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सोमवार, 1 जून 2015

अंध महासागर हरा क्यों दिखाई देता है ?


अंध महासागर हरा क्यों दिखाई देता है ?

भूमध्य और अंध महासागर की विशेषता है कि इन्हें इनके रंग के आधार पर पहचान जा सकता है। भूमध्य सागर का जल और अन्धमहासागर का जल हरा दिखाई देता है। ऐसा क्यों होता है ? सूर्य के प्रकाश में सात रंग होते हैं। कोई वस्तु किस रंग की दिखाई देगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह सूर्य के प्रकाश में मिले 7 रंगों में से किसको परावर्तित करती है। यह इस वस्तु या पदार्थ की संरचना पर भी निर्भर करता है कि वह किस रंग को परावर्तित करेगी। सामान्यतः समुद्र के पानी की विशेषता होती है कि वह सिर्फ नीले रंग को ही परावर्तित करता है। इसलिए सभी समुद्रों का रंग नीला दिखाई देता है। अंध महासागर के तल में हरे पौधों की बहुतायत है। इन पौधों के नष्ट होने के कारण पीला रंग इस महासागर में घुलता रहता है। इस कारण यह समुद्र नीले और पीले दोनों ही रंगों को परावर्तित करता है। चूँकि, दोनों रंग एक साथ ही परावर्तित होते हैं, तो इसलिए इस महासागर का रंग हरा दिखाई देता है, जो नीले और पीले रंग से मिलकर बना है। चूँकि भूमध्यसागर के जल में पीला रंग नहीं घुलता, इसलिए वह अन्य सागरों की तरह सिर्फ नीले रंग को ही परावर्तित करता है। इसलिए उसका पानी नीला दिखाई देता है।











बूमरैंग लौटकर क्यों आता है ?


बूमरैंग लौटकर क्यों आता है ?

बूमरैंग सख्त लकड़ी की एक मुड़ी हुई छड़ होती है, जो ऑस्ट्रेलिया और दूसरे देशों में शिकार या लड़ाई के काम आती है। इसकी सबसे महत्वपूर्ण किस्म वह होती है, जो निशाना चूकने पर वापस फेंकने वाले के पास आ जाती है। इसका विकास ऑस्ट्रेलिया के लोगों ने किया था और इसकी लम्बाई 12 से 30 इंच तक होती है। इस बूमरैंग का वजन 340 ग्राम होता है। जब इसे उरई शक्ति के साथ फेंका जाता है तो यह 45 मीटर की ऊंचाई पर चक्क्र काटता है और फिर कुछ छोटे - छोटे चक्कर काटने  के बाद फेंकने वाले के पास वापस आ जाता है। इसके वापस लौटने का कारण यह माना जाता था कि हवा इसके निचले सपाट हिस्से पर दबाव डालती हुई ऊपरी सतह पर निकलती है और इसी दबाव के कारण यह वापस लौटता है। बाद में एक स्कॉटिश शोधकर्ता ने पाया कि इसे फेंकने का तरीका और वायुदाब, दोनों ही इसे वापस लाने का काम करते हैं बूमरैंग हमेशा हाथ को कंधों से नीचे रख फेंका जाता है। फिर इसे फेंकते समय कलाई को भी कुछ इस तरह घुमाया जाता है कि बूमरैंग पर हवा के दाब के साथ ही इसका दाब भी बनता है और इसी दाब के कारण यह वापस लौटता है।













मृत सागर क्या है ?


मृत सागर क्या है ?

मृत सागर एक ऐसी खारी झील है जो जॉर्डन और इजरायल के बीच में स्थित है। यह लगभग 80  किलोमीटर लंबी और 5 से 20 किलोमीटर चौड़ी है। समुद्र - तल से ऊँची होने के बजाय यह समुद्र - तल से लगभग 400 मीटर नीची है। कहा जाता है कि  यह लगभग 430 मीटर ऊँची थी। तब इसमें जीव - जंतु रहते थे लेकिन आज इसमें कोई भी नहीं रहता है। इससे कोई नदी निकलने की बजाय इसमें जॉर्डन की नदी - नालें आकर मिलते हैं, और घुलनशील नमक को लाकर इसमें नमक की मात्रा बढाते रहते हैं।
सामान्यतः अन्य समुद्रों में नमक की मात्रा 4  से 5 प्रतिशत पायी जाती है किन मृत सागर के पानी में यह मात्रा सर्वाधिक 25 प्रतिशत के लगभग है। इतना ही नहीं, इसमें पाये जाने वाले साधारण लवणों के अतिरिक्त जहरीले पदार्थ भी पाये जाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि अन्य समुद्रों के पानी को तो चखकर देखा जा सकता है परन्तु इसे तो चखा भी नहीं जा सकता, क्योंकि इसे चखते ही खारेपन के स्वाद के साथ चखने वाला बीमार होने लगता है। अतः इस सागर के पानी में कोई भी जीव जिन्दा नहीं रह सकता। जॉर्डन नदी एवं अन्य नालों के साथ आने वाले जीव तथ अन्य समुद्री जीव इस सागर के पानी में प्रवेश करते ही मर जाते हैं। अतः यह सागर एक तरह से मौत का सागर है, इसलिए इसे मृत सागर भी कहा जाता है। 










रैकून खाना धोकर क्यों खाता है ?


रैकून खाना धोकर क्यों खाता है ?

अमेरिकी महाद्वीप में पाया जाने वाला रैकून एक अत्यंत मनोरंजक जीव है।  यह अपना खाना धोकर खाता है यदि धोने के लिए पानी नहीं मिले, तो यह भोजन नहीं खाता। यह तो अभी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं की रैकून अपना खाना क्यों धोता है, लेकिन वैज्ञानिक शोधों से यह स्पष्ट हो चुका है कि यह अपने भोजन को कम से कम साफ़ करने के लिए तो नहीं धोता है, क्योंकि यह भोजन को बहुत गंदे पानी में भी धोता है। दूसरे यह पानी में से पकड़े गए भोजन, जैसे मछली, झींगा, सीप और मेंढक को भी धोता है, जिन्हें धोने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। इसलिए वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह शायद इसलिए अपने भोजन को धोता है कि इससे उसे अपना भोजन और अधिक स्वादिष्ट लगता हो। रैकून अखरोट, फल और अनाज भी खाते हैं और अपने पंजों का इस्तेमाल भोजन को ढूंढने में करते हैं। इस आकर्षक जीव की दो प्रजातियां पायी जाती हैं। उत्तरी रैकून कनाडा, अमेरिका और सेंट्रल अमेरिका में पाये जाते हैं। केकड़े खाने वाले रैकून दक्षिण अमेरिका में पाये जाते हैं। इस किस्म के रैकूनों के दूसरे रैकूनों से बाल छोटे और टांगें लम्बी होती हैं।












पहाड़ों पर चढ़ते समय लोग आगे और उतरते समय पीछे की ओर क्यों झुक जाते हैं ?


पहाड़ों पर चढ़ते समय लोग आगे और उतरते समय पीछे की ओर क्यों झुक जाते हैं ?

जब हम सीधे खड़े होते हैं, तो हमारा गुरुत्व केंद्र हमारे पैरों के बीच में होता है। इसी के कारण हम संतुलित होकर खड़े रहते हैं। सामान्य मैदान में चलने पर यह गुरुत्व केंद्र चलने की दिशा में बदलता रहता है, लेकिन यह संतुलित अवस्था से इधर - उधर विचलित नहीं होता है। परन्तु जब हम मैदान की अपेक्षा पहाड़ की ऊंचाई पर चढ़ते हैं, तो हमारा गुरुत्व केंद्र आगे की ओर बढ़ जाता है। अतः इसे संतुलित करने के लिए हमें भी आगे की ओर झुकना पड़ता है, अन्यथा हम संतुलन खोकर गिर सकते हैं। ठीक इसी तरह जब हम पहाड़ से नीचे की ओर उतर रहे होते हैं , तो हमारा गुरुत्व केंद्र पीछे की ओर बढ़ जाता है, अतः इसे सन्तुलित करने के लिए हमें पीछे की ओर झुकना पड़ता है। इसलिए पहाड़ों पर चढ़ते - उतरते समय हम गिर न जाएँ, इसके लिए पहाड़ों पर चढ़ते समय आगे की ओर और उतरते समय पीछे की ओर झुकना आवश्यक होता है।











आइसक्रीम से सिरदर्द क्यों हो जाता है ?


आइसक्रीम से सिरदर्द क्यों हो जाता है ?

शायद ही कोई इंसान ऐसा होगा जिसे आइसक्रीम पसंद नहीं होगी। लेकिन कुछ लोग काफी इच्छा होने के बाद भी आइसक्रीम का सेवन नहीं कर पाते। क्योंकि आइसक्रीम खाते ही उनके सिर में तेज़ दर्द शुरू हो जाता है। आइसक्रीम के कारण होने वाला सिरदर्द, जिसे आइसक्रीम हैडेक भी कहते हैं , दरअसल मुँह के तापमान में अचानक परिवर्तन का परिणाम होता है। आइसक्रीम या बर्फ के गोले का तापमान मुँह के तापमान से कॅाफ़ी कम होता है। जैसे ही आइसक्रीम मुँह के ऊपरी हिस्से या तालू के सम्पर्क में आती है, वैसे ही मुँह में एक तरफ की प्रतिक्रिया होती है। तालू में मौजूद तंत्रिका केंद्र आइसक्रीम के कम तापमान पर जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया व्यक्त कर दिमाग को गर्म रखने का प्रयास करता है। इस कारण दिमाग की रक्त वाहिनियां फूल जाती हैं और सिर में दर्द होने लगता है। यह तीक्ष्ण दर्द ज्यादा देर नहीं होकर सिर्फ 30 से 60 सेकंड तक ही होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस सिर दर्द से बचने का उपाय यह है कि जब भी आइसक्रीम खाएं, इस बात का प्रयास करें कि वह तालू को नहीं छुएं।











रोचक विज्ञान

रोचक विज्ञान

1. जोएफ नीकपे ने 1827 में दुनिया की सबसे पहली फोटोग्राफिक आकृति विकसित की। थॅामस एडीसन और वी.के.एल.डिक्सन ने 1894 में फिल्म कैमरे का आरम्भ किया, पर एक तस्वीर को परदे पर लाने का काम सबसे पहले एक जर्मन पुजारी द्वारा किया गया। 


2. एक व्यक्ति बिना खाये एक महीना रह सकता है पर बिना पानी के 7 दिन। अगर शरीर में पानी की मात्रा 1 प्रतिशत से कम हो जाए तो आप प्यास महसूस करने लगते है। अगर यह मात्रा 10 प्रतिशत से कम हो जाए तो आपकी मौत हो जाएगी। 

3. युरेनस ग्रह का परिपथ 90 डिग्री तक झुक जाता है। 

4. हर मनुष्य अपने जीवन काल में लगभग आधा घंटा एक कोशिका जीव की तरह बिताता है। 

5. हर साल हमारे शरीर के लगभग 98 प्रतिशत परमाणु बदल जाते हैं। 

6. गरम पानी ठंडे पानी से ज्यादा भारी होता है। 

7. सौर मंण्डल के सारे ग्रह बृहस्पति में समा सकते है। 

8. जब अंतरिक्षयात्री अंतरिक्ष से वापिस आते है तब उन की लंम्बाई 2 इंच बढ़ जाती है। 
इसका कारण यह है कि हमारी रीड़ की हड्डी से जुड़ी लचीली हड्डियां गुरूत्व की गैरहाजरी में फैलने लगती हैं। 

9. जब हाईड्रोजन हवा में जलती है तो इस क्रिया के फलस्वरूप पानी बनता है। 

10. प्लेटिनियम मनुष्य द्वारा बनाया गया सबसे पहला तत्व है।


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11. अगर आप अंतरिक्ष में जाते है तो आप गला घुटने की बजाए शरीर के फटने से पहले मर
जाएगें क्योंकि वहाँ पर हवा का दबाब नही है। 

12. रेडियो-एक्टिव तत्व अमेरिकिनियम -241 कई धूम्र पदार्थो में इस्तेमाल किया जाता है। 

13. ध्वनि हवा से ज्यादा स्टील में लगभग 15 गुना अधिक गति करेगी। 

14. अभी तक 1 उल्का पिंड द्वारा सिर्फ एक ही बनावटी उपग्रह ही नष्ट किया गया है। यह
उपग्रह यूरोपियन स्पेस एजेंसी का ओलंपिक्स (1993) था। 

15. एक नजरिये से तापमान मापने के लिए सेल्सियस स्केल फ़ारेनहाइट स्केल से ज्यादा अक्लमंदी से बनाया गया, पर इसके निर्माता 'एंड्रो सेल्सियस' एक अनोखे वैज्ञानिक थे। जब उन्होंने पहली बार इस स्केल को विकसित किया, उन्होंने गलती से जमा दर्जा 100 और उबाल दर्जा 0 डिग्री बनाया, पर कोई भी उन्हें इस
गलती को कहने का हौसला न कर सका,तो बाद के वैज्ञानिकों ने स्केल को ठीक करने के लिए उनकी मृत्यु का इंन्तजार किया। 

16. जब एक जैट प्लेन की गति 1000 किलोमीटर प्रतिघंटा होती है तब उसकी लंम्बाई एक परमाणु घट जाती है। 

17. एक खगोलशास्त्री फ्रेंक ड्रेक ने अंतरिक्ष संम्ंबन्धी कई तत्थों को ध्यान में रखते हुए कई समीकरणों द्वारा दर्शाया कि हमारी आकाश गंगा(मंदाकिनी) में धरती के सिवाए 1000-10000 ग्रह ऐसे और हो सकते है जिन पर जीवन संभव हो सकता है। इतना ही नही 1974 में महान गणितज्ञ कार्ल सागन के अनुसार हमारी आकाशगंगा में ही 10 लाख सभ्यताएं होनी चाहीए। 

18. धरती एकलौता ऐसा ग्रह है जिसका नाम किसी देवता के ऊपर नही रखा गया और ना ही पुल्लिंग रखा गया है। 

19. अल्बर्ट आइंस्टाइन के अनुसार हम रात को आकाश में लाखों तारे देखते है लेकिन वह उस समय उस जगह नही होते बल्कि कहीं और होते है। हमें तो उनके द्वारा छोडा गया कई लाख प्रकाश साल पहले
का प्रकाश दिखाई दे रहा होता है। 

20. एक ताजा शैंपेन में गिरी किशमिश कांच की गोली की तरह थोड़ी देर तक ऊपर नीचे उछलती रहेगी। 

21. जब चाँद बिलकुल आपके सिर पर होता है तो आपका वजन थोड़ा कम हो जाता है। 

22. - 40 डिग्री पर फारेनहाइट स्केल और सेल्सियस स्केल बराबर होते हैं। 

23. शुक्र ग्रह बाकी ग्रहों की तरह अपनी धुरी के गिर्द झुका नही हुआ है और इसलिए इस पर ऋतुएँ भी नही और यह बाकी ग्रहो से उल्टी दिशा पर सूरज की परिक्रमा करता है। 

24. गरम पानी, ठंडे पानी से पहले बर्फ में बदल जाएगा। 

25. तत्वो की आवर्ती सारणी में ‘j’ अक्षर कहीं भी नही आता। 




क्या होगा सूरज का.… क्या यह भी होगा नष्ट ? सूरज के बारे में अनसुने तथ्य

क्या होगा सूरज का.… क्या यह भी होगा नष्ट ? सूरज के बारे में अनसुने तथ्य 


1. चाहे दिन हो या रात आप जब भी यह तथ्य पढ़ रहे हो या कभी भी कुछ कर रहे हो तो सुर्य द्वारा छोड़े गए 10 लाख अरब न्यूट्रॉन आप के शरीर से गुजर रहे होते हैं। 


2. सुर्य मंडल का 99.24% वजन सुर्य का है। 

3. अगर सु्र्य का आकार एक फुटबाल जितना और बृहस्पति का गोल्फ बॉल जितना कर दिया जाए तो धरती का आकार एक मटर से भी कम होगा। 

4. प्रकाश सुरज से धरती पर आने के लिए 8 मिनट 17 सैकेंड लेता है। 

5. संस्कृत भाषा में सुर्य के कुल 108 नाम हैं। 



6. अगर मान ले कि आप सुर्य की सतह पर रहते है तो आप को धरती पर आने कि लिए जो रॉकेट तैयार करना होगा उसकी शुरूआती गति 618 किलोमीटर प्रति सैंकेड होनी चाहिए। 

7. सुर्य 74 प्रतिशत हाईड्रोजन और 24 प्रतिशत हीलियम से बना है और बाकी का हिस्सा कई भारी तत्वों जैसे ऑक्सीजन, कार्बन, लोहे और नीयोन से बना है। 

8. सुर्य की बाहरी सतह का तापमान 5500 डिग्री सेल्सियस है जबकि अंदरूनी भाग का तापमान 1 करोड 31 लाख डिग्री सेल्सियस है। 

9. सुर्य भारी मात्रा में सौर वायु उत्पन्न करता है जिसमें इलेक्ट्रॉन और प्रोटान जैसे कण होते है। यह वायु इतनी तेज (लगभग 450 किलोमीटर प्रति सैकेंड) और शक्तिशाली होती है कि इसमें मौजुद इलेक्ट्रॉन और प्रोटोन सुर्य के शक्तिशाली गुरूत्व से भी बाहर निकल जाते हैं। 

10. धरती जैसे शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र वाले ग्रह ऐसे कणों को धरती के पास पहुँचने से पहले ही मोड़ देते हैं। (ध्यान रहें चुंबकीय क्षेत्र मोड़ता है वायुमंडल नही।)

11. सुर्य ग्रहण तब होता है जब चाँद धरती और सुर्य के मध्य आ जाए। यह स्थिति ज्यादा से ज्यादा 20 मिनट तक रहती है। 

12. सुर्य की द्रव्यमान (वजन) लगभग 1.989*10 30 किलोग्राम है। 

13. हर सैकेंड सुर्य में 7 करोड़ टन हाईड्रोजन , 6 करोड़ 95 लाख टन हीलियम में बदलती है और बची 5 लाख टन गामा किरणों में बदल जाती है। 

14. हर सेकंड सुर्य का द्रव्यमान 50 लाख टन कम हो जाता है। 


15. सुर्य के अंदरूनी भाग का दबाब धरती के वायुमंडल के दबाब से 340 अरब गुना ज्यादा है। 

16. सुर्य के अंदरूनी भाग की घनता, धरती पर मौजुद पानी की घनता से 150 गुना ज्यादा है। 

17. सुर्य के केंद्र से जो उर्जा उत्तपन होती है उसे इसकी सतह तक आने के लिए 5 करोड़
साल लगते हैं। 

18. अगर सुर्य के केंद्र से एक पनीर के टुकड़े जितने भाग को धरती की सतह पर रख दिया जाए तो कोई भी चट्टान या और कोई चीज इसे धरती के 150 किलोमीटर अंदर तक घुसने से नही रोक सकती। 

19. सुर्य की सतह का क्षेत्रफन धरती के क्षेत्रफल से 11990 गुना ज्यादा है। 

20. सुर्य का गुरूत्वार्कष्ण धरती से 28 गुना ज्यादा है। मतलब यह कि अगर धरती पर आपका वजन 60 किलो है तो सुर्य पर यह 1680 किलो होगा। 

21. धरती की तरह सुर्य ठोस नही है. यह सारा का सारा गैसों का बना हुआ है। 

22. सुर्य का गुरूत्व इतना शक्तिशाली है कि 6 अरब किलोमीटर दूर स्थित प्लूटो ग्रह भी इसके गुरूत्व के कारण अपनी कक्षा में घूम रहा है। 

23. पलायन वेग किसी पिंड की उस शक्ति को कहते है जो कि किसी निश्चित दूरी पर गति कर रही वस्तु को अपनी ओर खीच लेता है। सुर्य का पलायन वेग 20 लाख 22 किलोमीटर है। मतलब यह कि सुर्य अपने 20 लाख 22 हजार किलोमीटर के दायरे में आनी वाली हर चीज को अपनी ओर खींच लेगा। 

24. प्रकाश सुर्य से प्लुटो तक पहुँचने में 5 घंटे 30 मिनट लेता है। 

25. जैसे हमारी धरती अपने धुरे के समक्ष 24 घंटे में एक चक्कर पूरा करती है ऐसे ही सुर्य अपनी धुरी के समक्ष 25 दिन में एक चक्कर पूरा करता है। 

26. जबसे सुर्य का जन्म हुआ है इसने सिर्फ 20 बार ही आकाशगंगा का चक्कर काटा है। 

27. सुर्य के एक वर्ग सेंटीमीटर से जितनी उर्जा पैदा होती है इतनी उर्जा 100 वाट के 64 बल्बो को जगाने के लिए काफी होगी। 

28. सुर्य की जितनी उर्जा धरती पर पहुँचती है इतनी उर्जा संम्पूर्ण मानवों द्वारा खपत की ऊर्जा से 6000 गुना ज्यादा होती है। 

29. जितनी उर्जा 30 दिन में धरती को सुर्य द्वारा मिलती है इतनी ऊर्जा मानवों द्वारा पिछले 40,000 साल
से खपत ऊर्जा से कहीं ज्यादा है। 

30. अगर मान लें कि सुर्य की चमक एक दिन धरती पर न पुँहचे तो धरती कुछ ही घंटो में बर्फ की तरह पूरी तरह से जम जाएगी सारी धरती उत्तरी ओर दक्षिणी ध्रुव जैसी बन जाएगी। 

31. नार्वे एकलोता ऐसा क्षेत्र है जहां सुर्य लगातार साढ़े 3 महीने तक चमकता रहता है। 

32. धरती पर हर जगह 360 दिनो में एक बार सुर्यग्रहण जरूर दिखता है। साल में ज्यादा में ज्यादा 5 बार ही सुर्य ग्रहण लगता है। सुर्यग्रहण 7 मिनट 40 सैंकेड तक रहता है मगर सम्पूर्ण सुर्यग्रहण 20 मिनट तक चलता है। 


33. 1 अरब 10 लाख साल बाद सुर्य अब से 10 प्रतिशत ज्यादा चमकने लगेगा। धरती का वायुमंडल और इसकी नमी अत्यधिक तापमान के कारण अंतरिक्ष में उड़ जाएगी। 

 34. अब से 5 अरब साल बाद सुर्य अब से 40 प्रतिशत ज्यादा चमकने लगेगा। सारे सागर, महासागर और नदियों का पानी जलवाष्प बन कर अंतरिक्ष में उड़ जाएगें। 

35. अब से 5 अरब 40 करोड़ साल बाद सुर्य में सारी हाईड्रोजन खत्म हो जाएगी और यह खत्म होना शुरू हो जाएगा। 

36. अब से 7 अरब 70 करोड़ साल बाद सुर्य लाल दानव का रूप धारण कर लेगा। यह लगभग 200 गुना बड़ा हो जाएगा और बुद्ध ग्रह तक पहुँच जाएगा। 

37. 7 अरब 90 करोड़ साल बाद सुर्य एक सफेद गोले में बदल जाएगा तब इसका आकार सिर्फ शुक्र
ग्रह के जितना होगा।

वृद्धावस्था में त्वचा पर झुर्रियां क्यों पड़ जाती है ?


वृद्धावस्था में त्वचा पर झुर्रियां क्यों पड़ जाती है ?

त्वचा पर झुर्रियां पड़ना बुढ़ापे की निशानी माना जाता है। प्रायः ऐसा उम्र के साथ त्वचा के अंदर होने वाले परिवर्तनों के परिणामस्वरूप होता है। हमारी त्वचा का भीतरी भाग दो तरह के प्रोटीन तंतुओं से मिलकर बना होता है। इनमें एक 'कोलैजन' तथा दूसरा 'एलास्टिन' कहलाता है। कोलैजन एक तरह से त्वचा के उत्तकों के निर्माण की सामग्री उपलब्ध कराता है। जबकि एलास्टिन का कार्य त्वचा को मुलायम और लचीला करना होता है। इन्हीं के कारण त्वचा पर झुर्रियां न हो कर वह चौरस और साफ़ - सुथरी होती है। इसमें एलास्टिन की मात्रा पहले ही कम होती है, इसलिए इसकी और कमी होने पर त्वचा का स्वरूप बदलने लगता है। 
बढ़ती उम्र के साथ कोलैजन बेतरतीब अथवा असंगठित होने लगते हैं और एलास्टिन की मात्रा घटने लगती है। इतना ही नहीं, कोलैजन तंतु असंगठित होने के साथ परस्पर गुंफित भी होने होने लगते हैं। इससे त्वचा की चौरसता और लचीलापन कम होने लगता है और धीरे - धीरे बुढ़ापे में त्वचा पर झुर्रियां पड़ने लगती हैं।




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चलती रेल में गेंद हाथ में क्यों आती है ?


चलती रेल में गेंद हाथ में क्यों आती है ? 

ऐसा लगता है कि रेलगाड़ी के डिब्बे में उछाली गेंद, उछालने वाले व्यक्ति के पीछे गिरेगी क्योंकि गेंद को ऊपर जाने  और नीचे आने में कुछ समय लगेगा और इस समय में गेंद उछालने वाला व्यक्ति रेलगाड़ी के साथ आगे बढ़ जाएगा। लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं है। आइये जानें  कि ऐसा क्यों होता है ? चलती रेलगाड़ी में रखी सभी वस्तुएं रेलगाड़ी के साथ ही गति करने लगती हैं। रेलगाड़ी में लगे पंखे, उसमें बैठी सवारियां, गेंद और गेंद उछालने वाला व्यक्ति भी  सभी कुछ रेलगाड़ी के वेग से गतिशील होते हैं। जब गेंद ऊपर फेंकी जाती हैं, तो रेलगाड़ी का वेग भी इसके साथ निहित होता है। गेंद को ऊपर फेंकने पर इसके क्षैतिज वेग के साथ - साथ ऊर्ध्वाधर वेग और जुड़ जाता है। रेल में चलने वाले यात्रियों को इसकी क्षैतिज गति दिखाई नहीं देती। गेंद केवल ऊपर - नीचे जाती दिखती है। रेल से बाहर खड़ा व्यक्ति इस गेंद को परवलयी रास्ते से जाता हुआ देखेगा, क्योंकि उसे क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर दोनों ही गतियां दिखाई देती हैं। वास्तव में सभी गतियां सापेक्ष होती हैं। यही कारण है कि रेलगाड़ी में उछाली गयी गेंद की गति दो दर्शकों को भिन्न - भिन्न दिखायी देती है।


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नॉर्वे में सूर्य आधी रात्रि तक भी क्यों चमकता है ?

 
नॉर्वे में सूर्य आधी रात्रि तक भी क्यों चमकता है ?

नॉर्वे में गर्मियों में सूर्य मई के मध्य से जुलाई के अंत तक रात में भी पूरी तरह नहीं छिपता। इस अवधि में रात में भी काफी उजाला रहता है। ख़ास बात यह है कि सर्दियों के दो महीनों में यहां सूर्य के दर्शन ही नहीं होते, अर्थात पूरी तरह रात रहती है। क्या आप जानते हैं ऐसा क्यों होता है ?
दरअसल, सूर्य अर्धरात्रि में भी उन ध्रुवीय प्रदेशों में दिखाई देता है जहाँ रात्रि में भी यह क्षितिज के ऊपर ही रहता है, छिपता नहीं है। पृथ्वी का अक्ष अपनी भ्रमण करने की कक्षा के तल से 23.5 अंश झुका हुआ है, इसलिए प्रत्येक गोलार्ध गर्मी में सूर्य की ओर झुका रहता है, जबकि सर्दियों में यह झुकाव विपरीत दिशा यानी सूर्य से परे हो जाता है। इस कारण उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवीय प्रदेशों में साल में कुछ समय के लिए सूर्य पूरी तरह नहीं छिपता है, बल्कि अर्धरात्रि में भी दिखता रहता है। जब दक्षिणी ध्रुव प्रदेश में सर्दी का मौसम होता है, तो वहां दिन और रात का पता ही नहीं चलता। वहां केवल अँधेरा ही अँधेरा रहता है। इन दिनों ( अप्रैल से जुलाई ) में उत्तर ध्रुवीय प्रदेशों में गर्मी होती है और वहां सूर्य 24 घंटे दिखाई देता है। सूर्य उदय तो होता है लेकिन धीमी गति से चलता दिखाई देता है। शाम को यह छिपना शुरू होता है, लेकिन क्षितिज के पास पहुँचते ही फिर उगना चालु कर देता है।



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