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सोमवार, 11 जनवरी 2016

पुराना रिवाज़

पुराना रिवाज़

पुराना रिवाज़
रेगिस्तान के बीच बसे एक शहर में फलों की बहुत कमी थी . भगवान ने अपने दूत को भेजा कि जाओ और लोगों से कह दो कि हो सके तो वो एक दिन में बस एक ही फल खाएं . सभी लोग ऐसा ही करने लगे . पीढ़ी दर पीढ़ी ऐसा ही होता चला आया और वहां का पर्यावरण संरक्षित हो गया . चूँकि बचे हुए फलों के बीजों से और भी पेड़ निकल आते , कुछ दशकों में ही पूरा शहर हरा-भरा हो गया . अब वहां फलों की कोई कमी नहीं थी लेकिन अभी भी लोग एक दिन में बस एक ही फल खाने का पुराना रिवाज़ मानते थे – वे अपने पुरखों द्वारा दी गयी नसीहत के प्रति अभी भी वफादार थे . दूसरे शहर वाले उनसे बचे हुए फलों को देने का आग्रह करते पर उन्हें लौटा दिया जाता . नतीजतन टनो – टन फल बर्बाद हो जाते और सड़कों पर इधर -उधर बिखरे पड़े रहते . भगवान ने एक और दूत को बुलाया और कहा , ” जाओ नगर वासियों से कह दो कि वो अब जितना चाहें उतने फल कहें और बचे हुए फलों को बाकी शहरों को दे दें .” दूत यही सन्देश लेकर शहर पहुंचा लेकिन उसे पत्थरों से मार गया और शहर से दूर भगा दिया गया . लोगों के दिलो -दिमाग में पुरानी बात इतनी बैठ चुकी थी कि उससे अलग वो किसी भी बात को मानने के लिए तैयार नहीं थे .

पर समय के साथ कुछ युवा सोच वाले लोग पुराने रिवाजों के खिलाफ आवाज़ उठाने लगे . लेकिन इतनी पुरानी परंपरा को छोड़ना आसान न था इसलिए इन लोगों ने अपना धर्म ही छोड़ दिया और अब जी भर के फल खाने लगे और बचे हुए फलों को दूसरों में बांटने लगे . कुछ सालों में बस वो ही लोग धर्म को मानने वाले बचे जो खुद को संत मानते थे . लेकिन हकीकत में वे ये नहीं देख पा रहे थे कि दुनिया कैसे बदलती है और कैसे खुद को समय के साथ बदल लेना चाहिए . Friends, Paulo Coehlo कि ये कहानी हमारे लिए काफी relevant है . हमारे यहाँ बिल्ली के रास्ता काटने और कौवे के कांव – कांव से लेकर जात -पात और ऊँच-नीच से जुड़ी अनेकों मान्यताएं हैं जिनका आज कोई अर्थ नहीं है . और जैसे इस कहानी में इन चीजों को मानने वाले खुद को बड़ा धार्मिक और सबसे बड़ा संत समझते हैं उसी तरह हमारे समाज में भी ऐसी बातें मानने वाले खुद को बड़ा पवित्र और ईश्वर का चहेता समझते हैं … जबकि हकीकत कुछ और ही है . हमें भी समय के हिसाब से अपनी सोच को विकसित करना चाहिए , जो कल सही था वो आज गलत हो सकता है और जो आज सही है वो कल गलत भी हो सकता है . So, let’s change with time and abolish irrelevant customs and traditions.

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