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बुधवार, 2 दिसंबर 2015

अनोखी परम्परा! इस मंदिर में होता है मिर्च से अभिषेक

अनोखी परम्परा! इस मंदिर में होता है मिर्च से अभिषेक


वेलुप्पुरम। भगवान के प्रति आस्था और पूजा करने की परम्पराओं के बारे में आपने कई किस्से सुने होंगे। आज आपको एक खास तरीके की पूजा की परम्परा के बारे में बता ने जा रहे है जिसे जानकर आप आश्चर्य करेंगे कि ऎसा भी हो सकता है। तमिलनाडु में वर्नामुत्तु मरियम्मन नाम का एक मंदिर है। इसमें सबसे अनोखी परम्परा है चिली अभिषेक। अब आप सोच रहे होंगे कि चिली अभिषेक भला ये कैसी परम्परा है। इस परम्परा के बारे में जानने से पहले थोडा सा इस मन्दिर के बारे में जान लीजिए। वर्नामुत्तु मरियम्मन मंदिर तमिलनाडु के सबसे ब़डे जिले वेलुप्पुरम में विश्व प्रसिद्ध ऑरोविले इंटरनेशनल टाउनशिप (सिटी ऑफ डॉन) के पास एक गांव इद्यांचवाडी में स्थित है। यहां हर साल इन्ही दिनों में 8 दिनों तक चलने वाला त्योहार मनाया जाता है। इस बार ये त्यौहार पिछले मंगलवार को शुरू हुआ। इसमें लोगों के अच्छे स्वास्थ्य की कामना के लिये एक भव्य पूजन और प्रार्थना का आयोजन किया गया। जिसमे 1000 से ज्यादा लोग शामिल हुए। इसमें विदेशी पर्यटकों की संख्या भी शामिल है। ऑरोविले के विदेशी पर्यटकों ने ब़डे उत्साह के साथ इसमे भाग लिया। इस त्यौहारमें रविवार का दिन सबसे महत्वपूर्ण था। इसी दिन इस अनोखी "चिली अभिषेक" परम्परा को निभाया गया। इस परम्परा के लिए मंदिर की ट्रस्ट में शामिल तीन ब़डे लोगों ने पहले तो हाथ में पवित्र कंगन पहनकर पूरे दिन का व्रत रखा। इसके बाद उनके सिर के बालों का मुंडन किया गया। मुंडन के बाद में देवताओं की तरह ही उन्हें भी पूजन स्थल पर बीच में बिठाया गया और बाद में मंदिर के पुजारी ने उन तीनों को भगवान मानकर 108 सामग्रियों से अभिषेक किया। इन 108 सामग्रियों में कई तरह के तेल, इत्र, विभूति, कुचले हुये फल, चंदन, कुमकुम, हल्दी आदि के लेप तो थे हीं लेकिन सबसे ज्यादा दिलचस्प था मिर्च (चिली) का लेप। पहले तो तीनों को मिर्च का ये लेप खिलाया गया, उसके बाद में ऊपर से लेकर नीचे तक इसी लेप से उनका अभिषेक किया गया। आखिर में उन्हें नीम के लेप से नहलाकर मंदिर के अंदर ले जाया गया। मंदिर के अंदर जाकर "धीमिति" का आयोजन हुआ। जिसमें उन्हें जलते हुए कोयले पर चलाया गया। इद्यांचवाडी गांव के लोगों ने बताया अभिषेक की ये परम्परा पिछले 85 वर्षों से चली आ रही है। कहा जाता है कि 1930 में गांव के हरिश्रीनिवासन ने एक नीम के पे़ड से बाहर आते गोंद को देखा और इसे पी लिया। फिर, उसके सामने भगवान प्रकट हुए और वहां एक मंदिर का निर्माण करवाने को कहा। ग्रामीणों किसी भी रोग से पीडित ना होना प़डे इसके लिये प्रार्थना के हिस्से के रूप मिर्च से अभिषेक करने का आदेश दिया। हरिश्रीनिवासन के मरने के 19 साल पहले तक मिर्च से अभिषेक की ये परम्परा उन्हीं पर ही निभाई गयी।

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