Adsense responsive

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

शादी की अजब-गजब परंपरायें और रीति-रिवाज,दुनिया अजीब-अजीब घटनाओं और परंपरा



दुनिया अजीब-अजीब घटनाओं और परंपराओं से भरी हुई है, अक्सर भारत के बारे में कहा जाता है कि यहां कदम-कदम पर बोली और रीति-रिवाज बदल जाते हैं लेकिन दोस्तों ऐसा नहीं हैं, जितनी विभिन्ताएं और परंपरायें हमारे देश में हैं ना वैसे ही दुनिया के दूसरे देशों में भी है। चलिए बात करते हैं शादी की, जिसकी अहमियत दुनिया के हर देश में हैं। इसलिए हर देश में शादी करने के तरीके भी काफी अलग-अलग और दिलचस्प हैं।


आईये आपको बताते हैं ऐसे ही कुछ दिलचस्प शादी की परंपराओं और अजब-गजब रीति-रिवाजों के बारे में..






दाएं हाथ में रिंग

पूर्व देशों के लोगों के लिए सगाई की अंगूठी काफी मायने रखती हैं जिसे कि वे बांए की बजाय दाएं हाथ की तीसरी अंगुली में पहनते हैं। इसके पीछे कारण उनका धर्म है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि सारे शुभ और धार्मिक काम हम दाएं हाथ से ही करते हैं इसलिए सगाई भी दाएं हाथ से होनी चाहिए। तीसरी अंगुली इसलिए क्योंकि इसकी नस सीधे दिल तक पहुंचती है।




मोजे के किनारे काटना

यह शादी के वक्त होता है जब शादी करने वाला लड़का ब्रेकफास्ट करता है। उसके ठीक बाद उसके दोस्त उसके पहने मोजे के किनारे काट देते हैं। इसके पीछे कारण यह बताया जाता है कि मोजे काटने की वजह से लड़का कभी भी अपनी बीवी को अकेले छोड़कर कहीं नहीं जायेगा।





शादी की सेज

ग्रीस जैसे देशों में लड़के-लड़की की शादी के बाद पहली रात लड़की के घर पर होती है। इसलिए सुहागरात की सारी तैयारियां लड़की के घर वाले करते हैं। लड़की का भविष्य अच्छा हो वो सुखी और संपन्न रहे इसके लिए लड़की वाले सेज पर पैसे और फूल की माला सजाते हैं ताकी लड़की का नया जीवन प्यार और पैसे से महकता रहे।




सेज पर छोट बच्चा

पूर्व देशों में शादी की सेज पर घर-परिवार की ओर से छोटे बच्चे( जिसकी उम्र 1 साल से कम हो) को 5 मिनट के लिए लिटाया जाता है ताकि नये जोड़ों को जल्दी से संतान सुख मिले।





ताला लगाना

पूर्वी देशों में शादी के बाद नये जोड़े को एक सूखे पेड़ पर जंजीर बांधकर उसपर ताला लगाना होता है और उसकी चाभी को जंगल या नदी में फेंकनी होती है ताकी दोनों का आने वाला जीवन प्यार और भरोसे से बना रहे और उसमें किसी तीसरे की जगह ना हो।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



सोमवार, 29 अगस्त 2016

विदेशों में कई ऐसी जगह है जो भारतीय जगहों से काफी मिलती जुलती है



विदेशों में कई ऐसी जगह है जो भारतीय जगहों से काफी मिलती जुलती है। 
 आज इस लेख में हम आपको 10 ऐसी जगहों के बारे में बता रहे है।

1-इंडिया गेट और आर्क द ट्रिओम्फे (India Gate and Arc de Triomf)इंडिया गेट और आर्क द ट्रिओम्फे देखने में बिल्कुल एक जैसे लगते है। दोनों इमारते सैनिकों की याद को ताजा रखने के लिए बनाएं गए है। यह पेरिस का फेमस लैंडमार्क है।

2-जलमहल और ट्राकाई कैसल (Jalmahal and Trakai castle)जलमहल राजस्थान (भारत) की राजधानी जयपुर के मानसागर झील के मध्‍य स्थित प्रसिद्ध ऐतिहासिक महल है। अरावली पहाडिय़ों के गर्भ में स्थित यह महल झील के बीचों बीच होने के कारण ‘आई बॉल’ भी कहा जाता है। इसे ‘रोमांटिक महल’ के नाम से भी जाना जाता था। यह महल बिल्कुल ट्राकाई कैसल, लिथुआनिया में बने महल की तरह लगता हैं। खासकर दोनों महल रात के समय एक जैसे लगते हैं।

विदेशों में कई ऐसी जगह है जो भारतीय जगहों से काफी मिलती जुलती है
3-गुरदॉन्गमार लेक और जोकुलसैरलॉन लेक (Gurudongmar lake and Jokulsarlon lake)जॉकुल्सरलॉन साउथ-ईस्ट आइसलैंड में एक बहुत ही बड़ा ग्लैशियल लेक है। जॉकुल्सरलॉन का मतलब ही होता है ग्लैशियल रिवर लैगून। यहां कई हॉलीवुड मूवीज की शूटिंग हुई है। जोकुलसैरलॉन और सिक्किम की झील देखने में एक जैसी लगती है। सिक्किम यह लेक दुनिया की सबसे बड़ी झील में शामिल हैं।

4- गुलमर्ग, जम्मू और कश्मीर और स्विट्ज़रलैंड (Gulmarg and Switzerland)जम्मू और कश्मीर का यह टाउन इंडिया का स्विट्ज़रलैंड है। इस हिल स्टेशन पर आपको स्विट्ज़रलैंड की तरह माउंटेन, झरने, वैली, हरियाली मिल जाएगी। यह इंडिया की पॉपुलर स्की (बर्फ पर राइडिंग करना) डेस्टिनेशन है। यह जगह इसलिए भी खास है, क्योंकि यह टाउन हिमालय के पास है। इस वजह से यह और भी खूबसूरत लगता है।
विदेशों में कई ऐसी जगह है जो भारतीय जगहों से काफी मिलती जुलती है
5. अथिरापिल्ली फॉल्स, केरल और नियाग्रा फाल्स, कनाडा (Athirapally falls, Kerala and Niagara falls, Canada)केरल के थ्रिसुर टाउन का अथिरापिल्ली फॉल्स कैनेडा के निआग्रा फॉल्स की ही तरह है। केरल का यह फॉल्स बहुत खूबसूरत है, इसे देखकर बिल्कुल अहसास नहीं होगा कि यह इंडिया में है। कैनेडा के निआग्रा फॉल्स से अलग यहां की वाइल्ड लाइफ भी देखने लायक है। जमीन से 80 फीट नीचे गिरते इस फॉल्स को इंडिया का निआग्रा भी कहा जाता है।



6. गोवा, भारत और ब्राजील (Goa and Brazil)इंडिया में बीच का मजा लेना चाहते हैं, तो गोवा जरूर जाएं। यहां आपको ब्राज़ील की ही तरह बीच मिल जाएंगे। हाथ में कॉकटेल, स्विम सूट, सन बाथ लेते लोग, बीच पर लेटकर मस्ती करते लोग, यह सब जिसे सोचकर आप ब्राजील जाना चाहते हैं। यही आपको इंडिया के गोवा में मिल जाएगा। इतना ही नहीं रात का एटमॉसफेयर यहां और भी अच्छा होता है।

7. जामा मस्ज़िद, दिल्ली और बादशाही मस्जिद, लाहौर (Jama masjid, Delhi and Badshahi masjid Lahore)मुगलों द्वारा बनाई गई लाहौर की खूबसूरत मस्ज़िदों का दीदार करना चाहते हैं, तो इसका लुत्फ आप दिल्ली की जामा मस्ज़िद देखकर ही उठा सकते हैं। यह भारत की सबसे बड़ी मस्ज़िद है, जिसे 1665 में शाहजहां ने दिल्ली में बनवाया था। इस मस्ज़िद को बनने में 17 साल का समय लगा। यह लाहौर की बादशाही मस्ज़िद से भी कई गुना ज्यादा खूबसूरत है।

8. कच्छ, गुजरात और उताह, अमेरिका (Kutch,Gujarat and Utah, Amerika)कच्छ का यह नमक से फैली जगह अमेरिका के उताह शहर की ही तरह है। गुजरात का यह ‘ग्रेट रण ऑफ कच्छ’ दुनिया का सबसे बड़ा सॉल्ट डेज़र्ट (नमक का रेगिस्तान) माना जाता है। यह पूरा डेजर्ट 10,000 स्क्वेयर किलोमीटर में फैला हुआ है। ठीक इसी तरह अमेरिका का उताह में भी बहुत बड़ा नमक का रेगिस्तान है।


9. लक्ष्यद्वीप, भारत और थाईलैंड (Lakshadweep and Thailand)समुद्र में चमकता नीला पानी, सफेद रेत, बीच पर हरियाली और आस पास ऊंचे-ऊंचे पहाड़। दुनिया की भीड़ से दूर इन सबके बीच सिर्फ आप। इतना ही नहीं किसी खूबसूरत सीनरी की तरह नीले पानी में चलती बोट, बीच पर मौजूद बहुत सारे पाइन ट्री और समु्द्र में मछलियों के बीच डाइविंग करते आप। यह सब कुछ जो आप थाईलैंड के लिए प्लान कर रहे हैं वही सब कुछ इंडिया के खूबसूरत द्वीपों में से एक लक्ष्यद्वीप में एन्जॉय कर सकते हैं।

10. थार, राजस्थान और सहारा डेजर्ट, अफ्रीका (Thar, Rajasthan and Sahara desert, Africa)दुनिया का सबसे बड़ा रेगिस्तान सहारा की ही तरह भारत में थार रेगिस्तान मौजूद है। हज़ारों किलोमीटर तक फैली रेत, रेत पर चलते ऊंट, सूरज ढलने और उगने के दौरान सोने जैसी चमकती रेत, यह सब थार में मौजूद है। इसीलिए अगर आप इंडिया में ही रेगिस्तान का मज़ा लेना चाहते हैं, तो थार का रूख जरूर करें।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



घर में आती है नेगेटिव एनर्जी इन आदतों से



यदि किसी घर-परिवार में अक्सर परेशानियां बनी रहती हैं। परिवार का कोई न कोई सदस्य हमेशा बीमार या अस्वस्थ रहता है। आर्थिक तंगी रहती है। छोटे-छोटे काम भी बड़ी कठिनाई से पूरे होते हैं। ऐसा तब संभव है जब उस घर में कोई वास्तु दोष हो, कोई नकारात्मक शक्ति सक्रिय हो। आइए जानते हैं किन कामों को करने पर नकारात्मक ऊर्जा आकर्षित होती है…



लंबे नाख़ून



इंसान के शरीर की उंगलियों से लगातार ऊर्जा निकलती है ऐसे में लंबें नाखून रखने पर उनमें थोड़ी बहुत गंदगी तो रहती है इसी कारण शरीर से निकलने वाली ऊर्जा नकारात्मकता को आकर्षित करने लगती है।


मिठाई लेकर घूमना



माना जाता है कि मिठाई की तरफ नकारात्मक ऊर्जाएं विशेष रूप से आकर्षित होती है। इसलिए बढे-बुजूर्ग का मानना है की बिना झूठा किए सुनसान इलाकों व गंदी जगहों पर मीठा लेकर नहीं घूमना चाहिए।

रात को इत्र लगाकर रखना





रात के समय इत्र लगाकर रखने पर नकारात्मक शक्तियां आकर्षित होती है और अपनी गिरफ्त में लेने का प्रयास करती हैं।

गंदे कपडे पहनना



साफ़ कपडे पहनने से देवता प्रसन्न होते हैं वहीँ गंदे व अशुद्ध कपड़े पहनने पर नकारत्मक शक्तियां आकर्षित होती हैं।


मकड़ी के जाले होना



मकड़ी के जाले में असंख्य सूक्ष्मजीव रहते हैं जो कि हमारे स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए कहा जाता हैं कि अगर घर में मकड़ी के जाले होते हैं तो घर की सुख-समृद्धि का नाश होने लगता है, क्योंकि नकारात्मक ऊर्जा रहती है।

झूठे बर्तन रखना



रात के समय घर में झूठे बर्तन रखने से उसमें छोटे-छोटे बैक्टिरिया जन्म ले लेते हैं। साथ ही, घर में नकारात्मका निवास करने लगती है। जिससे गरीबी आती है।

बाल खुले रखकर घूमना



हिन्दू धर्म ग्रंथो में स्त्रियों का किसी विशेष शुभ मौके पर बाल खुले रखना अच्छा माना गया है, लेकिन रोज़ाना ऐसा करने पर नकारात्मकत ऊर्जा हावी हो सकती है। विशेषकर जब चंद्रमा की कलाएं घटती है, तब मन अधिक भावुक होता है। ऐसे में यह संभावना अधिक होती है।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



शनिवार, 27 अगस्त 2016

पूजा में परिक्रमा- क्यों करें, कैसे करें, कितनी करें?



पूजा करते समय देवी-देवताओं की परिक्रमा की जाती है। शास्त्रों में बताया गया है भगवान की परिक्रमा से अक्षय पुण्य मिलता है और पाप नष्ट होते हैं। इस परंपरा के पीछे धार्मिक महत्व के साथ ही वैज्ञानिक महत्व भी है। जिन मंदिरों में पूरे विधि-विधान के साथ देवी-देवताओं की मूर्ति स्थापित की जाती है, वहां मूर्ति के आसपास दिव्य शक्ति हमेशा सक्रिय रहती है। मूर्ति की परिक्रमा करने से उस शक्ति से हमें भी ऊर्जा मिलती है। इस ऊर्जा से मन शांत होता है। जिस दिशा में घड़ी की सुई घुमती है, उसी दिशा में परिक्रमा करनी चाहिए, क्योंकि दैवीय ऊर्जा का प्रवाह भी इसीप्रकार रहता है।


किस भगवान की कितनी परिक्रमा करना चाहिए

1. श्रीकृष्ण की 3 परिक्रमा करनी चाहिए।


2. देवी की 1 परिक्रमा करनी चाहिए।

3. भगवान विष्णुजी एवं उनके सभी अवतारों की चार परिक्रमा करनी चाहिए।

4. श्रीगणेशजी और हनुमानजी की तीन परिक्रमा करने का विधान है।



5. शिवजी की आधी परिक्रमा करनी चाहिए, क्योंकि शिवजी के अभिषेक की धारा को लाघंना अशुभ माना जाता है।

परिक्रमा करते समय ध्यान रखनी चाहिए ये बातें

1. जिस देवी-देवता की परिक्रमा की जा रही है, उनके मंत्रों का जप करना चाहिए।


2. भगवान की परिक्रमा करते समय मन में बुराई, क्रोध, तनाव जैसे भाव नहीं होना चाहिए।

3. परिक्रमा नंगे पैर ही करना चाहिए।

4. परिक्रमा करते समय बातें नहीं करना चाहिए। शांत मन से परिक्रमा करें।

5. परिक्रमा करते समय तुलसी, रुद्राक्ष आदि की माला पहनेंगे तो बहुत शुभ रहता है।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



ये उपाय करने से चमक सकती है किस्मत



तंत्र व ज्योतिष शास्त्र के अंतर्गत अनेक ऐसे छोटे व आसान उपाय बताए गए हैं, जिन्हें करने से जीवन की हर परेशानी दूर हो सकती है। बहुत से लोग इन उपायों के बारे में या तो जानते नहीं है और यदि जानते हैं तो इन पर विश्वास नहीं करते। इन उपायों पर विश्वास करने के लिए जरूरी है स्वयं पर विश्वास करना।

तंत्र शास्त्र व ज्योतिष के अनुसार, यदि ये उपाय सच्चे मन से किए जाएं तो जल्दी ही इनका सकारात्मक प्रभाव देखा जा सकता है। आज हम आपको कुछ ऐसे ही छोटे और अचूक उपाय बता रहे हैं, जिन्हें सच्चे मन से करने से आपकी जिंदगी की हर परेशानी दूर हो सकती है। ये उपाय इस प्रकार हैं-
1. रोज सुबह उठकर अपनी हथेलियां देखें



रोज सुबह जब आप उठें तो सबसे पहले दोनों हाथों की हथेलियों को कुछ क्षण देखकर चेहरे पर तीन चार बार फेरे। धर्म ग्रंथों के अनुसार, हथेली के ऊपरी भाग में मां लक्ष्मी, बीच में मां सरस्वती व नीचे के भाग (मणि बंध) में भगवान विष्णु का स्थान होता है। इसलिए रोज सुबह उठते ही अपनी हथेली देखने से भाग्य चमक उठता है।

2. पहली रोटी गाय को दें

भोजन के लिए बनाई जा रही रोटी में से पहली रोटी गाय को दें। धर्म ग्रंथों के अनुसार, गाय में सभी देवताओं का निवास माना गया है। अगर प्रतिदिन गाय को रोटी दी जाए तो सभी देवता प्रसन्न होते हैं और आपकी हर मनोकामना पूरी कर सकते हैं।
3. चीटियों को आटा डालें

अगर आप चाहते हैं कि आपकी किस्मत चमक जाए तो रोज चीटियों को शक्कर मिला हुआ आटा डालें। ऐसा करने से आपके पाप कर्मों का क्षय होगा और पुण्य कर्म उदय होंगे। यही पुण्य कर्म आपकी मनोकामना पूर्ति में सहायक होंगे।
4. देवताओं को फूलों से सजाएं

घर में स्थापित देवी-देवताओं को रोज फूलों से सजाना चाहिए। इस बात का ध्यान रखें कि फूल ताजे ही हो। सच्चे मन से देवी-देवताओं को फूल आदि अर्पित करने से वे प्रसन्न होते हैं व व्यक्ति के जीवन की हर परेशानी दूर कर सकते हैं। स्नान करने के बाद तोड़े गए फूल ही भगवान को चढ़ाना चाहिए, ऐसा नियम है।


5. सुबह करें झाड़ू-पोछा

घर को हमेशा साफ-स्वच्छ रखना चाहिए। रोज सुबह झाड़ू-पोछा करें। सूर्यास्त के बाद झाड़ू-पोछा नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से मां लक्ष्मी रूठ जाती हैं और व्यक्ति को आर्थिक हानि का सामना भी करना पड़ सकता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, जो व्यक्ति सूर्यास्त के बाद झाड़ू-पोछा करता है, देवी लक्ष्मी उस घर में निवास नहीं करती और वहां से चली जाती हैं।
6. मछलियों को आटे की गोलियां खिलाएं

अपने घर के आस-पास कोई ऐसा तालाब, झील या नदी का चयन करें, जहां बहुत सी मछलियां हों। यहां रोज जाकर आटे की गोलियां मछलियों को खिलाएं। मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने का यह बहुत ही अचूक उपाय है। नियमित रूप से जो यह उपाय करता है, कुछ ही दिनों में उसकी परेशानियां दूर होने लगती हैं।
7. माता-पिता का आशीर्वाद लें

रोज जब भी घर से निकले तो उसके पहले अपने माता-पिता और घर के बड़े बुजुर्गों के पैर छूकर आशीर्वाद लें। ऐसा करने से आपकी कुंडली में स्थित सभी विपरीत ग्रह आपके अनुकूल हो जाएंगे और शुभ फल प्रदान करेंगे। माता-पिता के आशीर्वाद से आप पर आने वाला संकट टल जाएगा और आपके काम बनते चले जाएंगे।

8. पीपल पर जल चढ़ाएं

रोज सुबह स्नान आदि करने के बाद पीपल के पेड़ पर एक लोटा जल चढ़ाएं। मान्यता है कि पीपल में भगवान विष्णु का वास होता है। रोज ये उपाय करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और शुभ फल प्रदान करते हैं। इस पेड़ का महत्व इसी बात से जाना जा सकता है कि अर्जुन को गीता को उपदेश देते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं को पेड़ों में पीपल बताया था।
9. घर खाली हाथ न जाएं

बाहर से जब भी आप घर में प्रवेश करें तो कभी खाली हाथ ना जाएं। घर में हमेशा कुछ ना कुछ लेकर प्रवेश करें। चाहे वह पेड़ का पत्ता ही क्यों न हो।

सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



600 करोड़ रुपए के गणेशजी



गुजरात के सूरत शहर को हीरा नगरी के रूप में जाना जाता है। इसी हीरा नगरी में है कच्चे हीरे की 182. 3 कैरेट की गणेश जी की प्रतिमा, जिस का वजन 36.5 ग्राम है। गणेश जी के आकार के इस हीरे का बाजार मूल्य लगभग 600 करोड़ रुपय है। हीरे के इस गणेश जी की सबसे बड़ी खासियत यह है की यह प्राकर्तिक है इसे बनाया नहीं गया है।



आसोदरिया परिवार के है अराध्य :
गणेश जी का यह स्वरुप सूरत के प्रसिद्द हीरा व्यापारी कनुभाई आसोदरिया के घर पर है जो की पिछले 12 वर्षो से आसोदरिया परिवार के अराध्य है। आसोदरिया परिवार के मुताबिक़ आज से 12 साल पहले बेल्जियम से आए कच्चे हीरों की खेप में ये हीरा मिला था। इसमें गणेश जी की छवि नज़र आने पर इसे घर के मंदिर में रख दिया गया, तब से यह यही पर विराजित है।



600 करोड़ रूपए लग चुकी है कीमत :
वैसे तो अास्था की कोई कीमत नहीं होती है पर हीरे के इन गणेश जी के लिए आसोदरिया परिवार के पास अब तक 600 करोड़ रूपए तक के ऑफर आ चुके है , पर आसोदरिया परिवार इन्हे बेचने का इच्छुक नहीं है।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



फेंगशुई – जानिए किस धातु के कछुए को रखने से होता है क्या फायदा



वास्तु शास्त्र और फेंगशुई दोनों में ही कछुए को बहुत शुभ माना जाता है। कछुए में नेगेटिव एनर्जी को खत्म करके पॉजिटीव एनर्जी बढ़ाने की अद्भुत ताकत मानी जाती है। कछुआ घर में होने से मन के लिए शांति और जीवन के लिए धन ले कर आता है। कछुए के घर में होने से कई प्रकार के लाभ होते हैं।

फेंगशुई के अनुसार घर में कछुआ रखने से घर के सदस्यों की उम्र लंबी होती है और सौभाग्य में भी वृद्धि होती है, इसलिए घर या ऑफिस में इसका होना लाभदायक माना जाता है। फेंगशुई के अनुसार कछुआ या कछुए की प्रतिमा रखने के लिए उत्तर दिशा शुभ मानी जाती है।

विभिन्न धातु से बने कछुए



आज-कल कई अलग-अलग धातुओं, आकार और रंग के कछुए आने लगे हैं। ऐसे में इस बात को समझना और उसका पालन करना बहुत जरुरी है कि कौन-सी इच्छा को पूरा करने के लिए किस धातु का बना कछुआ घर, दूकान या ऑफिस में रखना चाहिए। वास्तु शास्त्र और फेंगशुई के अनुसार अलग-अलग धातु से बने कछुए, विभिन्न परिणाम देते हैं।

संतान प्राप्ति के लिए


एक ख़ास प्रकार का कछुआ जिसकी पीठ पर बच्चे कछुए भी हों, उसे संतान प्राप्ति के लिए ख़ास माना जाता है। जिस घर में संतान ना हो या जो दंपत्ति संतान सुख से वंचित हों, उन्हें इस प्रकार का कछुआ अपने घर में रखना चाहिए।



धन प्राप्ति के लिए


इसके अलावा कछुआ धन प्राप्ति का भी सूचक माना गया है। यदि किसी को धन संबंधी परेशानी हो, तो उसे क्रिस्टल वाला कछुआ लाना चाहिए। इसे वह अपने कार्यस्थल या तिजोरी में भी रख सकते हैं।

बिजनेस में तरक्की के लिए



बिजनेस या ऑफिस में लगातार हो रहे नुकसान को रोक, तरक्की के अवसर पाने के लिए मेटल का कछुआ रखना चाहिए। इसे दूकान-ऑफिस के अलावा अपने बेडरूम में भी रखा जा सकता है।

बीमारियों से बचने के लिए


अगर घर में आए दिन किसी न किसी तरह की बीमारियां होती रहती है तो इससे बचने के लिए घर में मिटटी का बना कछुआ रखना सबसे अच्छा माना जाता है।

नया व्यापार शुरू करने पर


यदि आपने नया व्यापार शुरू किया है या करना चाहते हैं तो नई दूकान में चांदी का बना कछुआ रखना बहुत ही शुभ माना जाता है। ऐसा करने से व्यापार को किसी की बुरी नज़र नहीं लगाती।

परीक्षा में सफलता के लिए


आजकल बच्चों के साथ-साथ बड़े भी अपनी नौकरी में प्रमोशन पाने के लिए आए दिन परीक्षा की तैयारी करते रहते हैं, ऐसे में पीतल का बना कछुआ आपको सफलता पाने में मदद करेगा।

क्लेश खत्म करने के लिए


यदि घर के सदस्यों में आए दिन लड़ाई-झगडे होते रहते हैं तो घर में 2 कछुओं का जोड़ा रखना चाहिए। ऐसा करने से घर के सदस्यों के बीच चल रही अनबन ख़त्म हो जाएगी और प्यार बढेगा।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

दो माँ से आधा-आधा पैदा हुआ था जरासंध, जानिए जरासंध से जुडी कुछ रोचक बातें



महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत ग्रंथ में अनेक महारथी व बलशाली राजाओं का वर्णन है। ऐसा ही एक महारथी राजा था जरासंध। उसके जन्म व मृत्यु की कथा भी बहुत ही रोचक है। जरासंध मगध (वर्तमान बिहार) का राजा था। वह अन्य राजाओं को हराकर अपने पहाड़ी किले में बंदी बना लेता था। जरासंध बहुत ही क्रूर था, वह बंदी राजाओं का वध कर चक्रवर्ती राजा बनना चाहता था। भीम ने 13 दिन तक कुश्ती लड़ने के बाद जरासंध को पराजित कर उसका वध किया था।



कंस का ससुर था जरासंध

जरासंध मथुरा के राजा कंस का ससुर एवं परम मित्र था। उसकी दोनों पुत्रियों आसित व प्रापित का विवाह कंस से हुआ था। श्रीकृष्ण से कंस वध का प्रतिशोध लेने के लिए उसने 17 बार मथुरा पर चढ़ाई की, लेकिन हर बार उसे असफल होना पड़ा। जरासंध के भय से अनेक राजा अपने राज्य छोड़ कर भाग गए थे। शिशुपाल जरासंध का सेनापति था।


100 राजाओं का करना चाहता था वध

जरासंध भगवान शंकर का परम भक्त था। उसने अपने पराक्रम से 86 राजाओं को बंदी बना लिया था। बंदी राजाओं को उसने पहाड़ी किले में कैद कर लिया था। जरासंध 100 को बंदी बनाकर उनकी बलि देना चाहता था, जिससे कि वह चक्रवर्ती सम्राट बन सके।

ऐसे हुआ था जरासंध का जन्म



मगधदेश में बृहद्रथ नाम के राजा थे। उनकी दो पत्नियां थीं, लेकिन उन्हें कोई संतान नहीं थी। एक दिन संतान की चाह में राजा बृहद्रथ महात्मा चण्डकौशिक के पास गए और सेवा कर उन्हें संतुष्ट किया। प्रसन्न होकर महात्मा चण्डकौशिक ने उन्हें एक फल दिया और कहा कि ये फल अपनी पत्नी को खिला देना, इससे तुम्हें संतान की प्राप्ति होगी। राजा बृहद्रथ की दो पत्नियां थीं। राजा ने वह फल काटकर अपनी दोनों पत्नियों को खिला दिया। समय आने पर दोनों रानियों के गर्भ से शिशु के शरीर का एक-एक टुकड़ा पैदा हुआ। रानियों ने घबराकर शिशु के दोनों जीवित टुकड़ों को बाहर फेंक दिया। उसी समय वहां से एक राक्षसी गुजरी। उसका नाम जरा था। जब उसने जीवित शिशु के दो टुकड़ों को देखा तो अपनी माया से उन दोनों टुकड़ों को जोड़ दिया और वह शिशु एक हो गया। एक शरीर होते ही वह शिशु जोर-जोर से रोने लगा।



बालक की रोने की आवाज सुनकर दोनों रानियां बाहर निकली और उन्होंने उस बालक को गोद में ले लिया। राजा बृहद्रथ भी वहां आ गए और उन्होंने उस राक्षसी से उसका परिचय पूछा। राक्षसी ने राजा को सारी बात सच-सच बता दी। राजा बहुत खुश हुए और उन्होंने उस बालक का नाम जरासंध रख दिया क्योंकि उसे जरा नाम की राक्षसी ने संधित (जोड़ा) किया था।

भीम ने ऐसे किया था जरासंध का वध


जरासंध का वध करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने योजना बनाई। योजना के अनुसार श्रीकृष्ण, भीम व अर्जुन ब्राह्मण का वेष बनाकर जरासंध के पास गए और उसे कुश्ती के लिए ललकारा। जरासंध समझ गया कि ये ब्राह्मण नहीं है। जरासंध के कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना वास्तविक परिचय दिया।
जरासंध ने भीम से कुश्ती लड़ने का निश्चय किया। राजा जरासंध और भीम का युद्ध कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा से 13 दिन तक लगातार चलता रहा। चौदहवें दिन भीम ने श्रीकृष्ण का इशारा समझ कर जरासंध के शरीर के दो टुकड़े कर दिए।



जरासंध का वध कर भगवान श्रीकृष्ण ने उसकी कैद में जितने भी राजा थे, सबको आजाद कर दिया और कहा कि धर्मराज युधिष्ठिर चक्रवर्ती पद प्राप्त करने के लिए राजसूय यज्ञ करना चाहते हैं। आप लोग उनकी सहायता कीजिए। राजाओं ने श्रीकृष्ण का यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और धर्मराज युधिष्ठिर को अपना राजा मान लिया। भगवान श्रीकृष्ण ने जरासंध के पुत्र सहदेव को अभयदान देकर मगध का राजा बना दिया।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



क्यों होता है 12 साल में एक बार कुंभ मेले का आयोजन?



कुम्भ मेले का आयोजन चार स्थानों हरिद्वार, प्रयाग, नासिक तथा उज्जैन में होता है। हर जगह कुम्भ मेले का आयोजन 12 साल में एक बार होता है। आइए जानते है क्या है इसका कारण-



कुम्भ मेले के 12 वर्ष में एक बार आयोजित होने के पीछे दो मान्यताएं है। पहली ज्योतिष, दूसरी पौराणिक।

ज्योतिषीय मान्यता

ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार भचक्र में स्थित 360 अंश को 12 भागों में बांटकर 12 राशियों की कल्पना की गई है। भचक्र से तात्पर्य आकाश मंडल से है। हर कुंभ के निर्धारित मुहूर्त में गुरु और सूर्य विशेष महत्वपूर्ण होते हैं। गुरु एक राशि पर लगभग 13 महीने तक रहता है और फिर उसी राशि पर आने में 12 वर्ष का समय लगता है। यही कारण है कि कुंभ पर्व 12 वर्ष में एक बार होता है। हरिद्वार, प्रयाग व नासिक में हर 12 वें साल में कुंभ की परंपरा है। उज्जैन में कुंभ को सिंहस्थ कहा जाता है क्योंकि इस समय गुरु सिंह राशि में होता है।

पौराणिक मान्यता

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक बार इन्द्र देवता ने महर्षि दुर्वासा को रास्ते में मिलने पर जब प्रणाम किया तो दुर्वासाजी ने प्रसन्न होकर उन्हें अपनी माला दी, लेकिन इन्द्र ने उस माला का आदर न कर अपने ऐरावत हाथी के मस्तक पर डाल दिया। जिसने माला को सूंड से घसीटकर पैरों से कुचल डाला। इस पर दुर्वासाजी ने क्रोधित होकर इन्द्र को श्रीविहीन होने का शाप दिया। इस घटना के बाद इन्द्र घबराए हुए ब्रह्माजी के पास गए। ब्रह्माजी ने इन्द्र को लेकर भगवान विष्णु के पास गए और उनसे इन्द्र की रक्षा करने की प्रार्थना की। भगवान ने कहा कि इस समय असुरों का आतंक है। इसलिए तुम उनसे संधि कर लो और देवता और असुर दोनों मिलकर समुद्र मंथन कर अमृत निकालों। जब अमृत निकलेगा तो हम तुम लोगों को अमृत बांट देंगे और असुरों को केवल श्रम ही हाथ मिलेगा।



पृथ्वी के उत्तर भाग मे हिमालय के समीप देवता और दानवों ने समुद्र का मन्थन किया। इसके लिए मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकि को रस्सी बनाया गया। जिसके फलस्वरूप क्षीरसागर से पारिजात, ऐरावत हाथी, उश्चैश्रवा घोड़ा रम्भा कल्पबृक्ष शंख, गदा धनुष कौस्तुभमणि, चन्द्र मद कामधेनु और अमृत कलश लिए धन्वन्तरि निकलें। इस कलश के लिए असुरों और दैत्यों में संघर्ष शुरू हो गया। अमृत कलश को दैत्यों से बचाने के लिए देवराज इन्द्र के पुत्र जयंत बृहस्पति, चन्द्रमा, सूर्य और शनि की सहायता से उसे लेकर भागे। यह देखकर दैत्यों ने उनका पीछा किया। यह पीछा बारह दिनों तक होता रहा। देवता उस कलश को छिपाने के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान को भागते रहे और असुर उनका पीछा करते रहे।

इस भागदौड़ में देवताओं को पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करनी पड़ी। इन बारह दिनों की भागदौड़ में देवताओं ने अमृत कलश को हरिद्वार, प्रयाग, नासिक तथा उज्जैन नामक स्थानों पर रखा। इन चारों स्थानों में रखे गए कलश से अमृत की कुछ बूंदे छलक पड़ी। अंत में कलह को शांत करने के लिए समझौता हुआ। भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर दैत्यों को भरमाए रखा और अमृत को इस प्रकार बांटा कि दैत्यों की बारी आने तक कलश रिक्त हो गया। देवताओं का एक दिन मनुष्य के एक वर्ष के बराबर माना गया है। इसलिए हर 12 वें वर्ष कुंभ की परंपरा है।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



गजेन्द्र मोक्ष की कहानी



अति प्राचीन काल की बात है। द्रविड़ देश में एक पाण्ड्यवंशी राजा राज्य करते थे। उनका नाम था इंद्रद्युम्न। वे भगवान की आराधना में ही अपना अधिक समय व्यतीत करते थे। यद्यपि उनके राज्य में सर्वत्र सुख-शांति थी। प्रजा प्रत्येक रीति से संतुष्ट थी तथापि राजा इंद्रद्युम्न अपना समय राजकार्य में कम ही दे पाते थे। वे कहते थे कि भगवान विष्णु ही मेरे राज्य की व्यवस्था करते है। अतः वे अपने इष्ट परम प्रभु की उपासना में ही दत्तचित्त रहते थे।



राजा इंद्रद्युम्न के मन में आराध्य-आराधना की लालसा उत्तरोत्तर बढ़ती ही गई। इस कारण वे राज्य को त्याग कर मलय-पर्वत पर रहने लगे। उनका वेश तपस्वियों जैसा था। सिर के बाल बढ़कर जटा के रूप में हो गए थे। वे निरंतर परमब्रह्म परमात्मा की आराधना में तल्लीन रहते। उनके मन और प्राण भी श्री हरि के चरण-कमलों में मधुकर बने रहते। इसके अतिरिक्त उन्हें जगत की कोई वस्तु नहीं सुहाती। उन्हें राज्य, कोष, प्रजा तथा पत्नी आदि किसी प्राणी या पदार्थ की स्मृति ही नहीं होती थी।

एक बार की बात है, राजा इन्द्रद्युम्न प्रतिदिन की भांति स्नानादि से निवृत होकर सर्वसमर्थ प्रभु की उपासना में तल्लीन थे। उन्हें बाह्य जगत का तनिक भी ध्यान नहीं था। संयोग वश उसी समय महर्षि अगस्त्य अपने समस्त शिष्यों के साथ वहां पहुँच गए। लेकिन न पाद्ध, न अघ्र्य और न स्वागत। मौनव्रती राजा इंद्रद्युम्न परम प्रभु के ध्यान में निमग्न थे। इससे महर्षि अगस्त्य कुपित हो गए। उन्होंने इंद्रद्युम्न को शाप दे दिया- “इस राजा ने गुरुजनो से शिक्षा नहीं ग्रहण की है और अभिमानवश परोपकार से निवृत होकर मनमानी कर रहा है। ब्राह्मणों का अपमान करने वाला यह राजा हाथी के समान जड़बुद्धि है इसलिए इसे घोर अज्ञानमयी हाथी की योनि प्राप्त हो।”


महर्षि अगत्स्य भगवदभक्त इंद्रद्युम्न को यह शाप देकर चले गए। राजा इन्द्रद्युम्न ने इसे श्री भगवान का मंगलमय विधान समझकर प्रभु के चरणों में सिर रख दिया।

क्षीराब्धि में दस सहस्त्र योजन लम्बा, चौड़ा और ऊंचा त्रिकुट नामक पर्वत था। वह पर्वत अत्यंत सुन्दर एवं श्रेष्ठ था। उस पर्वतराज त्रिकुट की तराई में ऋतुमान नामक भगवान वरुण का क्रीड़ा-कानन था। उसके चारों ओर दिव्य वृक्ष सुशोभित थे। वे वृक्ष सदा पुष्पों और फूलों से लदे रहते थे। उसी क्रीड़ा-कानन ऋतुमान के समीप पर्वतश्रेष्ठ त्रिकुट के गहन वन में हथनियों के साथ अत्यंत शक्तिशाली और अमित पराक्रमी गजेन्द्र रहता था।

एक बार की बात है। गजेन्द्र अपने साथियो सहित तृषाधिक्य (प्यास की तीव्रता) से व्याकुल हो गया। वह कमल की गंध से सुगंधित वायु को सूंघकर एक चित्ताकर्षक विशाल सरोवर के तट पर जा पहुंचा। गजेन्द्र ने उस सरोवर के निर्मल,शीतल और मीठे जल में प्रवेश किया। पहले तो उसने जल पीकर अपनी तृषा बुझाई, फिर जल में स्नान कर अपना श्रम दूर किया। तत्पश्चात उसने जलक्रीड़ा आरम्भ कर दी। वह अपनी सूंड में जल भरकर उसकी फुहारों से हथिनियों को स्नान कराने लगा। तभी अचानक गजेन्द्र ने सूंड उठाकर चीत्कार की। पता नहीं किधर से एक मगर ने आकर उसका पैर पकड़ लिया था। गजेन्द्र ने अपना पैर छुड़ाने के लिए पूरी शक्ति लगाई परन्तु उसका वश नहीं चला, पैर नहीं छूटा। अपने स्वामी गजेन्द्र को ग्राहग्रस्त देखकर हथिनियां, कलभ और अन्य गज अत्यंत व्याकुल हो गए। वे सूंड उठाकर चिंघाड़ने और गजेन्द्र को बचाने के लिए सरोवर के भीतर-बाहर दौड़ने लगे। उन्होंने पूरी चेष्टा की लेकिन सफल नहीं हुए।



वस्तुतः महर्षि अगत्स्य के शाप से राजा इंद्रद्युम्न ही गजेन्द्र हो गए थे और गन्धर्वश्रेष्ठ हूहू महर्षि देवल के शाप से ग्राह हो गए थे। वे भी अत्यंत पराक्रमी थे। संघर्ष चलता रहा। गजेन्द्र स्वयं को बाहर खींचता और ग्राह गजेन्द्र को भीतर खींचता। सरोवर का निर्मल जल गंदला हो गया था। कमल-दल क्षत-विक्षत हो गए। जल-जंतु व्याकुल हो उठे। गजेन्द्र और ग्राह का संघर्ष एक सहस्त्र वर्ष तक चलता रहा। दोनों जीवित रहे। यह द्रश्य देखकर देवगण चकित हो गए।

अंततः गजेन्द्र का शरीर शिथिल हो गया। उसके शरीर में शक्ति और मन में उत्साह नहीं रहा। परन्तु जलचर होने के कारण ग्राह की शक्ति में कोई कमी नहीं आई। उसकी शक्ति बढ़ गई। वह नवीन उत्साह से अधिक शक्ति लगाकर गजेन्द्र को खींचने लगा। असमर्थ गजेन्द्र के प्राण संकट में पड़ गए। उसकी शक्ति और पराक्रम का अहंकार चूर-चूर हो गया। वह पूर्णतया निराश हो गया। किन्तु पूर्व जन्म की निरंतर भगवद आराधना के फलस्वरूप उसे भगवत्स्मृति हो आई। उसने निश्चय किया कि मैं कराल काल के भय से चराचर प्राणियों के शरण्य सर्वसमर्थ प्रभु की शरण ग्रहण करता हूं। इस निश्चय के साथ गजेन्द्र मन को एकाग्र कर पूर्वजन्म में सीखे श्रेष्ठ स्त्रोत द्वारा परम प्रभु की स्तुति करने लगा।

गजेन्द्र की स्तुति सुनकर सर्वात्मा सर्वदेव रूप भगवान विष्णु प्रकट हो गए। गजेन्द्र को पीड़ित देखकर भगवान विष्णु गरुड़ पर आरूढ़ होकर अत्यंत शीघ्रता से उक्त सरोवर के तट पर पहुंचे। जब जीवन से निराश तथा पीड़ा से छटपटाते गजेन्द्र ने हाथ में चक्र लिए गरुड़ारूढ़ भगवान विष्णु को तीव्रता से अपनी ओर आते देखा तो उसने कमल का एक सुन्दर पुष्प अपनी सूंड में लेकर ऊपर उठाया और बड़े कष्ट से कहा- “नारायण ! जगद्गुरो ! भगवान ! आपको नमस्कार है।”


गजेन्द्र को अत्यंत पीड़ित देखकर भगवान विष्णु गरुड़ की पीठ से कूद पड़े और गजेन्द्र के साथ ग्राह को भी सरोवर से बाहर खींच लाए और तुरंत अपने तीक्ष्ण चक्र से ग्राह का मुंह फाड़कर गजेन्द्र को मुक्त कर दिया।

ब्रह्मादि देवगण श्री हरि की प्रशंसा करते हुए उनके ऊपर स्वर्गिक सुमनों की वृष्टि करने लगे। सिद्ध और ऋषि-महर्षि परब्रह्म भगवान विष्णु का गुणगान करने लगे। ग्राह दिव्य शरीर-धारी हो गया। उसने विष्णु के चरणो में सिर रखकर प्रणाम किया और भगवान विष्णु के गुणों की प्रशंसा करने लगा।

भगवान विष्णु के मंगलमय वरद हस्त के स्पर्श से पाप मुक्त होकर अभिशप्त हूहू गन्धर्व ने प्रभु की परिक्रमा की और उनके त्रेलोक्य वन्दित चरण-कमलों में प्रणाम कर अपने लोक चला गया। भगवान विष्णु ने गजेन्द्र का उद्धार कर उसे अपना पार्षद बना लिया। गन्धर्व,सिद्ध और देवगण उनकी लीला का गान करने लगे। गजेन्द्र की स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने सबके समक्ष कहा- “प्यारे गजेन्द्र ! जो लोग ब्रह्म मुहूर्त में उठकर तुम्हारी की हुई स्तुति से मेरा स्तवन करेंगे, उन्हें मैं मृत्यु के समय निर्मल बुद्धि का दान करूँगा।”

यह कहकर भगवान विष्णु ने पार्षद रूप में गजेन्द्र को साथ लिया और गरुडारुड़ होकर अपने दिव्य धाम को चले गए।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



गुरुवार, 25 अगस्त 2016

जन्माष्टमी को सुख-समृद्धि प्राप्ति के लिए करें ये ज्योतिष उपाय



तंत्र शास्त्र के अनुसार किसी भी सिद्धि या मनोकामना को पूरा करने के लिए चार रात्रियां सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। इनमें पहली कालरात्रि है, जिसे नरक चतुर्दशी या दीपावली भी कहा जाता है। दूसरी अहोरात्रि या शिवरात्रि है। तीसरी दारुणरात्रि या होली है। चौथी मोहरात्रि या जन्माष्टमी है।



शास्त्रों के अनुसार श्री कृष्ण की पत्नी रुक्मणी माँ लक्ष्मी का अवतार थी अत: अगर इस दिन भगवान श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने के लिए विशेष उपाय किए जाएं तो माता लक्ष्मी भी प्रसन्न हो जाती हैं और भक्तों पर कृपा बरसाती हैं। यदि आप जन्माष्टमी के दिन ये उपाय पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास से करेंगे तो आपको अभीष्ट फल की प्राप्ति होगी।

श्री कृष्ण जनमाष्टमी के दिन किए जा सकने वाले ज्योतिष उपाय –



1. यदि आपकी आमदनी में कोई इज़ाफा नही हो रहा हो और नौकरी में प्रमोशन भी नहीं हो रहा हो तो जन्माष्टमी के दिन सात कन्याओं को घर बुलाकर खीर खिलाएं। यह काम पांच शुक्रवार तक लगातार करें।

2. आर्थिक संकट के निवारण और धन लाभ के लिए जन्माष्टमी के दिन प्रात: स्नान आदि करने के बाद किसी भी राधा-कृष्ण मंदिर में जाकर प्रभु श्रीकृष्ण जी को पीले फूलों की माला अर्पण करें। इससे आर्थिक संकट दूर होने लगते है और धन लाभ के योग प्रबल बनते है ।

3. जन्माष्टमी के दिन प्रात: दक्षिणावर्ती शंख में जल भरकर भगवान श्रीकृष्ण का अभिषेक करें । इसके बाद यह उपाय हर शुक्रवार को करें । इस उपाय को करने वाले जातक से मां लक्ष्मी शीघ्र प्रसन्न होती हैं। इस उपाय को करने से समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती है।



4. जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण को सफेद मिठाई, साबुतदाने अथवा चावल की खीर यथाशक्ति मेवे डालकर बनाकर उसका भोग लगाएं उसमें चीनी की जगह मिश्री डाले , एवं तुलसी के पत्ते भी अवश्य डालें। इससे भगवान श्री कृष्ण की कृपा से ऐश्वर्य प्राप्ति के योग बनते है।

5. भगवान श्रीकृष्ण को पीतांबर धारी भी कहलाते हैं, पीतांबर धारी का अर्थ है जो पीले रंग के वस्त्र पहनने धारण करता हो। इसलिए श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन किसी मंदिर में भगवान के पीले रंग के कपड़े, पीले फल, पीला अनाज व पीली मिठाई दान करने से भगवान श्रीकृष्ण व माता लक्ष्मी दोनों प्रसन्न रहते हैं, उस जातक को जीवन में धन और यश की कोई भी कमी नहीं रहती है ।

6. जन्माष्टमी के दिन श्रीकृष्ण जी के मंदिर में जटा वाला नारियल और कम से कम 11 बादाम चढ़ाएं । ऐसी मान्यता है कि जो जातक जन्माष्टमी से शुरूआत करके कृष्ण मंदिर में लगातार सत्ताइस दिन तक जटा वाला नारियल और बादाम चढ़ाता है उसके सभी कार्य सिद्ध होते है, उसको जीवन में किसी भी चीज़ का आभाव नहीं रहता है।


7. जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण को पान का पत्ता अर्पित करें फिर उसके बाद उस पत्ते पर रोली से श्री मंत्र लिखकर उसे अपनी तिजोरी में रख लें। इस उपाय से लगातार धन का आगमन होता रहता है ।

8. जन्माष्टमी की रात को 12 बजे भगवान श्री कृष्ण का केसर मिश्रित दूध से अभिषेक करने से जीवन में स्थाई रूप से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है ।

9. अपने जीवन में सभी तरह की सुख समृद्धि प्राप्त करने के लिए जन्माष्टमी के दिन पीले चंदन, केसर, गुलाबजल मिलाकर माथे पर टीका-बिंदी लगाएं। यह काम हर गुरुवार को करें।

10. अगर क़र्ज़ के बोझ तले दबे हुए हो तो श्मशान के कुएं का जल लाकर पीपल के वृक्ष पर जन्माष्टमी से लेकर नियमित रूप से छह शनिवार तक चढ़ाएं।

11. लक्ष्मी कृपा पाने के लिए जन्माष्टमी पर कहीं केले के दो पौधे लगा दें। बाद में उनकी नियमति देखभाल करते रहें। जब पौधे फल देने लगे तो इनका दान करें, स्वयं न खाएं।

12. जन्माष्टमी के दिन कृष्ण मंदिर जाकर तुलसी की माला से नीचे लिखे मन्त्र की 11 माला जाप करें। इस उपाय से आपकी हर समस्या का समाधान हो सकता है। मंत्र- क्लीं कृष्णाय वासुदेवाय हरी: परमात्मने प्रणत: क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः

13. जन्माष्टमी को शाम के समय तुलसी को गाय के घी का दीपक लगाएं और ॐ वासुदेवाय नमः मंत्र बोलते हुए तुलसी की 11 परिक्रमा करें।

सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



श्रीकृष्ण जन्माष्टमी आज: इस विधि से करें पूजा, ये हैं शुभ मुहूर्त

पूजन विधि

जन्माष्टमी की सुबह जल्दी उठें और स्नान आदि करने के बाद सभी देवताओं को नमस्कार कर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके व्रत का संकल्प लें (जैसा व्रत आप कर सकते हैं वैसा संकल्प लें यदि आप फलाहार कर व्रत करना चाहते हैं तो वैसा संकल्प लें और यदि एक समय भोजन कर व्रत करना चाहते हैं तो वैसा संकल्प लें)।
इसके बाद माता देवकी और भगवान श्रीकृष्ण की सोने, चांदी, तांबा, पीतल अथवा मिट्टी की (यथाशक्ति) मूर्ति या चित्र पालने में स्थापित करें। भगवान श्रीकृष्ण को नए वस्त्र अर्पित करें। पालने को सजाएं। इसके बाद सोलह उपचारों से भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करें। पूजन में देवकी, वासुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा और लक्ष्मी आदि के नाम भी बोलें। अंत में माता देवकी को अर्घ्य दें। भगवान श्रीकृष्ण को फूल अर्पित करें।
रात में 12 बजे के बाद श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाएं। पालने को झूला करें। पंचामृत में तुलसी डालकर व माखन मिश्री का भोग लगाएं। आरती करें और रात्रि में शेष समय स्तोत्र, भगवद्गीता का पाठ करें। दूसरे दिन पुन: स्नान कर जिस तिथि एवं नक्षत्र में व्रत किया हो, उसकी समाप्ति पर व्रत पूर्ण करें।

शुभ मुहूर्त

शाम 06:45 से रात 08:15 बजे तक– अमृत
रात 08:15 से 09:45 बजे तक– चर
मध्य रात्रि पूजा- 12:10 से 12:40 बजे तक- लाभ

भगवान श्रीकृष्ण की आरती

आरती कुंजविहारी की। श्रीगिरधर कृष्णमुरारी की।।
गले में बैजंतीमाला, बजावै मुरली मधुर वाला।
श्रवन में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला। श्री गिरधर ..
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली,
लतन में ठाढ़े बनमाली।
भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सो झलक,
ललित छवि स्यामा प्यारी की। श्री गिरधर ..
कनकमय मोर-मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसे,
गगन सो सुमन राशि बरसै,
बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालनी संग,
अतुल रति गोपकुमारी की। श्री गिरधर ..
जहां ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणि श्रीगंगा,
स्मरन ते होत मोह-भंगा,
बसी शिव सीस, जटा के बीच, हरै अध कीच,
चरन छवि श्रीबनवारी की। श्री गिरधर ..
चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृन्दावन बेनू,
चहूं दिसि गोपी ग्वाल धेनू,
हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद, कटत भव-फंद,
टेर सुनु दीन भिखारी की। श्री गिरधर ..
आरती कुंजबिहारी की। श्री गिरधर कृष्णमुरारी की।
भगवान शंकराचार्य ने स्वयं विष्णु के अद्भुत स्वरूप को उनके दो प्रमुख अवतारों - भगवान राम व श्रीकृष्ण की स्तुति के साथ अच्युताष्टक के रूप में प्रकट किया। इसमें भगवान विष्णु के साथ श्रीराम और श्रीकृष्ण की लीलाओं का स्मरण मन-मस्तिष्क को अंतहीन शांति, सुख व ऊर्जा से भर देता है। इससे जीवन की तमाम मुश्किलें आसान हो जाती हैं।

अच्युताष्टक

अच्युतं केशवं रामनारायणं कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम्
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे ।1।
अच्युतं केशवं सत्यभामाधवं माधवं श्रीधरं राधिकाराधितम्
इन्दिरामन्दिरं चेतसा सुन्दरं देवकीनन्दनं नन्दनं संदधे ।2।
विष्णवे जिष्णवे शङ्खिने चक्रिणे रुक्मिनीरागिणे जानकीजानये
वल्लवीवल्लभायाऽर्चितायात्मने कंसविध्वंसिने वंशिने ते नम: ।3।
कृष्ण गोविन्द हे राम नारायण श्रीपते वासुदेवाजित श्रीनिधे
अच्युतानन्त हे माधवाधोक्षज द्वारकानायक द्रौपदीरक्षक ।4।
राक्षसक्षोभित: सीतया शोभितो दण्डकारण्यभूपुण्यताकारण:
लक्ष्मणेनान्वितो वानरै: सेवितोऽगस्त्यसंपूजितो राघव: पातु माम् ।5।
धेनुकारिष्टकोऽनिष्टकृद्द्वेषिणां केशिहा कंसहृद्वंशिकावादक:
पूतनाकोपक: सूरजाखेलनो बालगोपालक: पातु माम् सर्वदा ।6।
विद्युदुद्धयोतवानप्रस्फुरद्वाससं प्रावृडम्भोदवत्प्रोल्लसद्विग्रहम्
वन्यया मालया शोभितोर:स्थलं लोहितांघ्रिद्वयं वारिजाक्षं भजे ।7।
कुञ्चितै: कुन्तलैभ्र्राजमानाननं रत्नमौलिं लसत् कुण्डलं गण्डयो:
हारकेयूरकं कङ्कणप्रोज्ज्वलं किङ्किणीमञ्जुलं श्यामलं तं भजे ।8।
अच्युतस्याष्टकं य: पठेदिष्टदं प्रेमत: प्रत्यहं पुरुष: सस्पृहम्
वृत्तत: सुंदरं कर्तृ विश्वंभरं तस्य वश्यो हरिर्जायते सत्वरम् ।9।

श्रीकृष्ण स्तुति

नमो विश्वस्वरूपाय विश्वस्थित्यन्तहेतवे।
विश्वेश्वराय विश्वाय गोविन्दाय नमो नम:॥1॥
नमो विज्ञानरूपाय परमानन्दरूपिणे।
कृष्णाय गोपीनाथाय गोविन्दाय नमो नम:॥2॥
नम: कमलनेत्राय नम: कमलमालिने।
नम: कमलनाभाय कमलापतये नम:॥3॥
बर्हापीडाभिरामाय रामायाकुण्ठमेधसे।
रमामानसहंसाय गोविन्दाय नमो नम:॥4॥
कंसवशविनाशाय केशिचाणूरघातिने।
कालिन्दीकूललीलाय लोलकुण्डलधारिणे॥5॥
वृषभध्वज-वन्द्याय पार्थसारथये नम:।
वेणुवादनशीलाय गोपालायाहिमर्दिने॥6॥
बल्लवीवदनाम्भोजमालिने नृत्यशालिने।
नम: प्रणतपालाय श्रीकृष्णाय नमो नम:॥7॥
नम: पापप्रणाशाय गोवर्धनधराय च।
पूतनाजीवितान्ताय तृणावर्तासुहारिणे॥8॥
निष्कलाय विमोहाय शुद्धायाशुद्धवैरिणे।
अद्वितीयाय महते श्रीकृष्णाय नमो नम:॥9॥
प्रसीद परमानन्द प्रसीद परमेश्वर।
आधि-व्याधि-भुजंगेन दष्ट मामुद्धर प्रभो॥10॥
श्रीकृष्ण रुक्मिणीकान्त गोपीजनमनोहर।
संसारसागरे मग्नं मामुद्धर जगद्गुरो॥11॥
केशव क्लेशहरण नारायण जनार्दन।
गोविन्द परमानन्द मां समुद्धर माधव॥12॥

मधुराष्टकं

मधुराष्टकंअधरम मधुरम वदनम मधुरमनयनम मधुरम हसितम मधुरम।
हृदयम मधुरम् गमनम् मधुरम्, मधुराधिपतेर अखिलम मधुरम॥1॥
वचनं मधुरं, चरितं मधुरं, वसनं मधुरं, वलितं मधुरम् ।
चलितं मधुरं, भ्रमितं मधुरं, मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥2॥
वेणुर्मधुरो रेणुर्मधुर:, पाणिर्मधुर:, पादौ मधुरौ ।
नृत्यं मधुरं, सख्यं मधुरं, मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥3॥
गीतं मधुरं, पीतं मधुरं, भुक्तं मधुरं, सुप्तं मधुरम् ।
रूपं मधुरं, तिलकं मधुरं, मधुरधिपतेरखिलं मधुरम् ॥4॥
करणं मधुरं, तरणं मधुरं, हरणं मधुरं, रमणं मधुरम् ।
वमितं मधुरं, शमितं मधुरं, मधुरधिपतेरखिलं मधुरम् ॥5॥
गुञ्जा मधुरा, माला मधुरा, यमुना मधुरा, वीची मधुरा ।
सलिलं मधुरं, कमलं मधुरं, मधुरधिपतेरखिलं मधुरम् ॥6॥
गोपी मधुरा, लीला मधुरा, युक्तं मधुरं, मुक्तं मधुरम् ।
दृष्टं मधुरं, शिष्टं मधुरं, मधुरधिपतेरखिलं मधुरम् ॥7॥
गोपा मधुरा, गावो मधुरा, यष्टिर्मधुरा, सृष्टिर्मधुरा।
दलितं मधुरं, फलितं मधुरं, मधुरधिपतेरखिलं मधुरम् ॥8॥॥
इति श्रीमद्वल्लभाचार्यविरचितं मधुराष्टकं सम्पूर्णम् ॥

एक श्लोकी भागवत

श्रीमद्भागवत पर ही आधारित एक श्लोकी भागवत में भी भगवान श्रीकृष्ण की ही महिमा का गुणगान किया गया है। इसके जरिए आप घर या ऑफिस कहीं भी बैठकर भगवान विष्णु भक्ति कर श्रीमद्भागवत पाठ का महापुण्य भी बटोर सकते हैं। एक श्लोकी भागवत से श्रीकृष्ण का स्मरण किसी भी वक्त सभी कष्ट व संकटों से मुक्ति देने वाला भी माना गया है -

आदौ देवकी देवी गर्भजननम् गोपीगृहे वर्धनम्
माया पूतन जीविताप हरणम् गोवर्धनोद्धारणम्
कंसच्छेदन कौरवादी हननम् कुंतीसुत पालनम्
एतद् भागवतम् पुराण कथितम् श्रीकृष्णलीलामृतम्।
सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



बुधवार, 24 अगस्त 2016

यहां हुई थी कृष्ण की राधा से शादी, भगवान को दहेज में मिले थे हाथी-घोड़े

जयपुर।सभी जानते हैं कि राधा और भगवान श्रीकृष्ण के बीच स्नेहपूर्ण संबंध थे, लेकिन उनकी कभी शादी नहीं हुई। श्रीकृष्ण का विवाह रुक्मणी के साथ हुआ था। क्या आप जानते हैं कि जयपुर में श्रीकृष्ण और राधा की शादी हुई थी। इस शादी को ज्यादा समय नहीं हुआ। अठारहवीं शताब्दी यानी 1778 से 1803 के बीच के समय की बात है।किसने करवाई थी ये अनोखी शादी..
- जयपुर राजपरिवार के महाराजा प्रतापसिंह के समय श्रीकृष्ण और राधा के बीच बाकायदा विवाह संपन्न हुआ, सभी तरह की रस्में अदा की गईं, दहेज लिया गया।
- यह एक ऐसा विवाह था, विवाह के साथ राधाजी को भरपूर दहेज तक दिया गया था।
- द्वापर में यह रिवाज रहा हो या नहीं, लेकिन कलयुग में जरूर श्रीकृष्ण ने राधा जी से दहेज में थोड़ा बहुत नहीं लिया, बल्कि हाथी-घोड़े, हीरे-जवाहरात सभी कुछ था इस दहेज में।
- यह सुनकर किसी को भी आश्चर्य हो सकता है, लेकिन कहते हैं न कि कलयुग में कुछ भी संभव है। वैसा ही कुछ श्रीकृष्ण के साथ हुआ।
 
कृष्ण के पिता थे खुद राजा और राधा के पिता प्रधानमंत्री
 
- असल में तब जयपुर के महाराजा थे प्रताप सिंह। वे कृष्ण के अनन्य भक्त थे। इतिहासकार और जयपुर के जानकार डॉ. आनंद शर्मा कहते हैं कि उन्होंने श्रीकृष्ण का मंदिर स्थापित कराया।
- यहीं वे रात-दिन भक्ति में लीन रहते। किसी से कोई वास्ता नहीं रखते थे। दिन-रात मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा के समक्ष खुद को रखते और भक्ति में लीन रहते।
- राजा के प्रधानमंत्री दौलतराम हल्दिया बड़े विद्वान थे।
- उन्होंने राजा को कहा, महाराज भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति बिना राधा के अधूरी है। बिना राधा के श्रीकृष्ण का मंदिर भी अधूरा है।
- इसके बाद राजा ने यह जिम्मेदारी दौलतराम हल्दिया को ही सौंपी कि वे राधा जी की प्रतिमा यहां स्थापित कराएं।
- स्थापित कराने के बजाय फिर यहां राधा को विवाह करा ही लाने का फैसला किया गया। राधा के पिता बने थे दौलतराम और कृष्ण के राजा प्रतापसिंह।
 
यूं हुई अनूठी और शाही शादी
 
- दौलतराम यहां जयपुर में हल्दियों के रास्ते में रहते थे। यहीं से कुछ माह पूर्व ही विवाह की तैयारियां शुरू करा दी गई।
- कुछ समय पूर्व ही बेटी का विवाह किया था। कमोबेश वैसी ही तैयारी शुरू करा दी गई। इस बीच दौलतराम ने एक भारी पीतल की राधा जी की विशेष प्रतिमा बनवाई।
- इसी प्रतिमा को दुल्हन मानकर कई दिन तक विवाह की रस्में पूरी कराई गईं।
- इस दौरान राज्य में मौजूद उनके सभी नाते-रिश्ते वाले, जयपुर के लोग शरीक हुए। घर और बाजारों को सजाया गया।
- हल्दी, चेल, चाक-भात जैसी रस्मों को भी निभाया गया। दूसरी ओर राजपरिवार में भी श्रीकृष्ण को बेटा मानकर दूल्हे वालों की ओर से तैयारी तेजी से चल रही थीं। फिर गाजे-बाजे के साथ विवाह संपन्न हो गया।
 
यूं आई राधा जी जयपुर राजपरिवार में
 
- दौलतराम हल्दिया के यहां से भगवान श्रीकृष्ण राधा जी को विदा करा, श्रीकृष्ण यहां मंदिर में ले आए। इसके बाद मंदिर के गर्भगृह में जहां भगवान की प्रतिमा थी, वहीं उन्हें स्थापित करा दिया गया।

ये आया था दहेज में सामान

- दहेज के रूप में दौलतराम ने पुत्री बनाकर राधाजी की प्रतिमा के साथ हाथी, घोड़े, वस्त्र और आभूषण, हीरे-जवाहरात भरपूर संख्या में दिए।

- यूं समझिए कि दहेज की भी पूरी एक बारात थी अलग से। अंतत: विवाह संपन्न हुआ।
सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



मंगलवार, 23 अगस्त 2016

शादी से जुडी अनोखी परम्पराए



दुनियाभार में शादी, संस्कृति का एक अहम हिस्सा माना जाता है। शादी जीवन और मृत्यु के बीच एक कड़ी है। हर समाज में शादी का तरीका अलग-अलग होता है। दुनिया में ऐसे भी समाज हैं जहां शादी करने के तरीके बड़े ही चौंकाने वाले हैं।आपको ऐसे ही चौंकाने वाली शादी की कुछ रस्मों के बारे में बता रहे हैं।

(1) पूरे महीने रोती है दुल्हन (Moping For a Month)
चीन के सिचुआन में एक परंपरा है कि शादी से पहले दुल्हन को पूरा एक महीना रोना पड़ता है। इस रस्म को जियो टांग कहा जाता है। एक महीने तक रात में आधा घंटा रोना होता है। दुल्हन के साथ पहले दस दिन उसकी मां और बाद के 10 उसकी दादी और आखिरी दिनों में परिवार की सभी महिलाएं तल्लीन होकर लगातार रोने का काम करती हैं।

(2) दुल्हन का अपहरण (Bride Kidnappings)
किर्गिस्तान में आज भी दुल्हनों का अपहरण करने की परंपरा कायम है। यह रस्म शादी के पहले होती है। पुरुष जिस महिला के साथ अपनी सारी जिंदगी बिताना चाहता है, वह उसका किडनैप कर देता है। यह परंपरा रोमानिया समाज में जीवित है। शादी में कोई दहेज ना मांगे और लड़की के घरवाले लड़की के पसंद के लड़के से शादी करवाने को राजी ना हो, इसलिए यह परंपरा है।


(3) हंसना मना है (No Smiling)
कांगो समाज में शादी के दौरान दुल्हा-दुल्हन को हंसना मना होता है। शादी की रस्म पूरी होने के बाद ही दोनों को हंसने की इजाजत दी जाती है। यह रस्म शादी में ही नहीं, बल्कि शादी के दौरान होने वाली अन्य रस्मों पर भी लागू होती है।

(4) दुल्हन के सिर की हजामत (The Bald And The Beautiful)
प्राचीन स्पार्टन्स समाज में शादी से पहले दुल्हन के सिर की हजामत की जाती है। इस समाज में दुल्हन भाग कर कहीं छिप जाती है और दुल्हा उसे ढूंढकर लाता है। तब माना जाता है कि शादी की रस्में पूरी हुई हैं।

(5) दुल्हन को जलील करना (Slimy Blessings For The Bride)
मसाई संस्कृति में शादी का तरीका दुनिया में सबसे अलग है। यहां दुल्हन को जलील और प्रताड़ित किया जाता है। सगाई के समय लड़की को एक बुजुर्ग के साथ भेजा जाता है, जहां उसके ससुरालवाले उसका स्वागत, उसको जलील करके, मारके और उसके सिर पर गोबर लगाकर करते हैं। वहीं एक और रस्म के तहत लड़की का पिता भी उस पर थूकता है।



(6) टॉयलेट में बना जूस पीना (Murky Toilet Mire For Juice)
फ्रांस की संस्कृति में शादी की अजीबोगरीब रस्म है जिसे ला सूप (La Soupe) कहते हैं। जैसे ही नया जोड़ा हनीमून पर जाता है, सभी गेस्ट पार्टी के बचे हुए खाने को इकट्ठा करके एक नए टॉयलेट के चेंबर में डालते हैं और उसमे पानी डाल कर उसका जूस बनाते है। यह जूस दुल्हन के परिवारवालों को पीना पड़ता है।

(7) व्हेल मछली का दांत (A Whale Tooth In Fiji Rituals)
फिजी समाज में शादी की रस्म कुछ अलग ही है। इसमें लड़के वाले को दुल्हन के पिता को व्हेल मछली का दांत देना पड़ता है, यह इस बात का प्रतीक होता है कि लकड़े वाले संपन्न घर के हैं। यह परंपरा तबुआ के नाम से प्रचलित है।

(8) दुल्हा, दुल्हन पर काला रंग (Bride And Groom Blackening)
स्कॉट समाज में शादी को तब तक पूरा नहीं माना जाता, जब तक की दुल्हा और दुल्हन पर काला रंग नहीं डाल देते। काला रंग दोनों पर अचानक डाला जाता है। यह इसलिए किया जाता है ताकि नवविवाहित जोड़ा का जीवन सुखी हो।




(9) तीन दिन तक शौचायल बंद (No Toilet For Three Days)
इंडोनेशिया के टीडॉन्ग संस्कृति में शादी की एक अनोखी रस्म है। यहां शादी के बाद तीन दिनों तक नवविवाहित जोड़े को शौचालय नहीं जाने दिया जाता है।

(10) पेड़ से शादी (Getting Married To A Tree)
भारत के कुछ प्रांत में यह परंपरा है कि यदि कोई लड़की मांगलिक है, तो उसे पेड़ से शादी करनी पड़ती है। लड़की की शादी पीपल के पेड़ से की जाती है ताकि उसमें जो भी दोष हो खत्म हो जाए और शादी की संभावनाएं बनी रहे। इसी तरह भारत के कुछ हिस्सों में प्रेत बाधा दूर करने के नाम पर लड़की की कुत्तों से भी शादी करवाते है।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



सोमवार, 22 अगस्त 2016

दिल से मांगेंगे तो पूरी होगी सब इच्‍छा, ऐसा है देवघर का वैद्यनाथ धाम


देवघर भारत के झारखंड राज्‍य का एक शहर है। यह शहर हिन्दुओं का एक प्रसिद्ध तीर्थ-स्थल भी है, जिसे बैद्यनाथ धाम या बाबा धाम के नाम से भी जाना जाता है। शैव पुराण में देवघर को बारह जोतिर्लिंगों में से एक माना गया है। देवघर का शाब्दिक अर्थ है देवी-देवताओं का निवास स्थान। देवघर में बाबा भोलेनाथ का अत्यन्त पवित्र और भव्य मन्दिर स्थित है। हर सावन में यहाँ लाखों शिव भक्तों की भीड़ उमड़ती है जो देश के विभिन्न हिस्सों से आते हैं। आप अगर शिव बाबा के बड़े भक्‍तो में से एक हैं, तो एक बार वैद्यनाथ धाम के दर्शन जरुर कीजियेगा क्‍योंकि यहां के कोने-कोने पर आपको अद्भुत आकर्षण देखने को मिलेगा। कहते हैं वैद्यनाथ धाम में अगर आप कुछ भी सच्‍चे दिल से मांगेंगे तो आपकी इच्‍छा जरुर पूरी होगी।









वैद्यनाथ धाम मंदिर में ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुई है, जिसका इतिहास यह है कि एक बार राक्षसराज रावण ने हिमालय पर जाकर शिवजी की प्रसन्नता के लिये घोर तपस्या की और अपने सिर काट-काटकर शिवलिंग पर चढ़ाने शुरू कर दिये। एक-एक करके नौ सिर चढ़ाने के बाद दसवाँ सिर भी काटने को ही था कि शिवजी प्रसन्न होकर प्रकट हो गये। फिर शिव जी ने उसके दसों सिर वैसे ही दुबारा कर दिये और बदले में वरदान मांगने को कहा। रावण ने लंका में जाकर उस लिंग को स्थापित करने के लिये उसे ले जाने की आज्ञा माँगी। शिवजी ने अनुमति तो दे दी, पर इस चेतावनी के साथ दी कि यदि मार्ग में इसे पृथ्वी पर रख देगा तो वह वहीं अचल हो जाएगा। रावण शिवलिंग ले कर चला पर मार्ग में एक चिताभूमि आने पर उसे लघुशंका निवृत्ति की आवश्यकता हुई। रावण उस लिंग को एक अहीर को थमा लघुशंका-निवृत्ति करने चला गया। इधर उस अहीर से उसे बहुत अधिक भारी अनुभव कर भूमि पर रख दिया। फिर क्या था, लौटने पर रावण पूरी शक्ति लगाकर भी उसे न उखाड़ सका और निराश होकर मूर्ति पर अपना अँगूठा गड़ाकर लंका को चला गया। इधर ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं ने आकर उस शिवलिंग की पूजा की। शिवजी का दर्शन होते ही सभी देवी देवताओं ने शिवलिंग की वहीं उसी स्थान पर प्रतिस्थापना कर दी और शिव-स्तुति करते हुए वापस स्वर्ग को चले गये। जनश्रुति व लोक-मान्यता के अनुसार यह वैद्यनाथ-ज्योतिर्लिग मनोवांछित फल देने वाला है।

सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 



भारत के 5 रहस्यमयी मंदिर



हिंदू धर्म में मंदिर जाने और पूजन करने का विशेष महत्व माना गया है। कहते हैं मंदिर जाने से मन को शांति मिलती हैं। साथ ही, मनोकामनाएं भी पूरी होती हैं, लेकिन कुछ मंदिर ऐसे भी हैं, जो सिर्फ मनोकामना पूरी करने के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी किसी अनोखी या चमत्कारिक विशेषता के कारण भी जाने जाते हैं। आज हम आपको बताने जा रहे हैं भारत के 5 ऐसे ही प्राचीन मंदिरों के बारे में जिन से जुड़ी चमत्कारिक बातों को कोई माने या न माने, लेकिन इनकी ये खास विशेषताएं किसी को भी सोचने पर मजबूर कर देती है।
1. कामाख्या देवी मंदिर, गुवाहाटी (Kamakhya Devi temple, Guwahati)



कामाख्या मंदिर असम के गुवाहाटी रेलवे स्टेशन से 10 किलोमीटर दूर नीलांचल पहाड़ी पर स्थित है। यह मंदिर देवी कामाख्या को समर्पित है। कामाख्या शक्तिपीठ 52 शक्तिपीठों में से एक है। कहा जाता है सती का योनिभाग कामाख्या में गिरा। उसी स्थल पर कामाख्या मन्दिर का निर्माण किया गया।

इस मंदिर में प्रतिवर्ष अम्बुबाची मेले का आयोजन किया जाता है। इसमें देश भर के तांत्रिक और अघोरी हिस्सा लेते हैं। माना जाता है कि सालभर में एक बार अम्बुबाची मेले के दौरान मां कामाख्या रजस्वला होती हैं और इन तीन दिन में योनि कुंड से जल प्रवाह कि जगह रक्त प्रवाह होता है। इसलिए अम्बुबाची मेले को कामरूपों का कुंभ कहा जाता है।
2. काल भैरव मंदिर, मध्य प्रदेश (Kaal bhairav temple, Madhya pradesh)



मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर से करीब 8 कि.मी. दूर कालभैरव मंदिर स्थित है। भगवान कालभैरव को प्रसाद के तौर पर केवल शराब ही चढ़ाई जाती है। शराब से भरे प्याले कालभैरव की मूर्ति के मुंह से लगाने पर वह देखते ही देखते खाली हो जाते हैं। मंदिर के बाहर भगवान कालभैरव को चढ़ाने के लिए देसी शराब की आठ से दस दुकानें लगी हैं।

मंदिर में शराब चढ़ाने की गाथा भी बेहद दिलचस्प है। यहां के पुजारी बताते हैं कि स्कंद पुराण में इस जगह के धार्मिक महत्व का जिक्र है। इसके अनुसार, चारों वेदों के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने जब पांचवें वेद की रचना का फैसला किया, तो उन्हें इस काम से रोकने के लिए देवता भगवान शिव की शरण में गए। ब्रह्मा जी ने उनकी बात नहीं मानी। इस पर शिवजी ने क्रोधित होकर अपने तीसरे नेत्र से बालक बटुक भैरव को प्रकट किया। इस उग्र स्वभाव के बालक ने गुस्से में आकर ब्रह्मा जी का पांचवां मस्तक काट दिया। इससे लगे ब्रह्म हत्या के पाप को दूर करने के लिए वह अनेक स्थानों पर गए, लेकिन उन्हें मुक्ति नहीं मिली। तब भैरव ने भगवान शिव की आराधना की। शिव ने भैरव को बताया कि उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर ओखर श्मशान के पास तपस्या करने से उन्हें इस पाप से मुक्ति मिलेगी। तभी से यहां काल भैरव की पूजा हो रही है। कालांतर में यहां एक बड़ा मंदिर बन गया। मंदिर का जीर्णोद्धार परमार वंश के राजाओं ने करवाया था।
3. करणी माता मंदिर, राजस्थान (Karni mata temple, Rajasthan)



करणी माता मंदिर राजस्थान में बीकानेर से कुछ दूरी पर देशनोक नामक स्थान पर है। यह स्थान मूषक मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहां भक्तों से ज्यादा काले चूहे नजर आते हैं। इनके बीच अगर कहीं सफेद चूहा दिख जाए तो समझें कि मनोकामना पूरी हो जाएगी। यही यहां की मान्यता है।



वैसे, इसे चूहों को काबा भी कहा जाता है। चूहों को भक्त दूध, लड्डू आदि देते हैं। आश्चर्यजनक बात यह भी है कि असंख्य चूहों से पटे मंदिर से बाहर कदम रखते ही एक भी चूहा नजर नहीं आता। इस मंदिर के भीतर कभी बिल्ली प्रवेश नहीं करती है। कहा तो यह भी जाता है कि जब प्लेग जैसी बीमारी ने अपना आतंक दिखाया था, तब यह मंदिर ही नहीं, बल्कि यह पूरा इलाका इस बीमारी से महफूज था।
4. ज्वाला देवी मंदिर, हिमाचल प्रदेश (Jwala devi temple, Himachal pradesh)



हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में कालीधार पहाड़ी के बीच बसा है ज्वाला देवी का मंदिर। शास्त्रों के अनुसार, यहां सती की जिह्वा गिरी थी। मान्यता है कि सभी शक्तिपीठों में देवी हमेशा निवास करती हैं। शक्तिपीठ में माता की आराधना करने से माता जल्दी प्रसन्न होती है। ज्वालादेवी मंदिर में सदियों से बिना तेल-बाती के प्राकृतिक रूप से नौ ज्वालाएं जल रही हैं। नौ ज्वालाओं में प्रमुख ज्वाला चांदी के जाला के बीच स्थित है, उसे महाकाली कहते हैं। अन्य आठ ज्वालाओं के रूप में मां अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विन्ध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका एवं अंजी देवी ज्वाला देवी मंदिर में निवास करती हैं।

कथा है कि मुगल बादशाह अकबर ने ज्वाला देवी की शक्ति का अनादर किया और मां की तेजोमय ज्वाला को बुझाने का हर संभव प्रयास किया, लेकिन वह अपने प्रयास में असफल रहा। अकबर को जब ज्वाला देवी की शक्ति का आभास हुआ, तो क्षमा मांगने के लिए उसने ज्वाला देवी को सवा मन सोने का छत्र चढ़ाया।

5. मेंहदीपुर बालाजी, राजस्थान (Mehandipur balaji, Rajasthan)



राजस्थान में मेंहदीपुर बालाजी का मंदिर श्री हनुमान का बहुत जाग्रत स्थान माना जाता है। लोगों का विश्वास है कि इस मंदिर में विराजित श्री बालाजी अपनी दैवीय शक्ति से बुरी आत्माओं से छुटकारा दिलाते हैं। मंदिर में हजारों भूत-पिशाच से त्रस्त लोग प्रतिदिन दर्शन और प्रार्थना के लिए यहां आते हैं, जिन्हें स्थानीय लोग संकटवाला कहते हैं। भूतबाधा से पीड़ित के लिए यह मंदिर अपने ही घर के समान हो जाता है और श्री बालाजी ही उसकी अंतिम उम्मीद होते हैं।

यहां कई लोगों को जंजीर से बंधा और उल्टे लटके देखा जा सकता है। यह मंदिर और इससे जुड़े चमत्कार देखकर कोई भी हैरान हो सकता है। शाम के समय जब बालाजी की आरती होती है तो भूत-प्रेत से पीड़ित लोगों को जुझते देखा जाता है और आरती के बाद लोग मंदिर के गर्भ गृह में जाते हैं। वहां के पुरोहित कुछ उपाय करते हैं और कहा जाता है इसके बाद पीड़ित व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपरोक्त पोस्ट से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

उपचार सम्बंधित घरेलु नुस्खे जानने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

देश दुनिया, समाज, रहन - सहन से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ  देखने के लिए यहाँ क्लिक करें ।