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रविवार, 22 फ़रवरी 2015

रविवार व मंगलवार को तेल क्यों नहीं लगाना चाहिए ?

जब तेल-मर्दन (तेल लगाना ) दैनिक जीवनचर्या का अगं है तो रवि-मंगलवार को निषेध क्यों? 

धर्मग्रंथों में एक श्लोक मिलता है-
‘‘ तेलाभ्यड्गे रवौ तापः सोमे शोभा कुजेमृतिः।
बुधेर्धन गुरौहानिः, शुक्रे दुःख शनौ सुखम्।।’’

अर्थात् रविवार को तेल-मर्दन से ताप, सोमवार को शारीरिक सौन्दर्य, मंगल को मृत्यु, बुध को धन प्राप्ति, गुरू को हानि, शुक्र को दुःख एवं शनि को सुख होता है। यह शास्त्र वचन है, इसलिए अति बुद्धिवादी लोग इसे व्यर्थ का ढोंग बताकर इन वचनों की नितान्त उपेक्षा करते हैं। सत्यता तो यह है कि तेलमर्दन का वास्तविक लाभ आप तभी उठा सकते हैं जब इसका आचरण धर्मानुसार ही करें।

इस पक्ष का वैज्ञानिक स्पष्टीकरण :- 

चाहे यूरोप हो या हिन्दुस्तान, रविवार ही सब जगह कहा जाता है क्योंकि यह दिन सूर्य से ज्यादा प्रभावित रहता है। सूर्य गर्मी का भण्डार है, आग की ऐसी दहकती हुई भट्टी है, जिसकी गर्मी करोड़ों वर्गमील दूर रहने वाले मनुष्यों को प्रभावित किए बिना नहीं रहती। शरीर में भी जठराग्नि ‘पिता’ गर्मी विद्यमान है। अधिक गर्मी से गर्मी-संबंधी रोग तुरंत हो जाते है। रविवार को सम्पूर्ण दिन का वातारण अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक गर्म होता है जिसके प्रभाव से हमारे शरीर के भीतर के पित्त अन्य दिनों की अपेक्षा ज्यादा बढे हुए होते हैं। तेल-मर्दन से भी शरीर की गर्मी संबंधी रोग तुरंत हो जाते हैं। बिना सोच-समझे अन्धाधुन्ध तेल रगड़ने से पित्त की गर्मी बढ़ जाएगी परिणामतः उच्च रक्त चाप, खुजली आदि पित्तजन्य रोग उत्पन्न होने की संभावना रहती है। इसी वैज्ञानिक पक्ष को शोध करने के पश्चात् ही भारतीय ऋषियों ने सूत्र दिया- ‘‘रवौ तापः।’’

क्या इन निषेध वचनों का कोई परिहार भी है?
हमारे ऋषियों ने तेल-मर्दन के इन निषेध वचनों के परिहार भी दिए हैं। यथा- ‘रवौ पुष्प’ गुरौ दूर्वा, भौमवारे च मृत्तिका।
गोमयं शुक्रवारे च, तेलाभ्यंगे न दोषभाक्।।’’
अर्थात् यदि रविवार को पुष्प, गुरूवार को दूर्वा, मंगल को मिट्टी और शुक्र को जरा-सा गोमय डाल दिया जाए तो तेल-मर्दन में कोई दोष नहीं है












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