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रविवार, 25 जून 2017

जानिए भगवद् गीता के 9 बेहतरीन मैनेजमेंट सूत्र




जानिए भगवद् गीता के 9 बेहतरीन मैनेजमेंट सूत्र जिनमे छुपा है आपकी हर परेशानी का हल





धर्म ग्रंथों के अनुसार मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। इसलिए प्रतिवर्ष इस तिथि को गीता जयंती का पर्व मनाया जाता है। गीता एकमात्र ऐसा ग्रंथ है, जिसकी जयंती मनाई जाती है।
Bhagavad gita slokas with meaning in Hindi
गीता दुनिया के उन चंद ग्रंथों में शुमार है, जो आज भी सबसे ज्यादा पढ़े जा रहे हैं और जीवन के हर पहलू को गीता से जोड़कर व्याख्या की जा रही है। इसके 18 अध्यायों के करीब 700 श्लोकों में हर उस समस्या का समाधान है जो कभी ना कभी हर इंसान के सामने आती हैं।  आज हम आपको इस लेख में गीता के 9 चुनिंदा प्रबंधन सूत्रों से रूबरू करवा रहे हैं, जो इस प्रकार हैं-

1

श्लोक 
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
 मा कर्मफलहेतु र्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि ।।
अर्थ- भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन। कर्म करने में तेरा अधिकार है। उसके फलों के विषय में मत सोच। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत हो और कर्म न करने के विषय में भी तू आग्रह न कर।
मैनेजमेंट सूत्र- भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन से कहना चाहते हैं कि मनुष्य को बिना फल की इच्छा से अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा व ईमानदारी से करना चाहिए। यदि कर्म करते समय फल की इच्छा मन में होगी तो आप पूर्ण निष्ठा से साथ वह कर्म नहीं कर पाओगे। निष्काम कर्म ही सर्वश्रेष्ठ परिणाम देता है। इसलिए बिना किसी फल की इच्छा से मन लगाकर अपना काम करते रहो। फल देना, न देना व कितना देना ये सभी बातें परमात्मा पर छोड़ दो क्योंकि परमात्मा ही सभी का पालनकर्ता है।

2

श्लोक 
 योगस्थ: कुरु कर्माणि संग त्यक्तवा धनंजय।
     सिद्धय-सिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।
अर्थ- हे धनंजय (अर्जुन)। कर्म न करने का आग्रह त्यागकर, यश-अपयश के विषय में समबुद्धि होकर योग युक्त होकर, कर्म कर, (क्योंकि) समत्व को ही योग कहते हैं।
मैनेजमेंट सूत्र- धर्म का अर्थ होता है कर्तव्य। धर्म के नाम पर हम अक्सर सिर्फ कर्मकांड, पूजा-पाठ, तीर्थ-मंदिरों तक सीमित रह जाते हैं। हमारे ग्रंथों ने कर्तव्य को ही धर्म कहा है। भगवान कहते हैं कि अपने कर्तव्य को पूरा करने में कभी यश-अपयश और हानि-लाभ का विचार नहीं करना चाहिए। बुद्धि को सिर्फ अपने कर्तव्य यानी धर्म पर टिकाकर काम करना चाहिए। इससे परिणाम बेहतर मिलेंगे और मन में शांति का वास होगा। मन में शांति होगी तो परमात्मा से आपका योग आसानी से होगा। आज का युवा अपने कर्तव्यों में फायदे और नुकसान का नापतौल पहले करता है, फिर उस कर्तव्य को पूरा करने के बारे में सोचता है। उस काम से तात्कालिक नुकसान देखने पर कई बार उसे टाल देते हैं और बाद में उससे ज्यादा हानि उठाते हैं।

3

श्लोक 
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयत: शांतिरशांतस्य कुत: सुखम्।
अर्थ- योग रहित पुरुष में निश्चय करने की बुद्धि नहीं होती और उसके मन में भावना भी नहीं होती। ऐसे भावना रहित पुरुष को शांति नहीं मिलती और जिसे शांति नहीं, उसे सुख कहां से मिलेगा।
मैनेजमेंट सूत्र – हर मनुष्य की इच्छा होती है कि उसे सुख प्राप्त हो, इसके लिए वह भटकता रहता है, लेकिन सुख का मूल तो उसके अपने मन में स्थित होता है। जिस मनुष्य का मन इंद्रियों यानी धन, वासना, आलस्य आदि में लिप्त है, उसके मन में भावना (आत्मज्ञान) नहीं होती। और जिस मनुष्य के मन में भावना नहीं होती, उसे किसी भी प्रकार से शांति नहीं मिलती और जिसके मन में शांति न हो, उसे सुख कहां से प्राप्त होगा। अत: सुख प्राप्त करने के लिए मन पर नियंत्रण होना बहुत आवश्यक है।

4

श्लोक 
 विहाय कामान् य: कर्वान्पुमांश्चरति निस्पृह:।
  निर्ममो निरहंकार स शांतिमधिगच्छति।।
अर्थ- जो मनुष्य सभी इच्छाओं व कामनाओं को त्याग कर ममता रहित और अहंकार रहित होकर अपने कर्तव्यों का पालन करता है, उसे ही शांति प्राप्त होती है।
मैनेजमेंट सूत्र – यहां भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन में किसी भी प्रकार की इच्छा व कामना को रखकर मनुष्य को शांति प्राप्त नहीं हो सकती। इसलिए शांति प्राप्त करने के लिए सबसे पहले मनुष्य को अपने मन से इच्छाओं को मिटाना होगा। हम जो भी कर्म करते हैं, उसके साथ अपने अपेक्षित परिणाम को साथ में चिपका देते हैं। अपनी पसंद के परिणाम की इच्छा हमें कमजोर कर देती है। वो ना हो तो व्यक्ति का मन और ज्यादा अशांत हो जाता है। मन से ममता अथवा अहंकार आदि भावों को मिटाकर तन्मयता से अपने कर्तव्यों का पालन करना होगा। तभी मनुष्य को शांति प्राप्त होगी।

5

श्लोक 
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
  कार्यते ह्यश: कर्म सर्व प्रकृतिजैर्गुणै:।।
अर्थ- कोई भी मनुष्य क्षण भर भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। सभी प्राणी प्रकृति के अधीन हैं और प्रकृति अपने अनुसार हर प्राणी से कर्म करवाती है और उसके परिणाम भी देती है।
मैनेजमेंट सूत्र- बुरे परिणामों के डर से अगर ये सोच लें कि हम कुछ नहीं करेंगे तो ये हमारी मूर्खता है। खाली बैठे रहना भी एक तरह का कर्म ही है, जिसका परिणाम हमारी आर्थिक हानि, अपयश और समय की हानि के रूप में मिलता है। सारे जीव प्रकृति यानी परमात्मा के अधीन हैं, वो हमसे अपने अनुसार कर्म करवा ही लेगी। और उसका परिणाम भी मिलेगा ही। इसलिए कभी भी कर्म के प्रति उदासीन नहीं होना चाहिए, अपनी क्षमता और विवेक के आधार पर हमें निरंतर कर्म करते रहना चाहिए।

6

श्लोक 
 नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण:।
   शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मण:।।
अर्थ- तू शास्त्रों में बताए गए अपने धर्म के अनुसार कर्म कर, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा।
मैनेजमेंट सूत्र- श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से मनुष्यों को समझाते हैं कि हर मनुष्य को अपने-अपने धर्म के अनुसार कर्म करना चाहिए जैसे- विद्यार्थी का धर्म है विद्या प्राप्त करना, सैनिक का कर्म है देश की रक्षा करना। जो लोग कर्म नहीं करते, उनसे श्रेष्ठ वे लोग होते हैं जो अपने धर्म के अनुसार कर्म करते हैं, क्योंकि बिना कर्म किए तो शरीर का पालन-पोषण करना भी संभव नहीं है। जिस व्यक्ति का जो कर्तव्य तय है, उसे वो पूरा करना ही चाहिए।

7

श्लोक 
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
 स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।
अर्थ- श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करते हैं, सामान्य पुरुष भी वैसा ही आचरण करने लगते हैं। श्रेष्ठ पुरुष जिस कर्म को करता है, उसी को आदर्श मानकर लोग उसका अनुसरण करते हैं।
मैनेजमेंट सूत्र- यहां भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि श्रेष्ठ पुरुष को सदैव अपने पद व गरिमा के अनुसार ही व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि वह जिस प्रकार का व्यवहार करेगा, सामान्य मनुष्य भी उसी की नकल करेंगे। जो कार्य श्रेष्ठ पुरुष करेगा, सामान्यजन उसी को अपना आदर्श मानेंगे। उदाहरण के तौर पर अगर किसी संस्थान में उच्च अधिकार पूरी मेहनत और निष्ठा से काम करते हैं तो वहां के दूसरे कर्मचारी भी वैसे ही काम करेंगे, लेकिन अगर उच्च अधिकारी काम को टालने लगेंगे तो कर्मचारी उनसे भी ज्यादा आलसी हो जाएंगे।

8

श्लोक 
 न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्म संगिनाम्।
 जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्त: समाचरन्।।
अर्थ- ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे किंतु स्वयं परमात्मा के स्वरूप में स्थित हुआ और सब कर्मों को अच्छी प्रकार करता हुआ उनसे भी वैसे ही कराए।
मैनेजमेंट सूत्र- ये प्रतिस्पर्धा का दौर है, यहां हर कोई आगे निकलना चाहता है। ऐसे में अक्सर संस्थानों में ये होता है कि कुछ चतुर लोग अपना काम तो पूरा कर लेते हैं, लेकिन अपने साथी को उसी काम को टालने के लिए प्रोत्साहित करते हैं या काम के प्रति उसके मन में लापरवाही का भाव भर देते हैं। श्रेष्ठ व्यक्ति वही होता है जो अपने काम से दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनता है। संस्थान में उसी का भविष्य सबसे ज्यादा उज्जवल भी होता है।

9

श्लोक 
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
म वत्र्मानुवर्तन्ते मनुष्या पार्थ सर्वश:।।
अर्थ- हे अर्जुन। जो मनुष्य मुझे जिस प्रकार भजता है यानी जिस इच्छा से मेरा स्मरण करता है, उसी के अनुरूप मैं उसे फल प्रदान करता हूं। सभी लोग सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।
मैनेजमेंट सूत्र- इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि संसार में जो मनुष्य जैसा व्यवहार दूसरों के प्रति करता है, दूसरे भी उसी प्रकार का व्यवहार उसके साथ करते हैं। उदाहरण के तौर पर जो लोग भगवान का स्मरण मोक्ष प्राप्ति के लिए करते हैं, उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। जो किसी अन्य इच्छा से प्रभु का स्मरण करते हैं, उनकी वह इच्छाएं भी प्रभु कृपा से पूर्ण हो जाती है। कंस ने सदैव भगवान को मृत्यु के रूप में स्मरण किया। इसलिए भगवान ने उसे मृत्यु प्रदान की। हमें परमात्मा को वैसे ही याद करना चाहिए, जिस रुप में हम उसे पाना चाहते हैं।

















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शनिवार, 24 जून 2017

आजमाएं ये आसान उपाय,श्रीगणेश करेंगे हर वास्तु समस्या दूर


घर या कार्यस्थल के किसी भी भाग में वक्रतुण्ड की प्रतिमा या चित्र लगाने से भी लाभ मिलता है। लेकिन प्रतिमा लगाते समय ध्यान रखें कि इनका मुंह दक्षिण दिशा या नैऋत्य कोण में नहीं हो।


घर में अगर वास्तु दोष है तो बिना किसी तोड़-फोड़ के श्रीगणेशजी को स्थापित और वंदन कर वास्तुदोषों को कम या खत्म किया जा सकता है।



- यदि घर के मुख्य द्वार पर एकदंत की प्रतिमा या चित्र लगाया गया है तो उसके दूसरी तरफ ठीक उसी जगह गणेशजी की प्रतिमा इस प्रकार लगाए कि दोनों गणेशजी की पीठ एक दूसरे से मिलती हो।



- इस प्रकार से दूसरी प्रतिमा या चित्र लगाने से वास्तु दोषों का शमन होता है। जिस भाग में वास्तु दोष हो उस स्थान पर घी मिश्रित सिंदूर से स्वास्तिक दीवार पर बनाने से भी वास्तु दोष का प्रभाव कम होता है।




- घर या कार्यस्थल के किसी भी भाग में वक्रतुण्ड की प्रतिमा या चित्र लगाने से भी लाभ मिलता है। लेकिन प्रतिमा लगाते समय ध्यान रखें कि इनका मुंह दक्षिण दिशा या नैऋत्य कोण में नहीं हो।




- घर में बैठे गणेशजी और कार्यस्थल पर खड़े गणपतिजी का चित्र लगाना लाभकारी होता है। लेकिन ध्यान रखें कि खड़े गणेशजी के दोनों पैर जमीन का स्पर्श करते हुए हों। इससे कार्यों में स्थिरता आती है।


भवन के ब्रह्म स्थान अर्थात केंद्र में, ईशान कोण और पूर्व दिशा में सुखकर्ता की मूर्ति अथवा चित्र लगाना शुभ रहता है। लेकिन टॉयलेट अथवा ऐसे स्थान पर गणेशजी का चित्र नहीं लगाएं।




यदि खिड़कियां रखना आवश्यक हो तो इन दोनों दिशाओं में छोटी व कम खिड़कियां होनी चाहिए। पश्चिम में खिड़की को पूरी पश्चिमी दीवार छोड़कर वायव्य कोण में रखा जाना चाहिए।










- दक्षिण दिशा की दीवार में आग्नेय कोण में खिड़की रखना ज्यादा शुभफलदायी होता है। इससे सूर्य की सायंकालीन हानिकारक रश्मियों का प्रवेश भवन में नहीं हो पाता।











- भवन में खिड़कियों की स्थिति इस प्रकार होनी चाहिए जिनसे ज्यादा से ज्यादा ऑक्सीजन भवन में आ सके। इसके लिए यथासंभव पूर्व व उत्तर दिशा की खिड़कियों के बाहर की तरफ छोटे पौधे लगाएं, जबकि पश्चिम व दक्षिण की खिड़कियों के बाहर बड़े पेड़ लगाएं।











- एक कक्ष में खिड़कियों की संख्या दो से अधिक संख्या नहीं होनी चाहिए। भवन में खिड़कियों की संख्या सम हो विषम नहीं।

गुरुवार, 22 जून 2017

तुलसी के पौधे के पास लगाएं ये पेड़



अधिकतर लोग अपने बाग- बगीचे में सोच समझकर पेड़-पौधे लगाते हैं। जो उनके घर परिवार के लिए सही हो, उससे जरूर लगाया जाता है, लेकिन क्या आपने पेड़- पौधे लगाते समय वास्तु को ध्यान रखा। कई बार बगीचे से भी वास्तुदोष लग जाता है, जिसका परिणाम लंबे समय तक भुगतना पड़ता है।



अधिकतर लोग घर में केले का पेड़ तो लगाते हैं, लेकिन उसे लगाने की दिशा का ध्यान नहीं रखते। केले के पेड़ को ईशान कोण में लगाने से आपके धन धान्य में वृद्घि होती हैं।


वास्तुशास्‍त्र की मानें तो तुलसी, केला, चंपा केतकी आदि पेड़ पौधे शुभ होते हैं और इन्हें घर में लगाने से कभी भी धन धान्य की कमी नहीं होती


तुलसी के पौधे को अक्सर लोग गमले में लगाकर छोड़कर देते है और उसके आस पास कोई दूसरा पौधा रखते है। जबकि तुलसी के पौधे के पास हमेशा केले का पौधा लगाना चाहिए। इससे भगवान विष्‍णु के साथ-साथ मां लक्ष्मी की भी कृपा मिलती है।


जिन पेड़ पौधे की पत्तियां या डालियां तोड़ने से उसमें से दूध निकले, ऐसे पौधों को घर के आस पास नहीं लगाना चाहिए। इससे धन की हानि होती है।



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बुधवार, 21 जून 2017

पशु-पक्षियों से संबंधित ज्योतिष उपाय



इनसे कम हो सकते है ग्रहों के अशुभ प्रभाव – ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ग्रहों का शुभ-अशुभ प्रभाव हर इंसान के जीवन पर पड़ता है। जब कोई ग्रह लगातार अशुभ फल दे रहा हो तो कुछ आसान उपाय कर उसके कुप्रभाव को कम किया जा सकता है। ये उपाय पालतू जानवरों व पशु-पक्षियों से जुड़े भी हो सकते हैं। ज्योतिषियों के अनुसार, जो ग्रह अशुभ प्रभाव दे रहा हो, यदि उसके प्रतिनिधि जीव-जंतु की सेवा की जाए तो उस ग्रह का अशुभ प्रभाव काफी हद तक कम किया जा सकता है। इससे दुर्भाग्य दूर होगा व सौभाग्य में वृद्धि भी होती है।

पशु-पक्षियों से संबंधित ज्योतिष उपाय


सूर्य – अगर कुंडली में सूर्य की स्तिथि खराब हो और उसके कारण परेशानियां आ रही हो तो रोज़ घोड़े को चारा खिलाएं व छत पर चिड़ियों के लिए दाना-पानी रखें।

चंद्रमा – चंद्रमा अगर अशुभ प्रभाव दे रहा हो तो पानी में रहने वाले जीव-जंतु जैसे-मछली, कछुआ के लिए आटे की गोलियां बनाकर तालाब या नदी में डालना चाहिए।


मंगल – ये गृह अशुभ हो तो जीवन में समस्याएं बनी रहती है। इसके अशुभ प्रभाव को कम करने के लिए भेड़ को चारा खिलाएं व बंदरों को भी कुछ खाने के लिए दें।

बुध – जन्म कुंडली में बुध अशुभ स्थान बैठा हो तो पक्षियों के लिए छत पर दाना-पानी डालें व घर पर तोता पालें। इससे आपकी परेशानियां कम हो सकती हैं।


गुरु – इस गृह के अशुभ प्रभाव के कारण विवाह होने में परेशानियां आती हैं। इसे अनुकूल करने के लिए गाय व हाथी को चारा खिलाएं व उनकी सेवा करें।

शुक्र – शुक्र ग्रह के कारण जीवन में परेशानियां आ रही हैं तो भेड़-बकरी व ऊंट को हरा चारा खिलाएं व कबूतरों के लिए छत पर दाना-पानी भी रखना चाहिए।

शनि – शनि ही मनुष्य को उसके अच्छे-बुरे कर्मों का फल प्रदान करता हैं। इसके अशुभ प्रभाव को कम करने के लिए भैंस, काला कुत्ता व कौए को उनके योग्य भोजन दें।

राहु-केतु – इन ग्रहों के कारण आ रही परेशानियों से बचने के लिए कुत्ते को रोटी खिलाएं, चींटियों के लिए शक्कर मिला हुआ आटा डालें व चूहों के लिए अनाज डालें।
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मंगलवार, 20 जून 2017

बहुत कम लोग जानते हैं इस कांड का नाम सुंदरकाण्ड ही क्यों रखा है



हनुमानजी की सफलता के लिए सुंदरकाण्ड को याद किया जाता है। श्रीरामचरित मानस के इस पांचवें अध्याय को लेकर लोग अक्सर चर्चा करते हैं कि इस अध्याय का नाम सुंदरकाण्ड ही क्यों रखा गया है? यहां जानिए इस प्रश्न का उत्तर...
श्रीरामचरित मानस में हैं 7 काण्ड
श्रीरामचरित मानस में कुल 7 काण्ड (अध्याय) हैं। सुंदरकाण्ड के अतिरिक्त सभी अध्यायों के नाम स्थान या स्थितियों के आधार पर रखे गए हैं। बाललीला का बालकाण्ड, अयोध्या की घटनाओं का अयोध्या काण्ड, जंगल के जीवन का अरण्य काण्ड, किष्किंधा राज्य के कारण किष्किंधा काण्ड, लंका के युद्ध की चर्चा का लंका काण्ड और जीवन से जुड़े प्रश्नों के उत्तर उत्तरकाण्ड में दिए गए हैं।
सुंदरकाण्ड का नाम सुंदरकाण्ड क्यों रखा गया?
हनुमानजी, सीताजी की खोज में लंका गए थे और लंका त्रिकुटाचल पर्वत पर बसी हुई थी। त्रिकुटाचल पर्वत यानी यहांं 3 पर्वत थे। पहला सुबैल पर्वत, जहां के मैदान में युद्ध हुआ था। दूसरा नील पर्वत, जहां राक्षसों के महल बसे हुए थे और तीसरे पर्वत का नाम है सुंदर पर्वत, जहां अशोक वाटिका निर्मित थी। इसी अशोक वाटिका में हनुमानजी और सीताजी की भेंट हुई थी। इस काण्ड की यही सबसे प्रमुख घटना थी, इसलिए इसका नाम सुंदरकाण्ड रखा गया है।

सुंदरकांड के पाठ से मिलता है मनोवैज्ञानिक लाभ
वास्तव में श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड की कथा सबसे अलग है। संपूर्ण श्रीरामचरितमानस भगवान श्रीराम के गुणों और उनके पुरुषार्थ को दर्शाती है। सुंदरकांड एकमात्र ऐसा अध्याय है जो श्रीराम के भक्त हनुमान की विजय का कांड है। मनोवैज्ञानिक नजरिए से देखा जाए तो यह आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति बढ़ाने वाला कांड है। सुंदरकांड के पाठ से व्यक्ति को मानसिक शक्ति प्राप्त होती है। किसी भी कार्य को पूर्ण करने के लिए आत्मविश्वास मिलता है।
हनुमानजी जो कि वानर थे, वे समुद्र को लांघकर लंका पहुंच गए और वहां सीता की खोज की। लंका को जलाया और सीता का संदेश लेकर श्रीराम के पास लौट आए। यह एक भक्त की जीत का कांड है, जो अपनी इच्छाशक्ति के बल पर इतना बड़ा चमत्कार कर सकता है। सुंदरकांड में जीवन की सफलता के महत्वपूर्ण सूत्र भी दिए गए हैं। इसलिए पूरी रामायण में सुंदरकांड को सबसे श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि यह व्यक्ति में आत्मविश्वास बढ़ाता है। इसी वजह से सुंदरकांड का पाठ विशेष रूप से किया जाता है।

सुंदरकांड के पाठ से मिलता है धार्मिक लाभ
हनुमानजी की पूजा सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली मानी गई है। बजरंग बली बहुत जल्दी प्रसन्न होने वाले देवता हैं। शास्त्रों में इनकी कृपा पाने के कई उपाय बताए गए हैं, इन्हीं उपायों में से एक उपाय सुंदरकांड का पाठ करना है। सुंदरकांड के पाठ से हनुमानजी के साथ ही श्रीराम की भी विशेष कृपा प्राप्त होती है। किसी भी प्रकार की परेशानी हो, सुंदरकांड के पाठ से दूर हो जाती है। यह एक श्रेष्ठ और सबसे सरल उपाय है। इसी वजह से काफी लोग सुंदरकांड का पाठ नियमित रूप करते हैं।

सुंदरकाण्ड के पाठ से प्रसन्न होते हैं हनुमानजी
माना जाता है कि सुंदरकाण्ड के पाठ से बजरंग बली की कृपा बहुत ही जल्द प्राप्त हो जाती है। जो लोग नियमित रूप से इसका पाठ करते हैं, उनके सभी दुख दूर हो जाते हैं। इस काण्ड में हनुमानजी ने अपनी बुद्धि और बल से सीता की खोज की है। इसी वजह से सुंदरकाण्ड को हनुमानजी की सफलता के लिए याद किया जाता है।
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सोमवार, 19 जून 2017

These architectural remedies will start doubling

दुकान के ठीक सामने कोई बिजली या फोन का खंबा, पेड़ अथवा सीढ़ी नहीं होना चाहिए यदि है तो आर्थिक नुकसान होगा। 

दुकान के अंदर समान रखने के लिए आलमारी, शो-केस, फर्नीचर आदि दक्षिण-पश्चिम या नैऋत्य में लगाएं। 

दुकान में माल का स्टोर, या कोई भी वैसा सामान जिसका वजन ज्यादा हो उसे नैऋत्य कोण (दक्षिण या पश्चिम) में रखना चाहिए.पूजा के लिए मंदिर ईशान, उत्तर या पूर्व में बनाएं। 

दुकान या शोरूम के मालिक को पश्चिम दिशा में बैठना चाहिए. ऐसा करने से आय में वृद्धि होती है। मालिक या मैनेजर तथा तिजोरी की जगह के ऊपर कोई बीम नहीं होना चाहिए, यह व्यवसाय के वृद्धि के लिए अच्छा नहीं होता।

दुकान
 में काम करने वाले दुकानदार और कर्मचारी इस बात का ध्यान रखें की वह दूकान में बैठे तब उनका मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा में हो इस दिशा में मुख करके बैठने से धन लाभ होता है। ऐसा करने से ग्राहक का दुकानदार और कर्मचारियों के मध्य बेहतर सम्बन्ध बना रहता है।

यदि आपकी दुकान में दुकानदार एवं कर्मचारी पश्चिम या दक्षिण की ओर मुख करके बैठते है तो सामान्यतः धन व्यय और कष्ट होता है।

दुकान की तिजोरी को पश्चिम या दक्षिण दीवार के सहारे रखना शुभ होता है जिससे उसका मुख उत्तर या पूर्व दिशा की ओर हो।

यदि दुकान में टीवी या कंप्यूटर रखना चाहते हैं, तो दक्षिणपूर्व दिशा सबसे शुभ है। दुकान खोलते समय तथा शाम को बिजली जलाने के बाद कभी भी दान नही देना चाहिए। 

कभी भी दान फेंककर न दें, साथ ही दान देते समय, धरती या आसमान की ओर नहीं देखना चाहिए।

यदि आपकी दुकान में दुकानदार एवं कर्मचारी पश्चिम या दक्षिण की ओर मुख करके बैठते है तो सामान्यतः धन व्यय और कष्ट होता है।

दुकान की तिजोरी को पश्चिम या दक्षिण दीवार के सहारे रखना शुभ होता है जिससे उसका मुख उत्तर या पूर्व दिशा की ओर हो।

यदि दुकान में टीवी या कंप्यूटर रखना चाहते हैं, तो दक्षिणपूर्व दिशा सबसे शुभ है। दुकान खोलते समय तथा शाम को बिजली जलाने के बाद कभी भी दान नही देना चाहिए। 

कभी भी दान फेंककर न दें, साथ ही दान देते समय, धरती या आसमान की ओर नहीं देखना चाहिए।

यदि आपके व्यवसाय में कोई परेशानी आ रही हो तो प्रतिदिन श्री लक्ष्मी सहस्रनाम का पाठ करें शीघ्र ही लाभ मिलेगा। 

यदि सरकार के अधिकारियों के द्वारा आपको बेवजह परेशान किया जा रहा हो तो प्राण-प्रतिष्ठित सूर्य यंत्र लगाने से समस्याएं दूर हो जाती है। 

यदि आप दुकान को लेकर शत्रु या गुण्डों से परेशान हो रहे है तो प्राण प्रतिष्ठित काली या बगुला मुखी यंत्र लगाने से लाभ मिलता है। 

दुकान आपके लिए शुभ फल प्रदान करे इसके लिए दुकान के मुख्य प्रवेश द्वार के ऊपर प्राण-प्रतिष्ठित बीसा या चौतीसा यंत्र लगाना चाहिए।
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शनिवार, 17 जून 2017

जानिए किस धातु के बर्तन में भोजन करने से होते है क्या लाभ

आजकल रसोई में जो बर्तन उपयोग में लाए जा रहे हैं, उनमें से अधिकतर या तो एल्युमिनियम के या प्लास्टिक के बने हाेते हैं। इन बर्तनों में भोजन करना न तो सेहत के हिसाब से ठीक है और न ही शास्‍त्रों में ही इसे ठीक बताया गया है। जानें शास्‍त्रों के अनुसार किस तरह के बर्तनों में भोजन करना हेल्थ के लिए फायदेमंद होता है….

1. लोहे के बर्तनआयुर्वेद के अनुसार, लोहे के बर्तनों में भोजन करने से शरीर में कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता। साथ ही, इससे शरीर में लौह तत्व की मात्रा बढ़ती है हिमोग्लोबिन का स्तर ठीक रहता है व पाचन संबंधित दिक्कते खत्म हो जाती हैं। घर में शांति रहती है और काम में तेजी से तरक्की होती है।


2. कांसे व पीतल के बर्तनकांसे के बर्तनों में जो भोजन बनता है उसमें 97 % पोषक तत्व विद्यमान रहते हैं। पीतल के बर्तन में बनने वाले भोजन में 92 % पोषक तत्व बरकरार रहते हैं| ये तथ्य CDRI की लेबोटरी से प्रमाणित हैं।आयुर्वेद के अनुसार, कांसे के बर्तन में भोजन करने से दिमाग तेज होता और भूख भी बढ़ती है। कांसे के बर्तनों में भोजन करने से रक्त पित्त ठीक होता है। पीतल के नक्काशीदार व सुंदर बर्तन उपयोग करने व इनमें भगवान विष्णु को भोग लगाने से घर में हमेशा बरकत रहती है।

3. सोने चांदी के बर्तन
कोई अगर थोड़े महंगे बर्तन खरीद सकता है तो चांदी के बर्तनों में भोजन करना काफी फायदेमंद होता है। चांदी की तासीर ठंडी होती है। इसलिए चांदी के बर्तन में भोजन करने से शरीर की गर्मी शांत होती है ‌और आंखें स्वस्‍थ रहती हैं। जबकि सोने के बर्तन में खाना खाने से शरीर मजबूत और ताकतवर होता है। पुरुषों के लिए सोने के बर्तनों में खाना खाना बहुत ही लाभदायक माना गया है।


4. मिट्टी के बर्तनमिट्टी के बर्तन में दाल 25 मिनट के अंदर धीमी आंच पर पक जाती है। इसलिए दाल को मिट्टी के बर्तन में पकने के लिए रखकर घर का काम करते रहिए। एक बार मिट्टी की हांड़ी में पकी दाल खाकर देखिए यह इतनी स्वादिष्ट और पौष्टिक होती है कि आप इस स्वाद को कभी, भूल नहीं पाएंगे। इसी तरह मिट्‌टी के तवे पर बनी रोटी व मटके का पानी न सिर्फ स्वादिष्ट होता है, बल्कि आपको जीवन भर स्वस्थ बनाए रखता है।

5. पत्तल में भोजन करनाशास्‍त्रों में पत्तल में भोजन करना काफी अच्छा बताया गया है। इसमें भोजन करने से भूख बढ़ती है और पेट की जलन भी खत्म होती है। ताजे पत्तों की बनी पत्तल में भोजन करने से शरीर के जहरीले तत्‍व भी खत्म होते हैं। शास्त्रों में माना गया है कि सुंदर पत्तल में देवताओं को भोजन करवाने से वे प्रसन्न होते हैं और घर में हमेशा समृद्धि बनी रहती है।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

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गुरुवार, 15 जून 2017

माथे की लकीरो के बारे में जानकारी

माथे की लकीरो के बारे में जानकारी 

1. सामुद्रिक शास्त्र



क्या आपने व्यक्ति के चेहरे-मोहरे देखकर, उसे पढ़कर व्यक्तित्व बताने वाली विधा सामुद्रिक शास्त्र के बारे में कभी सुना है? यह हिन्दू शास्त्र की विख्यात विधा है, जिसे ना केवल भारतीय स्तर पर, बल्कि विदेशों में भी उत्तम माना गया है।

2. महान शास्त्रीय विधा



इस विधा के प्रयोग से अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ता भी अपनी विभिन्न रिसर्च को एक अलग ही मुकाम पर ले जाने में सफल होते हैं। सामुद्रिक शास्त्र में केवल शरीरिक अंगों को आधार बनाते हुए ही व्यक्ति के चरित्र और सोच की जानकारी दी जाती है।


3. महान शास्त्रीय विधा



इसके अलावा उसके देखने का तरीका, उसकी आवाज, बोलने का तरीका, चलने या उठने-बैठने का तरीका, ऐसी कई चीजें हैं जिन्हें आधार बनाकर चरित्र की खूबियां बताई जाती हैं।

4. माथे की लकीरें



तो आज इस क्रम में आगे बढ़ते हुए हम आपको माथे की लकीरों के बारे में कुछ बताने जा रहे हैं। कुछ ज्योतिषी माथे की लकीरों को देखकर भविष्य तक बता देते हैं, लेकिन आज हम आपको माथे की विशेष 7 लकीरों के बारे में कुछ खास बताने जा रहे हैं।

5. माथे की लकीरें



माथे पर कई प्रकार की लकीरें होती हैं, लेकिन उनमें से 7 रेखाओं के बारे में यहां बताएंगे जो इस प्रकार हैं – बुध रेखा, शुक्र रेखा, मंगल रेखा, शनि रेखा, गुरु रेखा चंद्र रेखा और अंतिम है सूर्य रेखा।



6. बुध रेखा



भौहों (आएब्रोज) के ठीक बीचो-बीच बनती हैं ये रेखाएं। बुध रेखा व्यक्ति के तेज दिमाग की ओर इशारा करती है। जिस व्यक्ति की यह बुध रेखा भौहों के इस बीच के स्थान से लेती हुई दोनों ओर कानों तक जाती है, वह बेहद बुद्धिमान कहलाता है। धन के मामले में भी धुरंधर होते हैं ये लोग, कभी अपना आर्थिक नुकसान नहीं होने देते।

7. शुक्र रेखा



इस इमेज में जिस रेखा को आप देख पा रहे हैं, यही है शुक्र रेखा। यह रेखा कई बार माथे के ठीक बीचो-बीच होती है। जिन लोगों की यह रेखा स्पष्ट दिखाई देती है वे दुनिया घूमने-फिरने के शौकीन होते हैं। ये लोग काफी भाग्यशाली भी होते हैं।

8. शुक्र रेखा



यह रेखा जितनी गहरी होगी, उतना ही उस इंसान का भाग्य तेज होगा। इस रेखा का अधिक गहरा होना उस व्यक्ति का प्यार में रोमांटिक होने का संकेत भी देता है। लेकिन इस रेखा का ना के बराबर दिखना व्यक्ति को भाग्यहीन बनाता है।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

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क्यों होते हैं जुड़वां बच्चे



यह सवाल अक्सर हमारे मन में उठता है कि आखिर क्यों कुछ महिलाओं को जुड़वां या तीन बच्चे एक साथ होते हैं? आज हम यहां इसी सवाल का जवाब देने की कोशिश कर रहे हैं।

क्या होती है मल्टिपल प्रेग्नेंसी
एक से ज्यादा बच्चों को जन्म देने की घटना को मेडिकल टर्म में मल्टिपल प्रेग्नेंसी कहा जाता है। इसका मतलब है कि किसी महिला के गर्भ में दो या ज्यादा बच्चे हैं। ये बच्चे एक ही एग या अलग-अलग एग से हो सकते हैं।

दो तरह के होते है ट्विन्स
आइडेंटिकल ट्विन्स : एक ही एग से पैदा होने वाले बच्चे आइडेंटिकल कहलाते हैं। ऐसा तब होता है जब एक एग एक स्पर्म से फर्टिलाइज होता है। इसके बाद फर्टिलाइज्ड एग दो या ज्यादा हिस्सों में बंट जाता है। इसे काफी रेयर माना जाता है। इन बच्चों का चेहरा और नेचर बिल्कुल मिलता-जुलता होता है।

फ्रेटरनल ट्विन्स :अलग-अलग एग से पैदा होने वाले बच्चे फ्रेटरनल कहलाते हैं। ऐसा तब होता है जब दो या ज्यादा एग अलग-अलग स्पर्म से फर्टिलाइज होते हैं। अगर महिला के परिवार में पहले से ही फ्रेटरनल ट्विन्स हैं तो इसकी संभावना बढ़ जाती है। अधिकांश ट्विन्स इसी तरह के होते हैं। ऐसे ट्विन्स एक जैसे भी दिख सकते हैं और अलग-अलग भी।


क्यों होते हैं जुड़वां बच्चे
जुड़वां बच्चे होने के कई कारण होते है जिनमे से 6 प्रमुख कारणों के बारे में हम आपको बता रहे हैं –

1. फर्टिलिटी ट्रीटमेंट – जो महिलाएं IVF का सहारा लेती हैं या फर्टिलिटी दवाएं खाती हैं, उनमें ट्विन्स होने के चांस बढ़ जाते हैं।
क्यों – IVF में चांस बढ़ने के लिए यूट्रस में एक से ज्यादा फर्टिलाइज़्ड एग रखे जाते हैं। वहीं फर्टिलिटी दवाओं से भी ज्यादा एग बनते हैं।


2. फैमिली हिस्ट्री – अगर महिला के परिवार (मां, बहन, दादी) में पहले से ट्विन्स हैं तो उसको भी ट्विन्स होने की संभावना बढ़ जाती है।
क्यों – महिलाएं एग प्रोड्यूसर होती हैं। इसलिए उनके परिवार की मां या बहनों के जीन्स उनमें ट्रांसफर होते हैं।

3. लाइफस्टाइल – नॉनवेज और हाई फैट खाने वाली या मोटापे से ग्रस्त महिलाओं में ट्विन्स बेबी होने के चांस ज्यादा होते हैं।
क्यों – हाई फैट डाइट लेने वाली महिलाओं में हॉर्मोनल चेंजेस के कारण ऐसा हो सकता है।

4. एज़ – 30 से 40 साल की उम्र में मां बनने वाली महिलाओं में मल्टिपल प्रेग्नेंसी होने के ज्याद चांस होते हैं।
क्यों – डॉक्टर्स के मुताबिक बढ़ती उम्र में ओवरी का फंक्शन चेंज होता है और एग इवोल्यूशन बढ़ जाता है।

5. बच्चों की संख्या – जिन्हें पहले ट्विन्स या ज्यादा बच्चे है उन महिलाओं में मल्टिपल प्रेग्नेंसी होने के चांस बढ़ जाते हैं।
क्यों – महिला में एग प्रोड्यूस करने की क्षमता काफी अच्छी होने के कारण ऐसा होता हैं।

6. प्लेस – दुनिया के दूसरे हिस्सों के मुकाबले वेस्ट अफ्रीकन कंट्रीज़ में ट्विन्स होने के मामले ज्यादा सामने आते हैं।
क्यों – इसके पीछे इन इलाकों के क्लाइमेट और फ़ूड हैबिट्स को जिम्मेदार माना जाता हैं।

ट्विन्स पर कुछ इंट्रेस्टिंग स्टडीज
ट्विन्स पैदा करने वाली माताएं सामान्य माताओं की तुलना में ज्यादा जीती हैं। (उटाह यूनिवर्सिटी की स्टडी)
साढ़े पांच फ़ीट से ज्यादा हाइट वाली महिलाओं में ट्विन्स होने के चांस ज्यादा होते हैं। (रिसर्चर गेरी स्टीनमेन की स्टडी)
डेयरी प्रोडक्ट ज्यादा खाने वाली महिलाओं में ट्विन्स होने के चांस 5 गुना तक अधिक होते हैं। (जनरल ऑफ़ रिप्रोडक्टिव मेडिसिन में पब्लिश स्टडी)
गर्भ में ट्विन अपनी बॉडी के बजाय दूसरे बच्चे की बॉडी को ज्यादा टच करते हैं। (यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेडोवा, इटली के रिसर्चर की रिसर्च)सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

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शनिवार, 10 जून 2017

कैसे होता है किन्नर का अंतिम संस्कार



किन्नरों के अंतिम संस्कार को गोपनीय रखा जाता है। बाकी धर्मों से ठीक उलट किन्नरों की अंतिम यात्रा दिन की जगह रात में निकाली जाती है।

किन्नरों के अंतिम संस्कार को गैर-किन्नरों से छिपाकर किया जाता है। इनकी मान्यता के अनुसार अगर किसी किन्नर के अंतिम संस्कार को आम इंसान देख ले, तो मरने वाले का जन्म फिर से किन्नर के रूप में ही होगा।


वैसे तो किन्नर हिन्दू धर्म की कई रीति-रिवाजों को मानते हैं, लेकिन इनकी डेड बॉडी को जलाया नहीं जाता। इनकी बॉडी को दफनाया जाता है।

अंतिम संस्कार से पहले बॉडी को जूते-चप्पलों से पीटा जाता है। कहा जाता है इससे उस जन्म में किए सारे पापों का प्रायश्चित हो जाता है।


अपने समुदाय में किसी की मौत होने के बाद किन्नर अगले एक हफ्ते तक खाना नहीं खाते।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि किन्नर समाज अपने किसी सदस्य की मौत के बाद मातम नहीं मनाते। इसके पीछे ये वजह है कि मौत के बाद किन्नर को नरक रूपी जिन्दगी से से मुक्ति मिल गई।

मौत के बाद किन्नर समाज खुशियां मनाते हैं और अपने अराध्य देव अरावन से मांगते हैं कि अगले जन्म में मरने वाले को किन्नर ना बनाएं।सरकारी नौकरियों के बारे में ताजा जानकारी देखने के लिए यहाँ क्लिक करें । 

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vastu tips

यदि आपके जीवन में इन दिनों सबकुछ ठीक नहीं चल रहा तो वास्तुग के 15 ऐसे चमत्कारिक उपाय बताए हैं जो आपकी जिदंगी को बदलकर रख देंगे। 

घर
 के लिविंग रूम की दीवार पर उगते हुए सूर्य की एक तस्वीर लगाएं। यह तस्वीर भाग्योदय, नई संभावनाओं, यश और सफलता की सूचक है। 

घर के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में कम से कम एक तुलसी का पौधा जरूर रखें लेकिन इस बात का विशेष ध्यान रखें कि तुलसी के इस पौधे की ऊंचाई 1.5 मीटर से अधिक न हो। 

अगर घर में किसी बॉक्स या पर्स में पैसे इकट्ठा करके रखते हैं, तो इस बॉक्स को हमेशा कमरे के दक्षिण दिशा में रखें और अलमारी रखते समय यह ध्यान रखें कि अलमारी के दरवाजे हमेशा उत्तर दिशा में खुलने चाहिए।

टॉयलेट और बाथरूम के दरवाजे, जितना हो सके हमेशा बंद रखें। दरवाजे खुले रखने पर नकारात्मक ऊर्जा और बैक्टीरिया घर में प्रवेश कर सकते हैं। 

झाड़ू, पोंछा और सफाई में काम आने वाला अन्य सामान कभी भी किचन में न रखें। किचन में शीशा या आईना रखना या फिर दीवार पर लगाना भी गलत है। 

घर के सभी कोनों को साफ-सुथरा रखें और इन स्थानों पर रोशनी रखें। चाहें तो कैंडल्स, लैंप या डेकोरेटिव लाइट्स लगाकर इन स्थानों पर रोशनी बनाए रखें।


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शनिवार, 3 जून 2017

sandhya ke baad nahin karen ye 5 kaam



धार्मिक ग्रंथों के अनुसार हर काम का अपना एक समय निर्धारित होता है। कई ऐसे काम हैं जिन्हें दिन के वक्त नहीं करना चाहिए, वहीं कई ऐसे काम भी हैं जिन्हें रात वक्त बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए। ऐसा नहीं करते हैं तो फिर कोई अनहोनी आपके साथ हो सकती है। 
रात के वक्त किसी औरत को पराए मर्द से और मर्द को किसी पराई स्त्री से अकेले में नहीं मिलना चाहिए। इसके अलावा बुरी संगत में रहने वाले लोगों के साथ भी रात में नहीं मिलना चाहिए। इन दोनों हालात में आपकी बदनामी हो सकती है इतना ही नहीं आपके साथ किसी भी तरह की अनहोनी हो सकती है।

विष्णु पुराण के मुताबिक रात के वक्त भूलकर भी कभी श्मशान और कब्रिस्तान के पास से होकर नहीं गुज़रना चाहिए। क्योंकि रात के वक्त इसके आस-पास नकारात्मक ऊर्जा सबसे ज्यादा सक्रिय रहती हैं। रात के वक्त यहां जाने से आप भी नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव में आ सकते हैं और आपको नुकसान पहुंच सकता है।

रात में सोने से पहले डियो, इत्र या परफ्यूम बिल्कुल भी नहीं लगाना चाहिए। पुराणों के अनुसार रात के वक्त डियो, इत्र या परफ्यूम लगाने से नकारात्मक शक्तियां आपकी ओर आकर्षित हो सकती हैं। इसलिए कहा जाता है कि रात के वक्त हमेशा अपने हाथ-पैर और चेहरा धोकर ईश्वर का ध्यान करके सोना चाहिए।

रात के वक्त लड़कियों को अपने बालों को खुला रखकर नहीं सोना चाहिए। शास्त्रों के मुताबिक बाल खुले रखकर सोने से नकारात्मक शक्तियां आसानी से लड़कियों पर अपना प्रभाव बना लेती हैं। इसलिए हमेशा घर के बड़े बुजुर्ग लड़कियों को रात में बाल बांधकर सोने की सलाह देते हैं, ताकि उनकी नकारात्मक शक्तियों से रक्षा हो सके। रात के वक्त चौराहे पर नहीं जाना चाहिए।

रात के वक्त लड़कियों को अपने बालों को खुला रखकर नहीं सोना चाहिए। शास्त्रों के मुताबिक बाल खुले रखकर सोने से नकारात्मक शक्तियां आसानी से लड़कियों पर अपना प्रभाव बना लेती हैं। इसलिए हमेशा घर के बड़े बुजुर्ग लड़कियों को रात में बाल बांधकर सोने की सलाह देते हैं, ताकि उनकी नकारात्मक शक्तियों से रक्षा हो सके। रात के वक्त चौराहे पर नहीं जाना चाहिए।


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बुधवार, 31 मई 2017

सुबह उठने के बाद हाथ के दर्शन क्यों करने चाहिए ?

प्रातःकाल कर (हाथ) दर्शन क्यों करना चाहिए? 

प्रातःकाल उठते ही भगवतस्मरण करते हुए कर अर्थात् हाथ का दर्शन का शास्त्रीय विधान है।
करागे्र वसति लक्ष्मीः, करमध्ये सरस्वती।
करमूले तु गोविन्द, प्रभाते करदर्शनम्।।
हाथ के अग्र भाग में लक्ष्मी का निवास है, हाथ के मध्य भाग में सरस्वती रहती हैं और हाथ के मूलभाग में गोविन्द भगवान रहते है।, इसलिए प्रातःकाल हाथ का दर्शन करना चाहिए। मानव-जीवन की सफलता के लिए तीन वस्तुएं आवश्यक हैं- धन,ज्ञान और ईश्वर। ये तीनों वस्तुएं प्राप्त करना मनुष्य के हाथ में है। यही भाव कर-दर्शन में सन्निहित है।

मंगलवार, 30 मई 2017

सुख-शांति पाने के लिए यह उपाय आजमाएं

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देह समुद्भवान्। जन्ममृत्युजराहु: खैर्विमुक्तोकमृतमश्रुते ।। 
श्रीमद्भागवत गीता के 14वें अध्याय का यह श्लोक मानसिक अशांति एवं क्रोध को नष्ट करने का उत्तम मंत्र है। इस श्लोक का प्रतिदिन प्रात: या सांय काल उच्चारण करने से इन दोषों का निवारण होता है। 

पुराणों में कहा गया है, इस मंत्र का कम से कम 21 बार जाप करना चाहिए। एक 101 बार ओम कृष्णाय नम: का जाप करें। धर्मशास्त्रीय दृष्टि से जाप के समय प्याज, लहसुन, मदिरा व मांस का सेवन पूर्णत: वर्जित है। 

तामसी प्रवृत्ति वाले पुरुषों को यह जाप कृष्ण मंदिर या पीपल या वटवृक्ष के नीचे करना चाहिए और गुरुवार को पीले वस्त्र व रविवार को बैगनी वस्त्र धारण करने चाहिए।

बुजुर्ग व बीमार लोगों को शनिवार को इस श्लोक के जाप के पश्चात अपने हाथों से काले तिल, तेल का तिल साबूत सरसों व काले वस्त्रों का दान करना चाहिए।

रात्रि में जप के पश्चात भगवान श्री कृष्ण का ध्यान करना चाहिए। यूं तो किसी भी मंत्र का जाप लाभदायक माना जाता है, लेकिन खासकर उपरोक्त अध्याय और श्लोक का जाप सकारात्मक परिणाम देता है।

जाप करने से जातक कुछ ही दिनों में मानसिक शांति महसूस करने लगता है। यहां तक कि परिवार के अन्य सदस्य भी इसका जाप करें तो घर में शांति और खुशहाली का वास होने लगता है। परिवारजनों में आत्मीयता बढऩे लगती है।
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रविवार, 28 मई 2017

राजस्थान की बिश्नोई समाज



राजस्थान की बिश्नोई समाज की महिलाएं हिरण के बच्चों को बिल्कुल मां की तरह पालती है, यहां तक की उन्हें अपना दूध भी पिलाती है
बताया जाता है कि राजस्थान में करीब 500 सालों से बिश्नोई समाज के लोग जानवरों को अपने बच्चों की तरह पालते आ रहे हैं।

बिश्नोई समाज की महिलाएं जानवरों को पालती हैं साथ ही अपने बच्चे की तरह उनकी देखभाल करती हैं। न सिर्फ महिलाएं बल्कि, इस समाज के पुरुष भी लावारिस और अनाथ हो चुके हिरण के बच्चों को अपने घरों में परिवार की तरह पालते हैं। इस समाज की महिलाएं खुद को हिरण के इन बच्चों की मां कहती हैं।
क्या है बिश्नोई समाज
बिश्नोई समाज को ये नाम भगवान विष्णु से मिला। बिश्नोई समाज के लोग पर्यावरण की पूजा करते हैं। इस समाज के लोग ज्यादातर जंगल और थार के रेगिस्तान के पास रहते हैं। जिससे यहां के बच्चे जानवरों के बच्चों के साथ खेलते हुए बड़े होते हैं। ये लोग हिंदू गुरु श्री जम्भेश्वर भगवान को मानते हैं। वे बीकानेर से थे। इस समाज के लोग उनके बताए 29 नियमों का कड़ाई से पालन करते हैं।
कटने से बचाने के लिए पेड़ों से चिपक गए थे लोग, 363 लोगों की गई थी जान
जोधपुर से सटे खेजड़ली गांव में वर्ष 1736 में खेजड़ी की रक्षा के लिए बिश्नोई समाज के 363 लोगों ने अपनी जान दे दी थी। उस वक्त खेजड़ली व आसपास के गांव पेड़ों की हरियाली से भरे थे। दरबार के लोग खेजड़ली में खेजड़ी के पेड़ काटने पहुंचे। ग्रामीणों काे पता चला तो उन्होंने इसका विरोध किया। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि पेड़ नहीं काटें, लेकिन वे नहीं माने। तभी खेजड़ली की अमृतादेवी बिश्नोई ने गुरु जम्भेश्वर महाराज की सौगंध दिलाई और पेड़ से चिपक गईं। इस पर बाकी लोग भी पेड़ों से चिपक गए। फिर संघर्ष में एक के बाद एक 363 लोग मारे गए। बिश्नोई समाज ने इन्हें शहीद का दर्जा दिया और इनकी याद में हर साल खेजड़ली में मेला भी लगता है। अमृता देवी के नाम केंद्र और कई राज्य सरकारें पुरस्कार देती हैं।
भाई-बहन की तरह रहते हैं बच्चे
यहां रहने वाले 21 साल की रोशनी बिश्नोई कहती हैं कि ‘मैं हिरण के बच्चों के साथ ही बड़ी हुई हूं।’ वे मेरे भाई-बहन जैसे ही हैं। ये मेरी ड्यूटी है कि उन्हें (हिरणों) को किसी तरह की परेशानी ना हो। रोशनी बताती हैं कि ‘हम एक-दूसरे से बात करते हैं। वो हमारी भाषा अच्छी तरह से समझते हैं।’
फिल्म की शूटिंग के दौरान शिकार का मामला
बता दें कि 1998 में यहां के बिश्नोई समाज ने सलमान के खिलाफ हिरण के शिकार का मामला दर्ज कराया था। इसके बाद जब सलमान जयपुर मैराथन में भी हिस्सा लेने पहुंचे, उस वक्त भी बिश्नोई समाज ने उनका कड़ा विरोध किया था। इस मामले में सलमान जेल तक जा चुके हैं। हालांकि, वे बाद में इस मामले में काेर्ट से बरी कर दिए गए।
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