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रविवार, 7 फ़रवरी 2016

52 पीठों में एक है यह सिद्धपीठ मंदिर, होती थी अनहोनी घटनाएं

52 पीठों में एक है यह सिद्धपीठ मंदिर, होती थी अनहोनी घटनाएं 



सिर पर मुकुट के समान खड़ा पहाड़, उसके नीचे बैठी शक्तिपीठ कंकालीन देवी रियासत काल से ही लोगों के बीच आस्था का केंद्र है। पौराणिक कथा के अनुसार इन्हीं देवी के नाम पर कांकेर का नामकरण हुआ। यहां नवरात्र में दूर-दूर से लोग दर्शन करने के लिए आते हैं और मां के चरणों में शीश झुकाकर अपनी कामना की मन्नतें मांगते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां देवी के चरण में आने पर भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती है।
ये है पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार दक्ष यज्ञ में भगवान शंकर का अपमान देखकर देवी सती को इतना ज्यादा आघात लगा कि उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। यज्ञ में हुए अपमान और सती के वियोग में शंकर भगवान शंकर विक्षिप्त हो गए और सती के शरीर को लेकर पागलों की तरह पृथ्वी पर चक्कर काटने लगे। भगवान शंकर की यह दशा देखकर देवताओं को चिंता हुई और भगवान विष्णु से प्रार्थना करने लगे। इस पर विष्णु ने सुदर्शन चर्क से देवी सती के शरीर को खंड-खंड कर दिया और उनके अंग जहां-जहां गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ बना।
52 शक्ति पीठों में से एक
52 शक्ति पीठों में से एक कंकालीन पीठ के बारे में मान्यता है कि यहां पर सती का कंगन गिरा था। कंगन का अपभ्रंश कंकर हुआ और कंकर से ही इस नगर (प्राचीन में गांव) का नाम कांकेर पड़ा। सोमवंश के पतन के बाद चौदहवीं सदी में कंड्रा वंश के शासन काल में पद्मदेव के कार्यकाल में यहां मंदिर की स्थापना की गई।
मंदिर में प्रवेश करते ही बेहोश हो जाती थीं
ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर में पहले महिलाएं प्रवेश करते ही बेहोश हो जाती थीं या कुछ ना कुछ अनहोनी हो जाती थी। इस कारण यहां महिलाओं का प्रवेश वर्जित था। 1990-91 में माता की विशेष पूजा-अर्चना की गई और उनसे विनती की गई। इसके बाद महिलाओं का प्रवेश कराया गया।
मंदिर परिसर में चट्टान पर लिखित लिपि रहस्यपूर्ण है। ऐसी मान्यता है कि जो इस लिपि को पढ़ लेगा, उसे खजाने की प्राप्ति होगी। इस लिपि को आज तक किसी के पढ़े जाने का प्रमाण नहीं है। इस लिपि में 84 लाख जीव-जंतुओं के भोजन के खर्च का ब्यौरा लिखा जाना बताया जाता है।
एक और कहानी प्रचलित
इस मंदिर का तार उत्तर प्रदेश के लखनऊ के पास स्थित कड़ा मानिकपुर के लोगों से भी जुड़ा है। कंकालीन मंदिर के पुजारी अभिषेक सोनी ने बताया कि उनके पूर्वज सुखदेव प्रसाद को राजा ने आभूषण बनाने के लिए यहां बुलाया था। कुछ दिनों के पश्चात मां कंकालीन देवी ने स्वप्न में कहा कि मैं जोगी गुफा पहाड़ के नीचे चट्टानों से ढ़की हूं। चट्टानों की खुदाई कराकर स्थापना करो। सुखदेव ने यह बात राजा को बताई।
राजा ने इसकी अनुमति नहीं दी और कहा कि मां ने हमको क्यों नहीं बताया लेकिन बार-बार सुखदेव को स्वप्न आते रहे। इस पर पुन: सुखदेव ने आग्रह किया तो राजा ने कहा कि यदि मूर्ति नहीं निकली तो 100 कोड़े लगाए जाएंगे। इस पर सुखदेव ने सहमति दे दी तो राजा ने खुदाई कराई और कंकालीन देवी व भैरो नाथ की मूर्तियां निकली, जिसकी राजा ने विधिवत स्थापना कराई और यह आज कंकालीन देवी के रूप में विख्यात है। आज भी सुखदेव के परिवार के लोग ही पूजा करते हैं और यहीं पर बस गए हैं। आज सुखदेव की पांचवी पीढ़ी के अभिषेक यहां पूजा-पाठ कर रहे हैं।

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