Adsense responsive

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

गोमूत्र पवित्र क्यों है?

गोमूत्र पवित्र क्यों है?  

गोमाता शुचि है। उसका मुख अपवित्र है, परंतु उसके पीठ के पीछे का हिस्सा परम पवित्र कहा गया है? इसलिए गोमूत्र व गोबर दोनों ही पवित्र है।
गोमूत्र में गंधक और पारद के तात्त्विक अंश प्रचुर मात्रा में होते हैं। यकृत और प्लीहा जैसे रोग गोमूत्र के सेवन से दूर हो जाते हैं। गोमूत्र कैंसर जैसे रोगों को ठीक कर देता है तथा संक्रामक रोगों को नष्ट कर देता है।
गोमूत्र कटु तीक्ष्णोष्णं क्षारं तिक्तकषायकम्।
लध्वाग्निप्रदीपनं मेध्यं पित्तकृच्छकफवातह्मत् ।। 1।।
शूलगुल्मोदरानाहकण्ड्वाक्षि मुखरोगजित्।
किलासगदवातामंवस्ति रूक्कुष्ठनाशनम्।। 2।।
गोमूत्रं चरपरा, तीक्ष्ण, गरम, खारा, कसैला, हल्का, अग्निप्रदीपक, मेधा को हितकारी, पित्तनाशक व कफ, वात, शूल, गुल्म, उदय, अफारा, खुजली, नेत्र-रोग, मुखरोग, किलासकोढ़, वात-संबंधी रोग, वस्तिरोग, कोढ़, खांसी, सूजन, कामला तथा पाण्डुरोग नाशक है।
गोमूत्र पिया जाए तो खुजली, किलासकोढ़, शूल, मुख-रोग, नेत्र-रोग, गुल्म (गोला) अतिसार, वात-संबंधी रोग, मूत्ररोग, खांसी, कोढ़, उदर रोग, कृमि व पाण्डुरोग नाशक है। सर्व मूत्रों में गौ मूत्र अधिक गुणवाला है। इस कारण जहां केवल मूत्र ही कहा है वहां गाय का मूत्र ही लेना चाहिए। गाय का मूत्र कसैला, कड़वा, तीक्ष्ण, कान में डालने से कर्णशूल नाशक और प्लीहा (तिल्ली), उदररोग, श्वास, खांसी सूजन, मलरोग, ग्रहबाधा, शूल, गुल्म, अफारा, कामला व पाण्डुरोग नाशक है।














कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें