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रविवार, 7 फ़रवरी 2016

7 महत्त्वपूर्ण शुक्र नीतियां

7 महत्त्वपूर्ण शुक्र नीतियां

जानिए शुक्राचार्य की ऐसी ही 7 खास नीतियों के बारे में-

1. कल की सोचें, लेकिन कल पर न टाले
नीति- दीर्घदर्शी सदा च स्यात्, चिरकारी भवेन्न हि।
अर्थात- मनुष्य को अपना हर काम आज के साथ ही कल को भी ध्यान में रखकर करना चाहिए, लेकिन आज का काम कल पर टालना नहीं चाहिए। हर काम को वर्तमान के साथ-साथ भविष्य की दृष्टी से भी सोचकर करें, लेकिन किसी भी काम को आलय के कारण कल पर न टालें। दूरदर्शी बने लेकिन दीर्घसूत्री (आलसी, काम टालने वाला) नहीं।
2. बिना सोचे-समझे किसी को मित्र न बनाएं
नीति-
यो हि मित्रमविज्ञाय याथातथ्येन मन्दधीः।
मित्रार्थो योजयत्येनं तस्य सोर्थोवसीदति।।
अर्थात-
मनुष्य को किसी को भी मित्र बनाने से पहले कुछ बातों पर ध्यान देना बहुत ही जरूरी होता है। बिना सोचे-समझे या विचार किए किसी से भी मित्रता करना आपके लिए नुकसानदायक हो सकता हैं। मित्र के गुण-अवगुण, उसकी आदतें सभी हम पर भी बराबर प्रभाव डालती हैं। इसलिए, बुरे विचारों वाले या गलत आदतों वाले लोगों से मित्रता करने से बचें।
3. किसी पर भी हद से ज्यादा विश्वास न करें
नीति- नात्यन्तं विश्र्वसेत् कच्चिद् विश्र्वस्तमपि सर्वदा।
अर्थात-आर्चाय शुक्रचार्य के अनुसार, चाहे किसी पर हमें कितना ही विश्वास हो, लेकिन उस भरोसे की कोई सीमा होनी चाहिए। किसी भी मनुष्य पर आंखें बंद करके या हद से ज्यादा विश्वास करना आपके लिए घातक साबित हो सकता है। कई लोग आपके विश्वास का गलत फायदा उठाकर नुकसान भी पहुंचा सकते हैं। इसलिए, इस बात का ध्यान रखें कि अपने विश्वसनियों पर विश्वास जरूर करें लेकिन साथ में अपनी भी आंखें खुली रखें।
4. न करें अन्न का अपमान
नीति- अन्नं न निन्घात्।।
अर्थात- अन्न को देवता के समान माना जाता है। अन्न हर मनुष्य के जीवन का आधार होता है, इसलिए धर्म ग्रंथों में अन्न का अपमान न करने की बात कही गई है। कई लोग अपना मनपसंद खाना न बनने पर अन्न का अपमान कर देते हैं, यह बहुत ही गलत माना जाता है। जिसके दुष्परिणाम स्वरूप कई तरह के दुखों का सामना भी करना पड़ सकता है। इसलिए ध्यान रहे कि किसी भी परिस्थिति में अन्न का अपमान न करें।
5. धर्म ही मनुष्य को सम्मान दिलाता है
नीति- धर्मनीतिपरो राजा चिरं कीर्ति स चाश्नुते।
अर्थात- हर किसी को अपने जीवन में धर्म और धर्म ग्रंथों का सम्मान करना चाहिए। जो मनुष्य अपनी दिनचर्या का थोड़ा सा समय देव-पूजा और धर्म-दान के कामों को देता है, उसे जीवन में सभी कामों में सफलता मिलती है। धर्म का सम्मान करने वाले मनुष्य को समाज और परिवार में बहुत सम्मान मिलता है। इसलिए भूलकर भी धर्म का अपमान न करें, न ही ऐसा पाप-कर्म करने वाले मनुष्यों की संगति करें।
6. पापी-कर्म करने वाले चाहें कितना ही प्रिय हो, उसका त्याग कर देना चाहिए
नीति- त्यजेद् दुर्जनसंगतम्।
अर्थात- कई बार हमारे प्रियजन नास्तिक या पाप-कर्म करने वाले होते हैं। हमे सही-गलत का ज्ञान होने पर भी अपने मोह या लगाव की वजह से हम उस व्यक्ति का त्याग नहीं करते। धर्म- ग्रंथों में इस बात को बिल्कुल ही गलत कहा गया है। पाप-कर्म या गलत काम करने वाला मनुष्य हमें चाहे कितना ही प्रिय क्यों न हो, उसका त्याग कर देना चाहिए।
7. न सभी पर विश्वास करें, न सभी पर शंका
नीति- नैकः सुखी न सर्वत्र विस्त्रब्धो न च शकितः।
अर्थात-सामान्य रूप से दो तरह के लोग पाए जाते हैं- एक वे जो हर किसी पर बड़ी ही आसानी से विश्वास कर लेते हैं और दूसरे वे जो हर किसी पर शक करते हैं। मनुष्य की ये दोनों ही आदतें सही नहीं होती। हर किसी को विश्वास और शक के बीच का संतुलन बना कर चलना चाहिए। मनुष्य को परिस्थिति के अनुसार किसी पर भी शक या विश्वास करना चाहिए।

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