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रविवार, 8 फ़रवरी 2015

ग्रहण-काल में भोजन नहीं करना चाहिए?

हिन्दू धर्म में यह मान्यता है कि ग्रहण-काल में भोजन नहीं करना चाहिए? इसके धार्मिक एवं वैज्ञानिक आधार क्या हैं? 

हिन्दू धर्म में ग्रहण विषय पर जितनी सूक्ष्य शोध हुई है संसार में किसी धर्म व सभ्यता में नहीं हुई। निर्णय सिन्धु में ‘ ग्रहण निर्णय ’ के अवसर पर कहा गया है-
अर्थात् सूर्य ग्रहण के समय शकवात के चार प्रहर एवं चंद्र ग्रहण के समय प्रारंभिक तीन प्रहरों में पका हुआ भोजन नहीं करना चाहिए।
देवी भागवत् 9/35 के अनुसार सूर्य ग्रहण या चन्द्र ग्रहण के समय भोजन करने वाला मनुष्य जितना अन्न का दाना खाता है। उतने वर्षो तक ‘ अरन्तुद ’ नरक में रहता है। फिर वह उदररोग से पीडि़त होकर गुल्मरोगी, काना एवं दन्तहीन हो जाता है।
वैज्ञानिक परीक्षणों से भी यह सिद्ध हो चुका है कि सूर्य चंद्र ग्रहण के समय पड़ने वाली पराबैंगनी (न्सजतं टपवसमत तंले) किरणों से भोजन विषैला हो जाता है। इसलिए हिन्दू लोग पके हुए भोजन पर कुशा एवं तुलसी दल औषध के रूप में रखते हैं तथा आमतौर पर उपवास रखते हैं।







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