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मंगलवार, 31 मार्च 2015

जूते पहनकर भोजन क्यों नहीं करें?

जूते पहनकर भोजन क्यों नहीं करें? 

चमड़ा वैसे भी दुर्गन्धपूर्ण परमाणुओं से बनी एक अपवित्र वस्तु है। जूतों के तलों में नाना प्रकार की गंदगी, कीचड़, मल और दुर्गन्धपूर्ण वस्तुएं लगी होती हैं। भोजन एक ईश्वरीय उपासना तुल्य शुचि कार्य होने से उनमें जूतों का संसर्ग धार्मिक एवं वैज्ञानिक दोनों ही दृष्टि से निन्दनीय है।




























सोते समय दक्षिण दिशा में पांव क्यों नहीं? 

‘‘ दक्षिण दिशा की ओर पांव करके नहीं सोना चाहिए।’’ इस बात को गांवों में बसी अनपढ़ महिलाएं भी जानती हैं। हिन्दूधर्म का कोई भी सिद्धांत-नियम किंवदन्तियों पर आधारित न होकर वैज्ञानिक आधार पर बना है। उपर्युक्त धारणा भी इसी बात की पुष्टि करती है। सौर जगत् ध्रुव के आकर्षण पर अवलम्बित है, ध्रुव उत्तरदिशा में स्थित है। यदि कोई व्यक्ति दक्षिण दिशा को पांव और ध्रुव की ओर मस्तक करके सोएगा तो धु्रवाकर्षण के तारतम्य से पेट में पड़ा भोजन पचने पर जिसका अनुपयोगी अंश मल के रूप में नीचे की ओर जाना आवश्यक है, वह ऊपर की ओर गतिशील हो जाएगा। इससे ह्मदय व मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। इसके विपरीत यदि हम उत्तरदिशा की ओर पांव करके सोएंगे तो चुम्बकीय सिद्धांत के अनुसार भोजन परिपाक ठीक होगा। नींद बढि़या आएगी, निद्रा के बाद आप अपने-आपको ज्यादा स्वस्थ अनुभव करेंगे क्योंकि ध्रुव आकर्षण सिद्धंात के अनुसार दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर चल रहा विद्युत प्रवाह, हमारे मस्तिष्क से प्रविष्ट होकर पांवों के रास्ते से निकलेगा। फलतः व्यक्ति की आयु बढे़गी। जबकि दक्षिण की ओर, जिसे हिन्दू शास्त्रों में यम (मृत्यु) का स्थान कहा गया है, पांव करके सोने से आयु घटती है।























सोमवार, 30 मार्च 2015

 प्राणयाम से इच्छा मृत्यु कैसे संभव है? 
प्राणायाम के द्वारा मनुष्य मन पर नियंत्रण करके ‘प्राणवायु’ को पकड़ता और छोड़ता है और जब भी चाहे अपने प्राणों का कपाल स्थिति ‘ब्रह्मरंध’ में चढ़ाकर इच्छा मृत्यु को प्राप्त कर सकता है।












रविवार, 29 मार्च 2015

#‘सारोस चक्र‘ क्या होता है?

‘सारोस चक्र‘ क्या होता है? 

 पृथ्वी, चंद्र और सूर्य की एक ही राशि में स्थिति वापस 18 वर्षो के बाद आती है।
खगोलशास्त्रियों की भाषा में इसे ‘सारोस चक्र‘ कहते हैं। यह चक्कर 6585.3 दिन का होता है। इसके कारण ग्रहणों की सटीक भविष्यवाणी की जा सकती है।




रविवार, 1 मार्च 2015

शराब से प्यास क्यों नहीं बुझाती ?

शराब प्यास क्यों नहीं बुझाती ?


प्यास लगने का मतलब होता हैं कि  शरीर में पानी की कमी हो रही हैं । यह क्रिया दिमाग के द्वारा नियंत्रित होती हैं । शरीर में पानी कम होने से रक्त में पानी की कमी होने लगती हैं । जिससे रक्तदाब की समस्या भी सामने आती है । पेशाब और पसीने से पानी तो शरीर से कम होता ही रहता है, पानी की कमी से रक्त में अन्य पदार्थो की सांद्रता बढ़ जाती हैं या यो कहे कि रक्त गाढ़ा होने लगता हैं । जब ऐसा होने लगता हैं तो विशेष प्रकार की कोशिकाओं द्वारा, जो की मस्तिस्क क्षेत्र में स्थित होती हैं और "ओसमोरिसेप्टर" कहलाती हैं, सामान्य स्थिति लाने की दिशा में प्रयास किया जाता हैं । इससे लार ग्रन्थियां आदि अपना स्त्राव निकलना बंद कर देती हैं; जिससे मुह सूखने लगता हैं और हमें प्यास लगने लगती हैं। जब हम पानी पी लेते हैं, तो इस अवस्था में यही क्रिया विपरीत दिशा में कार्य करने लगती हैं और हमारी प्यास बुझ जाती हैं। 

लेकिन शराब तो अपने आप में ही ऐसा द्रव हैं, जो पानी को सोखती हैं, अतः शराब से पानी की पूर्ती के बजाय पानी की कमी और होने लगती हैं। इस स्थिति में शराब  से प्यास बुझने की आशा नहीं की जा सकती । हाँ कुछ ऐल्कॉहॉल ऐसे जरूर होते हैं, जिनमे ऐल्कॉहॉल कम और पानी अधिक होता हैं ; जैसे की बियर । अतः इनसे एक सीमा तक प्यास बुझने में सहायता मिल सकती हैं, परन्तु वास्तविकता यही हैं की प्यास बुझाने का साधन पानी ही हैं; ऐल्कॉहॉल नहीं । अतः प्यास पानी पीकर ही बुझाई जा सकती हैं ।










लोहे पर जंग क्यों लगता है ?

लोहे पर जंग क्यों लगता है ?


लोहे की  चीजो को किसी नमी वाले स्थान पर कुछ दिन रख जाए तो इन चीजों पर कत्थई रंग की परत सी जम जाती हैं , इसी को ज़ंग लगना कहते हैं । ज़ंग वास्तव में लोहे का ऑक्साइड हैं । जब लोहे के परमाणु ऑक्सीजन से मिलते हैं यानि संयोग करते हैं, तो लोहे का ऑक्साइड बनता है । लोहे के परमाणुओं का ऑक्सीजन से मिलना ऑक्सीकरण की क्रिया कहलाती है । लोहे पर जंग लगने के लिए ऑक्सीजन और नमी का होना अत्यंत आवश्यक है । नमी और ऑक्सीजन की उपस्थति में लोहे के परमाणु धीरे - धीरे ऑक्सीजन से मिलकर लोहे का ऑक्साइड बनाते हैं और जंग लगने की क्रिया जारी रहती है । जंग लगने से ठोस लोहे की सतह झड़ने लगती हैं और कमजोर पड़ जाती है । जंग लगने को रोकना  वैज्ञानिको के लिए एक बहुत बड़ी समस्या रही है । लोहे पर जंग लगने को पेंट या प्लास्टिक की पतली परत चढ़कर कुछ हद तक रोक जा सकता हैं । पेंट या प्लास्टिक की पतली परत के कारण लोहे के परमाणु पानी के संपर्क में नहीं आ पाते हैं इसलिए ऑक्सीजन लोहे के साथ संयोग नहीं कर पाती हैं और जंग नहीं लगता हैं. ।












कुत्ते के सूंघने की क्षमता अधिक क्यों होती है ?

कुत्ते के सूंघने की क्षमता अधिक क्यों होती है ?


कुत्ता एक ऐसा प्राणी है, जिसकी दृष्टि काफी कमजोर होती है। वह थोड़ी दूर की ही चीजें साफ देख पता है और उसे भूरा रंग तथा इसकी शेड यानि छाया ही स्पष्ट दिखाई देती है । अपनी इस कमी को वह अपनी तेज घ्राण सूंघने की शक्ति से पूरा करता है । कुत्ते को एक बार कोई चीज सूंघने को दे दी जाए, तो उस गंध को वह आसानी से पहचान लेता है । यही कारण  हैं की कुत्तो को विशेष प्रशिक्षण देकर उनका उपयोग विष्फोटक और नशीले पदार्थ पकड़ने  अपराधियो की तलाश के लिए किया जाता है । कुत्तो की नाक के दोनों छेदो में एक क्षेत्र ऐसा होता है, जहां लाखों की संख्या में विशेष तरह की गंध संवेदनशील कोशिकाए होती है । इन कोशिकाओ को कीमोरिसेप्टर कहते हैं । इनकी संरचना बालों जैसी होती है और  ये बाल  हमेशा म्यूकस नामक तरल पदार्थ से गीले रहते हैं । ये नाड़ियो के जरिये मस्तिक से जुड़ी होती हैं । मस्तिक के इस भाग को आल्फैक्टरी बल्ब कहते हैं । यह भाग जितना बड़ा होता है,घ्राण शक्ति भी उतनी ही अधिक होती हैं । मनुष्य की अपेक्षा कुत्ते का आल्फैक्टरी बल्ब कई गुना बड़ा होता है और इस कारण उसकी सूंघने की क्षमता भी काफी अधिक होती हैं ।