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सोमवार, 16 जनवरी 2017

जानिए, क्यों चढाया जाता है सूर्य को जल

Find out why the sun is filled with water
सूर्य ग्रहों के स्वामी हैं। ये पंचदेवों में एक हैं। जीवन को व्यवस्था सूर्य से ही मिलती है। पुराणों में सूर्योपासना को सर्वरोगों को हरने वाली कहा गया है। हिंदू संस्कृति में अƒर्यदान (जल देना) सामने वाले के प्रति श्रद्धा और आस्था प्रकट का प्रतीक है। स्नानदि के बाद भगवान सूर्य को अर्घ्य देने का अर्थ है जीवन में संतुलन को आमांत्रित करना। 

जहां स्नान के लिए नदी या सरोवर उपलब्ध हैं, वहां सचैल (गले वस्त्रों के साथ ही) सूर्य को अर्य देते हुए आज भी देखा जा सकता है। अर्य देते समय सूर्य के नामों का उच्चारण करने का विघान है। शास्त्रनुसार प्रात: पूर्व की ओर मुख करके सूर्य को अर्य देना चाहिए, जबकि सायं पश्चिम की ओर।

Dharmik


धार्मिक मान्यता के अनुसार,सूर्य को अर्घ्य दिए बिना अन्न ग्रहण करना पाप है। मान्यता है कि सूर्य को अर्घ्य देते सूर्य गिरने वाले जलकण वज्र बनकर राक्षसों का विनाश करते हैं। रोग ही तो राक्षस हैं। अर्घ्य की विधि को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि जल के संस्पर्श से सूर्य की रश्मियां किस प्रकार सात रंगों में बंट जाती हैं और उनका प्रभाव अर्घ्य प्रदान करने पर किस तरह से पडता है । 

इस सत्य को तो स्वीकार करना ही पडेगा कि जो रोगाणु सामान्यतया उबालने और शुष्कीकरण जैसी विशिष्ट क्रियाओं से नहीं मरते, उन्हे सूर्य-किरणें निर्मूल कर नष्ट कर देती हैं। सूर्य को अर्घ्य देने वाले की नेत्र ज्योति क्षीण नहीं होती,ऎसा आयुर्वेद ग्रंथों में कहा गया हैं।

रविवार, 15 जनवरी 2017

जानिए, क्यों कुतरते हैं नाखून!

Interesting Facts

क्या आप खुद के नाखून दांतों से कुतरते रहना?
कोई बीमारी है या फिर कुछ और?
दुनिया के पांच अरब लोगों में से लगभग 60 करो़ड लोग नाखून चबाने की आदत से मजबूर हैं, भले ही मखौल बनते रहें?
मनोवैज्ञानिकों की मानें तो दरअसल ऎसा कुछ नहीं है, जब कोई इंसान परेशान या बोर होने लगता है तो नाहक ही बेचारे मासूम नाखून खुद-ब-खुद दांतों तले आ जाते हैं। डॉक्टरों का कहना है- यह एक सहज प्रवृत्ति है, बच्चो को बचपन से सिखाया जाता है कि नाखून चबाना गलत है। ऎसा करने पर बराबर के उम्र वालों के बीच भी मजाक बनता है। ब़डे भी फटकार लगाते हैं, बावजूद तमाम टोका-टोकी के भी बच्चे इस आदत को लेकर चौकन्ने नहीं हो पाते और ब़डी उम्र तक आदत बरकरार रहती है।




मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि नेल बाइटिंग दरअसल बच्चों और युवाओं में मानसिक तनाव और ऑवसेसिव कंपलसिव डिसऑर्डर का लक्षण है। वे सचेत करते हैं, नेल बाइटिंग से गंभीर किस्म की संक्रामक बीमारियों का खतरा तो रहता ही है, दूसरे नाखून का मूल आकार भी हमेशा के लिए बदशक्ल हो सकता है।




हाल ही इस पर एक गंभीर शोध और सर्वे हुआ है, जो बताता है नाखून चबाने की आदत का एक दूसरा पहलू भी है। नाखून चबाने की आदत का कुंडली और ग्रहों से सीधा रिश्ता है। क्या कोई ग्रह किसी इंसान को ऎसा करने को बाध्य करता है। क्या इंसान की हर आदतों का सरोकर किसी न किसी ग्रह से है?







दरअसल नाखून चबाना आपके व्यक्तित्व की अस्थिरता को जाहिर करता है। ऎसे लोग जब किसी उलझन में होते हैं और उलझन को सुलझाने का सिरा पक़ड में नहीं आ रहा होता तो अपने नाखूनों को चबाने लगते हैं। ऎसा करते वक्त दरअसल वे अपनी खीज ही निकालते हैं।







दरअसल नाखून चबाना आपके व्यक्तित्व की अस्थिरता को जाहिर करता है। ऎसे लोग जब किसी उलझन में होते हैं और उलझन को सुलझाने का सिरा पक़ड में नहीं आ रहा होता तो अपने नाखूनों को चबाने लगते हैं। ऎसा करते वक्त दरअसल वे अपनी खीज ही निकालते हैं।







आंक़डे बताते हैं कि नाखून कुतरने की आदत से सबसे ज्यादा तंग 14 से 25 साल के युवा हैं। इनमें 34 फीसदी संख्या ल़डकियों की और 66फीसदी संख्या ल़डकों की है। हैरानी की बात तो यह है कि सर्वे रिपोर्ट इस तथ्य और सोच को झुठलाती है। नाखून चबाना ल़डकी की फितरत का हिस्सा है। सर्वे में शामिल कुल लोगों में 14 से 25 के दरम्यान युवाओं की 76फीसदी हिस्सेदारी रही।

कुण्डली के ग्रह
इस स्थिति को ज्योतिष के आइने से देखें तो ग्रहों की चालों के सामने बेबस इंसान के खुद को दुरूस्त करने की पहल आवश्यक हो जाती है। नाखून चबाने की आदत परिवार से मिली विरासत भी हो सकती है। यानि ग्रहों की चाल आपकी संतति को भी प्रभावित कर रही है।

क्या आप जानते है क्यूं लेते है अग्नि के सात फेरे!


Interesting Facts


अग्नि पृथ्वी पर सूर्य की प्रतिनिधि है। सूर्य जगत की आत्मा तथा विष्णु का रूप है। अत: अग्नि के समक्ष फेरे लेेने का अर्थ है- परमात्मा के समक्ष फेेरे लेना। अग्नि ही वह माध्यम है जिसके द्वारा यज्ञीय आहुतियां प्रदान करके देवताओं को पुष्ट किया जाता है। 

इस प्रकार अग्नि के रूप में समस्त देवताओं को साक्षी मानकर पवित्र बंधन में बंधने का विधान धर्म शास्त्रों में किया गया है।

वैदिक नियमानुसार, विवाह के समय चार फेरों का विधान है। इनमें से पहले तीना फेरों मेें कन्या आगे चलती है जबकि चौथे फेरे में वर आगे होता है। ये चार फेरे चार पुरूषार्थो- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के प्रतीक हैं।

इस प्रकार तीन फेरों द्वारा तीन पुरूषार्थो में कन्या पत्नी की प्रधानता है जबकि चौथे फेरे द्वारा मोक्ष मार्ग पर चलते समय पत्नी को वर का अनुसरण करना पडता है। यहां इस बात को स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि अपवादों से नियम नहीं बना करते।



शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

Vastu tips for prosperity and happiness in the home kitchen

vastu tips

रसोई का वास्तु : House Kitchen (घर में रसोई) का Vastu (वास्तु) खराब होने पर उसका सबसे खराब असर उस घर की Housewife (गृहणी) पर पड़ता है जो कि अपना अधिकतम समय रसोई में ही बिताती है। ऐसे में Kitchen (रसोई) को बनाते समय Vaastu Shaastra (वास्तु शास्त्र) के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। इससे न केवल घर वरन घर में रहने वाली महिलाओं का स्वास्थ्य सही रहता है और घर में Good Luck (सौभाग्य) का आगमन होता है। सामान्य तौर पर रसोई में इन वास्तु नियमों का ध्यान रखना चाहिएः



रसोई को हमेशा घर के दक्षिण-पूर्व यानि अग्निकोण दिशा में ही बनवाना चाहिए। यदि इस कोण में रसोई बनाना संभव न हो तो Aerial Angle (उत्तर-पश्चिम) पर बनवा सकते हैं। साथ ही चूल्हा का स्थान भी रसोई के अग्नि कोण में ही रखना चाहिए।
इसके अलावा रसोई में पानी का घड़ा, Water Purifier आदि रसोई की ईशान कोण (उत्तर-पूर्वी दिशा) में होना चाहिए। परन्तु इस दिशा में सिंक न बनवाएं, अन्यथा घर में बिन बुलाई आपत्तियां आती रहती हैं। साथ ही रसोई से लगा हुआ कोई जल स्त्रोत नहीं होना चाहिए। रसोई के बाजू में बोर, कुआँ, Making The Bathroom (बाथरूम बनवाना) Avoid करें, सिर्फ Washing Space दे सकते हैं।
रसोई की दक्षिण दिशा में कभी भी कोई दरवाजा या खिड़की नहीं होने चाहिए। बाकी तीनों दिशाओं में खिड़की तथा दरवाजे रखे जा सकते हैं। खिड़की व दरवाजों का पूर्व व उत्तर दिशा में होना सबसे बेहतर रहता है। खिड़की भी पर्याप्त बड़ी होनी चाहिए ताकि रसोई में बाहर की ताजी हवा आ सकें.
रसोई बनवाते समय ध्यान रखना चाहिए वहां सूर्य की रोशनी तथा हवा के Ventilation(वायु-संचालन) का पूरा इंतजाम हो। रसोई में चूल्हे की गर्म हवा निकालने के लिए भी Ventilators (वायु-प्रवाहक) होना चाहिए।
रसोई में कभी भी Mirror (शीशे) का प्रयोग नहीं होना चाहिए। इससे घर में Home Tribulation (गृह-क्लेश) का वातावरण बनता है।
घर की रसोई में साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें। इससे घर से Negative Energy (नकारात्मक ऊर्जा) दूर होकर Positive Energy (सकारात्मक ऊर्जा) आती है। साथ ही घर में पितृदेव भी प्रसन्न रहकर अपना आर्शीवाद देते हैं।


सपनों के बारे में 25 ग़ज़ब रोचक तथ्य


interesting facts


1. आपको कभी भी यह बात याद नहीं रहेगी, कि सपना शुरू कहा से हुआ था.

2. जिसका IQ जितना ज्यादा होगा, उसे उतने ही ज्यादा सपने आएगा.

3. छोटे बच्चों को पहले 3-4 साल तक सपने नहीं आते.

4. सपनों के ऊपर सबसे पहली किताब इजिप्ट में लिखी गई थी यह लगभग 4000 ईसा पूर्व पहले लिखी गई.


5. जन्म से अंधे लोगों को भी सपने आते हैं, वो अपने सपनों में सुगंध और दुर्गंध महसूस करते हैं या फिर उन्हें आवाजें सुनाई देती हैं.

6. जब आप सपने देखते हैं तो आपका शरीर पक्षाघात की स्थिति में पहुंच जाता है और कुछ भी करने में असमर्थ होता हैं. कई बार तो आप हिल-डुल भी नहीं पाते. आपको ऐसा लगता है कि सब सच में हो रहा हैं पर असल में आप सपना देख रहे होते हैं.

7. कई लोग सोचते हैं कि दिमाग थक जाता है लेकिन लेकिन ऐसा नहीं है यह सोते समय, जगे हुए की तुलना में और ज्यादा तेजी से काम करता हैं.

8. हमारा दिमाग कोई भी नया चेहरा नहीं बना सकता, इसलिए हम सपनों में उन्हीं लोगों को देखते हैं जो हमने असल जिंदगी में देखे हैं.

9. जो लोग सपने नहीं देखते, उन्हें “Personality Disorders” नामक बीमारी होती हैं.


10. यदि आप किसी के बारे में जागते हुए भी सपने देखते हैं तो इसका मतलब हैं आप उसे मिस कर रहे हैं.

11. जागने के 10 मिनट के अंदर ही हम 90% सपने भूल जाते हैं.

12. बहुत से लोगों का मानना है कि सुबह के सपने सच होते हैं लेकिन ऐसा बहुत कम होता है कि जो सपने में देखा है वही भविष्य में घटित हो गया हो.

13. जब तक रंगीन टीवी नहीं आए थे, तब अधिकतर लोगों को सपने भी ब्लैक एंड वाइट ही आते थे.

14. कुछ लोगों को नींद में चलने की बीमारी होती है जिसे “Sleep Walking” कहते हैं. यह एक मनोवैज्ञानिक बीमारी है यदि सही समय पर ठीक से नींद ली जाए तो यह बीमारी होने की संभावना ना के बराबर होती हैं.


15. जब हम कोई सपना देखते हैं वह हमें उससे नहीं पता होता है कि हम जो देख रहे हैं वह एक सपना है तो उस चीज को “Lucid Dream” बोलते हैं. इस दुनिया में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो Lucid Dream को कंट्रोल कर सकते हैं, जैसे अपनी मर्जी से सपने में उड़ना या time travel करना. (LIKE ME).

16. इसका कोई वैज्ञानिक प्रूफ तो नहीं है लेकिन हम एक ही समय में या तो खर्राटें मार सकते हैं या फिर सपने देख सकते हैं दोनों काम एक साथ नहीं कर सकते.

17. सिर्फ इंसान ही नहीं जानवर भी सपने देखते हैं. कई बार अपने पालतू जानवर को सोते हुए देखिए, यदि वह अपने पंजे हिला रहा है तो समझ लिजिए कि सपना देख रहा हैं.

18. मैनें सपने में मकड़ी खाई.. ये एक झूठ हैं क्योकिं सपने में मकड़ी खाने के चांस 0% हैं.

19. कुछ चीजें ऐसी हैं जिनका आविष्कार सपने की वजह से हुआ. एलियास होवे ने सिलाई मशीन की खोज सपने में देख कहीं की थी, उन्होंने अपने सपने में खुद को आदिवासियों की कैद में देखा था जो उन्हें जलाने वाले थे. आदिवासी अपने हथियारों को अजीब तरह से सिल रहे थे. इससे एलियास को सिलाई मशीन की तकनीक समझ में आ गई. जैसे:- C6H6 रसायनिक फार्मूला, D.N.A की खोज आदि.

20. सपनों में कुछ भी पढ़ नहीं सकते, यहां तक कि सपने में दिख रही घड़ी में समय देखना भी बेहद मुश्किल होगा.

21. सबसे लंबा सपना सुबह आता है लगभग 35 से 40 मिनट का और हम सोते समय हर डेढ़ घंटे में एक सपना जरुर देखते हैं.

22. एक व्यक्ति अपने जीवन में लगभग 6 साल सपने देखने में बिताता हैं.

23. यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से सिगरेट छोड़ने की कोशिश कर रहा है तो उसे गंभीर सपने आने लगते हैं.

24. कई बार क्या होता है कि रात में स्वप्नदोष हो जाता है ऐसा तब होता है जब हम नींद में कोई सेक्सी सपना देखते हैं आपकी जानकारी के लिए बता दे कि स्वप्नदोष होने के बाद ही हमारी आंखें खुलती है जबकि हमें पहले पता होता है कि स्वप्नदोष हो रहा हैं. अगर समय-समय पर हस्तमैथुन कर लिया जाए तो स्वप्नदोष होने के चांस थोड़े कम होते हैं रात में गर्म दूध पीने से इसके होने की संभावना बढ़ जाती हैं.

25. अगर आप किसी सपने से जाग गए हैं, वापस उस सपने को देखना चाहते हैं, तो जल्दी से अपनी आंखें बंद करके सो जाइए बिल्कुल सीधे होकर. बहुत ज्यादा चांस है कि आपका सपना वहीं से शुरु हो जाएगा. यह तरीका हर बार काम नहीं करता.




बुधवार, 11 जनवरी 2017

क्यों आए भगवान शिव, महाकाली के पैरों के नीचे?



Interesting facts



भगवती दुर्गा की दस महाविद्याओं में से एक हैं महाकाली। जिनके काले और डरावने रूप की उत्पति राक्षसों का नाश करने के लिए हुई थी। यह एक मात्र ऐसी शक्ति हैं जिन से स्वयं काल भी भय खाता है। उनका क्रोध इतना विकराल रूप ले लेता है की संपूर्ण संसार की शक्तियां मिल कर भी उनके गुस्से पर काबू नहीं पा सकती। उनके इस क्रोध को रोकने के लिए स्वयं उनके पति भगवान शंकर उनके चरणों में आ कर लेट गए थे। इस संबंध में शास्त्रों में एक कथा वर्णित हैं जो इस प्रकार है-

दैत्य रक्तबिज ने कठोर तप के बल पर वर पाया था की अगर उसके खून की एक बूंद भी धरती पर गिरेगी तो उस से अनेक दैत्य पैदा हो जाएंगे। उसने अपनी शक्तियों का प्रयोग निर्दोष लोगों पर करना शुरू कर दिया। धीरे धीरे उसने अपना आतंक तीनों लोकों पर मचा दिया। देवताओं ने उसे युद्ध के लिए ललकारा। भयंकर युद्ध का आगाज हुआ। देवता अपनी पूरी शक्ति लगाकर रक्तबिज का नाश करने को तत्पर थे मगर जैसे ही उसके शरीर की एक भी बूंद खून धरती पर गिरती उस एक बूंद से अनेक रक्तबीज पैदा हो जाते।


सभी देवता मिल कर महाकाली की शरण में गए। मां काली असल में सुन्दरी रूप भगवती दुर्गा का काला और डरावना रूप हैं, जिनकी उत्पत्ति राक्षसों को मारने के लिए ही हुई थी। महाकाली ने देवताओं की रक्षा के लिए विकराल रूप धारण कर युद्ध भूमी में प्रवेश किया। मां काली की प्रतिमा देखें तो देखा जा सकता है की वह विकराल मां हैं। जिसके हाथ में खप्पर है,लहू टपकता है तो गले में खोपड़ीयों की माला है मगर मां की आंखे और ह्रदय से अपने भक्तों के लिए प्रेम की गंगा बहती है।

महाकाली ने राक्षसों का वध करना आरंभ किया लेकिन रक्तबीज के खून की एक भी बूंद धरती पर गिरती तो उस से अनेक दानवों का जन्म हो जाता जिससे युद्ध भूमी में दैत्यों की संख्या बढ़ने लगी। तब मां ने अपनी जिह्वा का विस्तर किया। दानवों का एक बूंद खून धरती पर गिरने की बजाय उनकी जिह्वा पर गिरने लगा। वह लाशों के ढेर लगाती गई और उनका खून पीने लगी। इस तरह महाकाली ने रक्तबीज का वध किया लेकिन तब तक महाकाली का गुस्सा इतना विक्राल रूप से चुका था की उनको शांत करना जरुरी था मगर हर कोई उनके समीप जाने से भी डर रहा था।


सभी देवता भगवान शिव के पास गए और महाकाली को शांत करने के लिए प्रार्थना करने लगे। भगवान् शिव ने उन्हें बहुत प्रकार से शांत करने की कोशिश करी जब सभी प्रयास विफल हो गए तो वह उनके मार्ग में लेट गए। जब उनके चरण भगवान शिव पर पड़े तो वह एकदम से ठिठक गई। उनका क्रोध शांत हो गया। आदि शक्ति मां दुर्गा के विविध रूपों का वर्णन मारकण्डेय पुराण में वर्णित है।





विवाह के कार्ड पे लडके के नाम के आगे-चिरंजीव तथा लडकी के नाम-के आगे आयुष्मति क्यों लिखा जाता है ?



चिरंजीव:—-
————–
एक ब्राह्मण के कोई संतान नही थी, उसने महामाया की तपस्या की, माता जी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्राह्मण से बरदान माँगने को कहा:– ब्राह्मण ने बरदान में पुत्र माँगा।



माता ने कहा :– मेरे पास दो तरह के पुत्र हैं । पहला दस हजार वर्ष जिएेगा लेकिन महा मूर्ख होगा ।

दूसरा, पन्द्रह वर्ष (अल्पायु ) जिऐगा लेकिन महा विद्वान होगा ।

किस तरह का पुत्र चहिए । ब्राह्मण बोला माता मुझे दूसरा वाला पुत्र दे दो।
माता ने तथास्तु ! कहा ।


कुछ दिन बाद ब्राह्मणी ने पुत्र को जन्म दिया लालन- पालन किया धीरे-धीरे पाँच वर्ष बीत गये। माता का वह वरदान याद करके ब्राह्मणी ने ब्राह्मण से कहा पांच वर्ष बीत गये हैं, मेरा पुत्र अल्पायु है जिन आँखों ने लाल को बढते हुए देखा है, जिन आँखों में लाल की छवि बसी है अथाह प्रेम है वह आँखे लाल की मृत्यु कैसे देख पायेंगी कुछ भी करके मेरे लाल को बचालो ।

ब्राह्मण ने अपने पुत्र को विद्या ग्रहण करने के लिए काशी भेज दिया ।


दिन-रात दोनों पुत्र के वियोग में दुखी रहने लगे । धीरे-धीरे समय बीता पुत्र के मृत्यु का समय निकट आया ।

काशी के एक सेंठ ने अपनी पुत्री के साथ उस ब्राह्मण पुत्र का विवाह कर दिया ।
पति-पत्नी के मिलन की रात उसकी मृत्यु की रात थी ।
यमराज नाग रूप धारण कर उसके प्राण हरने के लिए आये। उसके पती को डस लिया पत्नी ने नाग को पकड के कमंडल में बंदकर दिया ।तब तक उसके पती की मृत्यु हो गयी ।


पत्नी महामाया की बहुत बडी भक्त थी वह अपने पती को जीवित करने के लिए माँ की आराधना करने लगी ।आराधना करते-करते एक माह बीत गया । पत्नी के सतीत्व के आगे श्रृष्टि में त्राहि-त्राहि मच गई।

यमराज कमंडल में बंद थे यम लोक की सारी गतविधियाँ रूक गईं ।

देवों ने माता से अनुरोध किया और कहा
-हे माता हम लोंगो ने यमराज को छुडाने की बहुत कोशिश की लेकिन छुडा नही पाये -हे! जगदम्बा अब तूही यमराज को छुडा सकती है।

माता जगदम्बा प्रगटी और बोली :–
-हे! बेटी जिस नाग को तूने कमंडल में बंद किया है वह स्वयं यमराज हैं उनके बिना यम लोक के सारे कार्य रुक गये हैं ।
-हे पुत्री यमराज को आजाद करदे ।

माता के आदेश का पालन करते हुए दुल्हन ने कमंडल से यम राज को आजाद कर दिया।

यमराज कमंडल से बाहर आये ।
माता को तथा दुल्हन के सतीत्व को प्रणाम किया ।माता की आज्ञा से यमराज ने उसके पती के प्राण वापस कर दिये ।
तथा चिरंजीवी रहने का बरदान दिया, और उसे चिरंजीव कहके पुकारा।

तब से लडके के नाम के आगे चिरंजीव लिखने की पृथा चली ।
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आयुषमती:—
____________

राजा आकाश धर के कोई सन्तान नही थी ।
नारद जी ने कहा :– सोने के हल से धरती का दोहन करके उस भूमि पे यज्ञ करो सन्तान जरूर प्राप्त होगी ।
राजा ने सोने के हल से पृथ्वी जोती, जोतते समय उन्हें भूमि से कन्या प्राप्त हुई ।कन्या को महल लेकर आये।

राजा देखते है :- महल में एक शेर खडा है जो कन्या को खाना चाहता है, डर के कारण राजा के हाथ से कन्या छूट गई शेर ने कन्या को मुख में धर लिया, कन्या को मुख में धरते ही शेर कमल पुष्प में परिवर्तित हो गया, उसी समय विष्णु जी प्रगटे और कमल को अपने हाथ से स्पर्स किया। स्पर्श करते ही कमल पुष्प उसी समय यमराज बनकर प्रगट हुआ ,और वो कन्या पच्चीस वर्ष की युवती हो गई।

राजा ने उस कन्या का विवाह विष्णु जी से कर दिया । यमराज ने उसे आयुषमती कहके पुकारा और आयुषमती का बरदान दिया तब से विवाह मे पत्र पे कन्या के नाम के आगे आयुषमती लिखा जाने लगा।

हनुमान ज्योतिष यंत्र: जानिए इससे धन, दाम्पत्य जीवन, प्रेम, रोग संबंधित प्रश्नों के उत्तर



 Hanuman Yantra Astrology



हमारे धर्मग्रंथो में अनेकों यंत्रों का वर्णन है, उन्ही में से एक है हनुमान ज्योतिष यंत्र। इस यंत्र के माध्यम से आपको पैसा, विवाह, प्रेम, स्वास्थ्य आदि से जुड़े सवालों के जबाव मिल सकते हैं। जरूरत है तो बस इस यंत्र पर पूर्ण विश्वास करने की। इस यंत्र की उपयोग विधि इस प्रकार है-



श्री हनुमान ज्योतिष यंत्र में सात खाने (कॉलम) होते हैं। इसका उपयोग करने से पहले पांच बार ऊं रां रामाय नम: मंत्र का तथा बाद में 11 बार ऊं हनुमते नम: मंत्र का जाप करें। इसके बाद आंख बंद करके अपनी मनोकामना के बारे में पूछते हुए इस यंत्र पर कर्सर घुमाएं। जिस खाने में यह कर्सर रुक जाए, उस अंक का फलादेश देखकर ही कार्य करें। यह कार्य पूरी श्रद्धा व विश्वास से करें।


आपको कब धन की प्राप्ति हो सकती है, इसका उत्तर इस प्रकार है-
1.धन प्राप्ति में विलंब होगा।
2. दूसरों की मदद करने से लाभ मिलेगा।
3. आपके पास धन है और धन की प्राप्ति होगी।
4. कर्म पर ध्यान दें। इसी से धन की प्राप्ति होगी।
5. हर कार्य खुशी से करें। लक्ष्मी अवश्य प्रसन्न होगी।
6. आपका धन सुरक्षित है। चिंता न करें।
7. धन के लिए किसी से विवाद न करें। समय आने पर धन की प्राप्ति होगी।

दांपत्य जीवन से संबंधी प्रश्नों के उत्तर इस प्रकार हैं-
1. दांपत्य प्रेम में वृद्धि होगी।
2. आपका दांपत्य जीवन सुखपूर्वक बीतेगा।
3. जीवनसाथी के आने से भाग्योदय होगा और प्रेम भी बढ़ेगा।
4. परायों के कारण परेशानी होगी।
5. वाणी में मधुरता रखें अन्यथा मतभेद और बढ़ेंगे। ऊं नम: शिवाय मंत्र का जाप करें।
6. पैसों को लेकर तनाव और कलह रहेगी।
7. दाम्पत्य में खुशियां मिलेंगी।


प्रेम से संबंधित प्रश्नों के उत्तर इस प्रकार हैं-
1.प्रेम में सफलता का योग है।
2. तीसरे व्यक्ति के बीच से हटने के बाद ही सफलता मिलेगी।
3. अभी सफलता प्राप्त होने में देरी है।
4. प्रेम विवाह का परिणाम अच्छा रहेगा।
5. प्रेम विवाह में बाधा होगी।
6. सफलता मिलेगी, लेकिन देरी से।
7. आसानी से सफलता मिलेगी।

जानिए आपका बुरा समय कब समाप्त होगा-
1. आलस्य छोड़ें, काम करें। छ: माह में सफलता मिलने लगेगी।
2. अपनों की सलाह से चलें, मनमानी और जिद छोड़ें।
3. भाग्य अभी साथ नहीं है। थोड़े समय बाद अनुकूल होगा।
4. बुजुर्गों का आदर करें तथा दान-पुण्य करें, लाभ मिलेगा।
5. पत्नी की सहायता से बुरा समय जल्दी ही कट जाएगा।
6. दो साल तक और अच्छे समय का इंतजार करना पड़ेगा।
7. शीघ्र ही आपका समय अच्छा आने वाला है।


विवाह से संबंधित आपके प्रश्नों के उत्तर इस प्रकार हैं-
1. दक्षिण दिशा में विवाह का योग है, लेकिन अभी देरी है।
2. शीघ्र ही आपकी मनोकामना पूरी होगी।
3. विवाह में बाधाएं आएंगी।
4. शिव-गौरी का पूजन करें तथा मंगल स्त्रोत का पाठ करें।
5. दो वर्ष के बाद विवाह का योग है।
6. अभी विवाह में अड़चनें हैं।
7. शीघ्र ही विवाह होगा।

रोग से संबंधित आपके प्रश्नों के उत्तर इस प्रकार हैं-
1.रोग का उपाय करें, लाभ मिलेगा।
2. भक्ति में ही शक्ति है, इष्टदेव की भक्ति एवं उपासना करें। रोग से मुक्ति मिलेगी।
3. रोग गंभीर है, भारी परेशानी रहेगी।
4. अभी स्वस्थ होने में कम से कम छ: माह लगेंगे।
5. उपचार में परिवर्तन करें, शीघ्र लाभ मिलेगा।
6. दूसरे स्थान पर जाएं, जलवायु बदलने से लाभ मिलेगा।
7. पूर्व कर्मों का फल है। मुक्ति मिलना कठिन है।

मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

यदि चाहते है भाग्य का साथ तो करे पीपल से सम्बंधित ये ज्योतिष उपाय

Astrology
यदि आपको कड़ी मेहनत के बाद भी धन लाभ प्राप्त नहीं हो पा रहा है तो यहां बताए जा रहे ज्योतिषीय उपाय पूरी आस्था के साथ करें। इनसे सकारात्मक फल प्राप्त किए जा सकते हैं। यहां जानिए भाग्य का साथ दिलाने वाले पीपल के उपाय----
If you want to have with the people related to the fate of these measures astrology
1.  को गाय का दूध, तिल और चंदन मिला हुआ पवित्र जल अर्पित करें।
2. ज्योतिष में बताया गया है कि पीपल का पौधा लगाने और उसकी देखभाल करने वाले व्यक्ति की कुंडली के सभी गृह दोष शांत हो जाते हैं। जैसे-जैसे पीपल बड़ा होगा, आपके घर परिवार में सुख-समृद्धि बढ़ती जाएगी।
3. यदि कोई व्यक्ति किसी पीपल के नीचे शिवलिंग स्थापित करता है और नियमित रूप से उस शिवलिंग का पूजन करता है तो सभी समस्याएं समाप्त हो सकती हैं। इस उपाय से बुरा समय दूर हो सकता है।
4. शनि दोष, शनि की साढेसाती और ढय्या के बुरे प्रभावों को दूर करने के लिए प्रति शनिवार पीपल पर जल चढ़ाकर सात बार परिक्रमा करनी चाहिए।
5. शाम के समय पीपल के वृक्ष के नीचे दीपक लगाना चाहिए।
6. पीपल के नीचे बैठकर हनुमान चालीस का पाठ करें, इस उपाय से हनुमानजी प्रसन्न होते हैं और कार्यों में आ रही बाधाएं दूर हो सकती हैं।

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

हिन्दू धर्म के सोलह (16) संस्कार

Hinduism sixteen (16) Rite
शास्त्रों के अनुसार मनुष्य जीवन के लिए कुछ आवश्यक नियम बनाए गए हैं जिनका पालन करना हमारे लिए आवश्यक माना गया है। मनुष्य जीवन में हर व्यक्ति को अनिवार्य रूप से सोलह संस्कारों का पालन करना चाहिए। यह संस्कार व्यक्ति के जन्म से मृत्यु तक अलग-अलग समय पर किए जाते हैं।

Hindu dharm
प्राचीन काल से इन सोलह संस्कारों के निर्वहन की परंपरा चली आ रही है। हर संस्कार का अपना अलग महत्व है। जो व्यक्ति इन सोलह संस्कारों का निर्वहन नहीं करता है उसका जीवन अधूरा ही माना जाता है।

ये सोलह संस्कार क्या-क्या हैं –

गर्भाधान संस्कार ( Garbhaadhan Sanskar) – यह ऐसा संस्कार है जिससे हमें योग्य, गुणवान और आदर्श संतान प्राप्त होती है। शास्त्रों में मनचाही संतान प्राप्त के लिए गर्भधारण संस्कार किया जाता है। इसी संस्कार से वंश वृद्धि होती है।

पुंसवन संस्कार (Punsavana Sanskar) – गर्भस्थ शिशु के बौद्धिक और मानसिक विकास के लिए यह संस्कार किया जाता है। पुंसवन संस्कार के प्रमुख लाभ ये है कि इससे स्वस्थ, सुंदर गुणवान संतान की प्राप्ति होती है।

सीमन्तोन्नयन संस्कार ( Simanta Sanskar) – यह संस्कार गर्भ के चौथे, छठवें और आठवें महीने में किया जाता है। इस समय गर्भ में पल रहा बच्चा सीखने के काबिल हो जाता है। उसमें अच्छे गुण, स्वभाव और कर्म का ज्ञान आए, इसके लिए मां उसी प्रकार आचार-विचार, रहन-सहन और व्यवहार करती है।

जातकर्म संस्कार (Jaat-Karm Sansakar) – बालक का जन्म होते ही इस संस्कार को करने से शिशु के कई प्रकार के दोष दूर होते हैं। इसके अंतर्गत शिशु को शहद और घी चटाया जाता है साथ ही वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया जाता है ताकि बच्चा स्वस्थ और दीर्घायु हो।


नामकरण संस्कार (Naamkaran Sanskar)– शिशु के जन्म के बाद 11वें दिन नामकरण संस्कार किया जाता है। ब्राह्मण द्वारा ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बच्चे का नाम तय किया जाता है।

निष्क्रमण संस्कार (Nishkraman Sanskar) – निष्क्रमण का अर्थ है बाहर निकालना। जन्म के चौथे महीने में यह संस्कार किया जाता है। हमारा शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश जिन्हें पंचभूत कहा जाता है, से बना है। इसलिए पिता इन देवताओं से बच्चे के कल्याण की प्रार्थना करते हैं। साथ ही कामना करते हैं कि शिशु दीर्घायु रहे और स्वस्थ रहे।


अन्नप्राशन संस्कार ( Annaprashana) – यह संस्कार बच्चे के दांत निकलने के समय अर्थात 6-7 महीने की उम्र में किया जाता है। इस संस्कार के बाद बच्चे को अन्न खिलाने की शुरुआत हो जाती है।

मुंडन संस्कार ( Mundan Sanskar)– जब शिशु की आयु एक वर्ष हो जाती है तब या तीन वर्ष की आयु में या पांचवे या सातवे वर्ष की आयु में बच्चे के बाल उतारे जाते हैं जिसे मुंडन संस्कार कहा जाता है। इस संस्कार से बच्चे का सिर मजबूत होता है तथा बुद्धि तेज होती है। साथ ही शिशु के बालों में चिपके कीटाणु नष्ट होते हैं जिससे शिशु को स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है।


विद्या आरंभ संस्कार ( Vidhya Arambha Sanskar )– इस संस्कार के माध्यम से शिशु को उचित शिक्षा दी जाती है। शिशु को शिक्षा के प्रारंभिक स्तर से परिचित कराया जाता है।

कर्णवेध संस्कार ( Karnavedh Sanskar) – इस संस्कार में कान छेदे जाते है । इसके दो कारण हैं, एक- आभूषण पहनने के लिए। दूसरा- कान छेदने से एक्यूपंक्चर होता है। इससे मस्तिष्क तक जाने वाली नसों में रक्त का प्रवाह ठीक होता है। इससे श्रवण शक्ति बढ़ती है और कई रोगों की रोकथाम हो जाती है।

उपनयन या यज्ञोपवित संस्कार (Yagyopaveet Sanskar) – उप यानी पास और नयन यानी ले जाना। गुरु के पास ले जाने का अर्थ है उपनयन संस्कार। आज भी यह परंपरा है। जनेऊ यानि यज्ञोपवित में तीन सूत्र होते हैं। ये तीन देवता- ब्रह्मा, विष्णु, महेश के प्रतीक हैं। इस संस्कार से शिशु को बल, ऊर्जा और तेज प्राप्त होता है।

वेदारंभ संस्कार (Vedaramba Sanskar) – इसके अंतर्गत व्यक्ति को वेदों का ज्ञान दिया जाता है।

केशांत संस्कार (Keshant Sanskar) – केशांत संस्कार अर्थ है केश यानी बालों का अंत करना, उन्हें समाप्त करना। विद्या अध्ययन से पूर्व भी केशांत किया जाता है। मान्यता है गर्भ से बाहर आने के बाद बालक के सिर पर माता-पिता के दिए बाल ही रहते हैं। इन्हें काटने से शुद्धि होती है। शिक्षा प्राप्ति के पहले शुद्धि जरूरी है, ताकि मस्तिष्क ठीक दिशा में काम करें। पुराने में गुरुकुल से शिक्षा प्राप्ति के बाद केशांत संस्कार किया जाता था।

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समावर्तन संस्कार (Samavartan Sanskar)- समावर्तन संस्कार अर्थ है फिर से लौटना। आश्रम या गुरुकुल से शिक्षा प्राप्ति के बाद व्यक्ति को फिर से समाज में लाने के लिए यह संस्कार किया जाता था। इसका आशय है ब्रह्मचारी व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक रूप से जीवन के संघर्षों के लिए तैयार किया जाना।

विवाह संस्कार ( Vivah Sanskar) – यह धर्म का साधन है। विवाह संस्कार सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार माना जाता है। इसके अंतर्गत वर और वधू दोनों साथ रहकर धर्म के पालन का संकल्प लेते हुए विवाह करते हैं। विवाह के द्वारा सृष्टि के विकास में योगदान दिया जाता है। इसी संस्कार से व्यक्ति पितृऋण से मुक्त होता है।

अंत्येष्टी संस्कार (Antyesti Sanskar)– अंत्येष्टि संस्कार इसका अर्थ है अंतिम संस्कार। शास्त्रों के अनुसार इंसान की मृत्यु यानि देह त्याग के बाद मृत शरीर अग्नि को समर्पित किया जाता है। आज भी शवयात्रा के आगे घर से अग्नि जलाकर ले जाई जाती है। इसी से चिता जलाई जाती है। आशय है विवाह के बाद व्यक्ति ने जो अग्नि घर में जलाई थी उसी से उसके अंतिम यज्ञ की अग्नि जलाई जाती है।

रुद्राक्ष और तुलसी की माला पहनने के फायदे

The advantages of wearing Rudraksha beads and basil





द्राक्ष, तुलसी जैसी दिव्य औषधियों की माला पहनने के पीछे वैज्ञानिक मान्यता यह है कि होंठ और जीभ का उपयोग कर मंत्र जप करने से गले की धमनियों को सामान्य से ज्यादा काम करना पड़ता है। इसके कारण कंठमाला, गलगंड आदि रोगों के होने की आशंका होती है। इनसे बचाव के लिए गले में रुद्राक्ष व तुलसी की माला पहनी जाती है।


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धार्मिक मान्यताएं– रुद्राक्ष की माला एक से लेकर चौदहमुखी रुद्राक्षों से बनाई जाती है। वैसे तो 26 दानों की माला सिर पर, 50 की गले में, 16 की बाहों में और 12 की माला मणिबंध में पहनने का विधान है। 108 दानों की माला पहनने से अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है। इसे पहनने वाले को शिव लोक मिलता है, ऐसी पद्म पुराण, शिवमहापुराण आदि शास्त्रों की मान्यता है।


शिवपुराण में कहा गया है-
यथा च दृश्यते लोके रुद्राक्ष: फलद: शुभ:।
न तथा दृश्यन्ते अन्या च मालिका परमेश्वरि।।

विश्व में रुद्राक्ष की माला की तरह दूसरी कोई माला फल देने वाली और शुभ नहीं है।


श्रीमद् देवी भागवत में लिखा है-
रुद्राक्ष धारणच्च श्रेष्ठ न किचदपि विद्यते।

विश्व में रुद्राक्ष धारण से बढ़कर कोई दूसरी चीज नहीं है। रुद्राक्ष की माला श्रद्धा से पहनने वाले इंसान की आध्यात्मिक तरक्की होती है। सांसारिक बाधाओं और दुखों से छुटकारा मिलता है। दिमाग और दिल को शक्ति मिलती है। ब्लडप्रेशर नियंत्रित रहता है। भूत-प्रेत आदि बाधाएं दूर होती हैं। मानसिक शांति मिलती है। गर्मी और ठंड से होने वाले रोग दूर होते हैं। इसलिए इतनी लाभकारी, पवित्र रुद्राक्ष की माला में भारतीय लोगों की अनन्य श्रद्धा है।


तुलसी का हिंदू संस्कृति में बहुत धार्मिक महत्व है। इसमें विद्युत शक्ति होती है। यह माला पहनने वाले में आकर्षण और वशीकरण शक्ति आती है। उसकी यश, कीर्ति और सौभाग्य बढ़ता है। तुलसी की माला पहनने से बुखार, जुकाम, सिरदर्द, चमड़ी के रोगों में भी लाभ मिलता है।संक्रामक बीमारी और अकाल मौत भी नहीं होती, ऐसी धार्मिक मान्यता है। शालग्राम पुराण में कहा गया है तुलसी की माला भोजन करते समय शरीर पर होने से अनेक यज्ञों का पुण्य मिलता है। जो भी कोई तुलसी की माल पहन कर नहाता है, उसे सारी नदियों में नहाने का पुण्य मिलता है।


बुधवार, 21 दिसंबर 2016

रात के समय नहीं करने चाहिए ये तीन काम

These three work at night should not

सुख, शांति और समृद्धि बनी रहे, इसके लिए शास्त्रों में कई नियम बताए गए हैं। इन नियमों में बताया गया है कि हमें किस समय कौन से काम नहीं करना चाहिए। यहां जानिए विष्णु पुराण के अनुसार 3 ऐसी बातें, जिनसे रात के समय दूर रहना चाहिए…

विष्णु पुराण में बताए गए गृहस्थ संबंधी नियमों का पालन करने पर भगवान विष्णु, महालक्ष्मी सहित सभी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त की जा सकती है। यहां जानिए बुद्धिमान व्यक्ति को रात के समय किन 3 से दूर रहना चाहिए…


1. चौराहों पर नहीं जाना चाहिए

किसी भी समझदार व्यक्ति को रात के समय चौराहे से दूर ही रहना चाहिए। रात के समय अक्सर चौराहों पर असामाजिक तत्वों की उपस्थिति रहती है। ऐसे में यदि कोई सज्जन व्यक्ति चौराहे पर जाएगा तो उसे परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही, ये काम सदाचार के नियमों के विरुद्ध भी है। रात के समय अपने घर में ही रहना चाहिए।

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2. श्मशान के आसपास नहीं जाना चाहिए

रात के समय श्मशान के आसपास जाना भी नहीं चाहिए। श्मशान क्षेत्र में सदैव नकारात्मक ऊर्जा सक्रिय रहती है। इसका बुरा असर हमारे मन और मस्तिष्क पर पड़ सकता है। साथ ही, श्मशान क्षेत्र में जलते हुए शवों से निकलने वाला धुआं भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक रहता है। उस क्षेत्र के वातावरण में कई सूक्ष्म कीटाणु भी रहते हैं जो स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसीलिए श्मशान जाने के बाद स्नान करना जरूरी बताया गया है। रात के समय में स्नान करना भी स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है। इन्हीं कारणों के चलते रात के समय श्मशान के आसपास नहीं जाना चाहिए।
3. बुरे चरित्र वाले व्यक्ति से दूर रहना चाहिए
वैसे तो बुरे चरित्र वाले व्यक्ति से हमेशा ही दूर रहना चाहिए, लेकिन रात के समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए। बुरे चरित्र वाले लोग अधिकतर अधार्मिक और गलत कार्य रात के समय में ही करते हैं। ऐसे में यदि कोई सज्जन व्यक्ति इनके साथ रहेगा तो वह परेशानियों में उलझ सकता है। अत: इन लोगों से दूर रहना चाहिए।

जानिए क्रिसमस से जुडी परम्पराएं – कौन है सांता, क्यों सजाते है क्रिसमस ट्री

Know traditions associated with Christmas - Santa Who, why decorate the Christmas tree


खुशी और उत्साह का प्रतीक क्रिसमस ईसाई समुदाय का सबसे बड़ा त्योहार है। ईसाई समुदाय द्वारा यह त्योहार 25 दिसंबर को यीशु मसीह के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। क्रिसमस से जुुड़ी अनेक परंपराएं व रोचक बाते हैं जैसे क्रिसमस ट्री सजाना, संता का गिफ्ट बांटना व कार्ड भेेजना। ये परंपराएं क्यों है व कब से इनकी शुरुआत हुई आइए जानते हैं इन परंपराओं के बारे में खास बातें…

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संत निकोलस यानी सांता (Saint Nicholas Santa) –
मान्यता है कि सांता का घर उत्तरी ध्रुव पर रहते और वे उडऩे वाले रेनडियर्स की गाड़ी पर चलते हैं। सांता का यह आधुनिक रूप 19वीं सदी से अस्तित्व में आया उसके पहले ये ऐसे नहीं थे। आज से डेढ़ हजार साल पहले जन्मे संत निकोलस को असली सांता और सांता का जनक माना जाता है, हालांकि संत निकोलस और जीसस के जन्म का सीधा संबंध नहीं रहा है फिर भी आज के समय में सांता क्लॉज क्रिसमस का अहम हिस्सा हैं। उनके बिना क्रिसमस अधूरा सा लगता है।

Santa Claus

संत निकोलस का जन्म तीसरी सदी में जीसस की मौत के 280 साल बाद मायरा में हुआ। वे एक रईस परिवार से थे। वे जब छोटे थे तभी उनके माता-पिता का देहांत हो गया। बचपन से ही उनकी प्रभु यीशु में बहुत आस्था थी। वे बड़े होकर ईसाई धर्म के पादरी (पुजारी) और बाद में बिशप बने। उन्हें जरूरतमंदों और बच्चों को गिफ्ट्स देना बहुत अच्छा लगता था। वे अक्सर जरूरतमंदों और बच्चों को गिफ्ट्स देते थे। संत निकोलस अपने उपहार आधी रात को ही देते थे, क्योंकि उन्हें उपहार देते हुए नजर आना पसंद नहीं था। वे अपनी पहचान लोगों के सामने नहीं लाना चाहते थे। इसी कारण बच्चों को जल्दी सुला दिया जाता।


क्रिसमस ट्री (Xmas Tree) –
कहा जाता है जब महापुरुष ईसा का जन्म हुआ तो उनके माता-पिता को बधाई देने आए। देवताओं ने एक सदाबहार फर को सितारों से सजाया। मान्यता है कि उसी दिन से हर साल सदाबहार फर के पेड़ को ‘क्रिसमस ट्री प्रतीक के रूप में सजाया जाता है। इसे सजाने की परंपरा जर्मनी में दसवीं शताब्दी के बीच शुरू हुई और इसकी शुरुआत करने वाला पहला व्यक्ति बोनिफेंस टुयो नामक एक अंग्रेज धर्मप्रचारक था।

इंग्लैंड में 1841 में राजकुमार पिंटो एलबर्ट ने विंजर कासल में क्रिसमस ट्री को सजावाया था। उसने पेड़ के ऊपर एक देवता की दोनों भुजाएं फैलाए हुए मूर्ति भी लगवाई, जिसे काफी सराहा गया। क्रिसमस ट्री पर प्रतिमा लगाने की शुरुआत तभी से हुई। पिंटो एलबर्ट के बाद क्रिसमस ट्री को घर-घर पहुंचाने में मार्टिन लूथर का भी काफी हाथ रहा। क्रिसमस के दिन लूथर ने अपने घर वापस आते हुए आसमान को गौर से देखा तो पाया कि वृक्षों के ऊपर टिमटिमाते हुए तारे बड़े मनमोहक लग रहे हैं।

Christmas day

मार्टिन लूथर को तारों का वह दृश्य ऐसा भाया कि उस दृश्य को साकार करने के लिए वह पेड़ की डाल तोड़ कर घर ले आया। घर ले जाकर उसने उस डाल को रंगबिरंगी पन्नियों, कांच एवं अन्य धातु के टुकड़ों, मोमबत्तियों आदि से खूब सजा कर घर के सदस्यों से तारों और वृक्षों के लुभावने प्राकृतिक दृश्य का वर्णन किया। वह सजा हुआ वृक्ष घर सदस्यों को इतना पसंद आया कि घर में हर क्रिसमस पर वृक्ष सजाने की परंपरा चल पड़ी।

क्रिसमस कार्ड की परंपरा (Tradition of Xmas Card) –
सबसे पहले कार्ड विलियम एंगले द्वारा सन् 1842 में भेजा गया था, क्योंकि वह क्रिसमस का मौका था। इसलिए इसे पहला क्रिसमस कार्ड माना जाता है। कहते हैं कि इस कार्ड में एक शाही परिवार की तस्वीर थी, लोग अपने मित्रों के स्वास्थ्य के लिए शुभकामनाएं देते हुए दिखाए गए थे और उस पर लिखा था विलियम एंगले के दोस्तों को क्रिसमस शुभ हो।


उस जमाने में चूंकि यह नई बात थी, इसलिए यह कार्ड महारानी विक्टोरिया को दिखाया गया। इससे खुश होकर उन्होंने अपने चित्रकार डोबसन को बुलाकर शाही क्रिसमस कार्ड बनवाने के लिए कहा और तब से क्रिसमस कार्डों की शुरुआत हो गई।

मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

हिन्दू परम्परायें और उनके वैज्ञानिक तर्क और फायदे



Interesting Facts


भारत परम्पराओं (Traditions) का देश है। हमारे देश में तरह तरह के रीति रिवाज और परम्परायें निभाई जाती हैं। और इन्ही परम्पराओं, रीति रिवाजों की वजह से दुनियां में भारत का एक अलग आकर्षण है। ये परम्परायें बहुत पुराने समय से चली आ रही हैं और ज्यादातर हिन्दू धर्म से जुड़ी दिखाई देती हैं। कुछ लोग इन्हें अन्धविश्वास (Superstition) मानते हैं। जबकि आज भी बहुत से लोग इन परम्पराओं को ऐसे ही निभा रहें हैं।



अगर आप इन परम्पराओं को गहराई से देखें और वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो आप पायेंगे कि हमारे ऋषि मुनियों और पूर्वजों ने गहन अध्ययन करके मनुष्य के लाभ के लिए इनको शुरू किया था। ये हमें स्वास्थ्य सम्बन्धी बहुत सी बीमारियों और समस्याओं से बचाती हैं। और इसे वैज्ञानिक भी प्रमाणित कर चुके हैं।

आज मैं आपके सामने ऐसी ही 15 परम्पराओं के बारे में बताने जा रहा हूँ जिनका अपना एक वैज्ञानिक आधार भी है और फायदे भी हैं।

Hindu traditions

1. व्रत रखना / उपवास रखना

हिन्दू धर्म में व्रत रखने का बहुत महत्व है। लोग, खासतौर पर महिलाएं अपनी अपनी श्रद्दा और आस्था के अनुसार अलग अलग देवी, देवताओं को मानते हैं और उनकी पूजा करते हैं। और फिर सप्ताह में एक दिन, या खास मौको या त्योहारों पर अपने देवी देवताओं के लिए व्रत रखते हैं। जिसमें वे पूरे दिन बगैर अन्न खाए सिर्फ फल खाकर ही रहते हैं। धर्म और मान्यता के अनुसार व्रत रखने से देवी, देवता प्रसन्न होते हैं तथा कष्टों और परेशानियों को दूर करके, मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं।

वैज्ञानिक तर्क :- धर्म और मान्यता के साथ साथ सप्ताह में एक दिन व्रत रखना वैज्ञानिक दृष्टि से भी फायदेमन्द है। आयुर्वेद के अनुसार व्रत रखने से और दिन भर में सिर्फ फल खाने से पाचन क्रिया को आराम मिलता है। जिससे पाचन तन्त्र (Digestion) ठीक रहता है और शरीर से हानिकारक तथा अवांछित तत्व बाहर निकल जाते हैं जिससे शरीर तथा स्वास्थ्य ठीक रहता है। एक शोध के अनुसार सप्ताह में एक दिन व्रत रखने से कैंसर, मधुमेह तथा ह्दय सम्बन्धी बीमारियों का खतरा कम होता है।
2. पैर छूना / चरण स्पर्श करना

हम अपने बड़ों, बुजुर्गो का सम्मान और उनका आदर करने के लिए उनके पैर छूते हैं। पैर छूना या चरण स्पर्श करना भारतीयों संस्कारो का एक हिस्सा है। जो सदियों से चला आ रहा है। यही संस्कार बच्चों को भी सिखाये जाते हैं ताकि वे भी अपने बड़ों का आदर करें और सम्मान करें।

वैज्ञानिक तर्क :- प्रत्येक मनुष्य के शरीर में मस्तिष्क से लेकर पैरों तक लगातार ऊर्जा का संचार होता है। जिसें कॉस्मिक ऊर्जा कहते हैं। जब हम किसी के पैर छूते हैं तब उस व्यक्ति के पैरों से होती हुई ऊर्जा हमारे शरीर में तथा हमारे हाथों से होते हुए उसके शरीर में पहुंचती है। और जब वह व्यक्ति आशीर्वाद देते समय हमारे सिर पर हाथ रखता है तब वह ऊर्जा दोबारा उसके हाथों से होती हुई हमारे शरीर में आती है। इस तरह पैर छूने से हमें दूसरे व्यक्ति की ऊर्जा मिलती है। जिससे नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है और हमारे अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। तथा मन को शांति मिलती है।
3. माथे पर तिलक लगाना

हिन्दू धर्म के अनुसार धार्मिक अवसरों, शादी-विवाह, त्यौहार या पूजा पाठ के समय चन्दन, कुमकुम या सिंदूर से माथे पर तिलक लगाया जाता है। हिन्दू परम्परा के अनुसार माथे पर तिलक लगाना बहुत ही शुभ माना गया है।

वैज्ञानिक तर्क :- मानव शरीर में दोनों आँखों के बीच में एक चक्र होता है। इसी चक्र पर तिलक लगाया जाता है। इस चक्र पर एक नस होती है जिससे पूरे चेहरे पर रक्त का संचार होता है। जब माथे पर तिलक लगाया जाता है तो उस चक्र पर ऊँगली या अंगूठे से दबाव बनता है जिससे वह नस ज्यादा सक्रिय हो जाती है और पूरे चेहरे की माँस पेशियों में बेहतर तरीके से रक्त संचार करती है। जिससे ऊर्जा का संचार होता है और एकाग्रता बढ़ती है तथा चेहरे पर रौनक आती है।
4. हाथ जोड़कर नमस्ते करना या हाथ जोड़ना

हिन्दू परम्परा तथा भारतीय संस्कृति के अनुसार किसी से मिलते समय या अभिवादन करते समय हाथ जोड़कर प्रणाम किया जाता है या पूजा पाठ के समय हाथ जोड़े जाते है। दरअसल हाथ जोड़ना सम्मान का प्रतीक है।

वैज्ञानिक तर्क :- हाथ जोड़ने पर हाथ की सभी अँगुलियों के सिरे एक दूसरे से मिलते हैं। जिससे उन पर दबाव पड़ता है। यह दबाव एक्यूप्रेशर का काम करता है। एक्यूप्रेशर चिकित्सा के अनुसार इसका सीधा असर हमारी आँखों, कानों तथा दिमाग पर पड़ता है। जिससे सामने वाला व्यक्ति हमें लम्बे समय तक याद रहता है।

इसका एक दूसरा तर्क यह भी है कि अगर आप हाथ मिलाने के बजाय हाथ जोड़कर अभिवादन करते हैं तो सामने वाले के शरीर के कीटाणु हम तक नही पहुंच पाते हैं। हाथ जोड़कर अभिवादन करने से एक दूसरे के हाथों का सम्पर्क नहीं हो पाता है जिससे बीमारी फ़ैलाने वाले वायरस तथा बैक्टीरिया हम तक नही पहुंच पाते हैं। और हम बीमारियों से बचे रहते हैं।
5. एक गौत्र में शादी नहीं करना

धार्मिक मान्यता के अनुसार समान गौत्र या कुल में शादी करना प्रतिबंधित है। मान्यता के अनुसार एक ही गौत्र का होने के कारण स्त्री पुरुष भाई बहन कहलाते हैं क्योंकि उनके पूर्वज एक ही हैं। इसलिए एक ही गौत्र में शादियाँ नहीं की जाती हैं। यह बात थोड़ी अजीब भी लगती हैं कि जिन स्त्री, पुरुष ने कभी एक दूसरे को देखा तक नहीं तथा अलग अलग जगहों पर तथा अलग अलग माहौल में पले बढ़े, फिर वे भाई, बहन कैसे बन गये?

वैज्ञानिक तर्क :- लेकिन इसका एक ठोस वैज्ञानिक तर्क है कि समान गौत्र का होने के कारण चाहे वे भाई बहन हों या ना हों लेकिन उनके गुणसूत्र (Chromosome) समान होते हैं। इसलिए अगर एक गौत्र के स्त्री, पुरुषों की शादी होती है तो उनके बच्चे अनुवांशिक (Genetic) बीमारियों के साथ पैदा होते हैं। ऐसे बच्चों में अनुवांशिक दोष जैसे मानसिक कमजोरी, अपंगता आदि गंभीर रोग जन्मजात ही पाए जाते हैं। ऐसे बच्चों की विचारधारा, व्यवहार आदि में कोई नयापन नही होता है। और उनमें रचनात्मकता का अभाव होता है। इसलिए अलग अलग गौत्र में शादी करने से स्त्री पुरुष के गुणसूत्र (Chromosome), जींस आपस में नही मिल पाते हैं जिससे उनके बच्चों में अनुवांशिक बीमारियों का खतरा नही होता है।
6. दक्षिण दिशा या पूर्व दिशा में सिर करके सोना

धर्मशास्त्रों के अनुसार सोते समय आपका सिर दक्षिण या पूर्व दिशा में होना चाहिए तथा आपके पैर उत्तर या पश्चिम दिशा में होने चाहिए। मान्यता के अनुसार ऐसा न करने पर बुरे सपने आते हैं और ये अशुभ होता है।

वैज्ञानिक तर्क :- पृथ्वी के दोनों ध्रुवों उत्तरी (North pole) तथा दक्षिण ध्रुव (South pole) में चुम्बकीय प्रवाह (Magnetic flow) होता है। उत्तरी ध्रुव पर धनात्मक (+) प्रवाह तथा दक्षिणी ध्रुव पर ऋणात्मक (-) प्रवाह होता है। उसी तरह मानव शरीर में भी सिर में धनात्मक (+) प्रवाह तथा पैरों में ऋणात्मक (-) प्रवाह होता है। विज्ञान के अनुसार दो धनात्मक (+) ध्रुव या दो ऋणात्मक (-) ध्रुव एक दूसरे से दूर भागते हैं। (चुम्बक से आप यह परीक्षण करके देख सकते हैं।)

इसलिए जब हम उत्तर दिशा की ओर सिर करके सोते हैं तो उत्तर की धनात्मक तरंग तथा सिर की धनात्मक तरंग एक दूसरे से दूर भागती हैं। जिससे हमारे दिमाग में हलचल होती है और बेचैनी बढ़ जाती है। जिससे अच्छे से नींद नही आती है और सुबह सोकर उठने के बाद भी शरीर में थकान रहती है। जिससे Blood Pressure अंसतुलित हो जाता है और मानसिक बीमारियाँ हो जाती हैं। तथा जब हम दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोते हैं तो दक्षिण की ऋणात्मक (-) तरंग तथा सिर की धनात्मक (+) तरंग आपस में मिल जाती हैं। जिससे चुम्बकीय प्रवाह आसानी से हो जाता है। और दिमाग में कोई हलचल नही होती है और अच्छी नींद आती है। और सुबह उठने पर तरोताजा महसूस करते हैं तथा मानसिक बीमारियों का खतरा नही होता है।

पूर्व दिशा में सूर्योदय होता है। जिससे सूर्योदय होने पर पूर्व दिशा की ओर पैर होने से सूर्य देव का अपमान होता है।

इसलिये हमेशा दक्षिण या पूर्व दिशा की ओर ही सिर करके सोना चाहिए |
7. जमीन पर बैठकर भोजन करना

पुराने समय में आज की तरह डाइनिंग टेबल नहीं थी इसलिए लोग जमीन पर आसन बिछाकर उस पर बैठकर भोजन करते थे। आज के समय में जमीन पर बैठकर भोजन करने की परंपरा लगभग ख़त्म सी हो गयी है लेकिन इसका एक ठोस वैज्ञानिक कारण भी है।

वैज्ञानिक तर्क :– पालथी लगाकर बैठना एक योग आसन है जिसे सुखासन कहते हैं। इस तरह बैठकर भोजन करने से एक तरह से योग होता है तथा पाचन क्रिया अच्छी रहती हैं और मोटापा, अपच, कब्ज , एसिडिटी आदि पेट की बीमारियाँ नहीं होती हैं तथा मन शांत रहता है।
8. भोजन की शुरुआत में तीखा खाना तथा अंत में मीठा खाना

भारतीय परम्परा के अनुसार धार्मिक अवसरों या शुभ अवसरों पर शुरुआत में तीखा खाना खाया जाता है तथा बाद में मीठा खाया जाता है। आज भी ज्यादातर लोग अपनी दैनिक दिनचर्या में खाना खाने के बाद मीठा खाते हैं। एक कहावत भी है कि “खाने के बाद कुछ मीठा हो जाये”।

वैज्ञानिक तर्क : – विज्ञान और आयुर्वेद के अनुसार शुरुआत में तीखा भोजन करने के बाद पेट में पाचन तत्व तथा अम्ल सक्रिय हो जाते हैं। जिससे पाचन तंत्र तेज जाता है। तथा खाने के बाद मीठा खाने से अम्ल की तीव्रता कम हो जाती है जिससे पेट में जलन या एसिडिटी नहीं होती है।
9. सूर्य को जल चढ़ाना

सूर्य को जल चढ़ाने की परम्परा बहुत पुराने समय से है। धर्म शास्त्रों के अनुसार सूर्यदेव को जल चढाने से सूर्यदेव प्रसन्न होते हैं और मनुष्य पर सूर्य का प्रकोप नहीं होता है और उसके राशि दोष ख़त्म हो जाते हैं।

वैज्ञानिक तर्क :– विज्ञान के अनुसार सूर्योदय के समय सूर्य की किरणें ज्यादा तेज नहीं होती है जो शरीर के लिए एक औषधि का काम करती हैं। उगते सूर्य को जल चढाने से तथा जल की धार में से सूर्य को देखने से सूर्य की किरणें जल में से छन कर हमारी आँखों तथा शरीर पर पड़ती हैं। जिससे आँखों की रौशनी तेज होती है तथा पीलिया, क्षय रोग, तथा दिल की बीमारियों का खतरा कम होता है। सूर्य की किरणों से विटामिन-डी भी प्राप्त होता है। इसके अलावा सुबह सुबह सूर्य को जल चढाने से शुद्ध ऑक्सीजन भी हमें मिलती है।
10. स्नान के बाद ही भोजन करना

शास्त्रों के अनुसार बिना स्नान किये भोजन करना वर्जित है। शास्त्रों के अनुसार स्नान करके पवित्र होकर ही भोजन करना चाहिए। बिना स्नान किये भोजन करना पशुओं के समान है और अपवित्र माना गया है। तथा ऐसा करने से देवी देवता अप्रसन्न हो जाते है।

वैज्ञानिक तर्क :- वैज्ञानिक दृष्टिकोण से स्नान करने से शरीर की गन्दगी निकल जाती है तथा शरीर में नई ताजगी तथा स्फूर्ति आती है। स्नान करने के बाद स्वभाविक रूप से भूख लगती है। उस समय भोजन करने से भोजन का रस शरीर के लिए पुष्टिवर्धक होता है।

जबकि स्नान करने से पूर्व खाना खाने से पेट की जठराग्नि उसे पचाने में लग जाती है। खाना खाने के बाद नहाने से शरीर ठंडा हो जाता है जिससे पेट की पाचन क्रिया मन्द पड़ जाती है और पाचन शक्ति कमजोर पड़ जाती तथा पेट के रोग हो जाते है।
11. धार्मिक कार्यो, शुभ अवसरों पर पूजा पाठ में हाथ पर कलावा बांधना

हिन्दू धर्म में प्रत्येक धार्मिक कार्य, शुभ अवसर या पूजा पाठ पर दाहिने हाथ में कलावा (मौली धागा) बाँधा जाता है। शास्त्रों के अनुसार हाथ पर कलावा बांधना शुभ होता है और इससे देवी देवता प्रसन्न होते हैं।

वैज्ञानिक तर्क :- विज्ञान के अनुसार दाहिने हाथ की कलाई में ऐसी नसे होती हैं जो दिमाग तक जाती है। उस जगह कलावा बाँधने से उन नसों पर दबाव पड़ता है जिससे दिमाग तक रक्त संचार सुचारू रूप से होता है जिससे दिमाग शांत रहता है। कलावा वात , कफ तथा पित्त जैसे रोग दोषों का खतरा भी कम करता है।
12. मासिक धर्म में स्त्रियों का मन्दिरों या धार्मिक कार्यो में जाना वर्जित होना

धर्म शास्त्रों के अनुसार स्त्रियों का मासिक धर्म (Periods) के दिनों में मन्दिर में जाना या किसी धार्मिक कार्य में भाग लेना पूर्णत वर्जित है। सनातन धर्म के अनुसार इन दिनों में स्त्रियों के शरीर से गन्दगी बाहर निकलती है जिससे उन्हें अपवित्र माना गया है। और उनको दूसरे लोगो से अलग रहने का नियम बनाया गया है। प्राचीन कल में महिलाओं को मासिक धर्म के समय कोप भवन में रहना पड़ता था और उस समय महिलाएं बाहर आना जाना नहीं करती थीं।

वैज्ञानिक तर्क :- विज्ञान भी इस बात को मानता है कि मासिक धर्म के समय महिलाओं के शरीर से गन्दगी निकलती है तथा एक विशेष प्रकार की तरंगे निकलती हैं। जो दूसरे लोगों के लिए हानिकारक होती है तथा उनसे संक्रमण फैलने का डर रहता है। इसलिये दूसरे लोगों को संक्रमण से बचाने के लिए ही स्त्रियों को इन दिनों में अलग रखे जाने की प्रथा शुरू हुई।

दूसरा कारण ये भी है कि मासिक धर्म के समय महिलाओं को अत्यधिक कमजोरी महसूस होती है। इसलिये इन्हें इन दिनों में घर के सभी कार्यो से दूर रखा जाता है ताकि उन्हें पर्याप्त आराम मिल सके।
13. कान छिदवाना

कान छिदवाना बहुत पुरानी परंपरा है। पुराने समय में ऋषि मुनि, राजा महाराजा कानों में कुंडल पहनते थे। आज के समय में कान छिदवाना एक फैशन बन गया है। जिसे सिर्फ भारत के लोग ही नहीं बल्कि विदेशों में भी लोग अपना रहे हैं। स्त्रियाँ श्रृंगार करने के लिए कान छिद्वाती हैं तथा कानों में कुंडल बालियाँ आदि पहनती हैं।

वैज्ञानिक तर्क :- वैज्ञानिक दृष्टिकोण के हिसाब से कान छिदवाना स्त्री व पुरुष दोनों के लिए लाभदायक है। कान में एक नस होती है जो दिमाग तक जाती है। कान छिदवाने से इस नस में रक्त संचार नियंत्रित रहता है। जिससे सोचने के शक्ति बढ़ती है तथा बोलने में होने वाली समस्या ख़त्म होती है और दिमाग शांत रहता है। पुरुषों के द्वारा कान छिदवाने से उनमे होने वाली हर्निया की बीमारी ख़त्म हो जाती है।
14. तुलसी के पौधे की पूजा करना

आज भी ज्यादातर घरों में तुलसी के पौधे की पूजा की जाती है। हिन्दू धर्म के अनुसार तुलसी की पूजा करने से घर में सुख समृद्धि तथा खुशहाली आती है।

वैज्ञानिक तर्क :- विज्ञानं के अनुसार तुलसी वातावरण को शुद्ध करता है। जिस घर में तुलसी का पौधा होता है उस घर का वातावरण शुद्ध होता है। तुलसी मच्छरों तथा कीटाणुओं को दूर भगाता है जिससे वायु शुद्ध होती है। इसके अलावा तुलसी में रोग प्रतिरोधी गुण होते हैं। इसकी पत्तियां खाने से शरीर का इम्यून सिस्टम मजबूत होता है तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
15. पीपल के पेड़ की पूजा

धार्मिक मान्यता के अनुसार रोजाना पीपल की पूजा करने से घर की सुख, समृद्धि बढती है तथा लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। शास्त्रों के अनुसार पीपल पर साक्षात ब्रम्हा, विष्णु और शिव निवास करते हैं। इस पर लक्ष्मी तथा पितरो का वास भी बताया गया है। इसलिये पीपल का वृक्ष पूजनीय है। शनिवार को पीपल की पूजा करने से शनि के प्रभाव से मुक्ति मिलती है।

वैज्ञानिक तर्क :- वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पीपल 24 घंटे ऑक्सीजन छोड़ता है जो प्राण वायु है और मानव जीवन के लिये बहुत जरूरी है। पीपल का वृक्ष गर्मी में शीतलता (ठण्डक) तथा सर्दी में उष्णता (गर्मी) प्रदान करता है। आयुर्वेद के अनुसार पीपल का हर भाग जैसे तना, पत्ते, छाल और फल सभी चिकित्सा के काम में आते हैं जिनसे कई गम्भीर रोगों का इलाज होता है।

एक दूसरा कारण इस वृक्ष को काटे जाने से बचाने का भी है। लोग इस वृक्ष को काटे नहीं, इसलिये इसकी पूजा का महत्व है। क्योंकि जीने के लिए ऑक्सीजन जरूरी है और सबसे ज्यादा ऑक्सीजन पीपल का वृक्ष ही देता है।

सोमवार, 19 दिसंबर 2016

भूलकर भी घर में इन जगहों पर ना रखें दर्पण

Keep these places in the house, forgetting the mirror





दर्पण हर किसी के घर में होना आम बात है। आप रोजाना इसके सामने खड़े होकर अपना चेहरा संवारते होंगे। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि क्या आपका दर्पण वास्तु के अनुसार सही स्थान पर रखा है? यह दर्पण गलत जगह पर रह कर आपकी आर्थिक परेशानी को बढ़ा रहा है। हालांकि आम तौर पर हम ऐसी भूल कर देते है। वास्तु व‌िज्ञान में सद‌ियों से दर्पण का प्रयोग होता आया है। वास्तु वैज्ञान‌िक दर्पण के प्रयोग से घर के वास्तु दोष को दूर करते आए हैं और इसे वास्तु दोष दूर करने वाला महत्वपूर्ण साधन के रूप में मानते हैं। इसल‌िए दर्पण के मामले में वास्तु संबंधी गलती से बचना चाह‌िए।

सप्ष्ट दर्पण का करें चुनाव
दर्पण का चुनाव करते समय सावधानी बरती चाहिए। दर्पण ऐसा होना चाह‌िए ज‌िसमें चेहरा साफ, स्पष्ट और वास्तव‌िक द‌िखे। धुंधला, व‌िकृत चेहरा द‌िखाने वाला दर्पण बहुत ही बुरा प्रभाव डालता है इससे रोग की वृद्ध‌ि होती है।


Interesting Facts

उत्तर-पूर्वी रखें दर्पण
उन्नत‌ि और लाभ के ल‌िए घर के उत्तर और पूर्वी दीवार की ओर दर्पण लगाएं। वास्तु व‌िज्ञान के अनुसार इस द‌िशा में लगा दर्पण व्यापार-व्यवसाय में घाटा, आर्थ‌िक नुकसान को दूर करके लाभ और धन वृद्ध‌ि में सहायक होता है।

गोल दर्पण लगाए
दर्पण ज‌ितना हल्का और बड़ा होता है वास्तु व‌िज्ञान के अनुसार यह उतना ही फायदेमंद होता है। घर में सुख समृद्ध‌ि बढ़ाने के ल‌िए घर के दरवाजे के सामने गोल दर्पण लगाना चाह‌िए।


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मुख्य द्वार पर न रखें दपर्ण
शयन कक्ष के दरवाजे के सामने दर्पण लगना जहां लाभप्रद होता है वहीं मुख्य द्वार के सामने दर्पण लगाने की भूल न करें इससे हान‌ि होती है। वास्तु व‌िज्ञान के अनुसार इससे सकारात्म उर्जा दर्पण से टकराकर लौट जाती है।


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शयन कक्ष में न रखें दपर्ण
शयन कक्ष में दर्पण नहीं लगाएं। वास्तु व‌िज्ञान के अनुसार इससे पत‌ि पत्नी के संबंध में व‌िश्वास की कमी आती है और मतभेद बढ़ता है।

शनिवार, 17 दिसंबर 2016

हिंदू विवाह में सात फेरे और सात वचन




विवाह एक ऐसा मौक़ा होता है जब दो इंसानो के साथ-साथ दो परिवारों का जीवन भी पूरी तरह बदल जाता है। भारतीय विवाह में विवाह की परंपराओं में सात फेरों का भी एक चलन है। जो सबसे मुख्य रस्म होती है। हिन्दू धर्म के अनुसार सात फेरों के बाद ही शादी की रस्म पूर्ण होती है। सात फेरों में दूल्हा व दुल्हन दोनों से सात वचन लिए जाते हैं। यह सात फेरे ही पति-पत्नी के रिश्ते को सात जन्मों तक बांधते हैं। हिंदू विवाह संस्कार के अंतर्गत वर-वधू अग्नि को साक्षी मानकर इसके चारों ओर घूमकर पति-पत्नी के रूप में एक साथ सुख से जीवन बिताने के लिए प्रण करते हैं और इसी प्रक्रिया में दोनों सात फेरे लेते हैं, जिसे सप्तपदी भी कहा जाता है। और यह सातों फेरे या पद सात वचन के साथ लिए जाते हैं। हर फेरे का एक वचन होता है, जिसे पति-पत्नी जीवनभर साथ निभाने का वादा करते हैं। यह सात फेरे ही हिन्दू विवाह की स्थिरता का मुख्य स्तंभ होते हैं।
सात फेरों के सात वचन

विवाह के बाद कन्या वर के वाम अंग में बैठने से पूर्व उससे सात वचन लेती है। कन्या द्वारा वर से लिए जाने वाले सात वचन इस प्रकार है।
प्रथम वचन



तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या:,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी !!

(यहाँ कन्या वर से कहती है कि यदि आप कभी तीर्थयात्रा को जाओ तो मुझे भी अपने संग लेकर जाना। कोई व्रत-उपवास अथवा अन्य धर्म कार्य आप करें तो आज की भांति ही मुझे अपने वाम भाग में अवश्य स्थान दें। यदि आप इसे स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ।)

किसी भी प्रकार के धार्मिक कृ्त्यों की पूर्णता हेतु पति के साथ पत्नि का होना अनिवार्य माना गया है। जिस धर्मानुष्ठान को पति-पत्नि मिल कर करते हैं, वही सुखद फलदायक होता है। पत्नि द्वारा इस वचन के माध्यम से धार्मिक कार्यों में पत्नि की सहभागिता, उसके महत्व को स्पष्ट किया गया है।
द्वितीय वचन



पुज्यौ यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या:,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम !!

(कन्या वर से दूसरा वचन मांगती है कि जिस प्रकार आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार मेरे माता-पिता का भी सम्मान करें तथा कुटुम्ब की मर्यादा के अनुसार धर्मानुष्ठान करते हुए ईश्वर भक्त बने रहें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ।)

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यहाँ इस वचन के द्वारा कन्या की दूरदृष्टि का आभास होता है। आज समय और लोगों की सोच कुछ इस प्रकार की हो चुकी है कि अमूमन देखने को मिलता है--गृहस्थ में किसी भी प्रकार के आपसी वाद-विवाद की स्थिति उत्पन होने पर पति अपनी पत्नि के परिवार से या तो सम्बंध कम कर देता है अथवा समाप्त कर देता है। उपरोक्त वचन को ध्यान में रखते हुए वर को अपने ससुराल पक्ष के साथ सदव्यवहार के लिए अवश्य विचार करना चाहिए।
तृतीय वचन



जीवनम अवस्थात्रये मम पालनां कुर्यात,
वामांगंयामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृ्तीयं !!

(तीसरे वचन में कन्या कहती है कि आप मुझे ये वचन दें कि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं (युवावस्था, प्रौढावस्था, वृद्धावस्था) में मेरा पालन करते रहेंगे, तो ही मैं आपके वामांग में आने को तैयार हूँ।)
चतुर्थ वचन



कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थं !!

(कन्या चौथा वचन ये माँगती है कि अब तक आप घर-परिवार की चिन्ता से पूर्णत: मुक्त थे। अब जबकि आप विवाह बंधन में बँधने जा रहे हैं तो भविष्य में परिवार की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व आपके कंधों पर है। यदि आप इस भार को वहन करने की प्रतीज्ञा करें तो ही मैं आपके वामांग में आ सकती हूँ।)

इस वचन में कन्या वर को भविष्य में उसके उतरदायित्वों के प्रति ध्यान आकृ्ष्ट करती है। विवाह पश्चात कुटुम्ब पौषण हेतु पर्याप्त धन की आवश्यकता होती है। अब यदि पति पूरी तरह से धन के विषय में पिता पर ही आश्रित रहे तो ऐसी स्थिति में गृहस्थी भला कैसे चल पाएगी। इसलिए कन्या चाहती है कि पति पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर होकर आर्थिक रूप से परिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ति में सक्षम हो सके। इस वचन द्वारा यह भी स्पष्ट किया गया है कि पुत्र का विवाह तभी करना चाहिए जब वो अपने पैरों पर खडा हो, पर्याप्त मात्रा में धनार्जन करने लगे।
पंचम वचन



स्वसद्यकार्ये व्यवहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्त्रयेथा,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: पंचमत्र कन्या !!

(इस वचन में कन्या जो कहती है वो आज के परिपेक्ष में अत्यंत महत्व रखता है। वो कहती है कि अपने घर के कार्यों में, विवाहादि, लेन-देन अथवा अन्य किसी हेतु खर्च करते समय यदि आप मेरी भी मन्त्रणा लिया करें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ।)

यह वचन पूरी तरह से पत्नि के अधिकारों को रेखांकित करता है। बहुत से व्यक्ति किसी भी प्रकार के कार्य में पत्नी से सलाह करना आवश्यक नहीं समझते। अब यदि किसी भी कार्य को करने से पूर्व पत्नी से मंत्रणा कर ली जाए तो इससे पत्नी का सम्मान तो बढता ही है, साथ साथ अपने अधिकारों के प्रति संतुष्टि का भी आभास होता है।
षष्ठम वचनः



न मेपमानमं सविधे सखीनां द्यूतं न वा दुर्व्यसनं भंजश्चेत,
वामाम्गमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम !!

(कन्या कहती है कि यदि मैं अपनी सखियों अथवा अन्य स्त्रियों के बीच बैठी हूँ तब आप वहाँ सबके सम्मुख किसी भी कारण से मेरा अपमान नहीं करेंगे। यदि आप जुआ अथवा अन्य किसी भी प्रकार के दुर्व्यसन से अपने आप को दूर रखें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ।)

वर्तमान परिपेक्ष्य में इस वचन में गम्भीर अर्थ समाहित हैं। विवाह पश्चात कुछ पुरुषों का व्यवहार बदलने लगता है। वे जरा जरा सी बात पर सबके सामने पत्नी को डाँट-डपट देते हैं। ऐसे व्यवहार से पत्नी का मन कितना आहत होता होगा। यहाँ पत्नी चाहती है कि बेशक एकांत में पति उसे जैसा चाहे डांटे किन्तु सबके सामने उसके सम्मान की रक्षा की जाए, साथ ही वो किन्हीं दुर्व्यसनों में फँसकर अपने गृ्हस्थ जीवन को नष्ट न कर ले।
सप्तम वचनः


परस्त्रियं मातृसमां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कुर्या,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तममत्र कन्या !!

(अन्तिम वचन के रूप में कन्या ये वर मांगती है कि आप पराई स्त्रियों को माता के समान समझेंगें और पति-पत्नि के आपसी प्रेम के मध्य अन्य किसी को भागीदार न बनाएंगें। यदि आप यह वचन मुझे दें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ।)

विवाह पश्चात यदि व्यक्ति किसी बाह्य स्त्री के आकर्षण में बँध पगभ्रष्ट हो जाए तो उसकी परिणिति क्या होती है। इसलिए इस वचन के माध्यम से कन्या अपने भविष्य को सुरक्षित रखने का प्रयास करती है।

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

कपूर के यह उपाय आपको बना देंगे मालामाल

This measure will make you rich Kapoor
रात के समय में चांदी की कटोरी में कपूर और लौंग को जलाएं। इस टोटके को कुछ दिनों तक रोज करें। यह उपाय आपको धन से मालामाल कर देगा। पैसों की कमी भी नहीं रहेगी।
जब हजार कोशिशों के बाद भी काम नहीं बनते हैं तो एैसे में कपूर आपकी किस्मत के ताले को खोल सकता है।

शनिवार के दिन कपूर के तेल की बूंदों को पानी में डालें और फिर इस पानी से रोज स्नान करें। यह टोटका आपकी बंद किस्मत को खोलता है। और आपको बीमारियों से भी बचाता है। दुर्घटना कभी भी हो सकती है। एैसे में बचाव बहुत ही जरूरी है।

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आप रात के समय में कपूर को जलाकर हनुमान चालीसा का पाठ करें। इस अचूक टोटके से इंसान किसी भी तरह की प्राकृतिक व अप्राकृतिक दुर्घटना से बचता रहता है।

आपके कई काम इसलिए नहीं बनते हैं क्योंकि इसके पीछे वास्तुदोष होता है। वास्तुदोष को खत्म करने के लिए घर में कपूर की दो गोली रखें। और जब यह गल जाएं फिर दो गोलियां रख दें। एैसा आप समय समय पर करते रहें या बदलते रहें। इससे वास्तुदोष खत्म हो जाएगा।

Interesting Facts

यदि आपके घर में परेशानी रहती हो तो कपूर को घी में भिगाएं और सुबह और शाम के समय में इसे जलाएं। इससे निकलने वाली उर्जा से घर के अंदर सकारात्मक उर्जा आती है जिससे घर में शांति बनी रहती है। 


यदि विवाह में किसी भी तरह की समस्या आ रही हो तो आप 6 कपूर के टुकडे और 36 लौंग के टुकडे लें। अब इसमें चावल और हल्दी को मिला लें। इसके पश्चात आप देवी दुर्गा को इससे आहुति दें। इस टोटके से शादी जल्दी होती है।


गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

यहां सास पिलाती है दूल्हे को शराब, तभी होती है शादी

The mother feeds the groom wine, is only marriage

छत्तीसगढ के कवर्धा जिले में एक अनूठी परंपरा के तहत बैगा-आदिवासियों के विवाह में दूल्हे को दुल्हन की मां शराब पिलाकर रस्म की शुरुआत करती है और इसके बाद पूरा परिवार इसका सेवन करता है। यही नहीं, दूल्हा और दुल्हन भी एक-दूसरे को शराब पिलाकर इस परंपरा का निर्वहन करते हैं। इसके बाद पूरे गांव में शादी का जश्न मनाया जाता है। 

अगर आप सोच रहे हैं कि शराब बुरी चीज है और शादी-ब्याह जैसे मांगलिक कार्य में इसका क्या काम, तो आप गलत हैं। बैगा-आदिवासियों का समुदाय इस पूरे मामले में पूरी तरह से अलग है, क्योंकि इस समुदाय में शादी-ब्याह से लेकर मातम में भी शराब का सेवन किया जाता है।
जिले के सुदूर वनांचल में निवासरत बैगा-आदिवासी परिवार में अब शादी का सिलसिला शुरू हो जाएगा। शादी पर्व का इन परिवारों को बेसब्री से इंतजार होता है। 


Interesting Facts

शादी पर्व में बाराती और घराती तो शराब पीते ही हैं, साथ ही दूल्हा-दुल्हन को भी शराब का शगुन करना बेहद जरूरी होता है। बारात जब दुल्हन लेने गांव पहुंचती है तो सबसे पहले शराब का ही शगुन किया जाता है। खुद दुल्हन की मां दूल्हे को अपने हाथ से शराब पिलाती है। इसके बाद दूल्हे और दुल्हन की बारी आती है और वे भी एक-दूसरे को शराब पिलाते हैं।

बैगा समुदाय को करीब से जानने वाले चंद्रशेखर शर्मा बताते हैं कि बैगा आदिवासियों की शादी में कोई पंडित नहीं होता और न ही कोई विशेष सजावट होती है। यहां तक दहेज प्रथा भी पूरी तरह से बंद है। यहां चलता है तो केवल महुए से बनी शराब। 

यही इनके लिए सब कुछ होता है। चंद्रशेखर बताते हैं कि महंगाई के इस दौर में आज भी परिवार का मुखिया शादी का खर्च महज 22 रुपये ही लेता है। वहीं समाज के पंचों को 100 रुपये दिए जाते हैं। वनांचल में निवासरत बैगा शादी रचाने और दुल्हन लाने के लिए आज भी पूरी बारात मीलों दूर पैदल चलकर जाती है। 

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शादी का पंडाल भी पेड़ों की पत्तियों से बनाया जाता है। तमाम सामाजिक रस्मों को पूरा करने के बाद दूल्हा दौड़ लगाकर अपनी दुल्हन को पकड़ लेता है और उसे अपनी अंगूठी पहना देता है। आदिवासी बैगा समुदाय में किसी भी जश्न या मातम में शराब परोसना अनिवार्य है। बैगा इस प्रचलित मान्यता को लेकर चर्चा में रहते हैं।

बुधवार, 14 दिसंबर 2016

इस मूर्ति को रखने मात्र से हो जाएंगे बिजनेस में वारे-न्यारे

The statue will be the only business in keeping Ware-separation


अगर आप धंधे और व्यवसाय में जबरदस्त बढोतरी चाहते हैं तो उस जगह पर चीन के गुआन गोंग या कुआन कुंग की मूर्ति को रखना शुरू कर दें। फिर देखें चमत्‍कार-
 

vastu tips

गुआन गोंग को वॉर हीरो माना जाता है। यही वजह है कि इस यौद्धा की मूर्ति को बिजनेसमैन अपने ऑफिस में रखते हैं।

यह न केवल सकारात्मक ऊर्जा देती है, बल्कि बिजनेस को बुरी नजर से भी बचाती है।

Astrology


वास्तु के अनुसार इसे फ्रंट रिसेप्शन डेस्क पर रखा जाना चाहिए। इसे वर्क एरिया के पीछे की ओर भी रखा जा सकता है। यह मूर्ति मेटल और क्ले में भी मिल जाती है। बेहतर होगा कि पीतल की मूर्ति रखी जाए।

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ध्यान रहे कि इसे किचन या बाथरूम में नहीं रखा जाए। घर में उत्तर-पश्चिम दिशा सबसे उपयुक्त है। साथ ही यह स्थान ऐसा होना चाहिए, जहां सभी की नजरें पड़ती हों।

मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

अदभुत रहस्य :- आखिर क्यों निगला सीताजी ने लक्ष्मण को



एक समय की बात है मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम रावण का वध करके भगवती सीता के साथ अवधपुरी वापस आ गए । अयोध्या को एक दुल्हन की तरह से सजाया गया और उत्सव मनाया गया ।उत्सव मनाया जा रहा था तभी सीता जी को यह ख्याल आया की वनवास जाने से पूर्व मां सरयु से वादा किया था कि अगर पुन: अपने पति और देवर के साथ सकुशल अवधपुरी वापस आऊंगी तो आपकी विधिवत रूप से पूजन अर्चन करूंगी ।


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यह सोचकर सीता जी ने लक्ष्मण को साथ लेकर रात्रि में सरयू नदी के तट पर गई। सरयु की पूजा करने के लिए लक्ष्मण से जल लाने के लिए कहा ,! लक्ष्मण जी जल लाने के लिए घडा लेकर सरयू नदी में उतर गए।


जल भर ही रहे थे कि तभी-सरयू के जल से एक अघासुर नाम का राक्षस निकला जो लक्ष्मण जी को निगलना चाहता था ।लेकिन तभी भगवती सीता ने यह दृश्य देखा :—-और लक्ष्मण को बचाने के लिए माता सीता ने अघासुर के निगलने से पहले स्वयं लक्ष्मण को निगल गई ।

लक्ष्मण को निगलने के बाद सीता जी का सारा शरीर जल बनकर गल गया (यह दृश्य हनुमानजी देख रहे थे जो अद्रश्य रुप से सीता जी के साथ सरयू तट पर आए थे ) उस तन रूपी जल को श्री हनुमान जी घड़े में भरकर भगवान श्री राम के सम्मुख लाए। और सारी घटना कैसे घटी यह बात हनुमान जी ने श्री राम जी से बताई ।


मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी हँसकर बोले:– -हे मारूति सुत सारे राक्षसों का बध तो मैने कर दिया लेकिन ये राक्षस मेरे हाथों से मरने वाला नही है । इसे भगवान भोलेनाथ का वरदान प्राप्त है कि जब त्रेतायुग में सीता और लक्ष्मण का तन एक तत्व में बदल जायेगा तब उसी तत्व के द्वारा इस राक्षस का बध होगा । और वह तत्व रूद्रावतारी हनुमान के द्वारा अस्त्र रूप में प्रयुक्त किया जाये ।

सो हनुमान इस जल को तत्काल सरयु जल में अपने हाथों से प्रवाहित कर दो। इस जल के सरयु के जल में मिलने से अघासुर का बध हो जायेगा और सीता तथा लक्ष्मण पुन:अपने शरीर को प्राप्त कर सकेंगे ।


हनुमान जी ने घडे के जल को आदि गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित करके सरयु जल में डाल दिया ।
घडे का जल ज्यों ही सरयु जल में मिला त्यों ही सरयु के जल में भयंकर ज्वाला जलने लगी उसी ज्वाला में अघासुर जलकर भस्म हो गया ।

और सरयु माता ने पुन: सीता तथा लक्ष्मण को नव-जीवन प्रदान किया ।
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अवधपुरी मम् पुरी सुहावन ।
उत्तर दिश बह सरयु पावन ।।
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|| राम ||