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गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

हजारों वर्ष पुराना है सेवड़ माता का मंदिर, होते हैं मां कालिका के दर्शन

हजारों वर्ष पुराना है सेवड़ माता का मंदिर, होते हैं मां कालिका के दर्शन


चन्दवाजी के निकट अजमेर बाइपास एक्सप्रेस हाइवे पर पूठ का बास व बीलपुर की सीमा पर विराजमान सेवड़ माता मंदिर क्षेत्र के लोगों का आस्था का केंद्र है। यहां राजस्थान के अलावा देशभर से श्रृद्धालू आते हैं जिनकी खाली झोलियां मातारानी भरती है।
अजमेर बाइपास हाइवे से गुजरने पर भव्य मंदिर लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है। सेवड़ माता का यह मंदिर हजारों वर्ष पुराना है। जिसके पीछे अनेक लोक कहानियां भी जुड़ी हुई हैं। मंदिर में नवरात्रों के दौरान नोै दिन तक मेला सा लगा रहता है। मंदिर का विकास अनवरत यहां पर जनसहयोग से जारी है। नवरात्रा समाप्ति पर यहां विशाल मेला व भंड़ारे का आयोजन होता है।
अजीब है कहानी, पैर से निकला था पानी
सेवड़ माता के यहां विराजमान होने एवं मंदिर निर्माण की कहानी भी उसके चमत्कारों की तरह ही दिलचस्प है। मंदिर निर्माण व विकास कमेटी अध्यक्ष श्योनारायण मीणा ने बताया कि सेवड़ माता मंदिर के निर्माण व माता जी के विराजमान होने के पीछे एक कहानी है । बताया जाता है कि जयपुर की स्थापना से पूर्व 1600 ईस्वी में सेवड़ माता यहां विराजमान हुई थी।
कहा जाता है कि मारवाड़ से एक रथ में बैठकर दुर्गा माता (सेवड़ माता) व भगवान शंकर भ्रमण के लिए निकले थे। उस समय दुर्गा माता ने प्रतिज्ञा की थी कि जहां रथ के पहिए से जमीन से पानी निकल जाएगा मैं वहीं विराजमान हो जाउंगी। शंकर भगवान ने प्रण किया था कि मेरे नंदी के पैर से जहां पानी निकलेगा मैं वहीं विश्राम करूंगा। चलते चलते क्षेत्र के ग्राम बीलपुर व पूठ का बास की सीमा पर रथ के पहिए से पानी निकला ओर रथ वहीं रूक गया।
अपने वचन के अनुसार दुर्गा माता यहां सेवड़ माता के रूप में विराजमान हो गई ओर भगवान शंकर अकेले ही यहां से रवाना हुए, आमेर के समीप टोड़ा मीणा गांव में शिव के वाहन नंदी के पैर से पानी निकला जहां उन्होने ने विश्राम किया । टोड़ा मीणा गांव में आज उस जगह टोड़ेश्वर महादेव का मशहूर मंदिर स्थित है। ग्रामीण साथल व बीला खोड़ा(मीणा) ने यहां माता जी के मंदिर की नींव रखी। सेवड़ माता ने यहां चोरी करके भाग रहे चोरों को शरण दी ओर उन्हे ग्रामीणों से बचाने के लिए बच्चे बना दिए। उनकी पहचान छुपाने के लिए शरीर पर कोड़ बना दिए जो बाद में जाकर खोड़ा कहलाए।
मान्यता है कि माताजी की पूजा आज भी खोड़ा गोत्र के मीणा ही करते हैं। मीणाओं की कुल देवी भी सेवड़ माता ही है। माता जी के भक्त बीला मीणा के नाम पर ही गांव बसाया गया जो आज बीलपुर के नाम से मशहूर है। जनसहयोग से ही मंदिर का विकास होता आया है जो वर्तमान में एक विशाल मंदिर है ओर लोगों की आस्था का केंद्र।
देश भर से आते हैं श्रद्धालु
सेवड़ माता मंदिर में सालाना करीब तीन लाख रूपये का चढावा आता है जिसका उपयोग मंदिर निर्माण व विकास में ही किया जा रहा है। यहां नवरात्रों के बाद विजया दशमी पर विशाल मेला भरता है जिसमें कांट, संागावाला, बीलपुर, सुंदरपुरा, जयपुर, चिताणु, पूठ का बास, रूण्ड़ल, मानपुरा माचैड़ी, टोडा मीणा सहित दिल्ली, गुजरात, मुंबई से भी भक्त आते हैं। नवरात्रों में रोजाना मेला सा लगा रहता है। ग्रामीण सेवड़ माता के यहां अनेक सवामणी व धार्मिक काय्रक्रमों का आयोजन करते हेैं।
चमत्कारी है माता
चिताणु निवासी बुजुर्ग श्योनारायण मीणा(70) व गोपाल लाल (55) ने बताया कि पहले क्षेत्र में वर्षा नही होने पर किसान माताजी से प्रार्थना करते थे तो बारिश हो जाती थी। क्षेत्र में बिमारियों का प्रकोप होने पर भी लोग माताजी की पूजा अर्चना कर मनुहार करने से महामारी व अन्य बिमारियों का प्रकोप दूर हो जाता है। यहां पर यज्ञ शाला , भोले नाथ का मंदिर, भैंरू जी का मंदिर व संकटमोचन हनुमान मंदिर सहित अनेक घर्मशालाएं बनी हुई हैं।
200 साल से जल रही है अखण्ड़ ज्योत
सेवक श्योनारायण मीणा व गोविंद शर्मा ने बताया कि मंदिर में विगत 200 वर्षो से अखण्ड़ ज्योत जल रही है। ज्योत के लिए मंदिर में रोजाना घी का चढावा आता है। उन्होने बताया कि मंदिर में करीब 14 से 15 क्विंटल घी का चढावा एकत्र हो चुका है। रोजाना घी के दीपकों से ही माता जी की आरती की जाती है। करीब तीन वर्ष पूर्व यहां यज्ञ का आयोजन हुआ था जिसमें चढ़ावे के घी का उपयोंग ही किया गया था।
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