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मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

यदि चाहते है भाग्य का साथ तो करे पीपल से सम्बंधित ये ज्योतिष उपाय

Astrology
यदि आपको कड़ी मेहनत के बाद भी धन लाभ प्राप्त नहीं हो पा रहा है तो यहां बताए जा रहे ज्योतिषीय उपाय पूरी आस्था के साथ करें। इनसे सकारात्मक फल प्राप्त किए जा सकते हैं। यहां जानिए भाग्य का साथ दिलाने वाले पीपल के उपाय----
If you want to have with the people related to the fate of these measures astrology
1.  को गाय का दूध, तिल और चंदन मिला हुआ पवित्र जल अर्पित करें।
2. ज्योतिष में बताया गया है कि पीपल का पौधा लगाने और उसकी देखभाल करने वाले व्यक्ति की कुंडली के सभी गृह दोष शांत हो जाते हैं। जैसे-जैसे पीपल बड़ा होगा, आपके घर परिवार में सुख-समृद्धि बढ़ती जाएगी।
3. यदि कोई व्यक्ति किसी पीपल के नीचे शिवलिंग स्थापित करता है और नियमित रूप से उस शिवलिंग का पूजन करता है तो सभी समस्याएं समाप्त हो सकती हैं। इस उपाय से बुरा समय दूर हो सकता है।
4. शनि दोष, शनि की साढेसाती और ढय्या के बुरे प्रभावों को दूर करने के लिए प्रति शनिवार पीपल पर जल चढ़ाकर सात बार परिक्रमा करनी चाहिए।
5. शाम के समय पीपल के वृक्ष के नीचे दीपक लगाना चाहिए।
6. पीपल के नीचे बैठकर हनुमान चालीस का पाठ करें, इस उपाय से हनुमानजी प्रसन्न होते हैं और कार्यों में आ रही बाधाएं दूर हो सकती हैं।

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

हिन्दू धर्म के सोलह (16) संस्कार

Hinduism sixteen (16) Rite
शास्त्रों के अनुसार मनुष्य जीवन के लिए कुछ आवश्यक नियम बनाए गए हैं जिनका पालन करना हमारे लिए आवश्यक माना गया है। मनुष्य जीवन में हर व्यक्ति को अनिवार्य रूप से सोलह संस्कारों का पालन करना चाहिए। यह संस्कार व्यक्ति के जन्म से मृत्यु तक अलग-अलग समय पर किए जाते हैं।

Hindu dharm
प्राचीन काल से इन सोलह संस्कारों के निर्वहन की परंपरा चली आ रही है। हर संस्कार का अपना अलग महत्व है। जो व्यक्ति इन सोलह संस्कारों का निर्वहन नहीं करता है उसका जीवन अधूरा ही माना जाता है।

ये सोलह संस्कार क्या-क्या हैं –

गर्भाधान संस्कार ( Garbhaadhan Sanskar) – यह ऐसा संस्कार है जिससे हमें योग्य, गुणवान और आदर्श संतान प्राप्त होती है। शास्त्रों में मनचाही संतान प्राप्त के लिए गर्भधारण संस्कार किया जाता है। इसी संस्कार से वंश वृद्धि होती है।

पुंसवन संस्कार (Punsavana Sanskar) – गर्भस्थ शिशु के बौद्धिक और मानसिक विकास के लिए यह संस्कार किया जाता है। पुंसवन संस्कार के प्रमुख लाभ ये है कि इससे स्वस्थ, सुंदर गुणवान संतान की प्राप्ति होती है।

सीमन्तोन्नयन संस्कार ( Simanta Sanskar) – यह संस्कार गर्भ के चौथे, छठवें और आठवें महीने में किया जाता है। इस समय गर्भ में पल रहा बच्चा सीखने के काबिल हो जाता है। उसमें अच्छे गुण, स्वभाव और कर्म का ज्ञान आए, इसके लिए मां उसी प्रकार आचार-विचार, रहन-सहन और व्यवहार करती है।

जातकर्म संस्कार (Jaat-Karm Sansakar) – बालक का जन्म होते ही इस संस्कार को करने से शिशु के कई प्रकार के दोष दूर होते हैं। इसके अंतर्गत शिशु को शहद और घी चटाया जाता है साथ ही वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया जाता है ताकि बच्चा स्वस्थ और दीर्घायु हो।


नामकरण संस्कार (Naamkaran Sanskar)– शिशु के जन्म के बाद 11वें दिन नामकरण संस्कार किया जाता है। ब्राह्मण द्वारा ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बच्चे का नाम तय किया जाता है।

निष्क्रमण संस्कार (Nishkraman Sanskar) – निष्क्रमण का अर्थ है बाहर निकालना। जन्म के चौथे महीने में यह संस्कार किया जाता है। हमारा शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश जिन्हें पंचभूत कहा जाता है, से बना है। इसलिए पिता इन देवताओं से बच्चे के कल्याण की प्रार्थना करते हैं। साथ ही कामना करते हैं कि शिशु दीर्घायु रहे और स्वस्थ रहे।


अन्नप्राशन संस्कार ( Annaprashana) – यह संस्कार बच्चे के दांत निकलने के समय अर्थात 6-7 महीने की उम्र में किया जाता है। इस संस्कार के बाद बच्चे को अन्न खिलाने की शुरुआत हो जाती है।

मुंडन संस्कार ( Mundan Sanskar)– जब शिशु की आयु एक वर्ष हो जाती है तब या तीन वर्ष की आयु में या पांचवे या सातवे वर्ष की आयु में बच्चे के बाल उतारे जाते हैं जिसे मुंडन संस्कार कहा जाता है। इस संस्कार से बच्चे का सिर मजबूत होता है तथा बुद्धि तेज होती है। साथ ही शिशु के बालों में चिपके कीटाणु नष्ट होते हैं जिससे शिशु को स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है।


विद्या आरंभ संस्कार ( Vidhya Arambha Sanskar )– इस संस्कार के माध्यम से शिशु को उचित शिक्षा दी जाती है। शिशु को शिक्षा के प्रारंभिक स्तर से परिचित कराया जाता है।

कर्णवेध संस्कार ( Karnavedh Sanskar) – इस संस्कार में कान छेदे जाते है । इसके दो कारण हैं, एक- आभूषण पहनने के लिए। दूसरा- कान छेदने से एक्यूपंक्चर होता है। इससे मस्तिष्क तक जाने वाली नसों में रक्त का प्रवाह ठीक होता है। इससे श्रवण शक्ति बढ़ती है और कई रोगों की रोकथाम हो जाती है।

उपनयन या यज्ञोपवित संस्कार (Yagyopaveet Sanskar) – उप यानी पास और नयन यानी ले जाना। गुरु के पास ले जाने का अर्थ है उपनयन संस्कार। आज भी यह परंपरा है। जनेऊ यानि यज्ञोपवित में तीन सूत्र होते हैं। ये तीन देवता- ब्रह्मा, विष्णु, महेश के प्रतीक हैं। इस संस्कार से शिशु को बल, ऊर्जा और तेज प्राप्त होता है।

वेदारंभ संस्कार (Vedaramba Sanskar) – इसके अंतर्गत व्यक्ति को वेदों का ज्ञान दिया जाता है।

केशांत संस्कार (Keshant Sanskar) – केशांत संस्कार अर्थ है केश यानी बालों का अंत करना, उन्हें समाप्त करना। विद्या अध्ययन से पूर्व भी केशांत किया जाता है। मान्यता है गर्भ से बाहर आने के बाद बालक के सिर पर माता-पिता के दिए बाल ही रहते हैं। इन्हें काटने से शुद्धि होती है। शिक्षा प्राप्ति के पहले शुद्धि जरूरी है, ताकि मस्तिष्क ठीक दिशा में काम करें। पुराने में गुरुकुल से शिक्षा प्राप्ति के बाद केशांत संस्कार किया जाता था।

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समावर्तन संस्कार (Samavartan Sanskar)- समावर्तन संस्कार अर्थ है फिर से लौटना। आश्रम या गुरुकुल से शिक्षा प्राप्ति के बाद व्यक्ति को फिर से समाज में लाने के लिए यह संस्कार किया जाता था। इसका आशय है ब्रह्मचारी व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक रूप से जीवन के संघर्षों के लिए तैयार किया जाना।

विवाह संस्कार ( Vivah Sanskar) – यह धर्म का साधन है। विवाह संस्कार सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार माना जाता है। इसके अंतर्गत वर और वधू दोनों साथ रहकर धर्म के पालन का संकल्प लेते हुए विवाह करते हैं। विवाह के द्वारा सृष्टि के विकास में योगदान दिया जाता है। इसी संस्कार से व्यक्ति पितृऋण से मुक्त होता है।

अंत्येष्टी संस्कार (Antyesti Sanskar)– अंत्येष्टि संस्कार इसका अर्थ है अंतिम संस्कार। शास्त्रों के अनुसार इंसान की मृत्यु यानि देह त्याग के बाद मृत शरीर अग्नि को समर्पित किया जाता है। आज भी शवयात्रा के आगे घर से अग्नि जलाकर ले जाई जाती है। इसी से चिता जलाई जाती है। आशय है विवाह के बाद व्यक्ति ने जो अग्नि घर में जलाई थी उसी से उसके अंतिम यज्ञ की अग्नि जलाई जाती है।

रुद्राक्ष और तुलसी की माला पहनने के फायदे

The advantages of wearing Rudraksha beads and basil





द्राक्ष, तुलसी जैसी दिव्य औषधियों की माला पहनने के पीछे वैज्ञानिक मान्यता यह है कि होंठ और जीभ का उपयोग कर मंत्र जप करने से गले की धमनियों को सामान्य से ज्यादा काम करना पड़ता है। इसके कारण कंठमाला, गलगंड आदि रोगों के होने की आशंका होती है। इनसे बचाव के लिए गले में रुद्राक्ष व तुलसी की माला पहनी जाती है।


Interesting Facts
धार्मिक मान्यताएं– रुद्राक्ष की माला एक से लेकर चौदहमुखी रुद्राक्षों से बनाई जाती है। वैसे तो 26 दानों की माला सिर पर, 50 की गले में, 16 की बाहों में और 12 की माला मणिबंध में पहनने का विधान है। 108 दानों की माला पहनने से अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है। इसे पहनने वाले को शिव लोक मिलता है, ऐसी पद्म पुराण, शिवमहापुराण आदि शास्त्रों की मान्यता है।


शिवपुराण में कहा गया है-
यथा च दृश्यते लोके रुद्राक्ष: फलद: शुभ:।
न तथा दृश्यन्ते अन्या च मालिका परमेश्वरि।।

विश्व में रुद्राक्ष की माला की तरह दूसरी कोई माला फल देने वाली और शुभ नहीं है।


श्रीमद् देवी भागवत में लिखा है-
रुद्राक्ष धारणच्च श्रेष्ठ न किचदपि विद्यते।

विश्व में रुद्राक्ष धारण से बढ़कर कोई दूसरी चीज नहीं है। रुद्राक्ष की माला श्रद्धा से पहनने वाले इंसान की आध्यात्मिक तरक्की होती है। सांसारिक बाधाओं और दुखों से छुटकारा मिलता है। दिमाग और दिल को शक्ति मिलती है। ब्लडप्रेशर नियंत्रित रहता है। भूत-प्रेत आदि बाधाएं दूर होती हैं। मानसिक शांति मिलती है। गर्मी और ठंड से होने वाले रोग दूर होते हैं। इसलिए इतनी लाभकारी, पवित्र रुद्राक्ष की माला में भारतीय लोगों की अनन्य श्रद्धा है।


तुलसी का हिंदू संस्कृति में बहुत धार्मिक महत्व है। इसमें विद्युत शक्ति होती है। यह माला पहनने वाले में आकर्षण और वशीकरण शक्ति आती है। उसकी यश, कीर्ति और सौभाग्य बढ़ता है। तुलसी की माला पहनने से बुखार, जुकाम, सिरदर्द, चमड़ी के रोगों में भी लाभ मिलता है।संक्रामक बीमारी और अकाल मौत भी नहीं होती, ऐसी धार्मिक मान्यता है। शालग्राम पुराण में कहा गया है तुलसी की माला भोजन करते समय शरीर पर होने से अनेक यज्ञों का पुण्य मिलता है। जो भी कोई तुलसी की माल पहन कर नहाता है, उसे सारी नदियों में नहाने का पुण्य मिलता है।


बुधवार, 21 दिसंबर 2016

रात के समय नहीं करने चाहिए ये तीन काम

These three work at night should not

सुख, शांति और समृद्धि बनी रहे, इसके लिए शास्त्रों में कई नियम बताए गए हैं। इन नियमों में बताया गया है कि हमें किस समय कौन से काम नहीं करना चाहिए। यहां जानिए विष्णु पुराण के अनुसार 3 ऐसी बातें, जिनसे रात के समय दूर रहना चाहिए…

विष्णु पुराण में बताए गए गृहस्थ संबंधी नियमों का पालन करने पर भगवान विष्णु, महालक्ष्मी सहित सभी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त की जा सकती है। यहां जानिए बुद्धिमान व्यक्ति को रात के समय किन 3 से दूर रहना चाहिए…


1. चौराहों पर नहीं जाना चाहिए

किसी भी समझदार व्यक्ति को रात के समय चौराहे से दूर ही रहना चाहिए। रात के समय अक्सर चौराहों पर असामाजिक तत्वों की उपस्थिति रहती है। ऐसे में यदि कोई सज्जन व्यक्ति चौराहे पर जाएगा तो उसे परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही, ये काम सदाचार के नियमों के विरुद्ध भी है। रात के समय अपने घर में ही रहना चाहिए।

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2. श्मशान के आसपास नहीं जाना चाहिए

रात के समय श्मशान के आसपास जाना भी नहीं चाहिए। श्मशान क्षेत्र में सदैव नकारात्मक ऊर्जा सक्रिय रहती है। इसका बुरा असर हमारे मन और मस्तिष्क पर पड़ सकता है। साथ ही, श्मशान क्षेत्र में जलते हुए शवों से निकलने वाला धुआं भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक रहता है। उस क्षेत्र के वातावरण में कई सूक्ष्म कीटाणु भी रहते हैं जो स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसीलिए श्मशान जाने के बाद स्नान करना जरूरी बताया गया है। रात के समय में स्नान करना भी स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है। इन्हीं कारणों के चलते रात के समय श्मशान के आसपास नहीं जाना चाहिए।
3. बुरे चरित्र वाले व्यक्ति से दूर रहना चाहिए
वैसे तो बुरे चरित्र वाले व्यक्ति से हमेशा ही दूर रहना चाहिए, लेकिन रात के समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए। बुरे चरित्र वाले लोग अधिकतर अधार्मिक और गलत कार्य रात के समय में ही करते हैं। ऐसे में यदि कोई सज्जन व्यक्ति इनके साथ रहेगा तो वह परेशानियों में उलझ सकता है। अत: इन लोगों से दूर रहना चाहिए।

जानिए क्रिसमस से जुडी परम्पराएं – कौन है सांता, क्यों सजाते है क्रिसमस ट्री

Know traditions associated with Christmas - Santa Who, why decorate the Christmas tree


खुशी और उत्साह का प्रतीक क्रिसमस ईसाई समुदाय का सबसे बड़ा त्योहार है। ईसाई समुदाय द्वारा यह त्योहार 25 दिसंबर को यीशु मसीह के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। क्रिसमस से जुुड़ी अनेक परंपराएं व रोचक बाते हैं जैसे क्रिसमस ट्री सजाना, संता का गिफ्ट बांटना व कार्ड भेेजना। ये परंपराएं क्यों है व कब से इनकी शुरुआत हुई आइए जानते हैं इन परंपराओं के बारे में खास बातें…

Interesting Facts


संत निकोलस यानी सांता (Saint Nicholas Santa) –
मान्यता है कि सांता का घर उत्तरी ध्रुव पर रहते और वे उडऩे वाले रेनडियर्स की गाड़ी पर चलते हैं। सांता का यह आधुनिक रूप 19वीं सदी से अस्तित्व में आया उसके पहले ये ऐसे नहीं थे। आज से डेढ़ हजार साल पहले जन्मे संत निकोलस को असली सांता और सांता का जनक माना जाता है, हालांकि संत निकोलस और जीसस के जन्म का सीधा संबंध नहीं रहा है फिर भी आज के समय में सांता क्लॉज क्रिसमस का अहम हिस्सा हैं। उनके बिना क्रिसमस अधूरा सा लगता है।

Santa Claus

संत निकोलस का जन्म तीसरी सदी में जीसस की मौत के 280 साल बाद मायरा में हुआ। वे एक रईस परिवार से थे। वे जब छोटे थे तभी उनके माता-पिता का देहांत हो गया। बचपन से ही उनकी प्रभु यीशु में बहुत आस्था थी। वे बड़े होकर ईसाई धर्म के पादरी (पुजारी) और बाद में बिशप बने। उन्हें जरूरतमंदों और बच्चों को गिफ्ट्स देना बहुत अच्छा लगता था। वे अक्सर जरूरतमंदों और बच्चों को गिफ्ट्स देते थे। संत निकोलस अपने उपहार आधी रात को ही देते थे, क्योंकि उन्हें उपहार देते हुए नजर आना पसंद नहीं था। वे अपनी पहचान लोगों के सामने नहीं लाना चाहते थे। इसी कारण बच्चों को जल्दी सुला दिया जाता।


क्रिसमस ट्री (Xmas Tree) –
कहा जाता है जब महापुरुष ईसा का जन्म हुआ तो उनके माता-पिता को बधाई देने आए। देवताओं ने एक सदाबहार फर को सितारों से सजाया। मान्यता है कि उसी दिन से हर साल सदाबहार फर के पेड़ को ‘क्रिसमस ट्री प्रतीक के रूप में सजाया जाता है। इसे सजाने की परंपरा जर्मनी में दसवीं शताब्दी के बीच शुरू हुई और इसकी शुरुआत करने वाला पहला व्यक्ति बोनिफेंस टुयो नामक एक अंग्रेज धर्मप्रचारक था।

इंग्लैंड में 1841 में राजकुमार पिंटो एलबर्ट ने विंजर कासल में क्रिसमस ट्री को सजावाया था। उसने पेड़ के ऊपर एक देवता की दोनों भुजाएं फैलाए हुए मूर्ति भी लगवाई, जिसे काफी सराहा गया। क्रिसमस ट्री पर प्रतिमा लगाने की शुरुआत तभी से हुई। पिंटो एलबर्ट के बाद क्रिसमस ट्री को घर-घर पहुंचाने में मार्टिन लूथर का भी काफी हाथ रहा। क्रिसमस के दिन लूथर ने अपने घर वापस आते हुए आसमान को गौर से देखा तो पाया कि वृक्षों के ऊपर टिमटिमाते हुए तारे बड़े मनमोहक लग रहे हैं।

Christmas day

मार्टिन लूथर को तारों का वह दृश्य ऐसा भाया कि उस दृश्य को साकार करने के लिए वह पेड़ की डाल तोड़ कर घर ले आया। घर ले जाकर उसने उस डाल को रंगबिरंगी पन्नियों, कांच एवं अन्य धातु के टुकड़ों, मोमबत्तियों आदि से खूब सजा कर घर के सदस्यों से तारों और वृक्षों के लुभावने प्राकृतिक दृश्य का वर्णन किया। वह सजा हुआ वृक्ष घर सदस्यों को इतना पसंद आया कि घर में हर क्रिसमस पर वृक्ष सजाने की परंपरा चल पड़ी।

क्रिसमस कार्ड की परंपरा (Tradition of Xmas Card) –
सबसे पहले कार्ड विलियम एंगले द्वारा सन् 1842 में भेजा गया था, क्योंकि वह क्रिसमस का मौका था। इसलिए इसे पहला क्रिसमस कार्ड माना जाता है। कहते हैं कि इस कार्ड में एक शाही परिवार की तस्वीर थी, लोग अपने मित्रों के स्वास्थ्य के लिए शुभकामनाएं देते हुए दिखाए गए थे और उस पर लिखा था विलियम एंगले के दोस्तों को क्रिसमस शुभ हो।


उस जमाने में चूंकि यह नई बात थी, इसलिए यह कार्ड महारानी विक्टोरिया को दिखाया गया। इससे खुश होकर उन्होंने अपने चित्रकार डोबसन को बुलाकर शाही क्रिसमस कार्ड बनवाने के लिए कहा और तब से क्रिसमस कार्डों की शुरुआत हो गई।

मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

हिन्दू परम्परायें और उनके वैज्ञानिक तर्क और फायदे



Interesting Facts


भारत परम्पराओं (Traditions) का देश है। हमारे देश में तरह तरह के रीति रिवाज और परम्परायें निभाई जाती हैं। और इन्ही परम्पराओं, रीति रिवाजों की वजह से दुनियां में भारत का एक अलग आकर्षण है। ये परम्परायें बहुत पुराने समय से चली आ रही हैं और ज्यादातर हिन्दू धर्म से जुड़ी दिखाई देती हैं। कुछ लोग इन्हें अन्धविश्वास (Superstition) मानते हैं। जबकि आज भी बहुत से लोग इन परम्पराओं को ऐसे ही निभा रहें हैं।



अगर आप इन परम्पराओं को गहराई से देखें और वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो आप पायेंगे कि हमारे ऋषि मुनियों और पूर्वजों ने गहन अध्ययन करके मनुष्य के लाभ के लिए इनको शुरू किया था। ये हमें स्वास्थ्य सम्बन्धी बहुत सी बीमारियों और समस्याओं से बचाती हैं। और इसे वैज्ञानिक भी प्रमाणित कर चुके हैं।

आज मैं आपके सामने ऐसी ही 15 परम्पराओं के बारे में बताने जा रहा हूँ जिनका अपना एक वैज्ञानिक आधार भी है और फायदे भी हैं।

Hindu traditions

1. व्रत रखना / उपवास रखना

हिन्दू धर्म में व्रत रखने का बहुत महत्व है। लोग, खासतौर पर महिलाएं अपनी अपनी श्रद्दा और आस्था के अनुसार अलग अलग देवी, देवताओं को मानते हैं और उनकी पूजा करते हैं। और फिर सप्ताह में एक दिन, या खास मौको या त्योहारों पर अपने देवी देवताओं के लिए व्रत रखते हैं। जिसमें वे पूरे दिन बगैर अन्न खाए सिर्फ फल खाकर ही रहते हैं। धर्म और मान्यता के अनुसार व्रत रखने से देवी, देवता प्रसन्न होते हैं तथा कष्टों और परेशानियों को दूर करके, मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं।

वैज्ञानिक तर्क :- धर्म और मान्यता के साथ साथ सप्ताह में एक दिन व्रत रखना वैज्ञानिक दृष्टि से भी फायदेमन्द है। आयुर्वेद के अनुसार व्रत रखने से और दिन भर में सिर्फ फल खाने से पाचन क्रिया को आराम मिलता है। जिससे पाचन तन्त्र (Digestion) ठीक रहता है और शरीर से हानिकारक तथा अवांछित तत्व बाहर निकल जाते हैं जिससे शरीर तथा स्वास्थ्य ठीक रहता है। एक शोध के अनुसार सप्ताह में एक दिन व्रत रखने से कैंसर, मधुमेह तथा ह्दय सम्बन्धी बीमारियों का खतरा कम होता है।
2. पैर छूना / चरण स्पर्श करना

हम अपने बड़ों, बुजुर्गो का सम्मान और उनका आदर करने के लिए उनके पैर छूते हैं। पैर छूना या चरण स्पर्श करना भारतीयों संस्कारो का एक हिस्सा है। जो सदियों से चला आ रहा है। यही संस्कार बच्चों को भी सिखाये जाते हैं ताकि वे भी अपने बड़ों का आदर करें और सम्मान करें।

वैज्ञानिक तर्क :- प्रत्येक मनुष्य के शरीर में मस्तिष्क से लेकर पैरों तक लगातार ऊर्जा का संचार होता है। जिसें कॉस्मिक ऊर्जा कहते हैं। जब हम किसी के पैर छूते हैं तब उस व्यक्ति के पैरों से होती हुई ऊर्जा हमारे शरीर में तथा हमारे हाथों से होते हुए उसके शरीर में पहुंचती है। और जब वह व्यक्ति आशीर्वाद देते समय हमारे सिर पर हाथ रखता है तब वह ऊर्जा दोबारा उसके हाथों से होती हुई हमारे शरीर में आती है। इस तरह पैर छूने से हमें दूसरे व्यक्ति की ऊर्जा मिलती है। जिससे नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है और हमारे अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। तथा मन को शांति मिलती है।
3. माथे पर तिलक लगाना

हिन्दू धर्म के अनुसार धार्मिक अवसरों, शादी-विवाह, त्यौहार या पूजा पाठ के समय चन्दन, कुमकुम या सिंदूर से माथे पर तिलक लगाया जाता है। हिन्दू परम्परा के अनुसार माथे पर तिलक लगाना बहुत ही शुभ माना गया है।

वैज्ञानिक तर्क :- मानव शरीर में दोनों आँखों के बीच में एक चक्र होता है। इसी चक्र पर तिलक लगाया जाता है। इस चक्र पर एक नस होती है जिससे पूरे चेहरे पर रक्त का संचार होता है। जब माथे पर तिलक लगाया जाता है तो उस चक्र पर ऊँगली या अंगूठे से दबाव बनता है जिससे वह नस ज्यादा सक्रिय हो जाती है और पूरे चेहरे की माँस पेशियों में बेहतर तरीके से रक्त संचार करती है। जिससे ऊर्जा का संचार होता है और एकाग्रता बढ़ती है तथा चेहरे पर रौनक आती है।
4. हाथ जोड़कर नमस्ते करना या हाथ जोड़ना

हिन्दू परम्परा तथा भारतीय संस्कृति के अनुसार किसी से मिलते समय या अभिवादन करते समय हाथ जोड़कर प्रणाम किया जाता है या पूजा पाठ के समय हाथ जोड़े जाते है। दरअसल हाथ जोड़ना सम्मान का प्रतीक है।

वैज्ञानिक तर्क :- हाथ जोड़ने पर हाथ की सभी अँगुलियों के सिरे एक दूसरे से मिलते हैं। जिससे उन पर दबाव पड़ता है। यह दबाव एक्यूप्रेशर का काम करता है। एक्यूप्रेशर चिकित्सा के अनुसार इसका सीधा असर हमारी आँखों, कानों तथा दिमाग पर पड़ता है। जिससे सामने वाला व्यक्ति हमें लम्बे समय तक याद रहता है।

इसका एक दूसरा तर्क यह भी है कि अगर आप हाथ मिलाने के बजाय हाथ जोड़कर अभिवादन करते हैं तो सामने वाले के शरीर के कीटाणु हम तक नही पहुंच पाते हैं। हाथ जोड़कर अभिवादन करने से एक दूसरे के हाथों का सम्पर्क नहीं हो पाता है जिससे बीमारी फ़ैलाने वाले वायरस तथा बैक्टीरिया हम तक नही पहुंच पाते हैं। और हम बीमारियों से बचे रहते हैं।
5. एक गौत्र में शादी नहीं करना

धार्मिक मान्यता के अनुसार समान गौत्र या कुल में शादी करना प्रतिबंधित है। मान्यता के अनुसार एक ही गौत्र का होने के कारण स्त्री पुरुष भाई बहन कहलाते हैं क्योंकि उनके पूर्वज एक ही हैं। इसलिए एक ही गौत्र में शादियाँ नहीं की जाती हैं। यह बात थोड़ी अजीब भी लगती हैं कि जिन स्त्री, पुरुष ने कभी एक दूसरे को देखा तक नहीं तथा अलग अलग जगहों पर तथा अलग अलग माहौल में पले बढ़े, फिर वे भाई, बहन कैसे बन गये?

वैज्ञानिक तर्क :- लेकिन इसका एक ठोस वैज्ञानिक तर्क है कि समान गौत्र का होने के कारण चाहे वे भाई बहन हों या ना हों लेकिन उनके गुणसूत्र (Chromosome) समान होते हैं। इसलिए अगर एक गौत्र के स्त्री, पुरुषों की शादी होती है तो उनके बच्चे अनुवांशिक (Genetic) बीमारियों के साथ पैदा होते हैं। ऐसे बच्चों में अनुवांशिक दोष जैसे मानसिक कमजोरी, अपंगता आदि गंभीर रोग जन्मजात ही पाए जाते हैं। ऐसे बच्चों की विचारधारा, व्यवहार आदि में कोई नयापन नही होता है। और उनमें रचनात्मकता का अभाव होता है। इसलिए अलग अलग गौत्र में शादी करने से स्त्री पुरुष के गुणसूत्र (Chromosome), जींस आपस में नही मिल पाते हैं जिससे उनके बच्चों में अनुवांशिक बीमारियों का खतरा नही होता है।
6. दक्षिण दिशा या पूर्व दिशा में सिर करके सोना

धर्मशास्त्रों के अनुसार सोते समय आपका सिर दक्षिण या पूर्व दिशा में होना चाहिए तथा आपके पैर उत्तर या पश्चिम दिशा में होने चाहिए। मान्यता के अनुसार ऐसा न करने पर बुरे सपने आते हैं और ये अशुभ होता है।

वैज्ञानिक तर्क :- पृथ्वी के दोनों ध्रुवों उत्तरी (North pole) तथा दक्षिण ध्रुव (South pole) में चुम्बकीय प्रवाह (Magnetic flow) होता है। उत्तरी ध्रुव पर धनात्मक (+) प्रवाह तथा दक्षिणी ध्रुव पर ऋणात्मक (-) प्रवाह होता है। उसी तरह मानव शरीर में भी सिर में धनात्मक (+) प्रवाह तथा पैरों में ऋणात्मक (-) प्रवाह होता है। विज्ञान के अनुसार दो धनात्मक (+) ध्रुव या दो ऋणात्मक (-) ध्रुव एक दूसरे से दूर भागते हैं। (चुम्बक से आप यह परीक्षण करके देख सकते हैं।)

इसलिए जब हम उत्तर दिशा की ओर सिर करके सोते हैं तो उत्तर की धनात्मक तरंग तथा सिर की धनात्मक तरंग एक दूसरे से दूर भागती हैं। जिससे हमारे दिमाग में हलचल होती है और बेचैनी बढ़ जाती है। जिससे अच्छे से नींद नही आती है और सुबह सोकर उठने के बाद भी शरीर में थकान रहती है। जिससे Blood Pressure अंसतुलित हो जाता है और मानसिक बीमारियाँ हो जाती हैं। तथा जब हम दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोते हैं तो दक्षिण की ऋणात्मक (-) तरंग तथा सिर की धनात्मक (+) तरंग आपस में मिल जाती हैं। जिससे चुम्बकीय प्रवाह आसानी से हो जाता है। और दिमाग में कोई हलचल नही होती है और अच्छी नींद आती है। और सुबह उठने पर तरोताजा महसूस करते हैं तथा मानसिक बीमारियों का खतरा नही होता है।

पूर्व दिशा में सूर्योदय होता है। जिससे सूर्योदय होने पर पूर्व दिशा की ओर पैर होने से सूर्य देव का अपमान होता है।

इसलिये हमेशा दक्षिण या पूर्व दिशा की ओर ही सिर करके सोना चाहिए |
7. जमीन पर बैठकर भोजन करना

पुराने समय में आज की तरह डाइनिंग टेबल नहीं थी इसलिए लोग जमीन पर आसन बिछाकर उस पर बैठकर भोजन करते थे। आज के समय में जमीन पर बैठकर भोजन करने की परंपरा लगभग ख़त्म सी हो गयी है लेकिन इसका एक ठोस वैज्ञानिक कारण भी है।

वैज्ञानिक तर्क :– पालथी लगाकर बैठना एक योग आसन है जिसे सुखासन कहते हैं। इस तरह बैठकर भोजन करने से एक तरह से योग होता है तथा पाचन क्रिया अच्छी रहती हैं और मोटापा, अपच, कब्ज , एसिडिटी आदि पेट की बीमारियाँ नहीं होती हैं तथा मन शांत रहता है।
8. भोजन की शुरुआत में तीखा खाना तथा अंत में मीठा खाना

भारतीय परम्परा के अनुसार धार्मिक अवसरों या शुभ अवसरों पर शुरुआत में तीखा खाना खाया जाता है तथा बाद में मीठा खाया जाता है। आज भी ज्यादातर लोग अपनी दैनिक दिनचर्या में खाना खाने के बाद मीठा खाते हैं। एक कहावत भी है कि “खाने के बाद कुछ मीठा हो जाये”।

वैज्ञानिक तर्क : – विज्ञान और आयुर्वेद के अनुसार शुरुआत में तीखा भोजन करने के बाद पेट में पाचन तत्व तथा अम्ल सक्रिय हो जाते हैं। जिससे पाचन तंत्र तेज जाता है। तथा खाने के बाद मीठा खाने से अम्ल की तीव्रता कम हो जाती है जिससे पेट में जलन या एसिडिटी नहीं होती है।
9. सूर्य को जल चढ़ाना

सूर्य को जल चढ़ाने की परम्परा बहुत पुराने समय से है। धर्म शास्त्रों के अनुसार सूर्यदेव को जल चढाने से सूर्यदेव प्रसन्न होते हैं और मनुष्य पर सूर्य का प्रकोप नहीं होता है और उसके राशि दोष ख़त्म हो जाते हैं।

वैज्ञानिक तर्क :– विज्ञान के अनुसार सूर्योदय के समय सूर्य की किरणें ज्यादा तेज नहीं होती है जो शरीर के लिए एक औषधि का काम करती हैं। उगते सूर्य को जल चढाने से तथा जल की धार में से सूर्य को देखने से सूर्य की किरणें जल में से छन कर हमारी आँखों तथा शरीर पर पड़ती हैं। जिससे आँखों की रौशनी तेज होती है तथा पीलिया, क्षय रोग, तथा दिल की बीमारियों का खतरा कम होता है। सूर्य की किरणों से विटामिन-डी भी प्राप्त होता है। इसके अलावा सुबह सुबह सूर्य को जल चढाने से शुद्ध ऑक्सीजन भी हमें मिलती है।
10. स्नान के बाद ही भोजन करना

शास्त्रों के अनुसार बिना स्नान किये भोजन करना वर्जित है। शास्त्रों के अनुसार स्नान करके पवित्र होकर ही भोजन करना चाहिए। बिना स्नान किये भोजन करना पशुओं के समान है और अपवित्र माना गया है। तथा ऐसा करने से देवी देवता अप्रसन्न हो जाते है।

वैज्ञानिक तर्क :- वैज्ञानिक दृष्टिकोण से स्नान करने से शरीर की गन्दगी निकल जाती है तथा शरीर में नई ताजगी तथा स्फूर्ति आती है। स्नान करने के बाद स्वभाविक रूप से भूख लगती है। उस समय भोजन करने से भोजन का रस शरीर के लिए पुष्टिवर्धक होता है।

जबकि स्नान करने से पूर्व खाना खाने से पेट की जठराग्नि उसे पचाने में लग जाती है। खाना खाने के बाद नहाने से शरीर ठंडा हो जाता है जिससे पेट की पाचन क्रिया मन्द पड़ जाती है और पाचन शक्ति कमजोर पड़ जाती तथा पेट के रोग हो जाते है।
11. धार्मिक कार्यो, शुभ अवसरों पर पूजा पाठ में हाथ पर कलावा बांधना

हिन्दू धर्म में प्रत्येक धार्मिक कार्य, शुभ अवसर या पूजा पाठ पर दाहिने हाथ में कलावा (मौली धागा) बाँधा जाता है। शास्त्रों के अनुसार हाथ पर कलावा बांधना शुभ होता है और इससे देवी देवता प्रसन्न होते हैं।

वैज्ञानिक तर्क :- विज्ञान के अनुसार दाहिने हाथ की कलाई में ऐसी नसे होती हैं जो दिमाग तक जाती है। उस जगह कलावा बाँधने से उन नसों पर दबाव पड़ता है जिससे दिमाग तक रक्त संचार सुचारू रूप से होता है जिससे दिमाग शांत रहता है। कलावा वात , कफ तथा पित्त जैसे रोग दोषों का खतरा भी कम करता है।
12. मासिक धर्म में स्त्रियों का मन्दिरों या धार्मिक कार्यो में जाना वर्जित होना

धर्म शास्त्रों के अनुसार स्त्रियों का मासिक धर्म (Periods) के दिनों में मन्दिर में जाना या किसी धार्मिक कार्य में भाग लेना पूर्णत वर्जित है। सनातन धर्म के अनुसार इन दिनों में स्त्रियों के शरीर से गन्दगी बाहर निकलती है जिससे उन्हें अपवित्र माना गया है। और उनको दूसरे लोगो से अलग रहने का नियम बनाया गया है। प्राचीन कल में महिलाओं को मासिक धर्म के समय कोप भवन में रहना पड़ता था और उस समय महिलाएं बाहर आना जाना नहीं करती थीं।

वैज्ञानिक तर्क :- विज्ञान भी इस बात को मानता है कि मासिक धर्म के समय महिलाओं के शरीर से गन्दगी निकलती है तथा एक विशेष प्रकार की तरंगे निकलती हैं। जो दूसरे लोगों के लिए हानिकारक होती है तथा उनसे संक्रमण फैलने का डर रहता है। इसलिये दूसरे लोगों को संक्रमण से बचाने के लिए ही स्त्रियों को इन दिनों में अलग रखे जाने की प्रथा शुरू हुई।

दूसरा कारण ये भी है कि मासिक धर्म के समय महिलाओं को अत्यधिक कमजोरी महसूस होती है। इसलिये इन्हें इन दिनों में घर के सभी कार्यो से दूर रखा जाता है ताकि उन्हें पर्याप्त आराम मिल सके।
13. कान छिदवाना

कान छिदवाना बहुत पुरानी परंपरा है। पुराने समय में ऋषि मुनि, राजा महाराजा कानों में कुंडल पहनते थे। आज के समय में कान छिदवाना एक फैशन बन गया है। जिसे सिर्फ भारत के लोग ही नहीं बल्कि विदेशों में भी लोग अपना रहे हैं। स्त्रियाँ श्रृंगार करने के लिए कान छिद्वाती हैं तथा कानों में कुंडल बालियाँ आदि पहनती हैं।

वैज्ञानिक तर्क :- वैज्ञानिक दृष्टिकोण के हिसाब से कान छिदवाना स्त्री व पुरुष दोनों के लिए लाभदायक है। कान में एक नस होती है जो दिमाग तक जाती है। कान छिदवाने से इस नस में रक्त संचार नियंत्रित रहता है। जिससे सोचने के शक्ति बढ़ती है तथा बोलने में होने वाली समस्या ख़त्म होती है और दिमाग शांत रहता है। पुरुषों के द्वारा कान छिदवाने से उनमे होने वाली हर्निया की बीमारी ख़त्म हो जाती है।
14. तुलसी के पौधे की पूजा करना

आज भी ज्यादातर घरों में तुलसी के पौधे की पूजा की जाती है। हिन्दू धर्म के अनुसार तुलसी की पूजा करने से घर में सुख समृद्धि तथा खुशहाली आती है।

वैज्ञानिक तर्क :- विज्ञानं के अनुसार तुलसी वातावरण को शुद्ध करता है। जिस घर में तुलसी का पौधा होता है उस घर का वातावरण शुद्ध होता है। तुलसी मच्छरों तथा कीटाणुओं को दूर भगाता है जिससे वायु शुद्ध होती है। इसके अलावा तुलसी में रोग प्रतिरोधी गुण होते हैं। इसकी पत्तियां खाने से शरीर का इम्यून सिस्टम मजबूत होता है तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
15. पीपल के पेड़ की पूजा

धार्मिक मान्यता के अनुसार रोजाना पीपल की पूजा करने से घर की सुख, समृद्धि बढती है तथा लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। शास्त्रों के अनुसार पीपल पर साक्षात ब्रम्हा, विष्णु और शिव निवास करते हैं। इस पर लक्ष्मी तथा पितरो का वास भी बताया गया है। इसलिये पीपल का वृक्ष पूजनीय है। शनिवार को पीपल की पूजा करने से शनि के प्रभाव से मुक्ति मिलती है।

वैज्ञानिक तर्क :- वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पीपल 24 घंटे ऑक्सीजन छोड़ता है जो प्राण वायु है और मानव जीवन के लिये बहुत जरूरी है। पीपल का वृक्ष गर्मी में शीतलता (ठण्डक) तथा सर्दी में उष्णता (गर्मी) प्रदान करता है। आयुर्वेद के अनुसार पीपल का हर भाग जैसे तना, पत्ते, छाल और फल सभी चिकित्सा के काम में आते हैं जिनसे कई गम्भीर रोगों का इलाज होता है।

एक दूसरा कारण इस वृक्ष को काटे जाने से बचाने का भी है। लोग इस वृक्ष को काटे नहीं, इसलिये इसकी पूजा का महत्व है। क्योंकि जीने के लिए ऑक्सीजन जरूरी है और सबसे ज्यादा ऑक्सीजन पीपल का वृक्ष ही देता है।

सोमवार, 19 दिसंबर 2016

भूलकर भी घर में इन जगहों पर ना रखें दर्पण

Keep these places in the house, forgetting the mirror





दर्पण हर किसी के घर में होना आम बात है। आप रोजाना इसके सामने खड़े होकर अपना चेहरा संवारते होंगे। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि क्या आपका दर्पण वास्तु के अनुसार सही स्थान पर रखा है? यह दर्पण गलत जगह पर रह कर आपकी आर्थिक परेशानी को बढ़ा रहा है। हालांकि आम तौर पर हम ऐसी भूल कर देते है। वास्तु व‌िज्ञान में सद‌ियों से दर्पण का प्रयोग होता आया है। वास्तु वैज्ञान‌िक दर्पण के प्रयोग से घर के वास्तु दोष को दूर करते आए हैं और इसे वास्तु दोष दूर करने वाला महत्वपूर्ण साधन के रूप में मानते हैं। इसल‌िए दर्पण के मामले में वास्तु संबंधी गलती से बचना चाह‌िए।

सप्ष्ट दर्पण का करें चुनाव
दर्पण का चुनाव करते समय सावधानी बरती चाहिए। दर्पण ऐसा होना चाह‌िए ज‌िसमें चेहरा साफ, स्पष्ट और वास्तव‌िक द‌िखे। धुंधला, व‌िकृत चेहरा द‌िखाने वाला दर्पण बहुत ही बुरा प्रभाव डालता है इससे रोग की वृद्ध‌ि होती है।


Interesting Facts

उत्तर-पूर्वी रखें दर्पण
उन्नत‌ि और लाभ के ल‌िए घर के उत्तर और पूर्वी दीवार की ओर दर्पण लगाएं। वास्तु व‌िज्ञान के अनुसार इस द‌िशा में लगा दर्पण व्यापार-व्यवसाय में घाटा, आर्थ‌िक नुकसान को दूर करके लाभ और धन वृद्ध‌ि में सहायक होता है।

गोल दर्पण लगाए
दर्पण ज‌ितना हल्का और बड़ा होता है वास्तु व‌िज्ञान के अनुसार यह उतना ही फायदेमंद होता है। घर में सुख समृद्ध‌ि बढ़ाने के ल‌िए घर के दरवाजे के सामने गोल दर्पण लगाना चाह‌िए।


Astrology

मुख्य द्वार पर न रखें दपर्ण
शयन कक्ष के दरवाजे के सामने दर्पण लगना जहां लाभप्रद होता है वहीं मुख्य द्वार के सामने दर्पण लगाने की भूल न करें इससे हान‌ि होती है। वास्तु व‌िज्ञान के अनुसार इससे सकारात्म उर्जा दर्पण से टकराकर लौट जाती है।


Jyotish Upay


शयन कक्ष में न रखें दपर्ण
शयन कक्ष में दर्पण नहीं लगाएं। वास्तु व‌िज्ञान के अनुसार इससे पत‌ि पत्नी के संबंध में व‌िश्वास की कमी आती है और मतभेद बढ़ता है।

शनिवार, 17 दिसंबर 2016

हिंदू विवाह में सात फेरे और सात वचन




विवाह एक ऐसा मौक़ा होता है जब दो इंसानो के साथ-साथ दो परिवारों का जीवन भी पूरी तरह बदल जाता है। भारतीय विवाह में विवाह की परंपराओं में सात फेरों का भी एक चलन है। जो सबसे मुख्य रस्म होती है। हिन्दू धर्म के अनुसार सात फेरों के बाद ही शादी की रस्म पूर्ण होती है। सात फेरों में दूल्हा व दुल्हन दोनों से सात वचन लिए जाते हैं। यह सात फेरे ही पति-पत्नी के रिश्ते को सात जन्मों तक बांधते हैं। हिंदू विवाह संस्कार के अंतर्गत वर-वधू अग्नि को साक्षी मानकर इसके चारों ओर घूमकर पति-पत्नी के रूप में एक साथ सुख से जीवन बिताने के लिए प्रण करते हैं और इसी प्रक्रिया में दोनों सात फेरे लेते हैं, जिसे सप्तपदी भी कहा जाता है। और यह सातों फेरे या पद सात वचन के साथ लिए जाते हैं। हर फेरे का एक वचन होता है, जिसे पति-पत्नी जीवनभर साथ निभाने का वादा करते हैं। यह सात फेरे ही हिन्दू विवाह की स्थिरता का मुख्य स्तंभ होते हैं।
सात फेरों के सात वचन

विवाह के बाद कन्या वर के वाम अंग में बैठने से पूर्व उससे सात वचन लेती है। कन्या द्वारा वर से लिए जाने वाले सात वचन इस प्रकार है।
प्रथम वचन



तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या:,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी !!

(यहाँ कन्या वर से कहती है कि यदि आप कभी तीर्थयात्रा को जाओ तो मुझे भी अपने संग लेकर जाना। कोई व्रत-उपवास अथवा अन्य धर्म कार्य आप करें तो आज की भांति ही मुझे अपने वाम भाग में अवश्य स्थान दें। यदि आप इसे स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ।)

किसी भी प्रकार के धार्मिक कृ्त्यों की पूर्णता हेतु पति के साथ पत्नि का होना अनिवार्य माना गया है। जिस धर्मानुष्ठान को पति-पत्नि मिल कर करते हैं, वही सुखद फलदायक होता है। पत्नि द्वारा इस वचन के माध्यम से धार्मिक कार्यों में पत्नि की सहभागिता, उसके महत्व को स्पष्ट किया गया है।
द्वितीय वचन



पुज्यौ यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या:,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम !!

(कन्या वर से दूसरा वचन मांगती है कि जिस प्रकार आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार मेरे माता-पिता का भी सम्मान करें तथा कुटुम्ब की मर्यादा के अनुसार धर्मानुष्ठान करते हुए ईश्वर भक्त बने रहें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ।)

Interesting Facts

यहाँ इस वचन के द्वारा कन्या की दूरदृष्टि का आभास होता है। आज समय और लोगों की सोच कुछ इस प्रकार की हो चुकी है कि अमूमन देखने को मिलता है--गृहस्थ में किसी भी प्रकार के आपसी वाद-विवाद की स्थिति उत्पन होने पर पति अपनी पत्नि के परिवार से या तो सम्बंध कम कर देता है अथवा समाप्त कर देता है। उपरोक्त वचन को ध्यान में रखते हुए वर को अपने ससुराल पक्ष के साथ सदव्यवहार के लिए अवश्य विचार करना चाहिए।
तृतीय वचन



जीवनम अवस्थात्रये मम पालनां कुर्यात,
वामांगंयामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृ्तीयं !!

(तीसरे वचन में कन्या कहती है कि आप मुझे ये वचन दें कि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं (युवावस्था, प्रौढावस्था, वृद्धावस्था) में मेरा पालन करते रहेंगे, तो ही मैं आपके वामांग में आने को तैयार हूँ।)
चतुर्थ वचन



कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थं !!

(कन्या चौथा वचन ये माँगती है कि अब तक आप घर-परिवार की चिन्ता से पूर्णत: मुक्त थे। अब जबकि आप विवाह बंधन में बँधने जा रहे हैं तो भविष्य में परिवार की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व आपके कंधों पर है। यदि आप इस भार को वहन करने की प्रतीज्ञा करें तो ही मैं आपके वामांग में आ सकती हूँ।)

इस वचन में कन्या वर को भविष्य में उसके उतरदायित्वों के प्रति ध्यान आकृ्ष्ट करती है। विवाह पश्चात कुटुम्ब पौषण हेतु पर्याप्त धन की आवश्यकता होती है। अब यदि पति पूरी तरह से धन के विषय में पिता पर ही आश्रित रहे तो ऐसी स्थिति में गृहस्थी भला कैसे चल पाएगी। इसलिए कन्या चाहती है कि पति पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर होकर आर्थिक रूप से परिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ति में सक्षम हो सके। इस वचन द्वारा यह भी स्पष्ट किया गया है कि पुत्र का विवाह तभी करना चाहिए जब वो अपने पैरों पर खडा हो, पर्याप्त मात्रा में धनार्जन करने लगे।
पंचम वचन



स्वसद्यकार्ये व्यवहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्त्रयेथा,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: पंचमत्र कन्या !!

(इस वचन में कन्या जो कहती है वो आज के परिपेक्ष में अत्यंत महत्व रखता है। वो कहती है कि अपने घर के कार्यों में, विवाहादि, लेन-देन अथवा अन्य किसी हेतु खर्च करते समय यदि आप मेरी भी मन्त्रणा लिया करें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ।)

यह वचन पूरी तरह से पत्नि के अधिकारों को रेखांकित करता है। बहुत से व्यक्ति किसी भी प्रकार के कार्य में पत्नी से सलाह करना आवश्यक नहीं समझते। अब यदि किसी भी कार्य को करने से पूर्व पत्नी से मंत्रणा कर ली जाए तो इससे पत्नी का सम्मान तो बढता ही है, साथ साथ अपने अधिकारों के प्रति संतुष्टि का भी आभास होता है।
षष्ठम वचनः



न मेपमानमं सविधे सखीनां द्यूतं न वा दुर्व्यसनं भंजश्चेत,
वामाम्गमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम !!

(कन्या कहती है कि यदि मैं अपनी सखियों अथवा अन्य स्त्रियों के बीच बैठी हूँ तब आप वहाँ सबके सम्मुख किसी भी कारण से मेरा अपमान नहीं करेंगे। यदि आप जुआ अथवा अन्य किसी भी प्रकार के दुर्व्यसन से अपने आप को दूर रखें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ।)

वर्तमान परिपेक्ष्य में इस वचन में गम्भीर अर्थ समाहित हैं। विवाह पश्चात कुछ पुरुषों का व्यवहार बदलने लगता है। वे जरा जरा सी बात पर सबके सामने पत्नी को डाँट-डपट देते हैं। ऐसे व्यवहार से पत्नी का मन कितना आहत होता होगा। यहाँ पत्नी चाहती है कि बेशक एकांत में पति उसे जैसा चाहे डांटे किन्तु सबके सामने उसके सम्मान की रक्षा की जाए, साथ ही वो किन्हीं दुर्व्यसनों में फँसकर अपने गृ्हस्थ जीवन को नष्ट न कर ले।
सप्तम वचनः


परस्त्रियं मातृसमां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कुर्या,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तममत्र कन्या !!

(अन्तिम वचन के रूप में कन्या ये वर मांगती है कि आप पराई स्त्रियों को माता के समान समझेंगें और पति-पत्नि के आपसी प्रेम के मध्य अन्य किसी को भागीदार न बनाएंगें। यदि आप यह वचन मुझे दें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ।)

विवाह पश्चात यदि व्यक्ति किसी बाह्य स्त्री के आकर्षण में बँध पगभ्रष्ट हो जाए तो उसकी परिणिति क्या होती है। इसलिए इस वचन के माध्यम से कन्या अपने भविष्य को सुरक्षित रखने का प्रयास करती है।

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

कपूर के यह उपाय आपको बना देंगे मालामाल

This measure will make you rich Kapoor
रात के समय में चांदी की कटोरी में कपूर और लौंग को जलाएं। इस टोटके को कुछ दिनों तक रोज करें। यह उपाय आपको धन से मालामाल कर देगा। पैसों की कमी भी नहीं रहेगी।
जब हजार कोशिशों के बाद भी काम नहीं बनते हैं तो एैसे में कपूर आपकी किस्मत के ताले को खोल सकता है।

शनिवार के दिन कपूर के तेल की बूंदों को पानी में डालें और फिर इस पानी से रोज स्नान करें। यह टोटका आपकी बंद किस्मत को खोलता है। और आपको बीमारियों से भी बचाता है। दुर्घटना कभी भी हो सकती है। एैसे में बचाव बहुत ही जरूरी है।

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आप रात के समय में कपूर को जलाकर हनुमान चालीसा का पाठ करें। इस अचूक टोटके से इंसान किसी भी तरह की प्राकृतिक व अप्राकृतिक दुर्घटना से बचता रहता है।

आपके कई काम इसलिए नहीं बनते हैं क्योंकि इसके पीछे वास्तुदोष होता है। वास्तुदोष को खत्म करने के लिए घर में कपूर की दो गोली रखें। और जब यह गल जाएं फिर दो गोलियां रख दें। एैसा आप समय समय पर करते रहें या बदलते रहें। इससे वास्तुदोष खत्म हो जाएगा।

Interesting Facts

यदि आपके घर में परेशानी रहती हो तो कपूर को घी में भिगाएं और सुबह और शाम के समय में इसे जलाएं। इससे निकलने वाली उर्जा से घर के अंदर सकारात्मक उर्जा आती है जिससे घर में शांति बनी रहती है। 


यदि विवाह में किसी भी तरह की समस्या आ रही हो तो आप 6 कपूर के टुकडे और 36 लौंग के टुकडे लें। अब इसमें चावल और हल्दी को मिला लें। इसके पश्चात आप देवी दुर्गा को इससे आहुति दें। इस टोटके से शादी जल्दी होती है।


गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

यहां सास पिलाती है दूल्हे को शराब, तभी होती है शादी

The mother feeds the groom wine, is only marriage

छत्तीसगढ के कवर्धा जिले में एक अनूठी परंपरा के तहत बैगा-आदिवासियों के विवाह में दूल्हे को दुल्हन की मां शराब पिलाकर रस्म की शुरुआत करती है और इसके बाद पूरा परिवार इसका सेवन करता है। यही नहीं, दूल्हा और दुल्हन भी एक-दूसरे को शराब पिलाकर इस परंपरा का निर्वहन करते हैं। इसके बाद पूरे गांव में शादी का जश्न मनाया जाता है। 

अगर आप सोच रहे हैं कि शराब बुरी चीज है और शादी-ब्याह जैसे मांगलिक कार्य में इसका क्या काम, तो आप गलत हैं। बैगा-आदिवासियों का समुदाय इस पूरे मामले में पूरी तरह से अलग है, क्योंकि इस समुदाय में शादी-ब्याह से लेकर मातम में भी शराब का सेवन किया जाता है।
जिले के सुदूर वनांचल में निवासरत बैगा-आदिवासी परिवार में अब शादी का सिलसिला शुरू हो जाएगा। शादी पर्व का इन परिवारों को बेसब्री से इंतजार होता है। 


Interesting Facts

शादी पर्व में बाराती और घराती तो शराब पीते ही हैं, साथ ही दूल्हा-दुल्हन को भी शराब का शगुन करना बेहद जरूरी होता है। बारात जब दुल्हन लेने गांव पहुंचती है तो सबसे पहले शराब का ही शगुन किया जाता है। खुद दुल्हन की मां दूल्हे को अपने हाथ से शराब पिलाती है। इसके बाद दूल्हे और दुल्हन की बारी आती है और वे भी एक-दूसरे को शराब पिलाते हैं।

बैगा समुदाय को करीब से जानने वाले चंद्रशेखर शर्मा बताते हैं कि बैगा आदिवासियों की शादी में कोई पंडित नहीं होता और न ही कोई विशेष सजावट होती है। यहां तक दहेज प्रथा भी पूरी तरह से बंद है। यहां चलता है तो केवल महुए से बनी शराब। 

यही इनके लिए सब कुछ होता है। चंद्रशेखर बताते हैं कि महंगाई के इस दौर में आज भी परिवार का मुखिया शादी का खर्च महज 22 रुपये ही लेता है। वहीं समाज के पंचों को 100 रुपये दिए जाते हैं। वनांचल में निवासरत बैगा शादी रचाने और दुल्हन लाने के लिए आज भी पूरी बारात मीलों दूर पैदल चलकर जाती है। 

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शादी का पंडाल भी पेड़ों की पत्तियों से बनाया जाता है। तमाम सामाजिक रस्मों को पूरा करने के बाद दूल्हा दौड़ लगाकर अपनी दुल्हन को पकड़ लेता है और उसे अपनी अंगूठी पहना देता है। आदिवासी बैगा समुदाय में किसी भी जश्न या मातम में शराब परोसना अनिवार्य है। बैगा इस प्रचलित मान्यता को लेकर चर्चा में रहते हैं।

बुधवार, 14 दिसंबर 2016

इस मूर्ति को रखने मात्र से हो जाएंगे बिजनेस में वारे-न्यारे

The statue will be the only business in keeping Ware-separation


अगर आप धंधे और व्यवसाय में जबरदस्त बढोतरी चाहते हैं तो उस जगह पर चीन के गुआन गोंग या कुआन कुंग की मूर्ति को रखना शुरू कर दें। फिर देखें चमत्‍कार-
 

vastu tips

गुआन गोंग को वॉर हीरो माना जाता है। यही वजह है कि इस यौद्धा की मूर्ति को बिजनेसमैन अपने ऑफिस में रखते हैं।

यह न केवल सकारात्मक ऊर्जा देती है, बल्कि बिजनेस को बुरी नजर से भी बचाती है।

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वास्तु के अनुसार इसे फ्रंट रिसेप्शन डेस्क पर रखा जाना चाहिए। इसे वर्क एरिया के पीछे की ओर भी रखा जा सकता है। यह मूर्ति मेटल और क्ले में भी मिल जाती है। बेहतर होगा कि पीतल की मूर्ति रखी जाए।

Interesting Facts


ध्यान रहे कि इसे किचन या बाथरूम में नहीं रखा जाए। घर में उत्तर-पश्चिम दिशा सबसे उपयुक्त है। साथ ही यह स्थान ऐसा होना चाहिए, जहां सभी की नजरें पड़ती हों।

मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

अदभुत रहस्य :- आखिर क्यों निगला सीताजी ने लक्ष्मण को



एक समय की बात है मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम रावण का वध करके भगवती सीता के साथ अवधपुरी वापस आ गए । अयोध्या को एक दुल्हन की तरह से सजाया गया और उत्सव मनाया गया ।उत्सव मनाया जा रहा था तभी सीता जी को यह ख्याल आया की वनवास जाने से पूर्व मां सरयु से वादा किया था कि अगर पुन: अपने पति और देवर के साथ सकुशल अवधपुरी वापस आऊंगी तो आपकी विधिवत रूप से पूजन अर्चन करूंगी ।


Interesting News


यह सोचकर सीता जी ने लक्ष्मण को साथ लेकर रात्रि में सरयू नदी के तट पर गई। सरयु की पूजा करने के लिए लक्ष्मण से जल लाने के लिए कहा ,! लक्ष्मण जी जल लाने के लिए घडा लेकर सरयू नदी में उतर गए।


जल भर ही रहे थे कि तभी-सरयू के जल से एक अघासुर नाम का राक्षस निकला जो लक्ष्मण जी को निगलना चाहता था ।लेकिन तभी भगवती सीता ने यह दृश्य देखा :—-और लक्ष्मण को बचाने के लिए माता सीता ने अघासुर के निगलने से पहले स्वयं लक्ष्मण को निगल गई ।

लक्ष्मण को निगलने के बाद सीता जी का सारा शरीर जल बनकर गल गया (यह दृश्य हनुमानजी देख रहे थे जो अद्रश्य रुप से सीता जी के साथ सरयू तट पर आए थे ) उस तन रूपी जल को श्री हनुमान जी घड़े में भरकर भगवान श्री राम के सम्मुख लाए। और सारी घटना कैसे घटी यह बात हनुमान जी ने श्री राम जी से बताई ।


मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी हँसकर बोले:– -हे मारूति सुत सारे राक्षसों का बध तो मैने कर दिया लेकिन ये राक्षस मेरे हाथों से मरने वाला नही है । इसे भगवान भोलेनाथ का वरदान प्राप्त है कि जब त्रेतायुग में सीता और लक्ष्मण का तन एक तत्व में बदल जायेगा तब उसी तत्व के द्वारा इस राक्षस का बध होगा । और वह तत्व रूद्रावतारी हनुमान के द्वारा अस्त्र रूप में प्रयुक्त किया जाये ।

सो हनुमान इस जल को तत्काल सरयु जल में अपने हाथों से प्रवाहित कर दो। इस जल के सरयु के जल में मिलने से अघासुर का बध हो जायेगा और सीता तथा लक्ष्मण पुन:अपने शरीर को प्राप्त कर सकेंगे ।


हनुमान जी ने घडे के जल को आदि गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित करके सरयु जल में डाल दिया ।
घडे का जल ज्यों ही सरयु जल में मिला त्यों ही सरयु के जल में भयंकर ज्वाला जलने लगी उसी ज्वाला में अघासुर जलकर भस्म हो गया ।

और सरयु माता ने पुन: सीता तथा लक्ष्मण को नव-जीवन प्रदान किया ।
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अवधपुरी मम् पुरी सुहावन ।
उत्तर दिश बह सरयु पावन ।।
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|| राम ||

सोमवार, 12 दिसंबर 2016

गीता में लिखी है कलियुग से जुड़ी ये बातें, आज हो रहीं सच

Kaliyuga is attached to these things written in the Gita, remained true today





श्रीमद्भागवत पुराण हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है। इस ग्रंथ की रचना आज से लगभग 5000 साल पहले कर दी गई थी। आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि कलयुग में क्या-क्या घटित होगा इसकी भविष्यवाणी भागवत पुराण में पहले कर दी गई थी। जानिए श्रीमद्भागवत पुराण में की गई कलियुग से जुड़ी कुछ भविष्यवाणियां..


Interesting Facts


श्लोक 1-
ततश्चानुदिनं धर्मः सत्यं शौचं क्षमा दया ।
कालेन बलिना राजन् नङ्‌क्ष्यत्यायुर्बलं स्मृतिः ॥

अर्थ- धर्म, सत्यवादिता, स्वच्छता, सहिष्णुता, दया, जीवन की अवधि, शारीरिक शक्ति और स्मृति सभी दिन-ब-दिन घटती जाएगी।




श्लोक 2-
वित्तमेव कलौ नॄणां जन्माचारगुणोदयः ।
धर्मन्याय व्यवस्थायां कारणं बलमेव हि ॥


अर्थ- कलयुग में जिस व्यक्ति के पास जितना धन होगा वो उतना गुणी माना जाएगा और कानून, न्याय केवल एक शक्ति के आधार पर लागू किया जाएगा।

श्लोक 3-
दाम्पत्येऽभिरुचिर्हेतुः मायैव व्यावहारिके ।
स्त्रीत्वे पुंस्त्वे च हि रतिः विप्रत्वे सूत्रमेव हि ॥


अर्थ- इस युग में पुरुष-स्त्री बिना विवाह के ही केवल एक-दूसरे में रूचि के अनुसार साथ रहेंगे। व्यापार की सफलता छल पर निर्भर करेगी। कलयुग में ब्राह्मण सिर्फ एक धागा पहनकर ब्राह्मण होने का दावा करेंगे।

श्लोक 4-
लिङ्‌गं एवाश्रमख्यातौ अन्योन्यापत्ति कारणम् ।
अवृत्त्या न्यायदौर्बल्यं पाण्डित्ये चापलं वचः ॥


अर्थ- जो मनुष्य घूस देने या धन खर्च करने में असमर्थ होगा, उसे अदालतों से ठीक-ठाक न्याय न मिल सकेगा। जो व्यक्ति बहुत चालाक और स्वार्थी होगा वो इस युग में बहुत विद्वान माना जाएगा।

श्लोक 5-
क्षुत्तृड्भ्यां व्याधिभिश्चैव संतप्स्यन्ते च चिन्तया ।
त्रिंशद्विंशति वर्षाणि परमायुः कलौ नृणाम्

अर्थ- लोग भूख-प्यास और कई तरह की चिंताओं से दुखी रहेंगे। कई तरह की बीमारियां उन्हें हर समय घेरे रहेगी। कलियुग में मनुष्य की उम्र केवल बीस या तीस वर्ष की होगी।

श्लोक 6-
दूरे वार्ययनं तीर्थं लावण्यं केशधारणम् ।
उदरंभरता स्वार्थः सत्यत्वे धार्ष्ट्यमेव हि ॥

अर्थ- लोग दूर के नदी-तालाबों को तो तीर्थ मानेंगे, लेकिन अपने पास रह रहे माता-पिता की निंदा करेंगे। सिर पर बड़े-बड़े बाल रखना ही सुंदरता मानी जायेगी और केवल पेट भरना ही लोगो का लक्ष्य होगा।

श्लोक 7-
अनावृष्ट्या विनङ्‌क्ष्यन्ति दुर्भिक्षकरपीडिताः
शीतवातातपप्रावृड् हिमैरन्योन्यतः प्रजाः ॥

अर्थ- कभी बारिश न होगी, सूखा पड़ जाएगा। कभी कड़ाके की सर्दी पड़ेगी तो कभी भीषण गर्मी हो जायेगी। कभी आंधी आएगी तो कभी बाढ़ आ जाएगी। इन परिस्तिथियों से लोग परेशान होंगे और नष्ट होते जाएंगे।

श्लोक 8-
अनाढ्यतैव असाधुत्वे साधुत्वे दंभ एव तु ।
स्वीकार एव चोद्वाहे स्नानमेव प्रसाधनम् ॥

इस युग में जिस व्यक्ति के पास धन नहीं होगा वो अधर्मी, अपवित्र और बेकार माना जाएगा। विवाह दो लोगों के बीच बस एक समझौता होगा और लोग बस स्नान करके समझेंगे की वो अंतरात्मा से शुद्ध हो गए हैं।

श्लोक 9-
दाक्ष्यं कुटुंबभरणं यशोऽर्थे धर्मसेवनम् ।
एवं प्रजाभिर्दुष्टाभिः आकीर्णे क्षितिमण्डले ॥

धर्म-कर्म के काम केवल लोगों के सामने अच्छा दिखने और दिखावे के लिए किए जाएगे। पृथ्वी भ्रष्ट लोगों से भर जाएगी और लोग सत्ता हासिल करने के लिए एक दूसरे को मारेंगे।

श्लोक 10-
आच्छिन्नदारद्रविणा यास्यन्ति गिरिकाननम् ।
शाकमूलामिषक्षौद्र फलपुष्पाष्टिभोजनाः ॥

अकाल और अत्याधिक करों के कारण परेशान लोग घर छोड़ सड़कों व पहाड़ों पर रहने को मजबूर हो जाएंगे, साथ ही पत्ते, जड़, मांस, जंगली शहद, फूल और बीज खाने को मजबूर हो जाएंगे।

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

सुबह-सुबह ही कर लेना चाहिए ये एक काम, मिलेंगे 10 फायदे

अच्छे स्वास्थ्य के लिए रोज नहाना बहुत जरूरी है। ये बात तो सभी जानते हैं, लेकिन सुबह जल्दी नहाने से 10 अलग-अलग लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं, ये बात कम लोग ही जानते हैं। यहां जानिए शास्त्रों के अनुसार रोज सुबह जल्दी नहाने से कौन-कौन से 10 लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं...
These should work in the early morning, will benefit 10

स्नान करते समय ध्यान रखें ये बातें
स्नान करते समय शरीर को टॉवेल से अच्छी तरह रगड़ना चाहिए, ताकि शरीर का मैल अच्छी तरह उतर जाए। समय-समय पर तेल मालिश भी करनी चाहिए। ऐसा करने पर त्वचा की चमक लंबे समय तक बनी रहती है और त्वचा से संबंधित बीमारियां नहीं होती हैं।
नहाने के लिए सुबह-सुबह का समय श्रेष्ठ बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त यानी ठीक सूर्योदय के समय जो लोग स्नान करते हैं, उन्हें अक्षय पुण्य के साथ ही स्वस्थ और शक्तिशाली शरीर प्राप्त होता है। महालक्ष्मी और अन्य देवी-देवताओं की कृपा बनी रहती है।  body tips
इस श्लोक में लिखें हैं सुबह जल्दी नहाने से प्राप्त होने वाले10लाभ
गुणा दश स्नान परस्य साधो रूपञ्च तेजश्च बलं च शौचम्।
आयुष्यमारोग्यमलोलुपत्वं दु:स्वप्रनाशश्च यशश्च मेधा:।।  health tips
1.इस श्लोक के अनुसार जो लोग सुबह जल्दी स्नान करते हैं, उन्हें पहला लाभ ये मिलता है कि वे सदैव सुंदर बने रहते हैं। ऐसे लोग लंबे समय तक जवान नजर आते हैं।
2. ऐसे स्नान से व्यक्ति के तेज में वृद्धि होती है। तेज यानी चमक। त्वचा का आकर्षण बढ़ता है।
3.सुबह जल्दी स्नान से शरीर शक्तिशाली बनता है। रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है और कई मौसमी बीमारियों से बचाव होता है।
4. सुबह जल्दी नहाने के लिए जल्दी उठना होता है, इस कारण वैवारिक पवित्रता बढ़ती है। गलत विचार नष्ट होते हैं। अधिकांश परिस्थितियों में सुबह-सुबह के समय में विचारों की पवित्रता भंग होती है।
5. जल्दी नहाएंगे तो रोग प्रतिरोधी क्षमता बढ़ेगी और इस कारण हमें श्रेष्ठ स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होंगे।
6. जल्दी उठेंगे तो मानसिक शक्ति भी बढ़ेगी, बुद्धि का विकास होगा। बुद्धि के विकास से परिस्थितियों के अनुसार सही निर्णय लेने की क्षमता भी बढ़ेगी।
7. जो लोग सुबह-सुबह सोते रहते हैं, उन्हें बुरे सपनों का सामना करना पड़ता है। ब्रह्म मुहूर्त में बिस्तर छोड़ देने से अशुद्ध विचार और बुरे सपनों से मुक्ति मिल जाती है।
8. आलस्य दूर होता है। सुबह जल्दी जागने और नहाने का ये ऐसा लाभ है जो तत्काल प्राप्त होता है। जल्दी जागने से पूरे दिन आलस्य से मुक्ति मिलती है, काम करने के लिए श्रेष्ठ शक्ति प्राप्त होती है।
9. जल्दी उठेंगे तो स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होंगे, ये लाभ मिलेंगे तो हमारी आयु भी बढ़ेगी।
10. शास्त्रों की मान्यता है कि जल्दी नहाने वाले व्यक्ति को घर-परिवार और समाज में मान-सम्मान की प्राप्ति होती है। जल्दी नहाएंगे तो दिन की शुरुआत जल्दी हो जाएगी, काम करने के लिए अधिक समय मिलेगा, काम सही होगा तो स्वत: ही सम्मान प्राप्त होगा।

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

बेटा चाहिए तो करनी पडेगी इस मंदिर में चोरी

Then will have a son in the temple theft


अगर आप संतान सुख से वंचित हैं और दर-दर की ठोकरें खाकर परेशान हो चुके हैं, तो परेशान ना हों। देवभूमि उत्तराखंड में एक ऐसा चमत्कारी मंदिर हैं, जहां के बारे में कहा जाता है कि मंदिर में लकडी का गुटका चोरी करने से पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है।
उत्तराखंड के चूडीवाला गांव में सिद्धपीठ चूड़ामणि देवी का एक चमत्कारी मंदिर स्थित है। लोगों का मानना है कि यहां आने वाली हर दंपति की मुरादें पूरी होती हैं। चूड़ामणि देवी के मंदिर में मान्यता है कि यहां चोरी करने पर ही मुरादें पूरी होंगी। इस मंदिर का निर्माण 1805 में लंढौरा रियासत के राजा द्वारा किया गया था।

Interesting Facts

यहां के बारे में प्रचलित कथा है कि माता सती के पिता राजा दक्ष प्रजापति द्वारा आयोजित यज्ञ में भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किए जाने से नाराज माता सती ने यज्ञ में कूदकर यज्ञ को विध्वंस कर दिया था। भगवान शिव जब माता सती के मृत शरीर को लेकर जा रहे थे, तब माता का चूड़ा इस घनघोर जंगल में गिर गया था, जिसके बाद यहां पर माता की पिंडी स्थापित होने के साथ ही भव्य मंदिर का निर्माण किया गया।

यह प्राचीन सिद्ध पीठ मंदिर कालांतर से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। मान्यता यह है कि अगर आप पुत्र की चाह रखते हैं, तो ऐसे में आपको मंदिर में आकर माता के चरणों में रखा लोकड़ा (लकड़ी का गुटका) चोरी करके अपने साथ ले जाना होता है। उसके बाद घर में बेटे की मुराद पूरी हो जाए तो फिर आपको वहां जाकर माथा टेकना होता है।

rochak news

साथ ही दंपती यहां से चोरी कर ले गए लोकड़े के साथ ही एक अन्य लोकड़ा भी अपने पुत्र के हाथों देवी के चरणों में चढ़वाते हैं। आज जहां माता का भव्य मंदिर बना हुआ है। कभी वहां घनघोर जंगल हुआ करता था। जहां शेरों की दहाड़ सुनाई पड़ती थी। पुराने जानकार बताते हैं कि माता की पिंडी पर रोजाना शेर भी मत्था टेकने के लिए आते थे।

गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

11 पीपल के पत्ते दूर कर सकते हैं पैसों की तंगी


Interesting Facts

यदि आप पैसे की तंगी को लेकर परेशान है तो अब आपको परेशान होने की जरुरत नहीं है बस श्रद्धा और विश्वास के साथ नीचे दिए गए उपाय को हर मंगलवार और शनिवार को करें निश्चित ही आपकी समस्या धीरे-धीरे समाप्त हो जाएंगी।
People can remove the leaves 11 cash-strapped

हर मंगलवार व शनिवार को सुबह उठे उसके बाद नित्यक्रम के बाद स्नानादि कर लें तत्पश्चात किसी पीपल के पेड़ से 11 पत्ते तोड़ लें। पत्ते तोड़ते समय यह ध्यान रहे कि पत्ते कहीं से टूटे या फटे नहीं होने चाहिए क्योंकि फटे पत्ते खंडित माने जाते हैं। अब इन पत्तों को साफ़ पानी से धोलें उसके बाद इन पत्तों पर कुमकुम या चन्दन से श्रीराम का नाम लिखें।

Jyotish Upay, 


उसके बाद इन पत्तों की एक माला बनाएं। अब इस माला को पास के किसी हनुमान मंदिर में जाकर उनको पहना दें। ध्यान रहे ऐसा करने के बाद कोई भी अधार्मिक कार्य न करें वर्ना यह टोटका निष्फल भी जा सकता है। 


Astrology


सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार शरीर का रंग भी बताता है आपका नेचर

Palmistry, the body tells you the color of Nature


भगवान ने प्रत्येक मनुष्य का शरीर अलग बनाया है। प्रत्येक इंसान के चेहरा अलग होता है। उसकी कद-काठी भिन्न होती है। यहां तक की उनकी त्वचा का रंग भी अलग होता है। किसी की त्वचा का रंग काला होता है तो किसी का गोरा। अधिकांश लोगों की त्वचा का रंग सांवला ही होता है। मनुष्य के शरीर की प्रकृति, बनावट तथा डील-डोल के आधार पर उसके स्वभाव व चरित्र के बारे में काफी कुछ जाना जा सकता है। इस विद्या को सामुद्रिक शास्त्र या शरीर लक्षण विज्ञान भी कहते हैं।
jyotish
सामुद्रिक शास्त्र के विद्वानों के अनुसार शरीर के रंग के आधार पर भी मनुष्य के स्वभाव के बारे में जाना जा सकता है। स्थान, प्रकृति तथा अनुवांशिकता के अनुसार मनुष्य का शरीर मुख्य रूप से तीन रंगों का होता है, जिन्हें हम साधारण बोलचाल की भाषा में गोरा, गेहुंआ (सांवला) व काला कहते हैं। इनके आधार पर हम किसी भी मनुष्य के स्वभाव का आंकलन कर सकते हैं। आइए जानते है किस रंग के लोग कैसे स्वभाव वाले होते हैं-

Interesting Facts
1. समुद्र शास्त्र के अनुसार, काले रंग के लोग हेल्दी, मेहनत करने वाले व गुस्से वाले होते हैं। इनका बौद्धिक विकास कम होता है, जिसके परिणामस्वरूप वे सभी सामाजिक परंपराओं, संस्कारों एवं मर्यादाओं से दूर, उत्तेजित, हिंसक, कामी, हठी एवं आक्रामक तथा अपराधी प्रवृत्ति के बन जाते हैं।

2. एकदम काले रंग से प्रभावित स्त्रियों के संबंध में समुद्र शास्त्र में वर्णन है कि अत्यधिक काले रंग के नेत्र, त्वचा, रोम, बाल, होंठ, तालु एवं जीभ आदि जिन स्त्रियों के हों, वे निम्न वर्ग में आती है। इस वर्ण की स्त्रियां स्वामीभक्त और बात को अंत तक निभाने वाली व साहसी होती हैं। रति में पूर्ण सहयोग और आनन्द देती हैं। विश्वसनीय, सही रास्ता दिखाने वाली और प्यार में बलिदान देने वाली होती हैं। इनके प्यार में धूप सी गर्मी व चंद्रमा सी शीतलता पाई जाती है। यही इनका गुण होता है।


3. समुद्र शास्त्र के अनुसार, गोरे रंग के लोगो में मुख्य रूप से दो भेद होते हैं हैं। प्रथम में लाल एवं सफेद रंग का मिश्रण होता है जिसे हम गुलाबी कहते हैं। ऐसे लोग अच्छे स्वभाव वाले, बुद्धिमान, साधारण परिश्रमी, रजोगुणी एवं अध्ययन तथा विचरण प्रेमी होते हैं। ऐसे लोग दिखने में सुंदर तथा आकर्षक होते हैं तथा सभी को अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम होते हैं।

4. गोरे रंग के दूसरे भेद में लाल व पीले रंग का मिश्रण होता है, जिसे पिंगल कहा जाता है। ऐसे लोग मेहनत करने वाले, धैर्यवान, सौम्य, गंभीर, रजोगुणी, भोगी, समृद्ध एवं व्यवहार कुशल होते हैं। देखने में आता है कि ऐसे लोग बीमार रहते हैं तथा इन्हें रक्त संबंधी बीमारी अधिक होती है।


5. विद्वानों की मान्यता है कि सफेद या पीले रंग से संयुक्त लाल रंग के नाखून, तालू, जीभ, होंठ, करतल तथा पदतल वाली स्त्री धन-धान्य से युक्त, उदार एवं सौभाग्यवती होती है।

6. समुद्र शास्त्र के अनुसार, विश्व में सबसे ज्यादा सांवले रंग के लोग होते हैं। इसे काले रंग से युक्त कहा जाता है क्योंकि यह एकदम गहरा काला रंग न होकर सफेद एवं लाल रंग से मिश्रित काला होता है। इसके दो भेद होते हैं। प्रथम के अंतर्गत रजोगुण प्रधानता के साथ तमोगुण की हल्की सी प्रवृत्ति होती है। ऐसे लोग अस्थिर, परिश्रमी और कभी सुस्त, सामान्य बुद्धि वाले, सामान्य समृद्ध तथा सामान्य अध्ययन वाले होते हैं। ये प्राय: उच्च मध्यम वर्ग के होते हैं।


7. सांवले रंग के प्रथम वर्ण के विपरीत द्वितीय वर्ण वालों में उपरोक्त गुणों में कुछ न्यूनता आ जाती है अत: उस वर्ग को निम्न मध्यम वर्ग में रखा जाता है।

8. इस वर्ण का प्रभाव स्त्रियों पर भी उसी प्रकार का होता है। फिर भी विशेष स्थिति में वे गृहस्थी के उतार-चढ़ाव में निरंतर संघर्षरत, धैर्य सम्पन्न, सहनशील, उदार, चंचल, भोगी एवं विश्वस्त होती हैं।

बुधवार, 7 दिसंबर 2016

ये हैं 7 चमत्कारी यंत्र, सिद्ध करके पाई जा सकती है मनचाही सफलता




Yantra

तंत्र शास्त्र के अंतर्गत विभिन्न मंत्रों व यंत्रों का उपयोग भी किया जाता है। ये यंत्र बहुत ही शक्तिशाली होते हैं। इन यंत्रों को सिद्ध कर मनचाही सफलता पाई जा सकती है। ये विशेष यंत्र देवी-देवताओं को प्रसन्न करने की तथा ग्रहों को अनुकूल करने की शक्ति भी रखते हैं। इन यंत्रों को बनाने के लिए एक खास कागज, कलम व स्याही का इस्तेमाल किया जाता है। शुभ मुहूर्त में बनाए गए यंत्र शुभ प्रभाव देते हैं। आज हम आपको कुछ खास यंत्रों के बारे में बता रहे हैं, जो आपको मनचाही सफलता दिला सकते हैं।


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बगलामुखी यंत्र (Baglamukhi Yantra)


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ये यंत्र शत्रुओं पर विजय दिलाने के लिए अत्यन्त उपयोगी है। इस यंत्र को शुभ मुहूर्त में सामने रखकर बगलामुख मंत्र का जाप करना चाहिए। मंत्र जाप करते समय पीला कपड़े पहनने चाहिए और जाप के लिए हल्दी की गांठ की माला का उपयोग करना चाहिए। इस यंत्र को सामने रखकर मां बगलामुखी का मंत्र 36 हजार की संख्या में जाप करने से शत्रुओं का किया गया तंत्र-मंत्र आदि टोटके नष्ट हो जाते हैं और साधक की मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
मंत्र- ऊं ह्लीं श्रीं ह्लीं पीताम्बरे तंत्र बाधाम नाशय नाशय

दुर्गा बीसा यंत्र (Durga Bisa Yantra)


Astrology


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दुर्गा बीसा यंत्र को परेशानियों से बचने के लिए एवं चोर भय, अग्नि भय, झगड़ा, लड़ाई इत्यादि से बचने के लिए पर्स में या जेब में रखते हैं। दुर्गा बीसा यंत्र शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
दुर्गा बीसा यंत्र को सामने रखकर शुभ मुहूर्त में हनुमान चालीसा का एक सौ आठ पाठ करने से सभी प्रकार की समस्याओं से छुटकारा मिलता है।
इस यंत्र की रोज पूजा कर सिरहाने रखने से बुरे सपनों से छुटकारा मिलता है।

चंद्र यंत्र (Chandra Yantra)


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जिस व्यक्ति की कुंडली में चंद्रमा अशुभ है तो उसे चंद्र यंत्र की पूजा करनी चाहिए। चंद्र यंत्र की चल या अचल प्रतिष्ठा करके पूजन करने से शीघ्र ही अनुकूल फल प्राप्त होने लगता है।
चंद्रदेव को शीघ्र प्रसन्न करना हो तो चंद्र यंत्र के साथ ही भगवान शंकर की भी पूजा करना चाहिए क्योंकि चंद्रमा भगवान शिव के मस्तक पर ही विराजमान हैं।
शुक्ल पक्ष के किसी सोमवार या पूर्णिमा पर शुभ मुहूर्त देखकर चंद्र यंत्र की स्थापना करें। इस यंत्र को सामने रखकर पूजा करने से सभी प्रकार के भय नष्ट हो जाते हैं तथा शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्त होता है।
व्यापार-व्यवसाय तथा नौकरी आदि में सफलता मिलती है। समाज में उन्नति प्राप्त होती है तथा कार्यों किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं होती।

संतान गोपाल यंत्र (Santan Gopal Yantra)


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इस यंत्र की साधना अत्यन्त प्रसिद्ध है जिन्हें संतान नहीं होती, वे लड्‌डू गोपाल की मूर्ति के साथ संतान गोपाल यंत्र स्थापित करते हैं तथा उनके सामने संतान गोपाल स्तोत्र का पाठ करते हैं। इससे योग्य संतान की प्राप्ति होती है।
संतान गोपाल यंत्र को गुरु पुष्य नक्षत्र में स्थापित करना चाहिए। इसके बात संतान गोपाल स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।
संतान गोपाल यंत्र की स्थापना गोशाला में करें तो इसका प्रभाव और भी बढ़ जाता है। इसके सामने गोपालकृष्ण मंत्र का जाप करने से शीघ्र ही योग्य संतान की प्राप्ति होती है।

महाकाली यंत्र (Mahakali Yantra)

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यंत्र शास्त्र के अंतर्गत कई अद्भुत व शक्तिशाली यंत्रों की पूजा का विधान है। ऐसा ही एक महाशक्तिशाली यंत्र है महाकाली यंत्र।
महाकाली यंत्र की पूजा मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए की जाती है। विशेष रूप से अत्याचारी शत्रु से रक्षा पाने के लिए।
वाद-विवाद, मुकदमें में जीतने के लिए, किसी भी प्रकार के युद्ध, शास्त्रार्थ में विजय के लिए महाकाली यंत्र की उपासना तुरंत फल देती है।
प्रतिदिन सुबह स्नान कर साफ वस्त्र पहनकर यंत्र के सामने बैठकर ऊं क्रीं कालीकायै नम:मंत्र का जाप करते हुए यंत्र का पूजा करनी चाहिए।

व्यापार वृद्धि यंत्र (Vyapar Vridhi Yantra)

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इस यंत्र से बिजनेस में सफलता मिलती है। यह यंत्र दुकान में चोरी, अग्निकांड आदि भय को भी समाप्त करता है।
इस यंत्र को शुक्ल पक्ष के किसी रविवार को तुलसी के रस में चमेली की लकड़ी की कलम के द्वारा भोजपत्र पर लिखें। इसके बाद इसकी विधि-विधान से पूजा करें।
व्यापार वृद्धि यंत्र की प्रतिष्ठा व पूजा करने के बाद इसे दुकान अथवा आॉफिस जहां से आप व्यवसाय करते हों वह के पूजा घर में रखें तथा रोज पूजा करें। ऐसा करने से रूके व्यापार में वृद्धि होगी।
इस यंत्र से व्यापार में तो लाभ होता ही है साथ ही व्यापार में हानि पहुंचाने वाले भी अनुकूल हो जाते हैं।

सूर्य यंत्र (Surya Yantra)

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यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में सूर्य अशुभ हो तो उसे हर काम में असफलता ही हाथ लगती है, न ही उसे अपने कामों का यश मिलता है और न ही सम्मान। ऐसे में कई बार वह व्यक्ति निराशा में डूब जाता है। यंत्र शास्त्र के अनुसार, ऐसी स्थिति में यदि सूर्य यंत्र का विधि-विधान पूर्वक पूजन किया जाए तो शीघ्र ही शुभ फल मिलने लगते हैं।
इस यंत्र की स्थापना रविवार या किसी शुभ मुहूर्त में करना चाहिए। सबसे पहले सुबह उठकर नित्य कर्मों से निपटकर सूर्य देव को प्रणाम करें। इसके बाद इस यंत्र को गंगाजल व गाय के दूध से पवित्र करें। अब इस यंत्र का विधिपूर्वक पूजन करने के बाद सूर्य मंत्र का जाप करना चाहिए।
मंत्र- ऊं घृणि सूर्याय नम:।
जाप करने के बाद इस यंत्र की स्थापना अपने पूजन स्थल पर कर दें तथा प्रतिदिन इस यंत्र का पूजन-पाठ करें। इस प्रकार इस यंत्र का पूजन करने से शीघ्र ही सूर्य संबंधी होने वाली समस्याएं समाप्त हो जाती हैं।

जानिए हथेली में बनने वाले इन 10 निशानों का क्या होता है फल


Jyotish Upay
हथेली में कभी-कभी रेखाओं से कुछ विशेष निशान बन जाते हैं। हस्तरेखा ज्योतिष के अनुसार रेखाओं के बने इन निशानों का असर हमारे जीवन पर भी होता है। कुछ निशान शुभ होते हैं और कुछ निशान अशुभ होते हैं। यहां जानिए हथेली में बनने 10 खास निशान और उनसे मिलने वाले शुभ-अशुभ फल…


मंदिर –

यदि किसी व्यक्ति के हाथ में मंदिर जैसा निशान बन जाए तो समझ लेना चाहिए कि वह सर्वश्रेष्ठ पद प्राप्त करेगा और हर ऐश-आराम ऐसे लोगों को मिलेगा।

त्रिशूल-


त्रिशूल का निशान भाग्यशाली लोगों के हाथ में होता है। इस निशान के असर से व्यक्ति जीवन में सभी सुख सुविधाएं और मान-सम्मान प्राप्त करता है।

अंडाकार-


 Astrology

अंडाकार निशान हथेली में जिस पर्वत पर या रेखा पर होता है, उसका शुभ असर कम करता है। आमतौर पर ये निशान अच्छा नहीं माना जाता है।

रथ-


जिस व्यक्ति के हाथ में रथ का निशान होता है, वह किसी राजा के समान जीवन जीता है। आमतौर पर किसी राजा के हाथ में रथ बनता है।

तलवार-

तलवार के निशान को अशुभ माना जाता है, उन्हें जीवन में कई प्रकार के संघर्षों का सामना करना पड़ता है।

स्वस्तिक-

स्वस्तिक पूजनीय और पवित्र चिन्ह है। जिन लोगों के हाथ में स्वस्तिक बन जाता है, वे धर्म के क्षेत्र में कार्य करते हैं। समाज में मान-सम्मान प्राप्त करते हैं।

वृक्ष-

हथेली में जिस रेखा या पर्वत पर वृक्ष बन जाता है, उसके शुभ फलों को बढ़ा देता है। ये बहुत शुभ निशान माना जाता है।

हाथी-

जिन लोगों के हाथ में हाथी (गज़) का निशाँ बन जाता है, उन्हें गणेशजी की कृपा से सभी राजकीय सुख और सुविधाएं मिलती है।

मछली-

मछली के निशान को चमत्कारिक माना जाता है। जिन लोगों के हाथ में ये निशान बन जाता है, उनके जीवन में कई चमत्कारिक घटनाएं होती है।

झंडा-

हथेली में झंडा बनना मतलब व्यक्ति को हर क्षेत्र में जीत मिलना। ऐसे लोग कोर्ट-कचहरी और किसी तरह के वाद-विवाद में जीत हासिल करते हैं।

सोमवार, 5 दिसंबर 2016

विंड चाइम की आवाज बदल सकती है आपकी किस्मत


Interesting Facts



फेंगशुई


फेंगशुई की समझ या जानकारी रखने वाले लोग विंड चाइम को अच्छी तरह जानते हैं। हालांकि भारत का प्राचीन वास्तुशास्त्र सदियों से अपनी पहचान कायम किए हुए है लेकिन फेंगशुई, जोकि एक चीनी साइंस है, भी भारत में अपनी पकड़ स्थापित करती जा रही है। जिस तरह वास्तुशास्त्र में आइना बहुत महत्वपूर्ण माना गया है उसी तरह फेंगशुई की दुनिया में विंड चाइम बहुत आवश्यक वस्तु के रूप में गिना जाता है।
विंड चाइम्स


इन विंड चाइम्स का उद्भव प्राचीन काल में ही हो गया था, हालांकि इन्हें पहचान बहुत समय बाद मिली। ऐसा कहा जाता है मंदिर के बाहर लगने वाले विंड बेल के रूप में भारत से ही इनका उद्भव हुआ। इसके बाद दक्षिणी एशिया, चीन और बाली से होते हुए ये तिब्बत तक पहुंचे।
सकारात्मक ऊर्जा


ये विंड चाइम घर के भीतर सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह को बढ़ाने में बेहद कारगर सिद्ध होते हैं। फेंगशुई का मौलिक उद्देश्य सकारात्मक ऊर्जा यानि ‘शाइ’ के मार्ग से अवरोधकों को हटाना है, जिसका सीधा असर व्यक्ति के स्वास्थ्य पर पड़ता है


wind chime
लक


विंड चाइम्स में निकलने वाली आवाज ऊर्जा को स्वच्छ करती है और उसे प्रवाहित करने का रास्ता खोलकर ‘लक’ को प्रभावित करती है।

विंड चाइम की बनावट


विंड चाइम्स सामान्य तौर पर लकड़ी, लोहे और अलग-अलग धातु के बने होते हैं लेकिन आपके लिए कौन सी धातु से बना विंड चाइम सही रहेगा यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपको इसे कहां टांगना है या किस दिशा में टांगना है।
विभिन्न प्रकार के विंड चाइम


घर की पश्चिमी, उत्तर-पश्चिमी और उत्तर दिशा में टांगने के लिए धातु से बने विंड चाइम सही रहते हैं जबकि पूर्वी, दक्षिण-पूर्वी और दक्षिण दिशा के लिए लकड़ी और दक्षिण-पश्चिमी, उत्तर-पूर्वी और मध्य दिशा के लिए मिट्टी के बने विंड चाइम बेस्ट हैं।
ध्यान रखने योग्य बातें


विंड चाइम खरीदने से पहले बहुत सी बातें ध्यान रखनी चाहिए। मसलन उसकी आवाज बेहद मधुर और कर्णप्रिय होनी चाहिए। विंड चाइम में कितनी रॉड हैं ये भी इसके प्रभावी साबित होने में काफी मददगार सिद्ध होता है।
फेंगशुई एक्सपर्ट्स


फेंगशुई एक्सपर्ट्स के अनुसार 6,7,8 या 9 रॉड वाली विंड चाइम लेना सबसे अच्छा है। 7 और 8 रॉड वाली विंड चाइम का प्रयोग सौभाग्य को बढ़ाने और दुर्भाग्य को कम करने के लिए किया जाता है। बीमारी को दूर करने या बचाव के लिए 5 रॉड वाली विंड चाइम प्रयोग की जाती है।
कलह से बचाव


शांति स्थापित करने और किसी भी कलह से बचने के लिए 2 या 3 रॉड वाली विंड चाइम उपयुक्त है।
विंड चाइम का आकार और स्थान


अगर आपने विंड चाइम घर के भीतर टांगने के लिए ली है तो ध्यान रखें कि ये बहुत ज्यादा बड़ी ना हो, जबकि घर के बाहर टांगने या बहुत बड़े कमरे में टांगने के लिए छोटी विंड चाइम सही नहीं है।
विंड चाइम को टांगना


सामायतौर पर विंडचाइम को घर के बाहर ही टांगा जाता है ताकि हवा के दबाव या किसी के आगमन पर हिलने से ये अपनी मधुर आवाज कर पाएं।
रोगों से बचाव


विंड चाइम का प्रयोग सुरक्षा, स्वच्छता और ऊर्जा के प्रवाह को बढ़ाने के लिए किया जाता है। अगर आपके घर या ऑफिस में एक ही लाइन में तीन दरवाजे हैं तो आपको बीच में 5 रॉड वाली विंड चाइम टांगनी चाहिए। यह रोग या किसी भी प्रकार की विपदा से बचाव करता है।
9 रॉड वाली विंड चाइम


9 रॉड वाली विंड चाइम उस कमरे के लिए बहुत उपयोगी है जिसके दरवाजे उत्तर दिशा की ओर खुलने की वजह से सूरज की रोशनी कमरे तक नहीं पहुंच पाती।
सूरज की रोशनी का ना पहुंचना


6,7,8 और 9 रॉड वाली विंड चाइम घर के भीतर सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह को बहुत हद तक बढ़ाती है। उत्तरमुखी घर के भीतर सूरज की रोशनी नहीं पहुंच पाती, जिसकी वजह से घर के भीतर नकारात्मक ऊर्जा विद्यमान रहती है। इसलिए उपरोक्त संख्या वाली रॉड बहुत सहायक साबित हो सकती है
धातु से बने विंड चाइम


घर के प्रवेश द्वार में धातु से बने विंड चाइम टांगने से घर जीवंत और भरापूरा होता है। मिट्टी से बनी विंड चाइम, जिनमें 2 या 9 रॉड होती हैं, संबंधों को मधुर बनाए रखने के लिए बहुत जरूरी है। घर के दक्षिण-पश्चिमी भाग में इन्हें टांगना आपसी संबंधों में सौभाग्य लाता है।
सौभाग्य


अगर आप अपने बच्चे के सौभाग्य को बढ़ाने के लिए विंड चाइम का उपयोग करना चाहते हैं तो आपको 6 या 7 रॉड वाली धातु से बनी विंड चाइम पश्चिमी दिशा में टांगनी चाहिए।
टीचर का सपोर्ट


अध्यापक की ओर से सपोर्ट हासिल करने के लिए इन्हीं संख्या वाली धातु से बनी विंड चाइम को घर के उत्तर-पश्चिमी भाग में टांगना प्रभावी साबित हो सकता है।
चमत्कारिक प्रयोग


विंड चाइम के प्रयोग और उसके प्रभाव चमत्कारिक हैं। इसकी आवाज की मधुरता घर के भीतर और वातावरण की नकारात्मक ऊर्जा और अशुद्धियों को दूर करती है।