही रहेगी, इसके बाद पूरे दिन तृतीय तिथि ही रहेगी। इसके चलते गणगौर का पर्व 9 को ही मनाया जाएगा। 16 दिन से ईसर व गौरी माता की पूजा कर रही स्त्रियों की अर्चना इसी दिन सम्पन्न होगी। इससे पहले नवरात्र घट स्थापना के दिन सिंजारा मनाया जाएगा।
घट स्थापना मुहूर्त
शास्त्रों के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को घट स्थापना प्रात:काल में ही करना श्रेष्ठ माना गया है। चित्रा नक्षत्र एवं वैधृति योग में घटस्थापना वर्जित बताया गया है। प्रतिपदा को सुबह 10.40 बजे तक वैधृति योग रहेगा। ऐसे में घट स्थापना अभिजित मुहूर्त में दोपहर 12.04 से 12.54 बजे तक करना सर्वश्रेष्ठ रहेगा। वैधृति योग के बाद सुबह 10.40 से 10.55 बजे तक अमृत के चौघडि़ए व दोपहर 12.29 से 2.03 बजे तक शुभ के चौघडि़ए में भी घट स्थापना शुभ रहेगा।
किस दिन कौनसा शुभ संयोग
8 अप्रेल : कुमार योग व सर्वार्थ सिद्धि योग
9 अप्रेल : रवि योग
10 अप्रेल : रवि योग
11 अप्रेल : सर्वार्थ सिद्धि योग, कुमार व रवि योग
12 अप्रेल : रवि योग
14 अप्रेल : सर्वार्थ सिद्धि योग, गुरुपुष्य योग, अमृत सिद्धि योग
15 अप्रेल : रवि योग

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मंगलवार, 29 मार्च 2016

नौ चमत्कारिक ज्वाला की पूजा


ज्वालामुखी देवी –  होती है नौ चमत्कारिक ज्वाला की पूजा







हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा से 30 किलो मीटर दूर स्तिथ है ज्वालामुखी देवी। ज्वालामुखी मंदिर को जोता वाली का मंदिर और नगरकोट भी कहा जाता है। ज्वालामुखी मंदिर को खोजने का श्रेय पांडवो को जाता है। इसकी गिनती माता के प्रमुख शक्ति पीठों में होती है। मान्यता है यहाँ देवी सती की जीभ गिरी थी। यह मंदिर माता के अन्य मंदिरों की तुलना में अनोखा है क्योंकि यहाँ पर किसी मूर्ति की पूजा नहीं होती है बल्कि पृथ्वी के गर्भ से निकल रही नौ ज्वालाओं की पूजा होती है। यहाँ पर पृथ्वी के गर्भ से नौ अलग अलग जगह से ज्वाला निकल रही है जिसके ऊपर ही मंदिर बना दिया गया हैं। इन नौ ज्योतियां को महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यावासनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका, अंजीदेवी के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर का प्राथमिक निमार्ण राजा भूमि चंद के करवाया था। बाद में महाराजा रणजीत सिंह और राजा संसारचंद ने 1835 में इस मंदिर का पूर्ण निमार्ण कराया।






अकबर और ध्यानु भगत की कथा :
इस जगह के बारे में एक कथा अकबर और माता के परम भक्त ध्यानु भगत से जुडी है। जिन दिनों भारत में मुगल सम्राट अकबर का शासन था,उन्हीं दिनों की यह घटना है। हिमाचल के नादौन ग्राम निवासी माता का एक सेवक धयानू भक्त एक हजार यात्रियों सहित माता के दर्शन के लिए जा रहा था। इतना बड़ा दल देखकर बादशाह के सिपाहियों ने चांदनी चौक दिल्ली मे उन्हें रोक लिया और अकबर के दरबार में ले जाकर ध्यानु भक्त को पेश किया।

बादशाह ने पूछा तुम इतने आदमियों को साथ लेकर कहां जा रहे हो। ध्यानू ने हाथ जोड़ कर उत्तर दिया मैं ज्वालामाई के दर्शन के लिए जा रहा हूं मेरे साथ जो लोग हैं, वह भी माता जी के भक्त हैं, और यात्रा पर जा रहे हैं।

अकबर ने सुनकर कहा यह ज्वालामाई कौन है ? और वहां जाने से क्या होगा? ध्यानू भक्त ने उत्तर दिया महाराज ज्वालामाई संसार का पालन करने वाली माता है। वे भक्तों के सच्चे ह्रदय से की गई प्राथनाएं स्वीकार करती हैं। उनका प्रताप ऐसा है उनके स्थान पर बिना तेल-बत्ती के ज्योति जलती रहती है। हम लोग प्रतिवर्ष उनके दर्शन जाते हैं।




अकबर ने कहा अगर तुम्हारी बंदगी पाक है तो देवी माता जरुर तुम्हारी इज्जत रखेगी। अगर वह तुम जैसे भक्तों का ख्याल न रखे तो फिर तुम्हारी इबादत का क्या फायदा? या तो वह देवी ही यकीन के काबिल नहीं, या फिर तुम्हारी इबादत झूठी है। इम्तहान के लिए हम तुम्हारे घोड़े की गर्दन अलग कर देते है, तुम अपनी देवी से कहकर उसे दोबारा जिन्दा करवा लेना। इस प्रकार घोड़े की गर्दन काट दी गई।

ध्यानू भक्त ने कोई उपाए न देखकर बादशाह से एक माह की अवधि तक घोड़े के सिर व धड़ को सुरक्षित रखने की प्रार्थना की। अकबर ने ध्यानू भक्त की बात मान ली और उसे यात्रा करने की अनुमति भी मिल गई।

बादशाह से विदा होकर ध्यानू भक्त अपने साथियों सहित माता के दरबार मे जा उपस्थित हुआ। स्नान-पूजन आदि करने के बाद रात भर जागरण किया। प्रात:काल आरती के समय हाथ जोड़ कर ध्यानू ने प्राथना की कि मातेश्वरी आप अन्तर्यामी हैं। बादशाह मेरी भक्ती की परीक्षा ले रहा है, मेरी लाज रखना, मेरे घोड़े को अपनी कृपा व शक्ति से जीवित कर देना। कहते है की अपने भक्त की लाज रखते हुए माँ ने घोड़े को फिर से ज़िंदा कर दिया।

यह सब कुछ देखकर बादशाह अकबर हैरान हो गया | उसने अपनी सेना बुलाई और खुद मंदिर की तरफ चल पड़ा | वहाँ पहुँच कर फिर उसके मन में शंका हुई | उसने अपनी सेना से मंदिर पूरे मंदिर में पानी डलवाया, लेकिन माता की ज्वाला बुझी नहीं।| तब जाकर उसे माँ की महिमा का यकीन हुआ और उसने सवा मन (पचास किलो) सोने का छतर चढ़ाया | लेकिन माता ने वह छतर कबूल नहीं किया और वह छतर गिर कर किसी अन्य पदार्थ में परिवर्तित हो गया |

आप आज भी वह बादशाह अकबर का छतर ज्वाला देवी के मंदिर में देख सकते हैं |



पास ही गोरख डिब्बी का चमत्कारिक स्थान :
मंदिर का मुख्य द्वार काफी सुंदर एव भव्य है। मंदिर में प्रवेश के साथ ही बाये हाथ पर अकबर नहर है। इस नहर को अकबर ने बनवाया था। उसने मंदिर में प्रज्‍जवलित ज्योतियों को बुझाने के लिए यह नहर बनवाया था। उसके आगे मंदिर का गर्भ द्वार है जिसके अंदर माता ज्योति के रूम में विराजमान है। थोडा ऊपर की ओर जाने पर गोरखनाथ का मंदिर है जिसे गोरख डिब्बी के नाम से जाना जाता है। कहते है की यहाँ गुरु गोरखनाथ जी पधारे थे और कई चमत्कार दिखाए थे। यहाँ पर आज भी एक पानी का कुण्ड है जो देख्नने मे खौलता हुआ लगता है पर वास्तव मे पानी ठंडा है। ज्वालाजी के पास ही में 4.5 कि.मी. की दूरी पर नगिनी माता का मंदिर है। इस मंदिर में जुलाई और अगस्त के माह में मेले का आयोजन किया जाता है। 5 कि.मी. कि दूरी पर रघुनाथ जी का मंदिर है जो राम, लक्ष्मण और सीता को समर्पि है। इस मंदिर का निर्माण पांडवो द्वारा कराया गया था। ज्वालामुखी मंदिर की चोटी पर सोने की परत चढी हुई है।




चमत्कारिक है ज्वाला :
पृत्वी के गर्भ से इस तरह की ज्वाला निकला वैसे कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि पृथ्वी की अंदरूनी हलचल के कारण पूरी दुनिया में कहीं ज्वाला कहीं गरम पानी निकलता रहता है। कहीं-कहीं तो बाकायदा पावर हाऊस भी बनाए गए हैं, जिनसे बिजली उत्पादित की जाती है। लेकिन यहाँ पर ज्वाला प्राकर्तिक न होकर चमत्कारिक है क्योंकि अंग्रेजी काल में अंग्रेजों ने अपनी तरफ से पूरा जोर लगा दिया कि जमीन के अन्दर से निकलती ‘ऊर्जा’ का इस्तेमाल किया जाए। लेकिन लाख कोशिश करने पर भी वे इस ‘ऊर्जा’ को नहीं ढूंढ पाए। वही अकबर लाख कोशिशों के बाद भी इसे बुझा न पाए। यह दोनों बाते यह सिद्ध करती है की यहां ज्वाला चमत्कारी रूप से ही निकलती है ना कि प्राकृतिक रूप से, नहीं तो आज यहां मंदिर की जगह मशीनें लगी होतीं और बिजली का उत्पादन होता।

यहां पहुंचे कैसे?
यहां पहुंचना बेहद आसान है। यह जगह वायु मार्ग, सड़क मार्ग और रेल मार्ग से अच्छी तरह जुडी हुई है।
वायु मार्ग
ज्वालाजी मंदिर जाने के लिए नजदीकी हवाई अड्डा गगल में है जो कि ज्वालाजी से 46 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। यहा से मंदिर तक जाने के लिए कार व बस सुविधा उपलब्ध है।

रेल मार्ग
रेल मार्ग से जाने वाले यात्रि पठानकोट से चलने वाली स्पेशल ट्रेन की सहायता से मरांदा होते हुए पालमपुर आ सकते है। पालमपुर से मंदिर तक जाने के लिए बस व कार सुविधा उपलब्ध है।

सड़क मार्ग
पठानकोट, दिल्ली, शिमला आदि प्रमुख शहरो से ज्वालामुखी मंदिर तक जाने के लिए बस व कार सुविधा उपलब्ध है। यात्री अपने निजी वाहनो व हिमाचल प्रदेश टूरिज्म विभाग की बस के द्वारा भी वहा तक पहुंच सकते है। दिल्ली से ज्वालाजी के लिए दिल्ली परिवहन निगम की सीधी बस सुविधा भी उपलब्ध है।

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नवरात्री के 9 दिनों में कन्या को किस दिन कौन-सी चीज करें दान

नवरात्री के 9 दिनों में कन्या को किस दिन कौन-सी चीज करें दान



नवरात्र के दिनों में 2 से 5 वर्ष तक की छोटी कन्याओं की पूजा करने का विशेष महत्व है। इन दिनों में कन्याओं को देवी मां का स्वरूप मानकर सुंदर चीजें दान करने से मां बहुत जल्दी प्रसन्न होती हैं। पुरानी मान्यताओं के अनुसार नौ दिनों तक कन्याओं को अलग-अलग चीजों की भेंट देना चाहिए, यहां जानिए किस दिन कौन सी चीज का दान करें…


















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सोमवार, 28 मार्च 2016

गुप्त व रोचक बातें श्रीगणेश की


जानिए श्रीगणेश की वो गुप्त व रोचक बातें जो बहुत कम लोग जानते हैं




भगवान श्रीगणेश को विघ्नहर्ता, मंगलमूर्ति, लंबोदर, व्रकतुंड आदि कई विचित्र नामों से पुकारा जाता है। जितने विचित्र इनके नाम हैं उतनी विचित्र इनसे जुड़ी कथाएं भी हैं। अनेक धर्म ग्रंथों में भगवान श्रीगणेश की कथाओं का वर्णन मिलता है। इन कथाओं में भगवान श्रीगणेश से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं। आज हम आपको श्रीगणेश से जुड़ी कुछ ऐसी ही गुप्त व रोचक बातें बता रहे हैं।


1- शिवमहापुराण के अनुसार माता पार्वती को श्रीगणेश का निर्माण करने का विचार उनकी सखियां जया और विजया ने दिया था। जया-विजया ने पार्वती से कहा था कि नंदी आदि सभी गण सिर्फ महादेव की आज्ञा का ही पालन करते हैं। अत: आपको भी एक गण की रचना करनी चाहिए जो सिर्फ आपकी आज्ञा का पालन करे। इस प्रकार विचार आने पर माता पार्वती ने श्रीगणेश की रचना अपने शरीर के मैल से की।

2- शिवमहापुराण के अनुसार श्रीगणेश के शरीर का रंग लाल और हरा है। श्रीगणेश को जो दूर्वा चढ़ाई जाती है वह जडऱहित, बारह अंगुल लंबी और तीन गांठों वाली होना चाहिए। ऐसी 101 या 121 दूर्वा से श्रीगणेश की पूजा करना चाहिए।

3- ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार माता पार्वती ने पुत्र प्राप्ति के लिए पुण्यक नाम व्रत किया था, इसी व्रत के फलस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण पुत्र रूप में माता पार्वती को प्राप्त हुए।

4- ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार जब सभी देवता श्रीगणेश को आशीर्वाद दे रहे थे तब शनिदेव सिर नीचे किए हुए खड़े थे। पार्वती द्वारा पुछने पर शनिदेव ने कहा कि मेरे द्वारा देखने पर आपके पुत्र का अहित हो सकता है लेकिन जब माता पार्वती के कहने पर शनिदेव ने बालक को देखा तो उसका सिर धड़ से अलग हो गया।

5- ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार जब शनि द्वारा देखने पर माता पार्वती के पुत्र का मस्तक कट गया तो भगवान श्रीहरि गरूड़ पर सवार होकर उत्तर दिशा की ओर गए और पुष्पभद्रा नदी के तट पर हथिनी के साथ सो रहे एक गजबालक का सिर काटकर ले आए। उस गजबालक का सिर श्रीहरि ने माता पार्वती के मस्तक विहिन पुत्र के धड़ पर रखकर उसे पुनर्जीवित कर दिया।

6- ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार एक बार किसी कारणवश भगवान शिव ने क्रोध में आकर सूर्य पर त्रिशूल से प्रहार किया। इस प्रहार से सूर्यदेव चेतनाहीन हो गए। सूर्यदेव के पिता कश्यप ने जब यह देखा तो उन्होंने क्रोध में आकर शिवजी को श्राप दिया कि जिस प्रकार आज तुम्हारे त्रिशूल से मेरे पुत्र का शरीर नष्ट हुआ है, उसी प्रकार तुम्हारे पुत्र का मस्तक भी कट जाएगा। इसी श्राप के फलस्वरूप भगवान श्रीगणेश के मस्तक कटने की घटना हुई।

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7- ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार एक बार तुलसीदेवी गंगा तट से गुजर रही थी, उस समय वहां श्रीगणेश भी तप कर रहे थे। श्रीगणेश को देखकर तुलसी का मन उनकी ओर आकर्षित हो गया। तब तुलसी ने श्रीगणेश से कहा कि आप मेरे स्वामी हो जाइए लेकिन श्रीगणेश ने विवाह करने से इंकार कर दिया। क्रोधवश तुलसी ने श्रीगणेश को विवाह करने का श्राप दे दिया और श्रीगणेश ने तुलसी को वृक्ष बनने का।

यह भी पढ़े- पौराणिक कथा – भगवान गणेश को क्यों नहीं चढ़ाते तुलसी ?

8- शिवमहापुराण के अनुसार श्रीगणेश का विवाह प्रजापति विश्वरूप की पुत्रियों सिद्धि और बुद्धि से हुआ है। श्रीगणेश के दो पुत्र हैं इनके नाम क्षेत्र तथा लाभ हैं।

9- शिवमहापुराण के अनुसार जब भगवान शिव त्रिपुर का नाश करने जा रहे थे तब आकाशवाणी हुई कि जब तक आप श्रीगणेश का पूजन नहीं करेंगे तब तक तीनों पुरों का संहार नहीं कर सकेंगे। तब भगवान शिव ने भद्रकाली को बुलाकर गजानन का पूजन किया और युद्ध में विजय प्राप्त की।

10- ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार एक बार परशुराम जब भगवान शिव के दर्शन करने कैलाश पहुंचे तो भगवान ध्यान में थे। तब श्रीगणेश ने परशुरामजी को भगवान शिव से मिलने नहीं दिया। इस बात से क्रोधित होकर परशुरामजी ने फरसे से श्रीगणेश पर वार कर दिया। वह फरसा स्वयं भगवान शिव ने परशुराम को दिया था। श्रीगणेश उस फरसे का वार खाली नहीं होने देना चाहते थे इसलिए उन्होंने उस फरसे का वार अपने दांत पर झेल लिया, जिसके कारण उनका एक दांत टूट गया। तभी से उन्हें एकदंत भी कहा जाता है।

11- महाभारत का लेखन श्रीगणेश ने किया है ये बात तो सभी जानते हैं लेकिन महाभारत लिखने से पहले उन्होंने महर्षि वेदव्यास के सामने एक शर्त रखी थी इसके बारे में कम ही लोग जानते हैं। शर्त इस प्रकार थी कि श्रीगणेश ने महर्षि वेदव्यास से कहा था कि यदि लिखते समय मेरी लेखनी क्षणभर के लिए भी न रूके तो मैं इस ग्रंथ का लेखक बन सकता हूं।

तब महर्षि वेदव्यास जी ये शर्त मान ली और श्रीगणेश से कहा कि मैं जो भी बोलूं आप उसे बिना समझे मत लिखना। तब वेदव्यास जी बीच-बीच में कुछ ऐसे श्लोक बोलते कि उन्हें समझने में श्रीगणेश को थोड़ा समय लगता। इस बीच महर्षि वेदव्यास अन्य काम कर लेते थे।

12- गणेश पुराण के अनुसार छन्दशास्त्र में 8 गण होते हैं- मगण, नगण, भगण, यगण, जगण, रगण, सगण, तगण। इनके अधिष्ठाता देवता होने के कारण भी इन्हें गणेश की संज्ञा दी गई है। अक्षरों को गण भी कहा जाता है। इनके ईश होने के कारण इन्हें गणेश कहा जाता है, इसलिए वे विद्या-बुद्धि के दाता भी कहे गए हैं।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

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भगवान गणेश से जुडी 6 कहानियां


भगवान गणेश से जुडी 6 कहानियां






भगवान श्रीगणेश की कथाओं का वर्णन अनेक ग्रंथों में मिलता है। श्रीगणेश ने कई लीलाएं ऐसी की हैं, जो कृष्ण की लीलाओं से मिलती-जुलती हैं। इन लीलाओं का वर्णन मुद्गलपुराण, गणेशपुराण, शिवपुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है। आज हम आपको भगवान श्रीगणेश से जुड़ी कुछ ऐसी ही रोचक कथाएं बता रहे हैं, जिसके बारे में कम ही लोग जानते हैं। ये कथाएं इस प्रकार हैं-


कैसे पाताल लोक के राजा बने गणपति?

एक बार गणपति मुनि पुत्रों के साथ पाराशर ऋषि के आश्रम में खेल रहे थे। तभी वहां कुछ नाग कन्याएं आ गईं। नाग कन्याएं गणेश को आग्रह पूर्वक अपने लोक लेकर जाने लगी। गणपति भी उनका आग्रह ठुकरा नहीं सके और उनके साथ चले गए।
नाग लोक पहुंचने पर नाग कन्याओं ने उनका हर तरह से सत्कार किया। तभी नागराज वासुकि ने गणेश को देखा और उपहास के भाव से वे गणेश से बात करने लगे, उनके रूप का वर्णन करने लगे। गणेश को क्रोध आ गया। उन्होंने वासुकि के फन पर पैर रख दिया और उनके मुकुट को भी स्वयं पहन लिया।
वासुकि की दुर्दशा का समाचार सुन उनके बड़े भाई शेषनाग आ गए। उन्होंने गर्जना की कि किसने मेरे भाई के साथ इस तरह का व्यवहार किया है। जब गणेश सामने आए तो शेषनाग ने उन्हें पहचान कर उनका अभिवादन किया और उन्हें नागलोक यानी पाताल का राजा घोषित कर दिया।
किसने दिए गणपति को उनके हथियार?

एक बार शिव कैलाश त्यागकर वन में जाकर रहने लगे। एक दिन शिव से मिलने विश्वकर्मा आए। उस समय गणेश की आयु मात्र छह वर्ष थी। गणेश ने विश्वकर्मा से कहा कि मुझसे मिलने आए हो तो मेरे लिए क्या उपहार लेकर आए हो। विश्वकर्मा ने कहा कि भगवन मैं आपके लिए क्या उपहार ला सकता हूं। आप तो स्वयं सच्चिदानंद हो।
विश्वकर्मा ने गणपति का वंदन किया और उनके सामने भेंट स्वरुप कुछ वस्तुएं रखीं, जो उनके हाथ से बनी हुई थीं। ये वस्तुएं थीं एक तीखा अंकुश, पाश और पद्म। ये आयुध पाकर गणपति को बहुत प्रसन्नता हुई। इन आयुधों से सबसे पहले छह साल के गणेश ने अपने मित्रों के साथ खेलते हुए एक दैत्य वृकासुर का संहार किया था।
जब गणपति ने चुराया ऋषि गौतम की रसोई से भोजन

एक बार बाल गणेश अपने मित्र मुनि पुत्रों के साथ खेल रहे थे। खेलते-खेलते उन्हें भूख लगने लगी। पास ही गौतम ऋषि का आश्रम था। ऋषि गौतम ध्यान में थे और उनकी पत्नी अहिल्या रसोई में भोजन बना रही थीं। गणेश आश्रम में गए और अहिल्या का ध्यान बंटते ही रसोई से सारा भोजन चुराकर ले गए और अपने मित्रों के साथ खाने लगे। तब अहिल्या ने गौतम ऋषि का ध्यान भंग किया और बताया कि रसोई से भोजन गायब हो गया है।

ऋषि गौतम ने जंगल में जाकर देखा तो गणेश अपने मित्रों के साथ भोजन कर रहे थे। गौतम उन्हें पकड़कर माता पार्वती के पास ले गए। माता पार्वती ने चोरी की बात सुनी तो गणेश को एक कुटिया में ले जाकर बांध दिया। उन्हें बांधकर पार्वती कुटिया से बाहर आईं तो उन्हें आभास होने लगा जैसे गणेश उनकी गोद में हैं, लेकिन जब देखा तो गणेश कुटिया में बंधे दिखे। माता काम में लग गईं, उन्हें थोड़ी देर बाद फिर आभास होने लगा जैसे गणेश शिवगणों के साथ खेल रहे हैं।

उन्होंने कुटिया में जाकर देखा तो गणेश वहीं बंधे दिखे। अब माता को हर जगह गणेश दिखने लगे। कभी खेलते हुए, कभी भोजन करते हुए और कभी रोते हुए। माता ने परेशान होकर फिर कुटिया में देखा तो गणेश आम बच्चों की तरह रो रहे थे। वे रस्सी से छुटने का प्रयास कर रहे थे। माता को उन पर अधिक स्नेह आया और दयावश उन्हें मुक्त कर दिया।
जब गणपति ने किया सारे देवताओं को यज्ञ में निमंत्रित

एक बार भगवान शिव के मन में एक बड़े यज्ञ के अनुष्ठान का विचार आया। विचार आते ही वे शीघ्र यज्ञ प्रारंभ करने की तैयारियों में जुट गए। सारे गणों को यज्ञ अनुष्ठान की अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंप दी गई। सबसे बड़ा काम था यज्ञ में सारे देवताओं को आमंत्रित करना। आमंत्रण भेजने के लिए पात्र व्यक्ति का चुनाव किया जाना था, जो समय रहते सभी लोकों में जाकर वहां के देवताओं को ससम्मान निमंत्रण दे आए। ऐसे में किसी ऐसे व्यक्ति का चयन किया जाना था, जो तेजी से जाकर ये काम कर दे, लेकिन भगवान शिव को ये भी डर था कि कहीं आमंत्रण देने की जल्दी में देवताओं का अपमान ना हो जाए। इसलिए उन्होंने इस काम के लिए गणेश का चयन किया। गणेश बुद्धि और विवेक के देवता हैं। वे जल्दबाजी में भी कोई गलती नहीं करेंगे, ये सोचकर शिव ने गणपति को बुलाया और उन्हें समस्त देवी-देवताओं को आमंत्रित करने का काम सौंपा। गणेश ने इस काम को सहर्ष स्वीकार किया, लेकिन उनके साथ समस्या यह थी कि उनका वाहन चूहा था, जो बहुत तेजी से चल नहीं सकता था। गणेश ने काफी देर तक चिंतन किया कि किस तरह सभी लोकों में जाकर आदरपूर्वक सारे देवताओं को यज्ञ में शामिल होने का आमंत्रण दिया जाए। बहुत विचार के बाद उन्होंने सारे आमंत्रण पत्र उठाए और पूजन सामग्री लेकर ध्यान में बैठे शिव के सामने बैठ गए।

गणेश ने विचार किया कि यह तो सत्य है कि सारे देवताओं का वास भगवान शिव में है। उनको प्रसन्न किया तो सारे देवता प्रसन्न हो जाएंगे। ये सोचकर गणेश ने शिव का पूजन किया और सारे देवताओं का आह्वान करके सभी आमंत्रण पत्र शिव को ही समर्पित कर दिए। सारे आमंत्रण देवताओं तक स्वत: पहुंच गए और सभी यज्ञ में नियत समय पर ही पहुंच गए। इस तरह गणेश ने एक मुश्किल काम को अपनी बुद्धिमानी से आसान कर दिया।
कैसे एकदंत हो गए भगवान गणेश?

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, भगवान विष्णु के अवतार परशुराम शिव के शिष्य थे। जिस फरसे से उन्होंने 17 बार क्षत्रियों को धरती से समाप्त किया था, वो अमोघ फरसा शिव ने ही उन्हें प्रदान किया था। 17 बार क्षत्रियों को हराने के बाद ब्राह्मण परशुराम शिव और पार्वती के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत पर गए। उस समय भगवान शिव शयन कर रहे थे और पहरे पर स्वयं गणेश थे। गणेश ने परशुराम को रोक लिया। परशुराम को क्रोध बहुत जल्दी आता था।

वे रोके जाने पर गणेश से झगड़ने लगे। बात-बात में झगड़ा इतना बढ़ गया कि परशुराम ने गणेश को धक्का दे दिया। गिरते ही गणेश को भी क्रोध आ गया। परशुराम ब्राह्मण थे, सो गणेश उन पर प्रहार नहीं करना चाहते थे। उन्होंने परशुराम को अपनी सूंड से पकड़ लिया और चारों दिशाओं में गोल-गोल घूमा दिया। घूमते-घूमते ही गणेश ने परशुराम को अपने कृष्ण रूप के दर्शन भी करवा दिए। कुछ पल घुमाने के बाद गणेश ने उन्हें छोड़ दिया।

छोड़े जाने के थोड़ी देर तक तो परशुराम शांत रहे। बाद में परशुराम को अपने अपमान का आभास हुआ तो उन्होंने अपने फरसे से गणेश पर वार किया। फरसा शिव का दिया हुआ था सो गणेश उसके वार को विफल जाने नहीं देना चाहते थे, ये सोचकर उस वार को उन्होंने अपने एक दांत पर झेल लिया। फरसा लगते ही दांत टूटकर गिर गया। इस बीच कोलाहल सुन कर शिव भी शयन से बाहर आ गए और उन्होंने दोनों को शांत करवाया। तब से गणेश को एक ही दांत रह गया और वे एकदंत कहलाने लगे।
जब शनि ने देखा गणेश को…

वैसे तो गणेश की गज आकृति को लेकर सबसे ज्यादा सुनी-सुनाई जाने वाली कथा तो यही है कि पार्वती ने नहाने से पहले एक बालक की आकृति बनाकर उसमें प्राण डाल दिए और उसे पहरे पर बैठा दिया। जिसका सिर शिव ने काटा था और फिर पार्वती के क्रोध को शांत करने के लिए एक हाथी के बच्चे का सिर जोड़ दिया, लेकिन कुछ पुराणों में इसके अलग-अलग संदर्भ भी मिलते हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण में कथा कुछ अलग ही है।

कथा कुछ ऐसी है कि एक बार भगवान शिव के शिष्य शनि देव कैलाश पर्वत पर आए। उस समय शिव ध्यान में थे तो शनिदेव सीधे पार्वती के दर्शन के लिए पहुंच गए। तब पार्वती बालक गणेश के साथ बैठी थीं। बालक गणेश का मुख सुंदर और हर तरह के कष्ट को भुला देने वाला था। शनिदेव आंखें नीची किए पार्वती से बात करने लगे।

पार्वती ने देखा कि शनिदेव किसी को देख नहीं रहे हैं। वे लगातार अपनी निगाहें नीची किए हुए हैं। पार्वती ने शनि देव से पूछा कि वे किसी को देख क्यों नहीं रहे हैं? क्या उनको कोई दृष्टिदोष हो गया है? शनिदेव ने कारण बताते हुए कहा कि उन्हें उनकी पत्नी ने शाप दिया है कि वो जिसे देखेंगे उसका विनाश हो जाएगा। पार्वती ने पूछा कि उनकी पत्नी ने ऐसा शाप क्यों दिया है तो शनिदेव कहने लगे कि मैं लगातार भगवान शिव के ध्यान में रहता हूं। एक बार में ध्यान में था और मेरी पत्नी ऋतुकाल से निवृत्त होकर मेरे समीप आई लेकिन ध्यान में होने के कारण मैंने उसकी ओर देखा नहीं।

उसने इसे अपना अपमान समझा और मुझे शाप दे दिया कि मैं जिसकी ओर देखूंगा, उसका विनाश हो जाएगा। ये बात सुन कर पार्वती ने कहा कि आप मेरे पुत्र गणेश की ओर देखिए, उसके मुख का तेज समस्त कष्टों को हरने वाला है। शनिदेव गणेश पर दृष्टि डालना नहीं चाहते थे लेकिन वे माता पार्वती के आदेश की अवहेलना भी नहीं कर सकते थे, सो उन्होंने तिरछी निगाह थे गणेश की ओर धीरे से देखा। शनि देव की दृष्टि पड़ते ही बालक गणेश का सिर धड़ से कटकर नीचे गिर गया। तभी भगवान विष्णु एक गजबालक का सिर लेकर पहुंचे और गणेश के सिर पर उसे स्थापित कर दिया।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

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शनिवार, 26 मार्च 2016

रामायण से जुड़ीं कुछ रोचक, अनसुनी व ज्ञानवर्धक बातें


रामायण से जुड़ीं कुछ रोचक, अनसुनी व ज्ञानवर्धक बातें

भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, सीता और रावण के जीवन का वर्णन यूं तो कई ग्रंथों में मिलता है, लेकिन इन सभी में वाल्मीकि रामायण में लिखे गए तथ्यों को ही सबसे सटीक माना गया है। वाल्मीकि रामायण की कुछ ऐसी रोचक बातें बताई गई हैं, जो बहुत कम लोग जानते हैं। आज हम आपको कुछ ऐसी ही रोचक बातें बता रहे हैं। ये बातें इस प्रकार हैं-






























































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सबसे अमीर हो कर भी गरीब है तिरुपति बालाजी


सबसे अमीर हो कर भी गरीब है तिरुपति बालाजी


अगर धन के आधार पर देखा जाए तो वर्तमान में सबसे धनवान भगवान बालाजी हैं। एक आंकड़े के अनुसार बालाजी मंद‌िर ट्रस्ट के खजाने में 50 हजार करोड़ से अध‌िक की संपत्त‌ि है। लेक‌िन इतने धनवान होने पर भी बालाजी सभी देवताओं से गरीब ही हैं


धनवान होकर भी गरीब हैं बालाजी

आप सोच रहे होंगे क‌ि इतना पैसा होने पर भी भगवान गरीब कैसे हो सकते हैं। और दूसरा सवाल यह भी आपके मन में उठ सकता है क‌ि जो सबकी मनोकामना पूरी करता है वह खुद कैसे गरीब हो सकता है।

लेक‌िन त‌िरुपत‌ि बालाजी के बारे में ऐसी प्राचीन कथा है ज‌िसके अनुसार बालाजी कल‌ियुग के अंत तक कर्ज में रहेंगे। बालाजी के ऊपर जो कर्ज है उसी कर्ज को चुकाने के ल‌िए यहां भक्त सोना और बहुमूल्य धातु एवं धन दान करते हैं।

शास्‍त्रों के अनुसार कर्ज में डूबे व्यक्त‌ि के पास क‌ितना भी धन हो वह गरीब ही होता है। इस न‌ियम के अनुसार यह माना जाता है क‌ि धनवान होकर भी गरीब हैं बालाजी।

आख‌िर कर्ज में क्यों डूबे हैं त‌िरुपत‌ि बालाजी

प्राचीन कथा के अनुसार एक बार महर्ष‌ि भृगु बैकुंठ पधारे और आते ही शेष शैय्या पर योगन‌िद्रा में लेटे भगवान व‌िष्‍णु की छाती पर एक लात मारी। भगवान व‌िष्‍णु ने तुरंत भृगु के चरण पकड़ ल‌िए और पूछने लगे क‌ि ऋष‌िवर पैर में चोट तो नहीं लगी।

भगवान व‌िष्‍णु का इतना कहना था क‌ि भृगु ऋष‌ि ने दोनों हाथ जोड़ ल‌िए और कहने लगे प्रभु आप ही सबसे सहनशील देवता हैं इसल‌िए यज्ञ भाग के प्रमुख अध‌िकारी आप ही हैं। लेक‌िन देवी लक्ष्मी को भृगु ऋष‌ि का यह व्यवहार पसंद नहीं आया और वह व‌िष्‍णु जी से नाराज हो गई। नाराजगी इस बात से थी क‌ि भगवान ने भृगु ऋष‌ि को दंड क्यों नहीं द‌िया।

नाराजगी में देवी लक्ष्मी बैकुंठ छोड़कर चली गई। भगवान व‌िष्‍णु ने देवी लक्ष्मी को ढूंढना शुरु क‌िया तो पता चला क‌ि देवी ने पृथ्‍वी पर पद्मावती नाम की कन्या के रुप में जन्म ल‌िया है। भगवान व‌िष्‍णु ने भी तब अपना रुप बदला और पहुंच गए पद्मावती के पास। भगवान ने पद्मावती के सामने व‌िवाह का प्रस्ताव रखा ज‌िसे देवी ने स्वीकार कर ल‌िया।

लेक‌िन प्रश्न सामने यह आया क‌ि व‌िवाह के ल‌िए धन कहां से आएगा।

और इस तरह धनवान होते जा रहे हैं बाला जी

व‌िष्‍णु जी ने समस्या का समाधान न‌िकालने के ल‌िए भगवान श‌िव और ब्रह्मा जी को साक्षी रखकर कुबेर से काफी धन कर्ज ल‌िया। इस कर्ज से भगवान व‌िष्‍णु के वेंकटेश रुप और देवी लक्ष्मी के अंश पद्मवती ने व‌िवाह क‌िया।

कुबेर से कर्ज लेते समय भगवान ने वचन द‌िया था क‌ि कल‌ियुग के अंत तक वह अपना सारा कर्ज चुका देंगे। कर्ज समाप्त होने तक वह सूद चुकाते रहेंगे। भगवान के कर्ज में डूबे होने की इस मान्यता के कारण बड़ी मात्रा में भक्त धन-दौलत भेंट करते हैं ताक‌ि भगवान कर्ज मुक्त हो जाएं।

भक्तों से म‌िले दान की बदौलत आज यह मंद‌िर करीब 50 हजार करोड़ की संपत्त‌ि का माल‌िक बन चुका है।


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शुक्रवार, 25 मार्च 2016

जाने किस दिशा में सिर रखकर सोना होता है लाभदायक

जाने किस दिशा में सिर रखकर सोना होता है लाभदायक



हर व्यक्ति अलग-अलग तरह सोता है। सोने के समय दिशाओं को लेकर भी तमाम भ्रंतियां हैं। अकसर लोग कहते हैं कि उत्तर दिशा की तरफ सिर रख कर नहीं सोना चाहिए। यदि ऐसा है तो वो क्या कारण है फिर कौंन सी दिशा में सर रखकर सोना चाहिए। आज हम आपको बता रहे हैं कि किस तरफ सिर करके सोने से सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।
1- रक्त से संबंधित कोई समस्या, जैसे एनीमिया या रक्ताल्पता आदि होने पर डॉक्टर आपको आयरन लेने की सलाह देते हैं। क्योंकि यह रक्त का एक बेहद महत्वपूर्ण तत्व होता है। पृथ्वी के भी चुंबकीय क्षेत्र (मैगनेटिक फील्ड) होते हैं। तो यदि आप उत्तर दिशा की ओर सिर कख कर 5 से 6 घंटों तक उस तरह रहते हैं, तो चुंबकीय खिंचाव आपके दिमाग पर दबाव डालने लगता है।
2- हमारा दिल शरीर के तीन-चौथाई भाग में ऊपर की ओर मौजूद होता है, क्योंकि गुरुत्वाकर्षण के खिलाफ रक्त को ऊपर की ओर पहुंचाना नीचे की ओर पहुंचाने से ज्यादा कठिन होता है। दरअसल हमारी जो रक्त शिराएं शरीर में ऊपर की ओर जाती हैं, वे नीचे की ओर जाने वाली धमनियों के बनिस्पद बहुत परिष्कृत होती हैं। पर दिमाग में जाते समय ये लगभग बालों जितनी पतली होती हैं। इतनी पतली कि ये एक अतिरिक्त रक्त की बूंद को भी ऊपर नहीं ले जा सकती हैं। इस पर अतिरिक्त दबाव पडऩे पर ये फट सकती हैं और हैमरेज (रक्तस्राव) हो सकता है।
3- आमतौर पर देखा जाता है कि 35 साल की उम्र के बाद बुद्धिमत्ता का स्तर कई रूपों में गिर जाता है जब तक कि हम इसे बनाए रखने के लिए बहुत मेहनत न करें। गलत दिशा में सोने पर इन धमनियों को नुकसान हो सकता है। ऐसा गलत दिशा में सोने पर दिमाग पर पडऩे वाले चुंबकीय खिंचाव के कारण होता है।
4- जब शरीर क्षैतिज स्थिति में होता है, तो तुरंत नाड़ी की गति को धीमा होता महसूस किया जा सकता है। शरीर यह बदलाव इसलिए लाता है क्योंकि यदि रक्त उसी स्तर पर पंपहोता रहेगा, तो सिर में जरूरत से ज्यादा रक्त जा सकता है और गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। तो यदि कोई अपना सिर उत्तर दिशा की ओर रखता है और 5 से 6 घंटों तक उसी स्थिति में रहता है, तो चुंबकीय खिंचाव सीधा दिमाग पर दबाव डालता है।
6- एक निश्चित आयु को पार कर लेने के बाद रक्तशिराएं कमजोर होने लगती हैं तो लगातार गलत दिशा में सर रख कर सोने से रक्तस्राव और लकवे के साथ स्ट्रोक भी हो सकता है। हालांकि ज़रूरी नहीं कि ऐसा सभी के साथ हो। कई लोगों को गलत दिशा में सोने पर उत्तेजित या परेशान होकर जागजानें जैसी समस्या हो सकती है। क्योंकि सोते समय दिमाग में जितना रक्त संचार होना चाहिए, उससे ज्यादा होता है। एक-दो दिन में इससे कोई समस्या नहीं होती है, लेकिन लंबे समय तक लगत दिशा में सिर रख कर सोने से समस्याएं हो सकती हैं।
7- सोते समय सिर करने के लिये पूर्व सबसे अच्छी दिशा होती है। पूर्वोत्तर ठीक है, पश्चिम भी ठीक रहती है। यदि कोई विकल्प न हो तो दक्षिण दिशा में सिर रखकर भी सोया जा सकता है। लेकिन उत्तर दिशा में सर रख कर सोना बिल्कुल ठीक नहीं है। जब तक आप उत्तरी गोलार्ध में हैं, यही सही है उत्तर के अलावा किसी भी दिशा में सिर करके सोया जा सकता है। लेकिन दक्षिणी गोलार्ध में होने पर दक्षिण दिशा की ओर सिर करके न सोएं।

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यहां है भगवान राम, सीता के चरण चिन्ह, पत्थर से भी निकलता है पानी



यहां है भगवान राम, सीता के चरण चिन्ह, पत्थर से भी निकलता है पानी





झारखंड के एडचोरो में एक पहाड़ी पर बना हुआ शिवजी का मंदिर स्थानीय लोगों में विशेष मान्यता रखता है। लादा महादेव टंगरा के नाम से मशहूर यह मंदिर झारखंड की राजधानी रांची से 20 किलोमीटर दूर है। इस मंदिर में प्रत्येक रामनवमी पर श्रद्धालु आते हैं और भगवान नीलकंठ से आशीर्वाद लेते हैं।



चट्टान पर है भगवान राम और सीता के चरण चिन्ह



श्रद्धालुओं का मानना है कि वनवास काल के दौरान भगवान राम, सीता और लक्ष्मण यहां आए थे। यहां की एक पहाड़ियों पर उनके चरण चिन्ह भी अंकित हैं जिनकी भक्तजन पूजा करते हैं।



चट्टान पर हाथ फेरने से निकलता है पानी



लादा महादेव टंगरा मंदिर परिसर में एक चट्टान है। इस चट्टान के लिए कहा जाता है कि यदि सच्चे मन से इस पर हाथ फेरा जाए तो पानी का रिसाव होने लगता है। यहां पर आकर श्रद्धालुभक्त भगवान शिव की आराधना करते हैं।



महाशिवरात्री तथा रामनवमी पर लगता है मेला



इन दोनों ही कारणों से इस मंदिर की बहुत मान्यता है। यहां हर वर्ष महाशिवरात्रि, रामनवमी तथा सावन के महीने में मेले लगते हैं, जिनमें दूर-दूर से लोग मन्नतें मांगने आते हैं। इन दिनों यहां विद्यमान शिवलिंग को दूध से नहलाकर कर फूलों से श्रृंगार किया जाता है। विशेष आरती होती हैं तथा श्रद्धालुभक्त अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं

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हनुमानजी को चढ़ता है नारियल का भोग, मुंह में रखते ही हो जाते हैं दो टुकड़े



हनुमानजी को चढ़ता है नारियल का भोग, मुंह में रखते ही हो जाते हैं दो टुकड़े






गुजरात के बोटाद शहर के पास स्थित सारंगपुर का हनुमान मंदिर अपने आप में बेहद अनूठा है। यहां मारूतिनंदन को नारियल का भोग चढ़ाया जाता है जो कि उनकी प्रतिमा के मुंह में रख दिया जाता है। मूर्ति नारियल का आधा हिस्सा हाथ से भक्त को वापस दे देती है जबकि बचा हुआ हिस्सा हनुमानजी को अर्पित हो जाता है।



मंदिर के महंत श्रीलालभाई के अनुसार इस प्रतिमा को इसी उद्देश्य से बनाया गया है। उन्होंने मंदिर को साफ-सुथरा रखने के मकसद से इसकी पहल की है। उन्होंने बताया कि मंदिरों में नारियल फोड़ने के चलते गंदगी का माहौल रहता है। इसीलिए हमने ऐसी मूर्ति का निर्माण करवाया, जिससे भगवान को प्रसाद भी अर्पित हो जाए और गंदगी भी न हो।



उन्होंने बताया कि वास्तव में मूर्ति के मुंह में एक मशीन लगाई गई है जो नारियल के दो टुकड़े कर देती है। मूर्ति के मुंह से नारियल अंदर जाता है जहां मशीन के जरिए दो हिस्सों में बंट जाता है। एक टुकड़ा प्रतिमा के हाथ के जरिए बाहर आ जाता है जिसे श्रद्धालुजनों को प्रसाद के रूप में दे दिया जाता है जबकि बचा हुआ दूसरा हिस्सा मशीन में चला जाता है जिसे मंदिर प्रशासन भोग के रूप में स्वीकार कर लेता है।

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Tone Totke

अगर रात को सोने से पहले महिलाएं करें ये चीजें तो बदल जाएगी आपकी जिंदगी 

ज्योतिष में महिलाओं से जुड़े कई तरह के टोने-टोटके बताए गए हैं जिन्हें सिर्फ महिलाएं ही कर सकती हैं। माना जाता है कि इन टोटकों को करने से घर में साक्षात लक्ष्मी का वास होता है और घर में रहने वालों का दुर्भाग्य सदा-सर्वदा के लिए समाप्त हो जाता है। पढि़ए ऐसे ही कुछ टोटकों के बारे में जिन्हें यदि महिलाएं रात को सोने से पहले करें तो उनके घर में कभी कोई कमी नहीं होगी और घर के सभी सदस्य स्वस्थ, शांत और सौभाग्यशाली रहेंगे।
(1) सूर्यास्त ढलने के बाद यदि कोई बाहर का व्यक्ति आप से दूध अथवा दही मांगे तो नहीं देना चाहिए। ऐसा करने से उस घर की लक्ष्मी दूसरे के घर चली जाती है।
(2) रात को सोने से पहले रसोई के सभी झूठे बर्तन धोकर तथा रसोई को साफ करके सोना चाहिए। इससे घर में वैभव, सम्पन्नता और शांति आती है।
(3) सोने से पहले कभी भी बाल न खोलें।
(4) सप्ताह में एक बार रात को सोने से पहले घर के सभी कमरों में थोड़ा-थोड़ा (लगभग 100 ग्राम से 250 ग्राम तक कमरे की साइज के हिसाब से) सेंधा नमक अथवा काला नमक एक अखबार के ऊपर रखकर फर्श पर रख दें। सुबह उठते ही बिना किसी से बात किए इस नमक इकट्ठा करें और पास के किसी गंदे नाले में फेंक आएं। इससे घर की समस्त नकारात्मक ऊर्जा बाहर निकल कर सकारात्मक ऊर्जा आती है। यदि किसी ने घर पर कुछ करवा रखा है तो वह भी सदा के लिए समाप्त हो जाता है।
(5) रात को सोने से पहले झाड़ू को दक्षिण-पश्चिम दिशा में छिपा कर रख दें।

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मंगलवार, 22 मार्च 2016

पूजा या दर्शन करते समय दूर रहना चाहिए इन 5 लोगों से


पूजा या दर्शन करते समय दूर रहना चाहिए इन 5 लोगों से




कई लोग ऐसे होते हैं, जो सकारात्मक ऊर्जा देते हैं और कई लोग अपने कर्मों और अपनी आदतों से नकारात्मक ऊर्जा देते हैं। कहा जाता है, मंदिर जाते समय या भगवान के दर्शन बिल्कुल शांत मन से करना चाहिए। विचलित मन से की गई पूजा का फल नहीं मिलता है। इसलिए, धर्म ग्रंथों में श्रीरामकृष्ण परमहंस ने ऐसे 5 लोगों के बारे में बताया हैं, जो नकारात्मक ऊर्जो देने वाले होते हैं और ऐसे लोगों से देव पूजा या आराधना के समय दूर ही रहना चाहिए।


1. नास्तिक

कई लोग ऐसे भी होते हैं, जो भगवान और धर्म में आस्था नहीं रखते। जिन्हें ना तो धर्म-ज्ञान से कोई मतलब होता है, ना ही देव भक्ति से। ऐसा व्यक्ति धर्म और शास्त्रों में विश्वास ना होने की वजह से अधर्मी और पापी होता है। झूठ बोलना, बुरा व्यवहार करना आदि उसका स्वभाव बन जाता है। देव पूजा या दर्शन करते समय ऐसे व्यक्ति के आस-पास होने पर हम भी अपने काम पर पूरा ध्यान नहीं लगा पाते। ऐसे मनुष्य से हमेशा दूरी बनाएं रखनी चाहिए।

2. क्रोध करने वाला

बेवजह या अत्यधिक क्रोध करने वाले का व्यवहार दानव के समान माना जाता है। क्रोध करने से मनुष्य हमेशा ही अपना नुकसान करता है। कई बार निन्दा और हास्य का पात्र भी बन जाता है। ऐसे व्यक्ति का मन हर समय अशांत रहता है और उसके स्वभाव के समय वह नकारात्मक ऊर्जा देने वाला होता है। देव पूजा या दर्शन के समय ऐसे व्यक्ति के आस-पास होने पर मनुष्य अपना ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता। इसलिए पूजा हा दर्शन करते समय ऐसे व्यक्ति से दूर रहना चाहिए।
3. जो दूसरों की निंदा करता हो

जो व्यक्ति दूसरों की निंदा या बुराई करता हो, ऐसा मनुष्य बुरे व्यवहार वाला होता है। दूसरों की निंदा करना मनुष्य व्यवहार का सबसे बड़ा दोष माना जाता है। ऐसे मनुष्य पूरे समय किसी न किसी की बुराई करता ही रहता है। ऐसे मनुष्य के आस-पास होने पर पूरे वातावरण की सकारात्मक ऊर्जा का नाश हो जाता है और शांति भंग हो जाती है। इसलिए, भगवान की पूजा या आरती करते समय ऐसे लोगों से दूर ही रहने की सलाह दी गई है।
4. लालची

जिस मनुष्य के मन में लालच होता है, उसकी प्रवृत्ति चोर के समान हो जाती है। ऐसा व्यक्ति पूरे समय दूसरों की वस्तु पाने के बारे में ही सोचता रहता है। ऐसे व्यक्ति से दोस्ती रखने या उसके कामों में मदद करने पर हमारे भी पुण्य कर्मों का नाश हो जाते है और हम भी पाप के भागी ही माने जाते है। इसलिए, देव आराधना के समय ऐसे मनुष्य से कभी बात नहीं करनी चाहिए।
5. जलन की भावना रखने वाला

जो मनुष्य दूसरों के प्रति अपने मन में जलन की भावना रखता है, वह निश्चित ही छल-कपट करने वाला, पापी, धोखा देने वाला होता है। ऐसे मनुष्य का मन हर समय अशांत ही रहता है। ऐसे व्यक्ति से बात करने पर या मिलने पर वह अपनी बातों और आदतों से हमारा मन भी अशांत कर देता है। अशांत मन से की गई पूजा का फल कभी नहीं मिलती, इसलिए पूजा या दर्शन करते समय ऐसे लोगों से दूर ही रहना चाहिए।
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जानिए गीले कपड़ों में क्यों करनी चाह‌िए धार्मिक स्थलों की पर‌िक्रमा



जानिए गीले कपड़ों में क्यों करनी चाह‌िए धार्मिक स्थलों की पर‌िक्रमा



कभी आपने सोचा है कि प्राचीन मंदिरों में कुंआ या कोई जलाशय क्यों होता है? कभी इस बात पर विचार किया है कि हम परिक्रमा क्यों लगाते हैं और यह परिक्रमा एक खास दिशा में ही क्यों होती है? इन सबके पीछे वैज्ञानिक कारण हैं।


प्रदक्षिणा का अर्थ है परिक्रमा करना। उत्तरी गोलार्ध में प्रदक्षिणा घड़ी की सुई की दिशा में की जाती है। इस धरती के उत्तरी गोलार्ध में यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। अगर आप गौर से देखें तो नल की टोंटी खोलने पर पानी हमेशा घड़ी की सुई की दिशा में मुडक़र बाहर गिरेगा। अगर आप दक्षिणी गोलार्ध में चले जाएं और वहां नल की टोंटी खोलें तो पानी घड़ी की सुई की उलटी दिशा में मुडक़र बाहर गिरेगा। बात सिर्फ पानी की ही नहीं है, पूरा का पूरा ऊर्जा तंत्र इसी तरह काम करता है।

उत्तरी गोलार्ध में अगर कोई शक्ति स्थान है और आप उस स्थान की ऊर्जा को ग्रहण करना चाहते हैं तो आपको घड़ी की सुई की दिशा में उसके चारों ओर परिक्रमा लगानी चाहिए। जब आप घड़ी की सुई की दिशा में घूमते हैं तो आप कुछ खास प्राकृतिक शक्तियों के साथ घूम रहे होते हैं।

कोई भी प्रतिष्ठित स्थान एक भंवर की तरह काम करता है, क्योंकि उसमें एक कंपन होता है और यह अपनी ओर खींचता है। दोनों ही तरीकों से ईश्वरीय शक्ति और हमारे अंतरतम के बीच एक संपर्क स्थापित होता है। घड़ी की सुई की दिशा में किसी प्रतिष्ठित स्थान की परिक्रमा करना इस संभावना को ग्रहण करने का सबसे आसान तरीका है। खासतौर से भूमध्य रेखा से 33 डिग्री अक्षांश तक यह संभावना काफी तीव्र होती है, क्योंकि यही वह जगह है जहां आपको अधिकतम फायदा मिल सकता है।


अगर आप ज्यादा फायदा उठाना चाहते हैं तो आपके बाल गीले होने चाहिए। इसी तरह और ज्यादा फायदा उठाने के लिए आपके कपड़े भी गीले होने चाहिए। अगर आपको इससे भी ज्यादा लाभ उठाना है तो आपको इस स्थान की परिक्रमा नग्न अवस्था में करनी चाहिए। वैसे, गीले कपड़े पहनकर परिक्रमा करना नंगे घूमने से बेहतर है।

इसका कारण यह है क‌ि शरीर बहुत जल्दी सूख जाता है, जबकि कपड़े ज्यादा देर तक गीले रहते हैं। ऐसे में किसी शक्ति स्थान की परिक्रमा गीले कपड़ों में करना सबसे अच्छा है, क्योंकि इस तरह आप उस स्थान की ऊर्जा को सबसे अच्छे तरीके से ग्रहण कर पाएंगे।

यही वजह है कि पहले हर मंदिर में एक जल कुंड जरूर होता था, जिसे आमतौर पर कल्याणी कहा जाता था। ऐसी मान्यता है कि पहले आपको कल्याणी में एक डुबकी लगानी चाहिए और फिर गीले कपड़ों में मंदिर भ्रमण करना चाहिए, जिससे आप उस प्रतिष्ठित जगह की ऊर्जा को सबसे अच्छे तरीके से ग्रहण कर सकें। लेकिन आज ज्यादातर कल्याणी या तो सूख गए हैं या गंदे हो गए हैं।




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सोमवार, 21 मार्च 2016

भगवान के जप में भूलकर भी न करें ये 5 काम



भगवान के जप में भूलकर भी न करें ये 5 काम





जप करना देवी-देवताओं को प्रसन्न करने का और उनकी कृपा पाने का एक आसान तरीका होता है। जप करते समय पूरे विधि-विधान का ध्यान रखना जरूरी होता है। पूरी क्रिया और श्रद्धा के साथ किया गया जप शुभ फल देना वाला होता है। पुराणों में जप से संबंधित कई बातें बताई गई हैं, जिनका ध्यान हर किसी को रखना ही चाहिए।


पुराणों में 5 ऐसे कामों के बारे में बताया गया जो जप करते समय भूलकर भी नहीं करने चाहिए। आइए जानते है क्या है ये काम-
1. छींकना

देवी-देवताओं का जप करते समय मनुष्य को अपनी छींक या खांसी पर नियंत्रण रखना चाहिए। भगवान का ध्यान करते समय छींकने से मुंह अपवित्र हो जाता है और अपवित्र मुंह से भगवान का नाम लेना वर्जित माना जाता है। अगर भगवान का जप करते समय छींक या खांसी आ जाए तो तुरंत हाथ-मुंह थो कर, पवित्र हो जाना चाहिए और उसके बाद ही जप दोबारा शुरू करना चाहिए।
2. थूकना

थूक के द्वारा मनुष्य अपने शरीर की गदंगी को बाहर करता है। देवी-देवताओं का ध्यान या जप करते समय ऐसी कोई भी क्रिया करना वर्जित माना गया है। मनुष्य को अपने मन के साथ-साथ शरीर को भी पूरी तरह से शुद्ध करने के बाद ही भगवान की पूजा-अर्चना करना चाहिए। यदि पूजा या ध्यान के बीच में शरीर संबंधी कोई भी क्रिया करनी पड़े तो फिर से नहाने के बाद ही देव-पूजा करनी चाहिए।
3. जंभाई (उबासी) लेना

उबासी लेना आलस्य की निशानी होती है। जो मनुष्य सुबह उठने के बाद भी उबासी लेता रहता है या नींद की अवस्था में रहता है, उसे भगवान की पूजा-अर्चना करने की मनाही है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, सुबह जल्दी उठ कर, स्नान आदि काम पूरे करके, आलस-नींद जैसे भावों को मन से दूर करके ही भगवान का ध्यान या जप करना चाहिए।
4. क्रोध

क्रोध यानी गुस्सा करना। बेवजह या बात-बात पर गुस्सा करना सबसे बड़े अवगुणों में से एक माना जाता है। जो क्रोध का भाव अपने मन में रखता है, वह किसी भी काम में अपना मन नहीं लगा सकता। देव पूजा और साधना के लिए मन का शांत और एकाग्र होना बहुत ही जरूरी होता है। अशांत मन से किया गया जप कभी फल नहीं देता। इसलिए, हर मनुष्य को मंदिर जाने से पहले या घर पर ही भगवान की पूजा या जप करने से पहले क्रोध, हिंसा, लालच जैसे भावों को मन से निकान देना चाहिए।
5. मद (नशा)

जो मनुष्य नशा करता है, उसे पुराणों में राक्षस के समान माना गया है। भगवान की पूजा-अर्चना करने से पहले मनुष्य को अपने मन और अपने तन दोनों की शुद्धि करना बहुत जरूरी होता है। जो मनुष्य शराब पीता या नशा करता है, उसके सभी पुण्य कर्म नष्ट हो जाते हैं और उसे नर्क की प्राप्ति होती है। भगवान का ध्यान या जप करते समय नशे के बारे में सोचना भी महापाप माना गया है।

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