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शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

शास्त्रों के अनुसार जानें किस दिन पति-पत्नी को एक-दूसरे से दूर रहना चाहिए

शास्त्रों के अनुसार जानें किस दिन पति-पत्नी को एक-दूसरे से दूर रहना चाहिए


पारस्परिक आकर्षण

स्त्री-पुरुष के बीच पारस्परिक आकर्षण, सृष्टि का एक अटल सत्य है। सृष्टि की रचना ही इस आकर्षण और मिलन पर निर्भर है इसलिए यह कहना उचित ही होगा कि महिला-पुरुष का संगम अगर सामाजिक, धार्मिक और पारिवारिक मान्यताओं के अनुसार किया जाए तो यह एक बेहद पवित्र घटनाक्रम है।

स्त्री-पुरुष का संगम

वे लोग जो धार्मिक मान्यताओं को समझते और उनका पालन करते हैं, वो ये जानते हैं कि बिना विवाह के स्त्री-पुरुष का संगम निकृष्ट कर्म माना जाता है।

वैवाहिक बंधन

हमारा समाज महिला और पुरुष के बीच संबंधों को तभी मान्यता देता है जब कि वे दोनों वैवाहिक बंधन में बंधे हों।

स्त्री-पुरुष के बीच संबंध

यूं तो विवाह पश्चात स्त्री-पुरुष के बीच संबंध को पूरी तरह शुभ और मान्यताओं के अनुरूप माना जाता है।

ब्रह्मवैवर्तपुराण

लेकिन ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार कुछ ऐसे दिन भी हैं जिस दिन पति-पत्नी को किसी भी रूप में शारीरिक संबंध स्थापित नहीं करने चाहिए।

निषेध

आइए जानते हैं उन अशुभ दिनों के विषय में जब पति-पत्नी के मिलन को निषेध माना गया है।

अमावस्या

शास्त्रों के अनुसार अमावस्या के दिन पति-पत्नी को एक दूसरे के साथ शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिए। यह उनके विवाहित जीवन को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है।

पूर्णिमा की रात

इसके अलावा पूर्णिमा की रात भी विवाहित दंपत्ति को एक दूसरे से अलग ही रहना चाहिए।

संक्रांति

संक्रांति का समय भी पति-पत्नी की नजदीकी का समय नहीं है। इस दौरान नजदीक आना उनके लिए हितकर नहीं है।

एक दूसरे से दूरी

तिथियों की बात करें तो चतुर्थी और अष्टमी तिथि पर भी विवाहित दंपत्ति को एक दूसरे से दूरी बनाए रखनी चाहिए।

रविवार

पुराणों के अनुसार रविवार के दिन भी पति-पत्नी को एक दूसरे से दूर ही रहना चाहिए। शारीरिक संबंधों के लिए भी यह समय नहीं है।

श्राद्ध या पितृ पक्ष

श्राद्ध या पितृ पक्ष के दौरान भी पति-पत्नी को संबंध बनाने के विषय में नहीं सोचना चाहिए।

व्रत

जिस दिन स्त्री या पुरुष व्रत रखते हैं, उस दिन किसी प्रकार से अपने साथी के निकट जाना, संभोग करना सही नहीं माना गया है।

नवरात्रि

नवरात्रि के दिनों में भी स्त्री-पुरुष के बीच शारीरिक संबंध स्थापित होना निषेध करार दिया गया है।

हिन्दू परंपरा

हिन्दू एक धर्म नहीं बल्कि जीवन जीने का एक तरीका है, सफल जीवन और निर्बाधित खुशियों को प्राप्त करने के लिए बहुत जरूरी है हिन्दू परंपरा के अनुसार कार्य किया जाए।

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